सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 268, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 268
॥ जगत्मिथ्यात्व को अंग ॥ [२५६
कहत है देह माहि जीव आइ मिलि रह्यो.
कहां देह कहा जीव वृथा चौंक पर्यो है ।
बूटवे के डरतें तिरन को उपाय करै,
ऐसें नहि जानै यहु मृगजरा भयौ है ॥
जेवरी कौं साप जैसे सीपि विषै रूपौ जानि,
और की और ई देखि यां ही भ्रम पर्यो है ।
सुन्दर कहत यह एक ई अखंड ब्रह्म,
ताहि को पलटि के जगत नाम धर्यो है ॥५॥
॥ इति जगन्मिथ्यात्व को अंग सम्पूर्ण ॥