सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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२४६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥३२॥
इन्देव छंद (प्रश्नोत्तर)
हौ तुम कौन ? हू ब्रह्म अखंडित,
देह मै क्यो ? नहि देह कै नेरै ।
बोलत केसै कै ? हूं नहि बोलत,
जानिये कैसै ? अज्ञान है तेरै ॥
दूरि करो भ्रम ? निश्चै धारि,
कहौ गुरुदेव ? कहौ नित टेरै ।
हू तुम ऐसे, हि तू पुनि ऐसौ ई,
दोइ भये ? नहिं द्वैत है मेरै ॥१॥
हू कछु और कि तू कछु और कि,
है कछु और कि सो कछु औरै ।
हू अरु तू यह है कछू सौ पुनि,
बुद्धि विलास भयौ झक झौरै ॥
हू नहि तू नहिं है कछु सौ नहि,
बूझि बिना जित ही तित दौरै ।
हू पुनि तू पुनि है कछु सो पुनि,
सुन्दर व्यापि रह्यौ सब ठौरै ॥२॥
उत्तम मद्धिम और शुभाशुभ,
भेद अभेद जहा लग जो है ।