सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४६
मनहर छंद
सिष्य पूछै गुरुदेव ! गुरु कहैं पूछ सिष्य,
मेरैं एक संशय है ? पूछै क्यों न अब ही ।
तुम कह्यौ एक ब्रह्म, अबहू मैं कहू एक,
एक तौ अनेक क्यौ ? इहै तौ भ्रम सब ही ॥
भ्रम इहै कौन कौ है ? भ्रम ही कौ भ्रम भयौ,
भ्रम ही कौ भ्रम कैसे ? तू न जानै कब ही ।
कैसे करि जा गै प्रभु ? गुरु कहै निश्चै धरि,
निहचै मै धार्यौ अब एक ब्रह्म तब ही ॥६॥
ब्रह्म ठौर कौ है ठौर दूसरौ न कोऊ और,
बस्तु कौ बिचार कियै बस्तु पहिचानिये ।
पंच तत्त तीनि गुन बिस्तरे बिबिध भाति,
नाम रूप जहा लगै मिथ्या माया मानिये ।:
सेषनाग आदि दै कै बैकुण्ठ गोलोक पुनि,
वचन बिलास सब भेद भ्रम भानिये ।
न तो कोऊ उरझ्यौ न सुरझ्यौ कहौ सु कौन,
सुन्दर सकल यह ऊबाबाई जानिये ॥१०॥
(१०) ऊवाबाई-भूल भुलैया ।