सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २२१
एक घर दोइ घर तीन घर चार घर,
पंच घर तजै तब छठी घर पाइ है ।
एक एक घर कै आधार एक एक घर,
एक घर निराधार आपु ही दिखाइ है ॥
सो तौ घर साक्षीरूप घर घर मैं अनूप,
ताहू घर मधि कोऊ दिन ठहराइ है ।
ताकै परै साक्षी न असाक्षी न सुन्दर कछु,
बचन अतीत कछू आइ है न जाइ है ॥२८॥
एक तौ श्रवन ज्ञान पावक ज्यौ देखियत,
माया जल वरसत वेगि बूझि जातु हे ।
एक है मनन ज्ञान बिजुरि ज्यीं घन मधि,
माया जल वरसत तामैं न बुझातु है ।
एक निदिध्यास ज्ञान बडवा अनल सम,
प्रगट समुद्र माहि माया जल खातु है ।
आत्मा अनुभव ज्ञान प्रलय अगनि जैसे,
सुन्दर कहत द्वैत प्रपंच बिलातु है ॥२६॥
(२८) घर-शरीर आदि का घेरा, पञ्च कोष ।
(२६) पावक-अग्नि, आग । बिजुरि-बिजली । घन-
बादल । वडवा अनल-समुद्र की अग्नि । प्रपंच-विस्तार ।
२२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
चकमक ठोके तै चमत्कार होत कछु,
ऐसौ है श्रवन ज्ञान तबही लौ जानिये ।
कफमन लागै जब प्रगटै पावक ज्ञान,
सिलगत जाइ वह मनन बखानिये ॥
वर्धमान भये काठ कर्मनि जरावत है,
वह निदिध्यास ज्ञान ग्रंथनि मैं गानिये ।
सकल प्रपंच यह जारि कै समाइ जात,
सुन्दर कहत वह अनुभै प्रमानिये ॥३०॥
भोजन की बात सुनि मन मैं मुदित होत,
मुख मैं न परै जौ लौ मेलिये न ग्रास है ।
सकल सामग्रो आनि पाक कौ करन लाग्यौ,
मनन करत कब जीमू यह आस है ॥
पाक जब भयौ तब भोजन करन बैठो,
मुख मैं मेलत जाइ उहै निदिध्यास है ।
भोजन परन करि तृपत भयौ है जब,
सुन्दर साक्षानकार अनुभै प्रकास है ॥३१॥
श्रवन करत जब सबसौ उदास होइ,
चित्त एकागर आनि गुरु मुख सुनिये ।
(३०) कफमन-कपास, रूई ।
॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २२३
बैठि कै एकत ठौर अंतहकरन माहि,
मनन करत फेरि उहै ज्ञान गुनिये ॥
ब्रह्म अपरोक्ष जानि कहत है अह ब्रह्म,
सोह सोह होइ सदा निदिध्यास घुनिये ।
उहै अनुभव उहै कहिये साक्षातकार,
सुन्दर पालै तैं गलि पानी होइ मुनिये ॥३२॥
जब ही जिज्ञास होइ चित एक ठौर आनि,
मृग ज्यौ सुनत नाद श्रवन सो कहिये ।
जैसे स्वाति बूंद हू कौ चातक रटत पुनि,
ऐसे ही मनन करै कब बूंद लहिये ॥
जैसे रात्रि हू चकोर चंद्रमा कौ धरै ध्यान,
ऐसे जानि निदिध्यास दृढ करि ग्रहिये ।
सुन्दर साक्षातकार कीट जैसे होइ भृंग,
उहै अनुभव उहै स्वस्वरूपर हिये ॥३३ ॥
काहू कौ पूछत रक धन कैसे पाइयत,
कान दै कै सुनत श्रवन सोई जानिये ।
उन कह्यौ धन हम देख्यौ है फलानी ठौर,
मनन करत भयौ कब घर आनिये ॥
(३२) एकागर-एकाग्र ।
(३३) जिज्ञास-जिज्ञासा ।
२२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
फेरि जब कह्यो धन गड्यौ तेरे घर माहि,
खोदन लग्यौ है तब निदिध्यास ठानिये ।
धन निकस्यौ है जब दरिद्र गयौ है तब,
सुन्दर साक्षात्कार नृपति बखानिये ॥३५'
॥ इति आतम अनुभव को अंग सम्पूर्ण ॥
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२५
अथ ज्ञानी को अंग ॥२७॥
इन्दव छंद
जाकै हृदै महिं ज्ञान प्रकासत
ताकौ सुभाव रहै नहिं छानौ ।
नैन मैं बैन मैं सैन मै जानिये,
ऊठत बैठत है अलसानौ ।
ज्यौ कछु भक्ष किये उदगारत,
कैसैं हुं राखि सकै न अघानौ ।
सुन्दरदास प्रसिद्धि दिखावत,
धान कौ खेत पयार तैं जानौ ।:१॥
ज्ञान प्रकाश भयौ जिनकै उर,
वे घट क्यूं हि छिपे न रहैगे ।
भोड्ल मांहि दुरै नहि दीपक,
यद्यपि वे मुख मौन गहेगे ।
ज्यूं घनसार हि गोप छिपावत,
तौहि सुगंधि सु तज्ञ लहैगे ।
सुन्दर और कहा कोऊ जानत,
बूंठे को बात बटाऊ कहैगे ॥२ ।
(१) पयार-प्याल, चावल का डठल ।
(२) घनसार-कपूर । तज्ञ-तत्वज्ञ, समझने वाले ।
दुरै-छिपता है । बूंठेकी-यात्री की ।
२२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
बोलत चालत बैठत ऊठत,
पीवत खातहु सूंघत श्वासै ।
ऊपरि तौ ब्यवहार करै सब,
भीतर स्वप्न समान सौ भासै ॥
लै कर तीर पताल कौ साधत,
मारत है पुनि फेरि अकासै ।
सुन्दर देह क्रिया सब देखत,
कोऊ न पावत ज्ञानी को आशै ॥३॥
बैठै तौ बैठै चलै तौ चलै पुनि,
पीछै तौ पीछै हि आगै तौ आगै ।
बोलैतौ बोलै न बोलैतौ मौनहि,
सोवै तौ सोवै रु जागै तौ जागै ॥
खाइ तौ खाइ नही तौ नही जु,
ग्रहै तौ ग्रहै अरु त्यागी तौ त्यागै ।
सुन्दर ज्ञानी की ऐसी दशा यह,
जानै नही कछु राग विरागै ॥४॥
(३) आशै-आशय, भाव, अभिप्राय ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२७
देखत है पै कछू नही देखत,
बोलत है नही बोल बखानै ।
सूघत है नही सूघत घ्रान,
सुनै सब है न सुनै यह मानै ॥
भक्ष करै अरु नाहि भखै कछु,
भेटत है नहि भेटत प्रानै ।
लेत है देत है देत न लेत है,
सुन्दर ज्ञानी की ज्ञानी ही जानै ॥५॥
काज अकाज भलौ न बुरौ कछु,
उत्तम मद्धिम दृष्टि न आवै ।
कायिक वाचिक मानस कर्म सु,
आपु विषै न तिन्है ठहरावै ॥
हौ करि हौ न कियौ न करौ अब,
यौ मन इद्रिनि कौ बरतावै ।
दीसत है विवहार विषै नित,
सुन्दर ज्ञानी को कोउ न पावै ॥६॥
देखत ब्रह्म सुनै पुनि ब्रह्म हि,
बोलत है सोऊ ब्रह्म हि बानी ।
भूमि हु नीर हु तेज हु वायु हु,
व्योम हु ब्रह्म जहा लगि प्रानी ॥
२२८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
आदि हु अति हु मधि हु ब्रह्म हि,
है सब ब्रह्म इहै मति ठानी।
सुन्दर ज्ञेय रु ज्ञान हु ब्रह्म हि,
आपु हु ब्रह्म हि जानत ज्ञानी ॥७॥
ऊठत केवल बैठत केवल,
बोलत केवल बात कही है।
जागत केवल सोवत केवल,
जोवत केवल दृष्टि लही है ॥
भूत हु केवल भावि हु केवल,
बर्तत केवल ब्रह्म सही है।
है सब ही अध ऊरध केवल,
सुन्दर केवल ज्ञान वही ९ ॥८॥
केवल ज्ञान भयौ जिनकै उर,
ते अध ऊरध लोक न जाही।
व्यापक ब्रह्म अखंड निरन्तर,
वा बिन और कहू कछु नाही ॥
ज्यौ घट नाश भये घटव्योम सु,
लीन भयौ पुनि है नभ माही '
त्यौ मुनि मुक्ति जहा वपु छाडत,
सुन्दर मोक्ष शिला कहु काही ॥६॥
(९) वपु-शरीर । मोक्षशिला-जैन धर्म मे प्रसिद्ध उच्च
अवस्था ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२६
आदि हु तौ नहि अंतहु है नहीं,
मधि शरीर भयौ भ्रम कूप ।
भासत है कछु और की और ई,
ज्यौ रजु मैं अहि सोपि मु रूप ॥
देखि मरीचि उठ्यी विचि विभ्रम,
जांनत नाहि उहै रवि धूपं ।
सुन्दर ज्ञान प्रकाश भयौ जब,
एक अखंडित ब्रह्म अनूप ॥१०॥
मनहर छन्द
जाही कै विवेक ज्ञान ताही कै कुशल भई,
जाही ओर जाइ वाकौं ताही ओर सुख है ।
जैसै कोऊ पाइनि पजार कौं चढाइ लेत,
ताकौ तो न काऊ कांटे खोभरे कौ दुख है ॥
भावै कोऊ निन्दा करौ भावै तौ प्रससा करौ,
वौ तौ देखै आरसी मैं आपनौ ई मुख है ।
देह कौ व्यौहार सब मिथ्या करि जांनै सोई,
सुन्दर कहत एक आतमा की रुख है ॥११॥
(१०) मरीचि-मृगतृष्णा * विचि-वीचि, जल की
तरंगें ।
(११) पैजार-जूती । खोभरा-खड्डा । रुख-लक्ष्य ।
२३० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अंतहकरन जाकै तम गुन छाइ रह्यौ,
जड़ता अज्ञान वाकै आलस भै त्रास है।
रज गुन कौ प्रभाव अंतहकरन जाकै,
विविध करम वाकै कामनां को वास है ॥
सत्त्व गुन अंतहकरन जाकै देखियत,
क्रिया करि सुध वाकै भक्ति कौ निवास है।
त्रिगुन अतीत साक्षी तुरीय स्वरूप जानि,
सुन्दर कहत वाकै ज्ञान को प्रकाश है ॥१२॥
तमोगुनी बुद्धि सु तौ तवा कै समान जैसे,
ताकै मध्य सूरज की रच हू न जोति है।
रजोगुनी बुद्धि जैसे आरसी की औंधी ओर,
ताकै मध्य सूरज कौ कछुक उद्योत है॥
सतोगुनी बुद्धि जैसे आरसी की सूधी ओर,
ताकै मध्य प्रतिबिंब सूरज की पोत है।
त्रिगुन अतीत जैसे प्रतिबिंब मिटि जात,
सुन्दर कहत एक सूरज ई होत है ॥१३॥
(१२) तुरीय-चतुर्थ अवस्था । भै भय ।
(१३) उद्योत-प्रकाश । पोत-छाया ।
॥ ज्ञानी को अग ॥ [ २३१
सबसौँ उदास होइ काढ़ि मन भिन्न करै,
ताकौ नाम कहियत परम बैराग है ।
अंतहकरन हूं की वासना निवृत्त होहि,
ताकौ मुनि कहत हैं उहै बडौ त्याग है ॥
चित्त एक ईश्वर सौं नेकहू न न्यारौ होइ,
उहै भक्ति कहियत उहै प्रेम माग है ।
आपु ब्रह्म जगत कौ एक करि जानै जब,
सुन्दर कहत वह ज्ञान भ्रम भाग है ॥१४॥
भ्रम विध्वंस
कोऊ नृप फूलनि की सेज पर सूतौ आइ,
जब लग जाग्यौ तौ लौं अति सुख मान्यौ है ।
नीद जब आई तब वाही कौ सुपन भयौ,
जाइ पर्यौ नरक कै कुंड मैं यों जान्यौ है ॥
अति दुख पावै पर निकस्यौ न क्यौ ही जाइ,
जागि जब पर्यौ तब सुपन बखान्यौ है ।
इह झूठ वह झूठ जाग्रत सुपन दोऊ,
सुन्दर कहत ज्ञानी सब भ्रम भान्यौ है ॥१५॥
(१४) माग-मार्ग । भ्रमभाग-भ्रान्ति रहित ।
२३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुपनै मै राजा होइ सुपनै मैं रक होइ,
सुपनै मैं सुख दुख सति करि जानै है ।
सुपनै मैं बुद्धिहीन मूढ समझै न कछु,
सुपनै मैं पडित बहु ग्रथनि बखानै है ॥
सुपनै मैं कामी होइ इद्रनि कै बसि पर्यौ,
सुपनै मैं जती होइ अहकार आनै है ।
सुपनै ते जाग्यौ जब समुझि परी है तब,
सुन्दर कहत सब मिथ्या करि मानै है ॥१६॥
बिधि न निषेध कछु भेद न अभेद पुनि,
क्रिया सौ कग्त दीसै यौ ही नित प्रति है ।
काहू कौ निकट राखै काहू कौ तौ दूरि भाखै,
काहू सौ नेरै न दूरि ऐसी जाकी मति है ॥
राग ही न द्वेष कोऊ शोक न उछाह दोऊ,
ऐमी विधि रहै कहु रति न विरति है ।
वाहिर व्यौहार ठानै मन मैं सुपन जानै,
सुन्दर ज्ञानी की कछु अदभूत गति है ॥१७॥
(१६) जती-यति, साधु सन्यासी ।
(१७) विधि-विधान, आज्ञा । उछाह-उत्साह, उमग,
खुशी । रति-आसक्ति । विरति-वैराग्य, अरुचि ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३३
कामी है न जती है न सूम है न सती है न,
- राजा है न रक है न तन है न मन है।
सोवै है न जागै है न पीछे है न आगै है न,
ग्रहै है न त्यागै है न घर है न वन है॥
थिर है न डोलै है न मौन है न बोलै है न,
बधै है न खोलै है न स्वामी है न जन है।
वैसौ कोऊ होइ जब वाकी गति जानै तब,
सुन्दर कहत ज्ञानी शुद्ध ज्ञान-घन है ॥१८॥
सुनत श्रवन मुख बोलत बचन घ्रान,
सूघन फूलनि रूप देखत दृगन है।
त्वक् सपर्शन रस रसना ग्रसन कर,
ग्रहत असन अरु चलत पगन है॥
करत गवन पुनि बैठत भवन सेज,
सोवत रवन तन औढत नगन है।
जु जु कछु बिवहार जानत सकल भ्रम,
सुन्दर कहत ज्ञानी गगन-मगन है ॥१९॥
(१९) अशन-भोजन । गगनमगन-आकाशवत् शुद्ध
व्यापक ब्रह्म स्वरूप ।
२३४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कर्म न विकर्म करै भाव न अभाव धरै,
शुभ हू अशुभ परै यातै निधरक है।
बसती न शून्य जाकै पाप ही न पुन्य ताकै,
अधिक न न्यून वाकै स्वर्ग न नरक है॥
सुख दुख सम दोऊ नीच ही न ऊच कोऊ,
ऐसी विधि रहै सोऊ मिल्यौ न फरक है।
एक ही न दोइ जानै बध मोक्ष भ्रम मानै,
सुन्दर कहत ज्ञानी ज्ञान मै गरक है ॥२०॥
अज्ञानी कौ दुख कौ समूह जग जानियत,
ज्ञानी कौ जगत सब आनन्द स्वरूप है।
नैन हीन कौ तौ घर बाहिर न सूझै कछु,
जहा जहा जाइ तहा तहा अधकूप है॥
जाकै चक्षु है प्रकाश अंधकार भयौ नाश,
वाकौ जहा रहै तहा सूरज की धूप है।
सुन्दर अज्ञानी ज्ञानी अंतरि बहुत आहि,
वाकै सदा राति वाकै दिवस अनूप है ॥२१॥
(२०) निधरक-बेधटक, निर्भय । गरक-मग्न, डूबा
हुआ ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३५
ज्ञानी अरु अज्ञानी की क्रिया सब एकसी ही,
अज्ञ आशा और ज्ञानी आश न निराश है ।
अज्ञ जोई जोई करै अहकार बुद्धि धरै,
ज्ञानी अहकार बिनु करत उदास है ॥
अज्ञ सुख दुख दोऊ आपु विषै मानि लेत,
ज्ञानी सुख दुख कौ न जानै मेरे पास है ।
अज्ञ कौ जगत यह सकल सताप करै,
सुन्दर ज्ञानी कै सब ब्रह्म कौ बिलास है ॥२२॥
ज्ञानी लोक संग्रह कौ करत व्यौहार बिधि,
अंतहकरन मैं सूपन की सी दौर है ।
देत उपदेश नाना भाति के वचन कहि,
सब कोऊ जानत सकल शिरमौर है ॥
हलन चलन पुनि देह सौ करत नित,
ज्ञान मैं गरक नित हिये निज ठौर है ।
सुन्दर कहत जैसे दन्त गजराज मुख,
खाइबे के और ही दिखाइबे कै और है ॥२३॥
(२३) लोक-संग्रह-लोक-शिक्षा ।
२३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इद्रिनि कौ ज्ञान जाकै सु तौ पशु कै समान,
देह अभिमान खान पान ही सौं लीन है ।
अंतहकरन ज्ञान कछुक बिचार जाकै,
मनुष व्यौहार शुभ कर्मनि अधीन है ॥
आतमा बिचार ज्ञान जाके निशवासरि है,
सोई साधु सकल [ही बात मैं प्रबीन है ।
एक परमातमा कौ ज्ञान अनुभव जाकै,
सुन्दर कहत वह ज्ञानी भ्रम छीन है । २४॥
जाही ठौर रवि कौ उद्योत भयौ ताही ठौर,
अंधकार भागि गयौ गृह बनवास तैं ।
न तौ कछु बन तैं उलटि आवै घर माहि,
न तौ बन चलि जाइ कनक आवास तैं ॥
जैसे पखी पाख टूटि जाही ठौर पर्यौ आइ,
ताही ठौर गिरि रह्यौ उडिबे की आश्र तें ।
सुन्दर कहत मिटि जाइ सब दौर धूप,
धोखौ न रहत कोऊ ज्ञान के प्रकाश तैं ।२५।।
(२४) निशवासर-रातदिन ।
(२५) कनक-सुवर्ण । आवास-महल ।
॥ ज्ञानी को अग ॥ [ २३७
जैसे काहू देश जाइ भाषा कहै और सी ही,
समुझ न कोऊ वासी कहै का कहतु है ।
कोऊ दिन रहि करि बोली सीखै उनही की,
फेरि समुझावै तब सबकौ लहतु है ॥
तैसे ज्ञान कहैं तै सुनत बिपरीत लागै,
आप आपुनौ ही मत सबकौ गहतु है ।
उनही के मत करि ¸न्दर कहत ज्ञान,
तबही तौ ज्ञान ठहराइ के रहतु है ॥२६॥
एक ज्ञानी कर्मनि मैं ततपर देखियत,
भक्ति कौ प्रभाव नाहिं ज्ञान मैं गरक है ।
एक ज्ञानी भकति कौ अत्यन्त प्रभाव लिये,
ज्ञान माहि निश्चै कर कर्म सौ तरक है ॥
एक ज्ञानी ज्ञानही मैं ज्ञानकौ उच्चार करै,
भक्ति अरु कर्म इनि दुहु तै फरक है ।
कर्म भक्ति ज्ञान तीनौ वेद मै बखान कहे,
सुन्दर बतायो गुरु ताहि मैं लरक है ॥२७॥
(२७) भकति-भक्ति । तरक-तर्क । लरक-तत्पर, लगा
हुआ ।
२३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जसै पखी पगनि सौ चलत अवनि आड,
तैसे ज्ञानी देह करि कर्मनि कग्तु है !
जैस पखी चचु करि चुगत अहार पुनि,
तैसे ज्ञानी उर मै उपासना धरतु है ॥
जैसे पखी पखनि सौ उडत गगन माहि,
तैसे ज्ञानी ज्ञान करि ब्रह्म मैं चरतु है ।
सुन्दर कहत ज्ञानी तीनौ भाति देखियत,
ऐसी विधि जानै सब सशय हरतु है ॥२८॥
इन्दव छन्द
एक क्रिया करि किर्षि निपावत
आदि रु अंत ममत्त्व वध्यौ है ।
एक क्रिया करि पाक करै जब,
भोजन लौ कछु अन्न रध्यौ है ॥
एक क्रिया मल त्यागत है,
लघुनीति करै कहु नाहिं फध्यौ है ।
त्यौ यह ज्ञानि क्रिया अरु सग्रह,
सुन्दर तीनि प्रकार सध्यौ है ॥ ६॥
(२८) अवनि-पृथ्वी, जमीन । अहार-आहार, भोजन ।
उर-हृदय, मन ।
(२६) किर्षि कृषि, खेती । निपावत-उपजाता है ।
॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २३६
दोइ जने मिलि चौपरि खेलत,
सारि धरै पुनि डारत पासा ।
जीतत है सु खुशी मन मैं अति,
हारत है सु भरै जु उषासा ॥
एक जनौ दुहु ओर हो खेलत,
हारि न-जीति करै जु तमासा ।
तैसे अज्ञानी कै द्वैत भयौ भ्रम,
सुन्दर ज्ञानी कै एक प्रकासा ॥३०॥
॥ सवईया छंद ॥
जीव नरेश अविद्या निद्रा,
सुख शय्या सोयौ करि हेत ।
कर्म खवास पुटपरी लाई,
तातै बहु बिधि भयौ अचेत ॥
भक्ति प्रधान जगायौ कर गहि,
आलस भर्यौ अभाई लेत ।
सुन्दर अब निद्रा बस नाही,
ज्ञान जागरण सदा सुचेत ॥३१॥
(३१) पुटपरी-नशीली चीजो की पुट दी हुई शराब ।
या पगचची ।
२४० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ज्ञानी कर्म करै नाना विधि,
अहंकार या तन कौ खोवै ।
कर्मन कौ फल कछू न वंछै,
अंतहकरन वासना धोवै ॥
ज्यौं कोऊ खेतनि कौं जोतत,
लै करि वीज भू नि करि वोवै ।
सुन्दर कहै सुनौ दृष्टान्त हि,
नागौ न्हाइ सु कहा निचोवै ॥३२॥
॥ इति ज्ञानी को अंग सम्पूर्ण ॥