सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

२५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अनछतौ जगत अज्ञान तै प्रगट भयौ,
जैसे कोऊ बालक बेताल देखि डर्यौ है ।
जैसे कोऊ सुपनै मैं दाव्यौ है अथारै आइ,
मुख तै न आवै बोल ऐसो दुख पर्यौ है ॥
जैसे अंधियारी रैनि जेवरी न जानै ताहि,
आपु ही तै साप मानि भय अति कर्यौ है ।
तैसे ही सुन्दर एक ज्ञान कै प्रकास बिन,
आपु दुख पाइ पाइ आपु पचि मर्यौ है ॥३॥
मृत्तिका समाइ रही भाजन के रूप माहि,
मृत्तिका कौ नाम मिटि भाजन ई गह्यौ है ।
कनक समाय त्यौ ही होइ रह्यौ आभूषण,
कनक न कहै कोऊ आभूषण कह्यौ है ॥
बीज ऊ समाइ करि बृक्ष होई रह्यौ पुनि,
बृक्ष ई कौ देखियत बीज नही लह्यौ है ।
सुन्दर कहत यह यौही करि जानौ सब,
ब्रह्म ई जगत होइ ब्रह्म पूरि रह्यौ है ॥४॥
(३) अनछतो-अस्तित्वहीन । अथारै-छाती पर ।
(४) मृत्तिका-मिट्टी । भाजन-बर्तन । कनक-सुवर्ण,
सोना ।