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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ । २०३
अथ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग
॥३१॥
सुन्दर द्रव
प्रीति की रीति नही कछु गनन,
जानि न पानि नही कुलगारो ।
प्रेम के नेम कछु नहिं दीसत,
लाज न कान नग्यो सब खारौ ।
लीन भयी हरि सों अभ्यन्तरि,
आठहू जाम रहै मनवारी ।
सुन्दर कोऊ न जानि सकै यह,
गोकुल गाव की पेंडी ही न्यारी ॥१॥
ज्ञान दियो गुरुदेव कृपा करि,
दूरि कियौ भ्रम खोलि किवारी ।
और क्रिया कहि कौन करै अब,
चित लग्यौ परब्रह्म पियारी ॥
पाव बिना चलिकै तिहि ठाहर,
पंगु भयी मन मीत हमारी ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गाव की पेंडी ही न्यारी ॥२॥
(१) कुलगारो-कुलगोत्र । अभ्यन्तर-भीतर हृदय मे
पेंडो-मार्ग ।