सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४७
दीसन भित्त तयो भ्रम दर्पन,
वस्तु दिषावन एकई सो है ॥
जो सुनिये गन दृष्टि परे पुनि,
वा बिन ओर नहीं अब को है ।
सुन्दर सुन्दर व्यापि रह्यो सब,
सुन्दर ही महि सुन्दर सो है ॥३।
ज्यों बन एक अनेक भये द्रुम,
नाम अनंतनि जाति हु न्यारी ।
वापि तडाग रु कूप नदी सब,
है जल एक सो देषौ निहारी ॥
पावक एक प्रकास बहू विधि,
दीप चिराफ़ मसाल हु वारी ।
सुन्दर ब्रह्म विलास अखंडित,
पंडित भेद की बुद्धि सु टारी ॥४॥
एक शरीर मैं अंग भये बहु,
एक धरा पर धाम अनेका ।
एक शिला महिं कोरि किये सब,
चित्र बनाइ घरे ठिकठेका ॥
एक समुद्र तरंग अनेकनि,
कैसे के कीजिये भिन्न विवेका ।
द्वैत कछू नहिं देखिये सुन्दर,
ब्रह्म अखंडित एक की एका ॥५॥