श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
चौ. २७: सब-पर राम राय-सिरताजा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सब-पर राम राय-सिरताजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥
शब्दार्थ—सब-पर ▸ सर्वोपरि। सब-पर शब्द सर्वपरका तद्भव है। यहाँ
सर्वत्र लवराम् (प्रा.प्र. ३-३) इस प्राकृत व्याकरण के सूत्रसे रका लोप
हुआ।
अर्थ—श्रीराम परब्रह्म और राजाओंके मुकुटमणि हैं। उनके भी संपूर्ण
कार्योंको आपने ही संपन्न किया।
व्याख्या—श्रीरामजी सर्वोपरि हैं। यथा—
शंभु बिरंचि बिष्णु भगवाना।
उपजहिं जासु अंश ते नाना॥
—रा.च.मा. १-१४४-६
अर्थात् श्रीराम राजाधिराज हैं फिर भी उनके संपूर्ण कार्योंको आपने ही संपन्न
किया। भाव यह है कि सर्वोपरि परब्रह्म राजाधिराज भगवान् श्रीरामको भी
जिनकी निरन्तर अपेक्षा रहती है, तो हम जैसे जीवोंकी उनके बिना कैसी
स्थिति होगी? यथा—
संकट-समाज असमंजस भो रामराज
काज जुग पूगनि को करतल पल भो।
—ह.बा. ६
६४
महावीरी व्याख्या चौ. २८: और मनोरथ जो कोइ लावै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और मनोरथ जो कोइ लावै।
तासु अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥
शब्दार्थ—मनोरथ ▸ अभिलाषा। अमित ▸ असीम।
अर्थ—हे प्रभो! और जो आपके समक्ष कोई भी मनोरथ लेकर आता
है, उस मनोरथका अपने इसी जीवनमें असीम फल पाता है।
व्याख्या—सोइ अमित जीवन फल पावै यह पाठ माननेपर "वह
व्यक्ति इसी जीवनमें उस इच्छाका असीम फल पा लेता है" अर्थ होगा।
भाव यह है कि मानवकी इच्छाएँ प्रायः पूर्ण नहीं होतीं, यदि होती भी
हैं तो शरीरान्तके पश्चात्। परन्तु हनुमान्जीके समक्ष इसी जीवनमें समस्त
इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यथा—नाम कलि-कामतरु केसरी-कुमार को
(ह.बा. ९)।
६५
चौ. २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
चारिउ जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत-उजियारा॥ २९ ॥
शब्दार्थ—उजियारा ▸ उजाला।
अर्थ—हे प्रभो! आपका प्रताप कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, एवं
कलियुग—इन चारों युगोंमें प्रसिद्ध है। इससे जगत्में उजाला छाया हुआ
है।
व्याख्या—श्रीराम सार्वकालिक हैं। अतः प्राकट्यके पहले स्वायम्भुव
मन्वन्तरके कृतयुगमें मनु-शतरूपाको द्विभुज रूपमें ही दर्शन दिया। यथा—
भृकुटि बिलास जासु जग होई।
राम बाम दिशि सीता सोई॥
—रा.च.मा. १-१४८-४
उसी प्रकार इनका नाम भी चारों युगोंमें प्रसिद्ध है, यथा—चहुँ जुग चहुँ
श्रुति नाम प्रभाऊ (रा.च.मा.१-२२-८)। अतः कृतयुगमें प्रह्लाद भी रामनाम
जपते थे। यथा—राम कहाँ सब ठौर हैं खम्भ में हाँ सुनि हाँक नृकेहरि
जागे (क. ७-१२८)। प्रह्लाद दैत्य-बालकोंसे स्वयं कहते हैं—
रामनामजपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना॥
तद्वत् श्रीरामजीके परिकर श्रीहनुमान्जी भी चारों युगोंमें रहते हैं। वैवस्वत
मन्वन्तरके २४वें त्रेतायुगके अन्तमें प्रभुका प्राकट्य हुआ। पश्चात् प्रभुने
आञ्जनेयको तब तकके लिए अमरत्व प्रदान किया, जब तक श्रीराम-
कथाका प्रवाह धराधामपर अक्षुण्ण रहे। अतः उस समयसे अद्यावधि
६६
महावीरी व्याख्या चौ. २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा
श्रीराम-कथाके साथ आञ्जनेयका स्वस्थ रहना सुस्पष्ट है। यह २८वाँ
कलियुग है। प्रभुके प्राकट्यसे आज तक चार चतुर्युगियाँ बीत ही गईं।
अतः हनुमान्जीके अमरत्वमें किमपि संदेह नहीं है।
कृते साकेतलोके स्यात्रेतायामवधे तथा।
द्वापरे पार्थकेतौ तु कलौ राज्यं करिष्यति ॥
जगत-उजियारा—प्रतापकी उपमा सूर्यसे दी जाती है। यथा—प्रभु-
प्रताप-रबि छबिहिं न हरिही (रा.च.मा. २-२०९-३)। इसलिए इससे
जगत्में उजाला कहना उचित है।
६७
चौ. ३०: साधु संत के तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर-निकंदन राम-दुलारे ॥ ३० ॥
शब्दार्थ—असुर-निकंदन ▸ राक्षसोंको मारने वाले।
अर्थ—हे राक्षसोंको नष्ट करने वाले श्रीरामजीके दुलारे श्रीहनुमान्जी
महाराज! आप साधु तथा सन्तोंके रक्षक हैं।
व्याख्या—यहाँ साधु शब्द साधनारत भक्तोंकी ओर संकेत करता है
एवं संत शब्द साधनसंपन्न भक्तको सूचित करता है। दोनोंको हनुमान्जीकी
अपेक्षा है। साधु सुग्रीव तथा सन्त विभीषण दोनों हनुमान्जीसे रक्षित हैं।
यथा—दुर्जन को काल सो कराल पाल सज्जन को (ह.बा. १०)।
राम-दुलारे—हनुमान्जी राघवजीके दुलारे हैं। यथा—राम को दुलारो
दास (ह.बा. ९)।
६८
महावीरी व्याख्या चौ. ३१: अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥
शब्दार्थ—दाता ▸ देने वाले।
अर्थ—आप अष्ट सिद्धियों एवं नव निधियोंके देने वाले हैं। जनकनन्दिनी
श्रीसीता माताने आपको ऐसा वरदान दिया है।
व्याख्या—अशोकवाटिकामें जब श्रीआञ्जनेयके वाक्चातुर्यसे माँ मैथिली
भली-भाँति संतुष्ट हो गईं, तब इन्होंने आञ्जनेयको आशीर्वाद-पुष्पोंसे विभूषित
कर दिया। यहाँ मायाकी सीता अविद्या अथवा विद्या रूपमें नहीं हैं, अपितु
श्रीराघवकी लीलाशक्ति ही माया सीताके रूपमें वर्तमान हैं, अन्यथा मायाके
मिथ्यात्वसे आञ्जनेयको दिए हुए आशीर्वाद भी प्रामाणिक न हो पाएँगे। इस
प्रसंगका संकेत भावी किसी ग्रन्थमें किया जाएगा। अथ प्रकृतमनुसरामः।
यथा—
आशिष दीन्ह राम प्रिय जाना।
होहु तात बल शील निधाना॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू॥
करिहिं कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
—रा.च.मा. ५-१७-२,३,४
सिद्धियाँ आठ हैं—
६९
चौ. ३१: अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता महावीर व्याख्या
अणिमा गरिमा चैव महिमा लघिमा तथा।
प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः ॥
—अ.को. १-१-३५क
अर्थात् अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और
वशित्व आठ सिद्धियाँ हैं। निधियाँ नौ हैं—महापद्म, पद्म, शङ्ख, मकर,
कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, और खर्व। यथा—
महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकरकच्छपौ।
मुकुन्दः कुन्दनीलौ च खर्वश्च निधयो नव ॥
— अ.को. १-१-७१क
७०
महावीरी व्याख्या चौ. ३२: राम-रसायन तुम्हरे पासा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-रसायन तुम्हरे पासा।
सादर हौ रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥
शब्दार्थ—राम-रसायन ▸ श्रीरामरसका भाण्डागार (भण्डार)।
अर्थ—हे पवननन्दन! रामप्रेमरसका भण्डार आपके ही पास है एवं
आप निरन्तर आदरपूर्वक रघुपति श्रीरामभद्रजूके दास्य भावमें रहते हैं।
यद्वा, हे आदरणीय रघुपति श्रीरामभद्रजूके दास हनुमान्जी! आपके पास
रामप्रेमरसका भवन अर्थात् राघवचरित्र निरन्तर निवास करता है।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जी रामभक्ति-रसके आचार्य ही हैं। अत एव इन्होंने
श्रीराघवसे अनपायनी भक्ति माँगी—
नाथ भगति तव अति सुखदायिनि।
देहु कृपा करि सो अनपायनि ॥
—रा.च.मा. ५-३४-३
इन्हें गोस्वामीजीने रसाइनी (संस्कृत: रसायनी) शब्दसे संबोधित किया है।
यथा—राम की रजाइ तें रसाइनी समीरसूनू (क. ५-२५)।
७१
चौ. ३३: तुम्हरे भजन राम को पावै महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥
शब्दार्थ— भजन ▸ सेवा, शरणागति।
अर्थ— हे कपिकुल-तिलक! आपके भजनसे साधक श्रीरामभद्रजूको पा
जाता है और प्रभुको पाकर वह अनेक जन्मोंके दुःखोंको भूल जाता है।
व्याख्या— आपका भजन भगवत्प्राप्तिमें साधन है क्योंकि भगवद्भक्ति
दर्शनके लिए ज्ञान और वैराग्य इन दो नेत्रोंकी आवश्यकता होती है।
यथा—ज्ञान बिराग नयन उरगारी (रा.च.मा. ७-१२०-१४)। और आप
स्वयं ज्ञान-वैराग्य-रूप हैं। यथा—ज्ञानिनामग्रगण्यम् (रा.च.मा. ५-
मङ्गलाचरण श्लोक ३) और बिरागी पवनकुमार सो (क. ५-१)। अतः
आञ्जनेयके भजनसे निश्चित श्रीरामरूपकी प्राप्ति हो जाती है। राघव सुखसिन्धु
हैं, अतः उन्हें प्राप्त कर व्यक्ति अनेक जन्मोंके दुःखोंको उन्हीं आनन्द-
सिन्धुकी एक लहरमें विलीन कर देता है, जैसे जटायु—निरखि राम
छबि-धाम मुख बिगत भई सब पीर (रा.च.मा. ३-३२)।
७२
महावीरी व्याख्या चौ. ३४: अंत-काल रघुबर-पुर जाई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अंत-काल रघुबर-पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भगत कहाई॥ ३४ ॥
शब्दार्थ—रघुबर-पुर ▸ श्रीसाकेतलोक।
अर्थ—हे राम-दूत! आपके भजनके प्रतापसे वह साधक इसी भौतिक
शरीरसे भगवान् श्रीरामभद्रका दर्शन करके शरीरावसान (अन्तकाल)के
समय श्रीसाकेतलोक जाकर पुनः मर्त्यलोकमें जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ
श्रीहरिका भक्त ही कहलाता है। अर्थात् पुनर्जन्ममें भी उसके भक्तिके संस्कार
धूमिल नहीं होते।
व्याख्या—इसी शरीरसे साधक इसी लोकमें इन्हीं चक्षुओंसे श्रीरामजूके
कोटि-कोटि-कन्दर्प-दर्प-दलन सगुण साकार नीलनीरधरश्याम लोकाभिराम
श्रीविग्रहका दर्शन करता है और अन्तकालमें वह मोक्ष नहीं चाहता।
क्योंकि—सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं (रा.च.मा. ६-११२-७)। फिर
प्रारब्धका क्षय करके शरीरको विसर्जित कर अपनी इच्छानुसार
श्रीसाकेतलोकमें विश्राम कर पुनः भगवल्लीलारसकी अनुभूतिकी लालसासे
भगवान् श्रीराघवके अवतार-कालमें संसारमें आकर किसी भाग्यशालिनी
माँकी कोखको पवित्र कर रघुनाथजीकी प्रतीक्षामें निरत रहता है। यथा—
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोक्ष सुख त्यागि॥
—रा.च.मा. ४-२६
७३
चौ. ३५: और देवता चित्त न धरई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ ३५ ॥
शब्दार्थ—सर्ब सुख ▸ लौकिक एवं पारलौकिक अनुकूलता।
अर्थ—जो भक्त किसी अन्य देवताको अपने चित्तमें न धारण कर केवल
हनुमान्जीकी सेवा करता है, वह समस्त सुखोंको प्राप्त कर लेता है। यद्वा, जो
अन्य किसी देवताको अपने चित्तमें नहीं धारण करता, वह भी हनुमान्जीकी
सेवा करके समस्त सुखोंकी प्राप्ति कर लेता है।
व्याख्या—देवता-विमुखको नास्तिक कहा जाता है, तथा उसे सुखकी
प्राप्ति नहीं होती क्योंकि इष्ट भोगोंको देने वाले देवता ही हैं। यथा—इष्टान्
भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः (भ.गी. ३-१२)। पर वह
भी हनुमत्कृपासे सर्वसुखका अधिकारी हो सकता है क्योंकि समस्त देव
उन्हींकी कृपाकी अपेक्षा रखते हैं। यथा—देवी देव दानव दयावने ह्वै
जोरैं हाथ बापुरे बराक कहा और राजा राँक को (ह.बा. १२)। अथवा,
अनन्य निष्ठासे सेवा करनेपर हनुमान्जी समस्त सुख प्रदान करते हैं।
७४
महावीरी व्याख्या चौ. ३६: संकट कटै मिटै सब पीरा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥
शब्दार्थ—बलबीरा ▸ बलसे युक्त वीर।
अर्थ—जो अतुलनीय-बलयुक्त वीर श्रीहनुमान्जी महाराजका स्मरण
करता है, उसके समस्त संकट कट जाते हैं तथा सभी पीड़ाएँ मिट जाती
हैं।
व्याख्या—हनुमान्जीके स्मरणसे श्रीशिव-पार्वती एवं श्रीसीता-राम-
लक्ष्मण प्रसन्न होकर साधकके पञ्चक्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष,
और अभिनिवेश) को हर लेते हैं। यथा—
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि
लोकपाल सकल लखन राम जानकी।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि
तुलसी तमाहि ताहि काहू बीर आन की।
केसरी-किसोर बंदीछोर के नेवाजे सब
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की।
बालक ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको
जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की॥
—ह.बा. १३
७५
चौ. ३७: जय जय जय हनुमान गोसाईं महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ ३७ ॥
शब्दार्थ—गोसाईं ▸ इन्द्रियोंके स्वामी।
अर्थ—हे गोसाईं हनुमान्जी महाराज! आपकी जय हो! जय हो!! जय
हो!!! आप गुरुदेवकी भाँति वात्सल्यपूर्ण कृपा करें।
व्याख्या—हनुमान्जी सच्चिदानन्द हैं, इसलिए गोस्वामीजी तीन बार
जय शब्दका प्रयोग करते हैं। प्रथम जयसे हनुमान्-चालीसा ग्रन्थका
उपक्रम किया था। पुनः जयसे उपसंहार करके उनसे कृपाकी याचना
कर रहे हैं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं अर्थात् कठोर कृपा न करें। जीवपर दो
ही कृपा कर सकते हैं—गुरु एवं गोविन्द। गोविन्दकी कृपामें कठोरताके
साथ कोमलता होती है, जैसे असुरोंके निग्रह में। किन्तु गुरुकृपा निरन्तर
कोमलतासे ओत-प्रोत रहती है। यथा—
एक शूल मोहि बिसर न काऊ।
गुरु कर कोमल शील सुभाऊ॥
—रा.च.मा. ७-११०-२
अतः प्रभो! गुरुदेवकी भाँति कृपा करके आप मुझे श्रीरामप्रेमका ज्ञान
कराएँ।
७६
बजरंग बाण, मारुति स्तोत्र एवं श्री हनुमान जी की आरती
महावीरी व्याख्या चौ. ३८: जो शत बार पाठ कर कोई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जो शत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥
शब्दार्थ—बंदि ▸ लौकिक तथा पारलौकिक बन्धन।
अर्थ—यदि कोई इसका १०० बार पाठ श्रद्धा एवं भक्तिसे करेगा, उसके
लौकिक एवं पारलौकिक बन्धन छूट जाएँगे एवं उसे महासुखकी प्राप्ति
होगी।
व्याख्या—यहाँ शत शब्द १०८का बोधक है तथा बार शब्द दिन एवं
संख्याका वाचक है। कोई शब्द सर्वसाधारणके लिए अधिकार-समर्पक है,
अर्थात् कोई भी मनुष्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, इतरधर्मी कोई भी)
यदि हनुमान्-चालीसाका १०८ बार प्रतिदिनके क्रमसे १०८ दिन तक पाठ
करे तो निश्चित उसका अनिष्ट बन्धन छूट जाएगा। इस हनुमान्-चालीसाको
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने समस्त प्राणिमात्रको तुलसीदल-प्रसाद-
रूपमें वितरित किया है। यह फलश्रुति है।
७७
चौ. ३९: जो यह पढ़े हनुमान-चलीसा
महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥
शब्दार्थ—गौरीसा ▸ भगवान् शिव।
अर्थ—अब गोस्वामीजी भविष्यत्कालमें वर्तमानकालका दर्शन कर
बोल रहे हैं कि जो इस हनुमान्-चालीसाको पढ़ेगा, उसको अवश्य लौकिक
तथा पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होगी। इस विषय-प्रतिज्ञाके साक्षी भगवान्
शिव हैं।
व्याख्या—हनुमान्-चालीसा लौकिक तथा पारलौकिक सिद्धियोंकी
प्रदाता है, इस प्रतिज्ञामें शिवजीका साक्ष्य देते हैं। जैसे विनयपत्रिकामें
श्रीराम-नाम प्रतीत करते समय शिवजीको साक्षी-रूपमें उपस्थित किया
है। यथा—शंकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो (वि.प.
२२६-६)।
७८
महावीरी व्याख्या चौ. ४०: तुलसीदास सदा हरि-चेरा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुलसीदास सदा हरि-चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥
शब्दार्थ—हरि-चेरा ▸ श्रीरामजीके सेवक।
अर्थ—हे कीशनाथ श्रीहनुमान्जी महाराज! आप निरन्तर भगवान्
श्रीरामके कैङ्कर्यमें निरत रहते हैं, अतः उसी कृपालुतावश तुलसीदासके
हृदयमें निवास कीजिए। यद्वा गोस्वामीजी कहते हैं कि आञ्जनेय! आप
निरन्तर भगवद्भक्तके हृदयमें निवास कीजिए। अथवा, मैं तुलसीदास निरन्तर
हरि अर्थात् वानरश्रेष्ठ आपश्रीका सदैव दास हूँ; हे नाथ! आप मेरे हृदयमें
श्रीराम-लक्ष्मण-सीता सहित निवास कीजिए।
व्याख्या—अन्तमें गोस्वामीजी अपने हृदयमें निवास करनेके लिए किंवा
वैष्णवजनोंके लिए हनुमान्जीसे प्रार्थना करते हैं। हरि-चेरा शब्दका नाथ,
हृदय, तथा तुलसीदास शब्दसे अन्वय करनेपर उपर्युक्त तीनों अर्थ संगत
हो जाते हैं। अर्थात् नाथ सदा हरि-चेरा तुलसीदास हृदय महँ डेरा
कीजै—इस अन्वयसे प्रथम अर्थ; तथा तुलसीदास नाथ हरि-चेरा हृदय
महँ सदा डेरा कीजै—इस अन्वयसे द्वितीय अर्थकी पुष्टि हो जाती है। यहाँ
(दूसरे अर्थ में) तुलसीदास शब्दके साथ कहत इस बाहरी क्रियाको जोड़ना
पड़ता है, जैसे अन्यत्र। यथा—शरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल
(रा.च.मा. २-२२६)। तुलसीदास सदा हरि-चेरा नाथ हृदय महँ डेरा
कीजै—इस अन्वयसे तृतीय अर्थकी पुष्टि होती है।
७९
दो.: पवनतनय संकट-हरन महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
पवनतनय संकट-हरन मंगल-मूरति-रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप॥
शब्दार्थ—पवनतनय ▸ पवनके पुत्र। सुर-भूप ▸ देवताओंके राजा।
अर्थ—हे पवनके पुत्र! समस्त संकटोंको हरनेवाले मङ्गलमूर्ति-रूप!!
समस्त देवताओंके अधिष्ठान-स्वरूप श्रीहनुमान्जी महाराज!!! आप श्रीराम,
श्रीलक्ष्मण, एवं माँ मैथिलीके साथ हमारे हृदयमें निवास करें।
व्याख्या—चार विशेषण देकर श्रीहनुमान्जीको ही मन, बुद्धि, अहंकार,
एवं चित्तको शुद्ध करनेमें सहायक सिद्ध करते हैं और पश्चात् राम, लक्ष्मण,
एवं सीताजीके सहित हृदयमें विश्राम करनेकी प्रार्थना करके सर्वतोभावेन
श्रीमन्मारुतिके ही श्रीचरणकमलकी शरणागतिको ही परम पुरुषार्थ बताकर
ग्रन्थको विश्राम दे रहे हैं।
॥ उपसंहारः ॥
सुमिरि राम-सिय-चरन-कमल गुरु-पद-रज शिर धरि।
चऊद्वार उत्कल-थल मारुतसुतहि ध्यान करि॥
संबत नभ-फल-ख-दृग सुमाधव शिव शनिवारा।
शुक्ल दूज हनुमान-चलीसा मति अनुसारा॥
जुगुति-शास्त्र-सिद्धान्तमय वैष्णव-रीति-भगति-भरी।
नाम महावीरी ललित लघु व्याख्या गिरिधर करी॥
॥ श्रीहनुमते नमः ॥
८०
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पद्यार्धानुक्रमणी
इस अनुक्रमणीमें श्रीहनुमान्-चालीसाके सभी ८६ पद्यार्ध (तीन दोहोंके छः दल
और चालीस चौपाइयोंकी अस्सी अर्धालियाँ) अकारादिक्रमसे सूचित हैं। प्रत्येक
पद्यार्धके बाद कोष्ठकमें पद्य-संख्या और पूर्वार्ध/उत्तरार्ध दिए गए हैं। पद्य-संख्याके लिए
मङ्गलाचरण-दोहाको म.दो., चौपाईको चौ., और उपसंहार-दोहाको उ.दो.—इस
प्रकारसे संकेतित किया गया है। तत्तत् पद्यार्धकी प्रस्तुत संस्करणमें महावीरी व्याख्याकी
पृष्ठ-संख्या दाहिनी ओर दिखाई गई है।
अंजनिपुत्र-पवनसुत-नामा (चौ. २, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १९
अंत-काल रघुबर-पुर जाई (चौ. ३४, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता (चौ. ३१, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं (चौ. १३, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
अस बर दीन्ह जानकी माता (चौ. ३१, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९
असुर-निकंदन राम-दुलारे (चौ. ३०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८
आपन तेज सम्हारो आपे (चौ. २३, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९
और देवता चित्त न धरई (चौ. ३५, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
और मनोरथ जो कोइ लावै (चौ. २८, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६५
कंचन-बरन बिराज सुबेसा (चौ. ४, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
कबि कोबिद कहि सकें कहाँ ते (चौ. १५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
काँधे मूँज-जनेऊ छाजै (चौ. ५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६
कानन कुंडल कुंचित केसा (चौ. ४, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा (चौ. ४०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७९
कुमति-निवार सुमति के संगी (चौ. ३, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २१
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं (चौ. ३७, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६
चारिउ जुग परताप तुम्हारा (चौ. २९, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६६
छूटहिं बंदि महा सुख होई (चौ. ३८, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७