शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
४६ शालिहोत्रम् ।
सातवां उपाय-अकड़टैया जड, फल, फूल, पत्ते समेत आग
जलावे उसमें से दो छटांक लेकर जौं के आटे में मिला गोली
बना दोनों समय चार पांच दिन तक देवे ।
आठवां उपाय-सेर भर अजवायन को आदमी के मूत्र में तीन
दिनतक भिगोवे फिर सायंकालके समय दाना देनेके पीछे इसमें
से जौंके आटेमें एक पैसे भर मिला गोला सा बना चार पांच
दिन तक खिलाना चाहिये ।
जुखाममें नाक टपकनेकी दवा-रोगी घोडेको दाना देनेके पी-
छे दो दिन तक भुनी हुई अदरक जौंके आटेमें मिलाकर देवे फिर
दो दिन तक दाना देने के पीछे एक छुहारा देवै ।
दूसरा उपाय-जो जुखाम के कारण आंख पीली पड गई हो तो
दस बारह दिनतक पावभर मेथी दाना और पैसे भर कालीमिरच
को पीसकर दोनों को मिला कर देता रहे ।
तीसरा उपाय-हींग छः रत्ती, सोंठ ४ माशे इन दोनों को
पीस जौं के आटे में मिला दाना देने के पीछे चार पांच दिन
तक देता रहे ।
कुरकुरी का वर्णन-यूनानी शालहोत्र वालों ने इस रोग को
सात प्रकार का लिखा है और डाक्टर लोग इसे केवल दो ही
प्रकार का बताते हैं [ १ ] मूत्र बन्द होने से [ २ ] दस्त बन्द
होनेसे यह रोग बहुधा खाने पीने की समता विषमता से हुआ
करता है। इसमें घोडेके मुखसे पानी टपका करता है, और प-
सीना अधिक निकलता है, न वह लेट सकता है न बैठता है
और कभी २ चारों पैरों को फैलाकर लेटता है, उसके पेट में
बहुत पीडा मालूम होती है ।
शालिहोत्र । ५७
पहिलो कुरकुरी मूत्र बन्द होनेसे-इसमें घोडा बारबार तनता
है और मूत्रेन्द्रिय को कभी बाहर और कभी भीतर करताहै।
इसमें लाल मिरच पीसकर सूतमें लपेट बत्तीसी बना मूत्रमार्ग
में प्रवेश करे और जो घोड़ी हो तो केवल पिसी हुई मिरच वा
एक बतासा उसकी योनिमें रखनेसे शीघ्रही पेशाब करेगी। जो
इससे पेशाब न उतरे तो थोडा सा कतीरा खिलादे ।
दूसरा उपाय-छटाकभर शोरा पानीमें घोलकर पिलादे अथवा
शोरे के पानी से कपडा भिगोकर मूत्रमार्ग में रखदे ।
अन्य उपाय-बेर की पत्ती पीसकर उसकी लुगदी मूत्रद्वार में
रक्खे, अथवा नासिकाद्वारा खालिस सरसों का तेल पिलावै अ-
थवा उसके सिर में से दो चार जुंए निकाल कर उसके कानमें
डालदे, अथवा राईको पानीमें पीसकर उसके अण्डकोषोंपर मलै।
अथवा एक सेर पानीमें थोड़ीसी इमली पीसकर पिलादे, अथ-
वा खीरा वा ककड़ीके बीज समान भाग लेकर पानीमें पीसकर
पिलादे, अथवा लोटेमें पानी भरकर घोडोकी योनिके पास टोंटी
द्वारा धीरे २ पृथ्वीपर गिरावे और मुख से सीटी बजाता रहे ।
दूसरी कुरकुरी-इसमें घोडेका मूत्र और लीद दोनों बन्द हो
जाते हैं, बारबार पृथ्वी पर लेटता है और बगलोंकी ओर झांक
ता है पेट में दर्द होता है ।
पहली दवा-सोंठ और काजल समान भाग लेकर गोमूत्र में
रिगडकर बत्ती बनाले और इसको घोडे वा घोडी के मूत्रस्थान
में रख देवे ।
दूसरी दवा-सैंधा नमक, पीपल, नीम की छाल; नागरमोथा
४८ शालिहोत्रम् ।
सिरसों इन सबको तेलमें पीसकर नलीद्वारा गुदामें भर देवे ।
तीसरी दवा-मुर्गीके दो अंडे जौके आटेमें मिलाकर खिलावे
इसी तरह दो दो घंटे पीछे दो दो अंडे देवे ।
चौथी दवा-कंजेका गूदा पैसेभर भुना हुआ, कालानमक पैसे
भर सफेद जीरा पैसे भर इन सबको पीसकर देवे, सूखा तँबाखू
और कंजे का गूदा चने के चून में मिलाकर देवे ।
पांचवीं दवा-सोंठ दो माशे, गुड़ चार माशे, हींग चार माशे
तीनोंको कूटकर गोला बनाकर खिलावे ।
छठा उपाय-हाथीकी लीद और पीपल की छाल दोनों छः सेर
पानी में चढ़ादे, जब तीनसेर रहजाय तब छानकर पिलादे ।
सातवां उपाय-कालाजीरा, काली मिरच, भुना हुआ सुहागा
सज्जी, कुटई, राई, हींग, और अजवायन इन सबको बराबर २
लेकर कूटडाले और अदरख के रस में छटांक २ भर की गोली
बनावे । इनमें से एक एक गोली जब तक दस्त न आवै तब
तक देता रहे ।
दस्त बन्द होजानेसे नीचे लिखे हुए जुलाब देने चाहिए:—
पहिला जुलाब-गुड तीन छटांक, हींग दस रत्ती; सोंफ एक
छटांक अजवायन आधी छटांक सुहागा आधी छटांक, नमक
एक छटांक इन सबको मिलाकर तीन गोलियां बना लेवे और
जबतक दस्त न हो तबतक घंटे २ भर में एक गोली देता रहे
दूसरा जुलाब-पाव भर अलसी का तेल वा सरसों का तेल
पिलाकर कुछ देर तक टहलानेसे दस्त होने पर आराम होजाय
गा । जो बहुत जल्द दस्त कराने की आवश्यकता समझी जाय
तो उसी तेलमें जमाल गोटे के तेलकी दस बूँद मिला देवे ।
शालिहोत्र। ४१
तीसरा जुल्लाब-आधसेर पानी में आधपाव सूरती तमाखू खू-
ब कूटकर मसल डाले और छानकर पानी पिलादे, पिलाने के
पीछे पसीना निकले वा न निकले गद्दो मार देवे जिससे घोडा
बैठने न पावे । और शोरा का पानी मूत्र के स्थान पर लगाना
उचित है ।
चौथा जुलाब-पीपल, पीपला मूल, कसौंदी के बीज, काली-
मिरच और सोंठ इन सबको समान भाग लेकर कूट कर कपड-
छन करले और इसमें से डेढ छटांक लेकर गौ के दूध में मिला
कर पिलाना चाहिये ।
तीसरी कुरकुरी-जब घोड़ा डाभ (दर्भा) खा लेता है तब
वह उसकी आंतो को छीलने लगती है ऐसा होने पर घोडा
अपनी दुम को बार बार मलता है और बार बार बेचैनी से
पृथ्वी पर लेटता है ।
इस रोग में सेर भर गर्म दूध में आधसेर कडवा तेल मिला-
कर नाल में भरकर पिला देवे।
चौथी कुरकुरी-इसमें घोडा होठों को थप थपाकर मलता है
और हवा पी पीकर राह चूकताहै। अपनी स्वाभाविक बातोंको
भूल जाता है, मुख की शक्ति बन्द हो जाती है।
पहिली दवा-घोडे के तालु में गुड की एक चकती
चिपका देवे ।
दूसरा उपाय-ताजे नीमकी लकडीकी लगाम मुखमें लगादे।
तीसरा उपाय-भुना सुहागा छः माशे, गुड आधपाव दोनों
को पावभर पानी में मिला कर पिलादे ।
पांचवी कुरकुरी-इसमें घोडेकी आंतें स्थानसे अलग होजाती
५० शालिहोत्रम् ।
हैं, अण्डकोशोंपर सूजन हो जाती है इसमें उँगुलियों से दबा दबा
कर धीरे २ आंतों को अपने स्थान पर करना चाहिये ।
छठी कुरकुरी-इसके लक्षण पांचवी कुरकुरी के विपरीत होते
हैं, घोडे को बैठने उठने में बडा कष्ट होता है ।
पहली दवा-बकरी के कलेजे को दस सेर पानी में आगपर
चढादे और गाढा २ पिलावे ।
दूसरी दवा-पावभर नरकचूर को मोठ के आटेमें मिला दोनों
समय आधा आधा खिलावे ।
विशेष द्रष्टव्य-कोई चतुर आदमी हाथ को घी से चुपड कर
गुदा में प्रवेश करके लीद निकाल देते हैं, यह काम बहुत बुरा
है, फिर कोई उपाय नहीं चलता है ।
सातवी कुरकुरी-इसमें आंतों में पीडा होती है, पेशाब और
लीद कठिनता से होती हैं, कभी २ होती ही नहीं है, पेट में
गडगडाहट होता है, बेसुध होकर बार बार लेटता है, चेहरा
लाल पड जाता है, इसमें दाग देना अधिक लाभदायक है, जो
न दागे तो नीचे लिखी हुई दवाइयां करे ।
पहली दवा-घोडावच, गेरू हींग, वायविडङ्ग इनको समान
भाग चार चार दिरम लेकर कूट पीस कपडछन करके फिर सेर
भर शराब में मिलाकर नाल में भर भर कर पिलावे, जब तक
अच्छा न हों तब तक प्रतिदिन करता रहे ।
दूसराउपाय-दो सेर दूध और आधसेर कडवा तेल दोनों
को मिला गुनगुना करके पिलावे, जो दस्त न आवे तो फिर
पिलावे ।
शालिहोत्र । ५१
वास्तव में कुरकुरी दो ही प्रकार की हैं अर्थात् एक तो मूत्र
बन्द होने से और दूसरी दस्तबन्द होने से और सब कुरकुरी
इन्हीं दो के अन्तर्गत होती हैं ।
खुजली का वर्णन-इससे सब देहमें घाव से होजाते हैं । यह
रोग संक्रामक होता हैं, एक को होते ही उस अस्तबल के सब
घोड़ों को हो जाता है, इससे पशु को बडी पीड़ा होती हैं ।
पहिली दवा-प्रतिदिन बासी पानी से धो दिया करे ।
दूसरा उपाय-दहीमें बारूद घोलकर पशुकी सब देहपर लगा
देवे और पांच छः घण्टे पीछे साबुनसे धो डाले । और इस दवा
करने के साथ ही धेला २ भर गंधक और सेंधा नमक जौ के
आटे के साथ प्रातःकाल खाने को दे ।
तीसरा उपाय-साबुन और चौथाई नमक दोनों को कूट कर
पोटली बना लेवे, और घोडेको स्नान कराते समय इस पोटली
से मलता रहे फिर जबतक दवा न सूख तबतक धूपमें बैठा रहने
दे । परन्तु उष्ण काल में विचार के रखना ।
चौथा उपाय-आधसेर खट्टा दही और पावभर नमक मिला
कर घोडेकी सब देहपर लगादे और चौबीस घण्टे पीछे धो
डाले, इसी तरह दो तीन दिन करने से आराम होजाता है ।।
पांचवां उपाय-हुक्के के पानी से भी दो दो तीन तीन बार
धोने से आराम होजाता है ।
छटा उपाय-खट्टा दही चार सेर, नीम की पत्ती आधसेर, का
ला जीरा पावभर, लहसन पावभर, काली मिरच आधपाव इन
में से दही को छोड़ सब दवाओं को पीसकर दही में मिला तीन
५२ शालिहोत्रम् ।
दिन रख छोड़ें फिर घोडे को साबुन से धोयकर यह दवा लगा
धूप में खडा रक्खे ।
सातवां उपाय-ग्वार पाठे को नमक मिलाकर खिलादे । अनु-
सार माफिक ।
आठवां उपाय-सफेद सरबैंक एक छटांक, सुरती छटांक भर,
पानी सेर भर, चुनेका पानी डेढ पाव इनमें से पहिली दो दवा-
ओंको पानी में घोटा ले फिर चुनेका पानी मिलाकर घोडे की
देह पर लगादे ।
नवां उपाय-बाकूची, गंधक, मनमिल और वायविडंगइन सब
को बराबर लेकर कूटके और पानीमें रातके समय भिगो देवैं,
प्रातःकाल मथकर थोडासा कडवा तेल मिलाकर मर्दन करै तीन
घंटे धूपमें खडा रखने के पीछे मिट्टी लगाकर धो डाले ।
दसवां उपाय-खट्टे दही में वेद अंजीर मिलाकर तीन दिन
मले तीसरे दिन घोडेके देहपर पीली मिट्टी मलदे और चौथे
दिन पानी से धोडाले ।
ग्यारहवां उपाय-पाव भर कडवे तेलमें पैसे भर नील मिला-
कर घोडे के शरीर पर मलै पहर भर पीछे चिकनी मिट्टी लगा
कर गर्मी की ऋतुमें ठंडे पानी से और जाडे की ऋतुमें गर्म
पानी से धोडालै ।
गजचर्मका उपाय-इस रोगमें घोडेका चमडा हाथी के चम-
डेके समान खुर खुरा हो जाता है शरीर की चमक दमक मारी
जाती है ।
कासनी, कांजी, बच और भिलावा इनमें से सब दवाओं को
शालिहोत्रम् । ५३
कांजी में मिला पाताल यंत्र में रख तेल खींचले और उसमें
तिल का तेल मिलाकर लगाता रहे ।
पित्तीका इलाज-सर्पकी कांचली थोडे गुड़में मिलाकर खिलावे
अथवा काली मिरच और गेरू छटांक २ भर पीसकर तीन दिन
तक खिलावे ।
आग से जलजाने की दवा ।
पहिली दवा-जले हुए पर प्याजका रस लगा देना चाहिए ।
दूसरी दवा-आधी छटांक पत्थर का चूना ढाई पाव पानी में
मिलाकर अच्छी तरह से हिलावे । पीछे रखदे तब थोडी देरमें
चुना नीचे बैठ जायगा तब ऊपर के निर्मल पानी को धीरे धीरे
निकाल कर एक बोतल में भर ले फिर एक बोतल में थोडासा
अलसी का तेल और उससे तिगुना चूने वाला पानी मिलाकर
हिलावे । हिलाते हिलाते जब गाढा होजाय तब जली हुई जग
हपर लगादे इस दवा से घाव को सदा तर रक्खे।
अग्निवाद का इलाज—जिसके यह रोग होता है उसके देहके
रोम और चमड़ा जगह जगह से गलकर ऐसे अलग होजाता
है जैसे आग का जला होता है ।
पहिली दवा-चांवलका भात नीमके पत्ते और दही तीनों आध
आध सेर लेकर रातिब की तरह बीस दिन तक खिलावे ।
दूसरा सरसों का तेल दो सेर, गौ का घी दो सेर, चर्बी दो
सेर, तीनों को अग्नि पर चढादे, फिर दो सेर सावन धीरे धीरे
चम्मच से मिलावे, जब सब मिल जाय और जलकर राख होजाय
तब जौ के चून में पाव भर प्रतिदिन खिलावे ।
५४ शालिहोत्रम् ।
तीसरा उपाय-पारा पपरिया कत्था, बोल और कपूर इनसब
को पैसे २ भर लेकर आध सेर घी में मिला लेवे और तीन
दिन तक घाव पर लेप करे, तीसरे दिन पोली मिट्टी लगाकर
पोले २ हाथों से धोये ।
झुरुनबाद का इलाज-इस रोग में घोडा पांव उठाकर पटककर
चलता है अथवा पैर को घसीट कर चलता है ।
पहिली दवा-लहसन और पारा दोनों दो दो ड्राम लेकर कूट
ले और दोनों समय महेले या सत्तू के संग देवे ।
दूसरी दवा-हलदी, पारा और पीपल तीनों को सत्तू के वा
महेले में तड़के ही खिलावे ।
तीमरो दवा-थोड़ी सी हींग सत्तू में मिला इक्कीस दिन तक
देवै । बरसाती का लक्षण-यह रोग घोडेके पैरों में हुआ करता
है और विशेष करके यह वर्षा ऋतु में हुआ करता है इसलिये
इसे बरसाती कहते हैं ।
पहिली दवा-हलदी, घुड़वच और पुरानो गच इनको पीसकर
घाव में भर देवै ।
दूसरी दवा-नीमका तेल घाव पर लगावै और जब सूख जाय
तब चूना भर देवै ।
तीसरा उपाय-भिलावा पावभर, विलायती मोम सेर १ और
मीठा तेल सेरभर लोहेकी कढाईमें आगपर चढ़ादे, जब जलकर
राख होजाय तब उतारकर छानले और बोतल में भरकर रखले,
घावको पहिले केञ्जव नीमके पानीसे धोडाले और उसपर थोडा
सा पिसा नीलाथोथा बुरककर उक्तदवा दोनोंसमय लगाना चाहिये
चौथा उपाय-नीला थोथा और फिटकरी दोनों एक २ तोले
शालिहोत्रम् । ५५
लेकर पीस डाले और घावको नीमके पानी से धोकर बुरक
दे फिर कपडे से बांधदे ।
पांचवां उपाय-बकरीकी चर्बी दो सेर, मोम आधपाव, एरं-
डका तेल पावभर, कोलतार पाव भर इनमें से पहिली तीन
दवाओं को आग पर रखकर पिघलालेवे, फिर कोलतार डाल
कर मिला लेवें ठंडा होने पर जमकर मरहम बन जायगा, फिर
नीम के पानी से घावको धो तृतियाका चूर्ण बुरक कर मरहम
लगाकर कपडे से बांध देवें । दिनमें दो बार लगाता रहे ।
छठा उपाय-सेंधानमक १ छटांक, पीपल ९ दिरम, बकरी का
ताजा रुधिर पाव भर मिलाकर खिलावे और आंखों के पीछे
तीनों वा दोनों पावों में फस्द खोले ॥
बहुधा इन घावों में से बुरा मांस बाहर निकलकर त्वचा से
ऊँचा होजाता है और प्याजकीसी गांठ पड जाती है ।
पहिली दवा-प्याज और तृतिया पीसकर बुरे मांस पर बांधे
ऊपर से एरंडके पत्ते बांधदें । इसी तरह प्रति दिन करता रहे ।
दूसरा उपाय-तृतियाको पीसकर उस पर मांस बुरकता रहे ।
थोडी देर पीछे उसपर गरम प्याज बांधदे और एक दिन पीछे
खोलें और जो बहुतही जल्दी आराम कराना हो तो मनसिल
कांजी के पानी में पीसकर बांधे पर पहिले घावको नीमके पानी
से धो डाले ।
घोडेके गरम होनेका वर्णन-घोडे बहुधा चलने में अडजाया
करते हैं इस समय उनको मारना उचित नहीं है ? परन्तु उसके
अडनेका कारण जानना चाहिये. ऐसे अवसर में उनकी आंखें
लाल होजाया करती हैं और भूक भी जाती रहती है ।
५६ शालिहोत्रम् ।
पहिली दवा-हरड, बहेडा और आंवला तीनों छटांक २ भर
लेकर कुचल डाले और रात्रि के समय भिगोदे, दिन निकलते
ही छान कर पिलादे इस तरह पांच छः दिन तक करने से
आराम हो जाता है ।
दूसरी दवा-रातके समय मिट्टी के घडे में जल भरकर उसमें
आधसेर शीशमकी पत्तियां डालदे, दिन निकलने पर हाथसे
पत्तियों को मसल कर छानले और उस जलमें पाव भर जौं का
सत्तू घोलकर पिलादे इसी तरह पांच चार दिन तक करने से
आराम होजाता है । पहिले दिनकी पत्तियां निकाल कर दूसरे
दिन भी काम में लाई जासक्ती हैं यह पत्तियां तीसरे दिन
बदलदी जाती हैं।
तीसरा उपाय-रातके समय मिट्टी के एक नवीन पात्रमें सेर
भर पानी भरकर उसमें छटांक भर कतीरा डालदो सबेरे के
समय उसे मिलाकर पिलादे ।
कमर के दर्दका इलाज-बहुधा चोट वा लचका खाजाने से
यह दर्द उत्पन्न होजाया करता है ।
पहिली दवा-थोडेसे चांवलोंका माढ निकालकर ठंडा करले,
इस माढमें घोडेकी पूंछकी डंडीको उलटकर डालदे परन्तु प्रथम
ही घोडेकी पिछाडी दृढतासे बांध देवै । जब दुम भीग जाय तब
पिछाडी खोलदे ऐसा करने से घोडा पूंछको बडे वेगसे फड
फडावैगा और लचक जाती रहेगी ।
दूसरी दवा-अंडीका गूदा दहीमें पीसकर तीन दिन तक कमर
पर लगावै और चौथे दिन गरम पानी से धो डाले ।
शालिहोत्र । ५७
जो कमर में सूजन होजाय या फट जाय तो यह दवा लगावे
लछाव की पत्ती, तिली का तेल और पानी तीनों को सेर सेर
ले एक देगची में चढादे जब पत्ती जल जाय और पानी भी
जल जाय तेल रह जाय तब उसे बर्तन में रखले और उसकी
कमर से मला करे । यह दवा और दर्दोंको भी लाभकारक है।
दूसरी दवा-शहद १ तोला; कपूर ३ माशे इन दोनोंको मिला
कर मले; ऊपर से बकरीकी नरम खाल बांधकर धूपमें खडाकर
दिया करे परन्तु खाल नित्य ताजी बदल दिया करे, १० दिन
तक ऐसा करने से आराम हो जाता है ।
बादगीरा का इलाज-इस रोगमें वादीके कारण घोडेकी कमर
में दर्द होने लगता है इससे वह पेट को लटकाता है, पीठको
झुकाता है और पीठ और पेट दोनों सूखने लगजाते हैं ।
पहली दवा-कडवा तेल आघपाव, भिलावा आघपाव इन
दोनोंको कढाईमें चढा खूब जलाले, फिर नीलाथोता दो तोले
रस कपूर दो तोला इन दोनों को पीसकर दो पोटली बनावे
और इस तेल में भिगोकर गरम कर करके रीढ से पीठ तक
सेकै यह दवा एकही दिन की जाती है ।
दूसरी दवा-तिल के तेल से सेकै फिर तिल का तेल और
जवाखार दोनों को पानी में औटा कर पिलावे ।
तीसरी दवा-गरम पानी के साथ साबुन लगा कर धोवे ।
चौथी दवा-दूध और नमक को औटाकर मले ।
पांचवीं दवा-सरेस को पानी में पका कर लगावे ।
छठी दवा-कुटकी आघपाव, सोंठ आघपाव, कमीला आघ-
५८ शालिहोत्र ।
पाव, काली मिरच आधपाव गूगल डेढ़ तोला इनको पानी में
पीस कर गरम करके लेप करे ।
पानी की दवा-कच्छ, मुसब्बर, पीपल प्रत्येक आधपाव; शहद
एक सेर इनमें से हर एक दवा को अलग २ पीसकर शहद में
मिलावे और डेढ़ डेढ़ तोले की गोलियां बना कर उनमें से
प्रतिदिन दो दो गोली दाने के साथ खिलावे ।
पीठ को सूजन का इलाज-गेहूं की मैदा, हल्दी; सज्जी इन
सब को महीन पीस कर अग्नि पर पकाकर लेप करे ।
पीठके घावका हलाज-चार जामा के ढीला कसने से रिगड़
खाकर वा और किसी रीतिसे छिलकर पीठमें घाव होजाताहै ।
पहिली दवा-पुरानी गच का चूना और कड़वा तेल दोनों
दो सेर पानी में घोल कर रखदे, जब पानी ऊपर रह जाय
और तेल चूना नीचे बैठ जाय तब उसे निकाल घाव में भरे
और मक्खी न बैठने दे ।
दूसरी दवा-ऊँट की पसली की राख भरदे ।
तीसरी दवा-पुराने जूते की राख करके घावमें भरदे अथवा
[इस राख को कडवे तेल या मिट्टीके तेलमें मिलाकर लेप करे ।
चौथी दवा-प्रथमही चिकनी मिट्टी लगाकर साबुनके पानी से
दो दिन तक धोकर सरसोंका तेल और नील मिलाकर लगादे ।
घाव को नीमके पानीसे धोते रहनाभी अधिक गुणकारक है ।
तङ्ग के नीचे घाव होजाने का उपाय ।
जो पेटपर तङ्ग के नीचे घाव होजाय तो सादे कागज की
कई तह करके पानी में अच्छी तरह भिगोकर घाव पर रखदे
ऊपर से तङ्ग कसदे ।
शालिहोत्रम् । ५९
दूसरी दवा-फिटकरी, भुना सुहागा, काली मिरच, हल्दी इन
सबको कूट छानकर चार पैसे भर दवाको मोंठके चूनमें मिला
दोनों समय दे ।
घावपर मरहम-सरसोंका तेल आधसेर, लहसन आधपाव, सु-
रती एक छटांक, लाल मिरच एक छटांक, नीमकी पत्ती आध
पाव, मुर्दा संग एक तोला, सिंदूर दो तोला, संजराहत दो तोला
इन सबको तेलमें पका लेवे और ठंडा होने पर घावके ऊपर
लगाता रहे ।
दूसरी मरहम-मुर्दासंग तीन माशे, मुसब्बर तीन माशे, मोम
तीन माशे, तिलका तेल पावभर, एक पान इन सबको पीसकर
तेलमें पका लेवे और घावको नीमके पानी से धोकर यह मर-
हम लगा देवे ॥
तीसरी दवा-गोचिकित्सा में घावके प्रकरण में जो जो उपाय
लिखे गये हैं उनसे भी आराम होता है ।
तवकका इलाज-तंगके नीचे रोटीकी टिकिया के समान सूज-
न उठती है, जो इसका उपाय करने में देरीकी जायतो यह सूज-
न नाभितक दौड़ जाती है। इसमें देरी करना ठीक नहीं है ।
पहिली दवा--काले धतूरेके पत्तोंका रस, काची मकोयका अर्क
कालीजीरीकी लकडी मैदा इन सबको सिलपर पीसकर लगादे ।
दूसरी दवा-बकायन, नीम, संभालूके पते इनको मुझ मुला
कर सूजन पर रख कपडे से बांध देवें । और इसोका वफारा
तीन दिन तक दे !
तीसरी दवा-मूलीके बीज और कलमी शोरा इनको पानी
में घिस गरम करके लेप करै ।
६० शालिहोत्रम् ।
अन्य सूजनोंके उपाय-सज्जीखार, सरसों, लोटाखार, सेंघानमक
पीपल, दावा हलदी इन सबको समान भागले पानी में पीसकर
लेप करे ।
दूसरी दवा-अजवायन, सेंधानमक हरड. घुडवच, चिरायता ये
सब समान भागले सरसों के तेलमें चासनी कर खिलावे । यह
दवा दोनों समय करनी चाहिये जो सूजन ऐसी जगह हो कि
उसका बैठाना कठिन हो तो पकानेका उपाय करै ।
सूजनको पकानेकी दवा-काली मिरच पीसकर रखले फिर
उरदके आटेकी इतनी बडी रोटी बनावै जितनी सूजन हो, उसे
एक तरफसे सेक ले और जिधर कच्ची हो उधरकी ओर काली
मिरचोंका चूर्ण बुरक कर सूजनपर बांधदे, ऊपरसे एरंडके पत्ते रख
कपडेसे बांधदेवै और आठपहर पीछे खोलेतो सूजन पक जायगी।
सब देहकी सूजनका उपाय-काली या लाल मिरच आधपाव
पीसकर महेले में मिलाकर खिलावै और नीमकी पत्ती मट्ठे में
पीस कर तीन दिनतक सब देह पर मर्दन करै ।
लादीसे अ्रंदकोषों की सूजनका उपाय ।
दबलूत जीरा; जवाखार, साथरी इन सबको कूट छान
घीमें मिला मरहम बना दिनमें पांच सात बार लगावै ।
दूसरी दवा-मछलीको दो सेर पानी में उवालै जब चौथाई
पानी रह जाय तब नालमें भरकर तीन दिनतक पिलावै ।
तीसरी दवा-दालचीनी और गोड दोनोंको पीसकर लेप करे
और जो कफके साथ सूजन हो तो वह कडी होती है।
दवा-पीपल, सोंठ, गेरू, जवाखार, साथरी इनको कूट छान
कर सेरभर शराब में मिलाकर नाल में भर कर पिलावे ।
दूसरी दवा—तीन दिन तक गौ का ताजा गोबर मलै ।
गर्मीदाने का इलाज—जिस घोडे के अण्डकोशों पर गर्मी से
दाने से पड़जांय उसके अण्डकोषों को तेल से चिकना करके
नीम की छाल को महीन पीसकर उसका लेप करदे ।
गुप्त अण्डकोषों को प्रगट करने का उपाय ।
रुधिर और कफ दोनों मिलकर घोडेके अण्डकोषोंको खींचते
हैं जिससे एक या दोनों ओरके अण्ड लुप्त होजातेहैं, जो इसके
इलाजमें देर होती है तो घोडा लङ्गडा होकर चलने लगता है,
जिस घोडे के अण्ड पर सीवन का चिह्न नहीं होता और साफ
मेंडासा चमकता है वह पैदायशी है उसका इलाज नहीं हो
सकता और जो सीवन का चिह्न हो और उनकी दोनों तरफभी
मालूम होती होतो जानले कि यह बीमारीहै इसका इलाज करे ।
दवा पहिली—जङ्घा की रग अण्डकोषों के समीप खोले फिर
अण्डकोषोंको तेजसे चिकना करदे और गायका मूत्र तेल और
नमक इसको हांडी में भरकर हांडी का मुख बन्द करके आग
पर औटावे, फिर हांडीका मुख खोलकर अण्डकोषोंको वफारादे
तो नीचे उतर आते हैं। इस प्रकार सबेरे और सन्ध्या दोनों
समय करे और यह दवा खिलावे ।
खिलाने की दवा—एलुआ, भुनी हींग, जवाखार, छिला हुआ
लहसन, प्रत्येक नौ दिरम और पीपल सवा दो दिरम सबको
कूट छान कर नौ दिरम तिल के तेल में मिला कर सात दिन
तक खिलावे, घोडे को कूभा का पानी पिलावे, दवा देने के
बाद दाना न दे और इस दशा में सवारी भी न करे।
६२ शालिहोत्रम् ।
गुह्येन्द्रिय के रोगों का इलाज ।
जिस घोडे के उपस्थ पर गर्मी से दाने पड़ जांय और उनमें
खुजली चले तो उसका शीघ्र उपाय करे क्योंकि देर करने से
कीडे पड़ जाते हैं इस रोग में जानूं में नश्तर लगावे और यह
दवा करे ।
दवा-उपस्थ को ठण्डे पानी से छिड़ककर छुहारे या नीम का
लेप करदे अथवा नीम के पत्तों को औटाकर उसे पानी सेधोवे
अथवा घी को एक सौ एक बार धोकर उसमें पपड़िया कत्था
और थोडा कपूर मिला कर लेप करे ।
घोडे की पूंछ के रोगों पर इलाज ।
घोडे की पूंछ में खराब रुधिर के इकट्ठे हो जाने से खुजली
होती है और उसमें फुन्सियां होजाती हैं जिनसे भुसीसी उड़ने
लगती है अगर रोग के इलाज में देर हो तो कीडे दुम की
खाल को खा जाते हैं और सब बाल गिर पडते हैं और कीडों
की खाल को खा जाने के कारण हड्डियां निकल आती हैं।
इस रोग का इलाज-पहिले पूंछ के सिरे की फस्द खोले
फिर सरसों के तेल को धीरे २ दुम पर मले जिससे घोडे को
कष्ट न हो और सेर भर छुहारे तथा पावभर नीम के पत्ते दोनो
को कूट कर तीन दिन तक घोडे को खिलावे या खुजली को
दूर करने वाला तेल बना कर प्रयोग करे ।
खुजली और अर्द्धांगका इलाज-घोडेका आधा शरीर बादीसे
रहजाता है फिर धीरे २ आधा शरीर सूख जाता है तथा घोडा
बेहोश और सुस्त रहता है तथा दाना घासतक नहीं खाता है।
दवा-तिल का तेल सेर भर, अकलूत आधसेर दोनोंको मिला
शालिहोत्रम् । ६१
कर अग्निपर चढाकर औटाले, फिर उसको घोडे के शरीर पर
मालिश करै इस रोगमें घोडेको हवासे बचावे तथा पानाकेलिये
यह दबादेः पावभर पीपलको पीसकर सेरभर गायके दूधमें मिला
कर तीन दिनतक प्रातःकाल घोडेको पिलावै ।
फालिजका इलाज–तिलका तेल गर्दन पर मले और तेलके
सूखने पर अरंडके पत्ते गो।के गोबरमें पीसकर मले (अन्य उपाय)
कुचलाके सतकी एक रत्तीमें ४० गोलियां बनाकर एक एक
गोली दोनों समय दे और लिनिमॅट रोमानियाका मर्दन करे ।
अन्य उपाय–लहसनके वीज, अमलतास, सोंठ इनको समान
भागले दो सेर पानी में औटावै जब आधा पानी रहजाय तब
छानकर सात दिन तक पिलावै ।
मस्सेका उपाय–जब घोडेके मुखपर कोई मस्सा हो तो काग-
जकी मोटी वत्ती बनाकर उसकी धूनी से जलादे ।
दूसरा उपाय–तबकिया हरताल और चूना दोनों बराबर
पीसकर लेप करै ।
तीसरा उपाय–गंधक और उससे चौथाई केशर सिरकेमें पीस
कर बराबर लगाता रहे ।
बसका इलाज–जिस घोडे के मुखपर उजले दाग होजाते हैं
उसे बरस कहते हैं । इस पर यह काम करना चाहिये कि बैंगन
के टुकडे करके पानी में मलले और उस पानी को दिनमें दस
बारह बार थोडा २ लगावे ।
मुख बंधकी दवा-जिस घोडे के दांत बंध जाते हैं और मुख से
लार टपकने लगजाती है उसका यह उपाय है कि तिलका तेल
६४ शालिहोत्रम् ।
उसके सिरपर लगावै और गौका गोबर वा अंजीरका हरा पत्ता
इनको पीसकर गुनगुना करके लेप करें ।
गलसुराकी दवा-यह सूजन कानकी जड से हलक तक होती
है । इसको पुरानी ईंटसे सेकना चाहिये ।
दूसरा इलाज-इन्द्रायनका भुना हुआ फल जौके आटेमें मल-
कर सात दिनतक खिलावै ।
तीसरा इलाज-अदरख पावभर, कालीमिरच आधसेर'पानएक
सौ (१००) कालेसर पावभर उनको कूट छानकर सात दिनतक
सायंकालके समय खिलावै ।
खुशकेका इलाज-इसमें गलेके दोनों ओर दो गोले होते हैं,
इस रोगके होनेसे जाडेमें सूत्रबन्द हो जाता है और गर्मी में
खाना पीना छोड देता है ।
पहिली दवा-पान, पीपल, अदरख, कालीमिरच, सेंधानमक
इन सबको बराबर लेकर चनेके चूनमें मिलाकर सात दिन तक
खिलावै ।
दूसरी दवा-बिनौलोंकी पोटली बनाकर सेकें और थोडे से
बिनौले मनुष्यके सूत्रमें पीसकर बांध दे तौ तीन दिनमें आराम
होजाता है ।
खुवकका इलाज-हलक के जोड में एक छालासा होता है इसे
जह्रवाद भी कहते हैं । इसका इलाज वैसाही होता है जैसा
गलसुराका होता है जो उससे आराम न हो तौ शिंगरफ की
गोली बहुत अच्छी होती हैं और जो बीमारी यहां तक बढजाय
कि मुख न खुल सकै तौ गौका गोबर और सांभरनमक मनुष्य
शालहोत्र। ६५
के मूत्र में पीसकर दोनों समय लगावे ऊपर से कपडा बांधदें।
इससे पक कर फूट जायगा। फिर सफेद जीरा, हल्दी एक २
दाम, नेहूं तीन दाम, नमक पांच दाम इनको पीस कर घाव में
भरकर कपडा बांध दे । फिर तीन दिनतक केवल नमक पीसकर
भरता रहे और नीचे लिखी मरहम लगावे । तिली का तेल
डेढ़ पाव, भिलावा छटांक भर तेल में जला कर लगावे, जब
उसकी ऊंचाई जाती रहे तब काली मिरच, नोलायोथा और
साबुन इनको तेल में पकाकर लगावे ।
अन्य दवा-सोंठ मिरच, पीपल, कुटकी, वायविडङ्ग, चिरा-
यता, सफेद जीरा, चीते की छाल, काकड़ासींगी, काला जीरा
इन सबको कूट छान कर इसमें आधपाव, सत्तू के साथ खिला-
ता रहे ।
ब्राह्मनी कोलास का इलाज ।
यह रोग दुम म या चोटी में होता है, इसमें रुधिर विकार
के कारण बाल जड़ से गिर जाते हैं और दर्द होता है ।
इसकी दवा-ढाक के पके हुए पीले पत्ते २० नग ले तथा
हरताल और सङ्खिया दोनों को बराबर लेकर पानी डाल कर
दोपहर तक खरल में घोटे, फिर उसको उन आक के पत्रों पर
लपेट ले और सेर भर तिल के तेल में उन पत्तों को डालकर
अग्नि पर चढावे जब पत्ते जल जांय तब उतार ले और नीला-
थोता, आंवलाहल्दी और आशखार तीनों बराबर उसमें डाल
कर नीम की लकड़ी से खूब घोटले फिर जिस जगह पर
ब्राह्मनी कोलास है उसको उपले से इतनी खुजलाओ कि रुधिर