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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

शालिहोत्रम् । ६१
कर अग्निपर चढाकर औटाले, फिर उसको घोडे के शरीर पर
मालिश करै इस रोगमें घोडेको हवासे बचावे तथा पानाकेलिये
यह दबादेः पावभर पीपलको पीसकर सेरभर गायके दूधमें मिला
कर तीन दिनतक प्रातःकाल घोडेको पिलावै ।
फालिजका इलाज–तिलका तेल गर्दन पर मले और तेलके
सूखने पर अरंडके पत्ते गो।के गोबरमें पीसकर मले (अन्य उपाय)
कुचलाके सतकी एक रत्तीमें ४० गोलियां बनाकर एक एक
गोली दोनों समय दे और लिनिमॅट रोमानियाका मर्दन करे ।
अन्य उपाय–लहसनके वीज, अमलतास, सोंठ इनको समान
भागले दो सेर पानी में औटावै जब आधा पानी रहजाय तब
छानकर सात दिन तक पिलावै ।
मस्सेका उपाय–जब घोडेके मुखपर कोई मस्सा हो तो काग-
जकी मोटी वत्ती बनाकर उसकी धूनी से जलादे ।
दूसरा उपाय–तबकिया हरताल और चूना दोनों बराबर
पीसकर लेप करै ।
तीसरा उपाय–गंधक और उससे चौथाई केशर सिरकेमें पीस
कर बराबर लगाता रहे ।
बसका इलाज–जिस घोडे के मुखपर उजले दाग होजाते हैं
उसे बरस कहते हैं । इस पर यह काम करना चाहिये कि बैंगन
के टुकडे करके पानी में मलले और उस पानी को दिनमें दस
बारह बार थोडा २ लगावे ।
मुख बंधकी दवा-जिस घोडे के दांत बंध जाते हैं और मुख से
लार टपकने लगजाती है उसका यह उपाय है कि तिलका तेल