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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

शालहोत्र। ६५
के मूत्र में पीसकर दोनों समय लगावे ऊपर से कपडा बांधदें।
इससे पक कर फूट जायगा। फिर सफेद जीरा, हल्दी एक २
दाम, नेहूं तीन दाम, नमक पांच दाम इनको पीस कर घाव में
भरकर कपडा बांध दे । फिर तीन दिनतक केवल नमक पीसकर
भरता रहे और नीचे लिखी मरहम लगावे । तिली का तेल
डेढ़ पाव, भिलावा छटांक भर तेल में जला कर लगावे, जब
उसकी ऊंचाई जाती रहे तब काली मिरच, नोलायोथा और
साबुन इनको तेल में पकाकर लगावे ।
अन्य दवा-सोंठ मिरच, पीपल, कुटकी, वायविडङ्ग, चिरा-
यता, सफेद जीरा, चीते की छाल, काकड़ासींगी, काला जीरा
इन सबको कूट छान कर इसमें आधपाव, सत्तू के साथ खिला-
ता रहे ।
ब्राह्मनी कोलास का इलाज ।
यह रोग दुम म या चोटी में होता है, इसमें रुधिर विकार
के कारण बाल जड़ से गिर जाते हैं और दर्द होता है ।
इसकी दवा-ढाक के पके हुए पीले पत्ते २० नग ले तथा
हरताल और सङ्खिया दोनों को बराबर लेकर पानी डाल कर
दोपहर तक खरल में घोटे, फिर उसको उन आक के पत्रों पर
लपेट ले और सेर भर तिल के तेल में उन पत्तों को डालकर
अग्नि पर चढावे जब पत्ते जल जांय तब उतार ले और नीला-
थोता, आंवलाहल्दी और आशखार तीनों बराबर उसमें डाल
कर नीम की लकड़ी से खूब घोटले फिर जिस जगह पर
ब्राह्मनी कोलास है उसको उपले से इतनी खुजलाओ कि रुधिर