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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

६४ शालिहोत्रम् ।
उसके सिरपर लगावै और गौका गोबर वा अंजीरका हरा पत्ता
इनको पीसकर गुनगुना करके लेप करें ।
गलसुराकी दवा-यह सूजन कानकी जड से हलक तक होती
है । इसको पुरानी ईंटसे सेकना चाहिये ।
दूसरा इलाज-इन्द्रायनका भुना हुआ फल जौके आटेमें मल-
कर सात दिनतक खिलावै ।
तीसरा इलाज-अदरख पावभर, कालीमिरच आधसेर'पानएक
सौ (१००) कालेसर पावभर उनको कूट छानकर सात दिनतक
सायंकालके समय खिलावै ।
खुशकेका इलाज-इसमें गलेके दोनों ओर दो गोले होते हैं,
इस रोगके होनेसे जाडेमें सूत्रबन्द हो जाता है और गर्मी में
खाना पीना छोड देता है ।
पहिली दवा-पान, पीपल, अदरख, कालीमिरच, सेंधानमक
इन सबको बराबर लेकर चनेके चूनमें मिलाकर सात दिन तक
खिलावै ।
दूसरी दवा-बिनौलोंकी पोटली बनाकर सेकें और थोडे से
बिनौले मनुष्यके सूत्रमें पीसकर बांध दे तौ तीन दिनमें आराम
होजाता है ।
खुवकका इलाज-हलक के जोड में एक छालासा होता है इसे
जह्रवाद भी कहते हैं । इसका इलाज वैसाही होता है जैसा
गलसुराका होता है जो उससे आराम न हो तौ शिंगरफ की
गोली बहुत अच्छी होती हैं और जो बीमारी यहां तक बढजाय
कि मुख न खुल सकै तौ गौका गोबर और सांभरनमक मनुष्य