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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

दो शब्द
१ सम्पादनका कारण
सर्वार्थसिद्धिको सम्पादित होकर प्रकाशमें आनेमें अत्यधिक समय लगा है । लगभग आठ नौ वर्ष पूर्व
विशेष वाचनके समय मेरे ध्यानमें यह आया कि सर्वार्थसिद्धिमें ऐसे कई स्थल हैं जिन्हें उसका मूल भाग
माननेमें सन्देह होता है । किन्तु जब कोई वाक्य, वाक्यांश, पद या पदांश लिपिकारकी असावधानी या अन्य
कारणसे किसी ग्रन्थका मूल भाग बन जाता है तब फिर उसे बिना आधारके पृथक् करनेमें काफी अड़चनका
सामना करना पड़ता है । सर्वार्थसिद्धिके वाचनके समय भी मेरे सामने यह समस्या थी और इसीके फलस्वरूप
इसके सम्पादनकी ओर मेरा झुकाव हुआ था ।
यह तो स्पष्ट ही है कि आचार्य पूज्यपादने तत्त्वार्थसूत्र प्रथम अध्यायके 'निर्देशस्वामित्व' और
'सत्संख्या' इन दो सूत्रोंकी व्याख्या षट्खण्डागमके आधारसे की है । इसका विचार आगे चलकर प्रस्तावना-
में हम स्वतन्त्र प्रकरण लिखकर करनेवाले हैं । यहाँ केवल यह देखना है कि इन सूत्रोंकी व्याख्यामें कहीं
कोई शिथिलता तो नहीं आने पायी और यदि शिथिलताके चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं तो उसका कारण क्या है ?
'निर्देशस्वामित्व-' सूत्रकी व्याख्या करते समय आचार्य पूज्यपादने चारों गतियोंके आश्रयसे सम्य-
ग्दर्शनके स्वामीका निर्देश किया है। वहाँ तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शनके अभावके समर्थनमें पूर्व मुद्रित
प्रतियोंमें यह वाक्य उपलब्ध होता है—
‘कुत इत्युक्ते मनुष्यः कर्मभूमिज एव दर्शनमोहक्षपणप्रारम्भको भवति । क्षपणप्रारम्भकालात्पूर्वं
तिर्यक्षु बद्धायुष्कोऽपि उत्तमभोगभूमितिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्स्त्रीषु ; द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां क्षायिका-
संभवात् । एवं तिरश्चामपर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयं न पर्याप्तकानाम् ।'
दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके आगममें इस प्रकारके नियमका निर्देश है कि सम्यग्दृष्टि
मर कर किसी भी गतिके स्त्रीवेदियोंमें उत्पन्न नहीं होता ।
किन्तु श्वेताम्बर आगम ज्ञाताधर्मकथा नामके छठवें अंगमें मल्लिनाथ तीर्थङ्करकी कथा¹ के प्रसंगसे
बतलाया गया है कि मल्लिनाथ तीर्थङ्करने अपने पिछले महाबलके भवमें मायाचारके कारण ²स्त्रीनामकर्म
गोत्रको निष्पन्न किया जिससे वे तीर्थङ्करकी पर्यायमें स्त्री हुए । और इसी कारण पीछेके श्वेताम्बर टीका-
कारोंने उक्त नियमका यह खुलासा किया है कि 'सम्यग्दृष्टि मरकर स्त्री नहीं होता यह बाहुल्यकी अपेक्षा
कहा है ।'
यहाँ हमें इस कथाके सन्दर्भ पर विचार न कर केवल इतना ही देखना है कि यह स्त्री नामकर्म गोत्र
क्या वस्तु है । क्या यह नौ नोकषायोंमेंसे स्त्रीवेद नामक नोकषाय है या इस द्वारा अङ्गोपाङ्गका निर्देश
किया गया है ? जब महाबलकी पर्यायमें इस कर्मका बन्ध होता है तब वे तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले
सम्यग्दृष्टि साधु थे और सम्यग्दृष्टिके स्त्रीवेदका बन्ध नहीं होता ऐसा कर्मशास्त्रका नियम है । इसलिए यह
बँधनेवाला कर्म स्त्रीवेद नामक नोकषाय तो हो नहीं सकता । रही अङ्गोपाङ्गकी बात सो एक तो अङ्गो-
पाङ्गमें ऐसा भेद परिलक्षित नहीं होता । कदाचित् ऐसा भेद मान भी लिया जाय तो कर्मशास्त्रके नियमा-
नुसार अशुभ अङ्गोपाङ्गका बन्ध प्रमत्त-संयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें होता है यह कहना कठिन है ।
१. देखो अध्ययन ८ । २. तए णं से महब्बले अणगारे इमेणं कारणेणं इत्थिणामकम्मं गो यं विव्वंतिसु ।
ज्ञाता० पृ० ३१२ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

इसलिए प्रस्तुत प्रकरणमें न तो ज्ञाताधर्मकथाकी इस कथाको आधार माना जा सकता है और न ही इस
आधारसे श्वेताम्बर टीकाकारोंका यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि 'सम्यग्दृष्टि जीव मरकर स्त्रीवेदियोंमें
नहीं उत्पन्न होता यह बाहुल्य की अपेक्षा कहा है।'
इतने विचारके बाद जब हम सर्वार्थसिद्धिके उक्त कथन पर ध्यान देते हैं तो हमें उसमें सन्देह होता है।
उसमें तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शन न होनेके हेतुका निर्देश किया गया है। यह तो स्पष्ट है कि जो
मनुष्य तिर्यञ्चायुका बन्ध कर सम्यग्दृष्टि हो क्षायिक सम्यग्दर्शनको प्राप्त होता है वह उत्तम भोगभूमिके पुरुष-
वेदी तिर्यञ्चोंमें ही उत्पन्न होता है, स्त्रीवेदी तिर्यञ्चोंमें नहीं। किन्तु इसके समर्थनमें जो 'द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां
क्षायिकासंभवात्' यह युक्ति दी गयी है वह न केवल लचर है अपि तु भ्रमोत्पादक भी है।
इस युक्तिके आधारसे पूरे वाक्यका यह अर्थ होता है कि तिर्यञ्च द्रव्यवेदवाली स्त्रियोंमें चूँकि क्षायिक
सम्यग्दर्शन सम्भव नहीं है इसलिए क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव मरकर उत्तम भोगभूमिके तिर्यञ्च पुरुषोंमें ही
उत्पन्न होते हैं। अब थोड़ा बारीकीसे पूरे सन्दर्भ पर विचार कीजिए। जो प्रश्न है, एक तरहसे वही समाधान
है। तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शन क्यों नहीं होता इसका विचार करना है। किन्तु उसके उत्तरमें इतना
कहना पर्याप्त था कि बद्धतिर्यञ्चायु मनुष्य यदि क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है तो वह मरकर उत्तम भोग-
भूमिके तिर्यञ्च पुरुषोंमें ही उत्पन्न होता है ऐसा नियम है वहाँ समर्थनमें 'द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां क्षायिका-
संभवात्' इस हेतु कथनकी क्या आवश्यकता थी। इसीको कहते हैं वही प्रश्न और वही उत्तर।
दूसरे यहाँ 'द्रव्यवेदस्त्रीणां' यह वाक्य रचना आगम परिपाटीके अनुकूल नहीं है अतएव भ्रमोत्पादक
भी है, क्योंकि आगममें तिर्यञ्च, तिर्यञ्चिनी और मनुष्य, मनुष्यिनी ऐसे भेद करके व्यवस्था की गयी है तथा
इन संज्ञाओंका मूल आधार वेद नोकषायका उदय बतलाया गया है।
हमारे सामने यह प्रश्न था। हम बहुत कालसे इस विचारमें थे कि यह वाक्य ग्रन्थका मूलभाग है या
कालान्तरमें उसका अङ्ग बना है। तात्त्विक विचारणाके बाद भी इसके निर्णयका मुख्य आधार हस्तलिखित
प्राचीन प्रतियां ही थीं। तदनुसार हमने उत्तर भारत और दक्षिण भारतकी प्रतियोंका संकलन कर शंकास्थलोंका
मुद्रित प्रतियोंसे मिलान करना प्रारम्भ किया। परिणामस्वरूप हमारी धारणा सही निकली। यद्यपि सब
प्रतियोंमें इस वाक्यका अभाव नहीं है पर उनमेंसे कुछ प्राचीन प्रतियाँ ऐसी भी थीं जिनमें यह वाक्य नहीं
उपलब्ध होता है।
इसी सूत्रकी व्याख्यामें दूसरा वाक्य 'क्षायिकं पुनर्भाववेदेनैव' मुद्रित हुआ है। यहाँ मनुष्यिनियोंके
प्रकरणसे यह वाक्य आता है। बतलाया यह गया है कि पर्याप्त मनुष्यिनियोंके ही तीनों सम्यग्दर्शनोंकी प्राप्ति
सम्भव है अपर्याप्त मनुष्यिनियोंके नहीं। निश्चयतः मनुष्यिनीके क्षायिक सम्यग्दर्शन भाववेदकी मुख्यतासे ही
कहा है यह द्योतित करनेके लिए इस वाक्यकी सृष्टि की गयी है।
किन्तु यह तो स्पष्ट ही है कि आगममें 'मनुष्यिनी' पद स्त्रीवेदके उदयवाले मनुष्य गतिके जीवके लिए
ही आता है। जो लोकमें नारी, महिला या स्त्री आदि शब्दोंके द्वारा व्यवहृत होता है, आगमके अनुसार
मनुष्यिनी शब्दका अर्थ उससे भिन्न है। ऐसी अवस्थामें उक्त वाक्यको मूलका मान लेने पर मनुष्यिनी शब्दके
दो अर्थ मानने पड़ते हैं। उसका एक अर्थ तो स्त्रीवेदका उदयवाला मनुष्य जीव होता ही है और दूसरा अर्थ
महिला मानना पड़ता है चाहे उसके स्त्रीवेदका उदय हो या न हो।
ऐसी महिलाको भी जिसके स्त्रीवेदका उदय होता है मनुष्यिनी कहा जा सकता है और उसके क्षायिक
सम्यग्दर्शनका निषेध करनेके लिए यह वाक्य आया है, यदि यह कहा जाय तो इस कथनमें कुछ भी तथ्यांश
नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जैसा कि हम पहले कह आये हैं कि आगममें मनुष्यिनी शब्द भाववेदकी मुख्यतासे
ही प्रयुक्त हुआ है, अतएव वह केवल अपने अर्थमें ही चरितार्थ है। अन्य आपत्तियोंका विधि-निषेध करना
उसका काम नहीं है।
हमने इस वाक्य पर भी पर्याप्त ऊहापोह कर सब प्रतियोंमें इसका अनुसन्धान किया है। प्रतियोंके
मिलान करनेसे ज्ञात हुआ कि यह वाक्य भी सब प्रतियोंमें नहीं उपलब्ध होता।

दो शब्द ९
इसी प्रकार एक वाक्य 'सत्संख्या' — इत्यादि सूत्रकी व्याख्याके प्रसंगसे लेश्या प्रकरणमें आता है।
जो इस प्रकार है—
‘द्वादशभागाः कुतो न लभ्यन्ते, इति चेत् तन्नावस्थितलेश्यापेक्षया पञ्चैव । अथवा येषां मते सासा-
दनएकेन्द्रियेषु नोत्पद्यते तन्मतापेक्षया पञ्चैव ।'
प्रकरणे कृष्ण आदि लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंके स्पर्शनका है। तिर्यंच और मनुष्य सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीव मर कर नरकमें नहीं उत्पन्न होते । जो देवगतिमें जाते हैं या देवगतिसे आते हैं उनके कृष्ण
आदि अशुभ लेश्याएँ नहीं होतीं। नरकसे आनेवालोंके कृष्ण आदि अशुभ लेश्याएँ और सासादनसम्यग्दर्शन
दोनों होते हैं। इसी अपेक्षासे यहां कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शन
क्रमसे कुछ कम पांच बटे चौदह राजु, कुछ कम चार बटे चौदह राजु और कुछ कम दो बटे चौदह राजु
कहा गया है।
यह षट्खण्डागमका अभिमत है। सर्वार्थसिद्धिमें सत्, संख्या और क्षेत्र आदि अनुयोगद्वारोंका निरूपण
इसी अभिप्रायसे किया गया है। कषायप्राभृतका अभिमत इससे भिन्न है। उसके मतसे सासादनसम्यग्दृष्टि
जीव मर कर एकेन्द्रियोंमें भी उत्पन्न होते हैं। इसलिए इस अपेक्षासे कृष्ण लेश्यामें सासादनसम्यग्दृष्टिका
कुछ कम बारह बटे चौदह राजु स्पर्शन भले ही बन जावे, परन्तु षट्खण्डागमके अभिप्रायसे इन लेश्याओं में
यह स्पर्शन उपलब्ध नहीं होता।
हमारे सामने यह प्रश्न था । सर्वार्थसिद्धिमें जब भी हमारा ध्यान 'द्वादशभागाः कुतो न लभ्यन्ते'
इत्यादि वाक्य पर जाता था, हम विचारमें पड़ जाते थे। प्रश्न होता था कि यदि सर्वार्थसिद्धिकारको मतभेद-
की चर्चा करना इष्ट था तो सतरूपणामें उन्होंने इस मतभेदका निर्देश क्यों नहीं किया ? अनेक प्रकारसे इस
वाक्यके समाधानकी ओर ध्यान दिया पर समुचित समाधानके अभावमें चुप रहना पड़ा। यह विचार अवश्य
होता था कि यदि सर्वार्थसिद्धिकी प्राचीन प्रतियोंका आश्रय लिया जाय तो सम्भव है उनमें यह वाक्य न
हो। हमें यह संकेत करते हुए प्रसन्नता होती है कि हमारी धारणा ठीक निकली। मूडबिद्रीसे हमें जो ताड़-
पत्रीय प्रतियां उपलब्ध हुईं उनमें यह वाक्य नहीं है। इस आधारसे हम यह निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि
यह वाक्य भी सर्वार्थसिद्धिका नहीं है।
सर्व-प्रथम सर्वार्थसिद्धिमूलका मुद्रण कल्लप्पा भरमप्पा निटवेने कोल्हापुरसे किया था। दूसरा मुद्रण
श्री मोतीचन्द्र गोतमचन्द्र कोठारी द्वारा सम्पादित होकर सोलापुरसे हुआ है। तथा तीसरी बार श्रीमान्
पं० बंशीधरजी सोलापुरवालोंने सम्पादित कर इसे प्रकाशित किया है। पण्डितजी ने इसके सम्पादित करनेमें
पर्याप्त श्रम किया है और अन्य संस्करणोंकी अपेक्षा यह संस्करण अधिक शुद्ध है। फिर भी जिन महत्वपूर्ण
शंकास्थलोंकी ओर हमने पाठकोंका ध्यान आकर्षित किया है वे उस संस्करणमें भी यथास्थान अवस्थित हैं।
सर्वार्थसिद्धिके नीचे जो टिप्पणियां उद्धृत की गयी हैं वे भी कई स्थलों पर भ्रमोत्पादक हैं। उदाहर-
णार्थ कालप्ररूपणामें अनाहारकोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा सासादनसम्यग्दृष्टियोंका उत्कृष्ट काल आवलिके
असंख्यातवें भागप्रमाण बतलाया गया है। इस पर टिप्पणी करते हुए टिप्पणकार लिखते हैं—
'आवलिकाया असंख्येयभाग इति — स च आवलिकाया असंख्येयभागः समयमात्रलक्षणत्वात् एक-
समय एव स्यात्, आवल्याः असंख्यातसमयलक्षणत्वात् ।'
इसका तात्पर्य यह है कि वह आवलिका असंख्यातवां भाग एक समय लक्षणवाला होनेसे एक समय
प्रमाण ही होता है, क्योंकि एक आवलिमें असंख्यात समय होते हैं, अतः उसका असंख्यातवां भाग एक समय
ही होगा।
स्पष्ट है कि यदि यहां आचार्योंको एक समय काल इष्ट होता तो वे इसका निर्देश 'एक समय' शब्द
द्वारा ही करते। जीवस्थान कालानुयोगद्वारमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण कालका जो स्पष्टीकरण किया
है उसका भाव यह है कि कई सासादनसम्यग्दृष्टि दो विग्रह करके दो समय तक अनाहारक रहे और तीसरे
समयमें अन्य सासादनसम्यग्दृष्टि दो विग्रह करके अनाहारक हुए। इस प्रकार निरन्तर आवलिके असंख्यातवें
प्रस्तावना-२

१० सर्वार्थसिद्धि
भाग बार जीव दो-दो समय तक अनाहारक होते रहे । इसलिए आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काण्डकोंको
दो से गुणा करने पर अनाहारक सासादनसम्यग्दृष्टियोंका कुल काल उपलब्ध होता है । १
अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें यह देखा जाता है कि पीछेसे अनेक स्थलों पर विषयको स्पष्ट करनेके
लिए अन्य ग्रन्थोंके श्लोक, गाथा, वाक्यांश या स्वतन्त्र टिप्पणियां जोड़ दी जाती हैं और कालान्तरमें वे ग्रन्थका
अंग बन जाती हैं। सर्वार्थसिद्धिमें यह व्यत्यय बहुत ही बड़ी मात्रामें हुआ है । ऐसे तीन उदाहरण तो हम
इस वक्तव्यके प्रारम्भमें ही उपस्थित कर आये हैं । कहना न होगा कि यह किसी टिप्पणकारकी सूझ है और
उसने अपनी दृष्टिसे विषयको स्पष्ट करनेके लिए पहले वे वाक्य फुटनोटके रूपमें हाशियामें लिखे होंगे और आगे
चलकर उसपर-से दूसरी प्रति तैयार करते समय वे ही मूल ग्रन्थके अंग बन गये होंगे । इसके सिवा आगे
भी ऐसे कई वाक्यांश या गाथाएँ मिली हैं जो अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध नहीं होतीं और जिन्हें
दूर कर देनेसे प्रकरणकी कुछ भी हानि नहीं होती । यहाँ हम कुछ ऐसे उपयोगी वाक्यांशोंके दो-तीन उदाहरण
उपस्थित कर रहे हैं जो प्राचीन संस्करणोंमें थे और इस संस्करणमें-से अलग करने पड़े हैं—
१. कुछ प्रतियोंमें तृतीय अध्यायके प्रथम सूत्रकी वृत्तिमें 'घनं च घनो मन्दो महान् आयत इत्यर्थः'
आदि पाठ उपलब्ध होता है। अब तककी मुद्रित प्रतियोंमें भी यह पाठ प्रकाशित हुआ है। हमारे सामने जो
प्रतियां थीं उनमें से अधिकतर प्रतियोंमें यह पाठ नहीं है और वृत्तिको देखते हुए वह वृत्तिकारका प्रतीत भी
नहीं होता, इसलिए इस पाठको ऊपर न देकर नीचे टिप्पणीमें दिखा दिया है।
२. नौवें अध्यायके नौवें सूत्रके मलपरीषहके व्याख्यानके अन्तमें 'केशलोञ्चसंस्काराभ्यामुत्पन्नखेद-
सहनं मलसामान्यसहनेऽन्तर्भवतीति न पृथगुक्तम्।' यह वाक्य मुद्रित प्रतियोंमें उपलब्ध होता है। किन्तु
हमारे सामने जो हस्तलिखित प्रतियां थीं उनमें यह वाक्य नहीं पाया जाता। वाक्य-रचनाको देखते हुए यह
सर्वार्थसिद्धिकारका प्रतीत भी नहीं होता। तथा किसी परीषहका स्वरूपनिर्देश करनेके बाद सर्वार्थसिद्धिमें
पुनः उस परीषहके सम्बन्धमें विशेष स्पष्टीकरण करनेकी परिपाटी भी नहीं दिखाई देती, इसलिए हमने इस
वाक्यको मूलमें न देकर टिप्पणीमें अलगसे दिखा दिया है।

२ प्रस्तुत संस्करणमें स्वीकृत पाठकी विशेषता
यह हम पहले ही निर्देश कर आये हैं कि प्रस्तुत संस्करणके पहले सर्वार्थसिद्धिके अनेक संस्करण
प्रकाशमें आ चुके थे। ऐसी अवस्थामें प्रस्तुत संस्करणके सम्पादनके समय किसी पाठको स्वीकार करने या
अस्वीकार करनेमें हमारे सामने बड़ी कठिनाई रही है। साधारणतः हमने इस बातका ध्यान रखा है कि
मुद्रित प्रतियोंमें जो पाठ उपलब्ध होते हैं। सर्वप्रथम उन्हें ही प्रमुखता दी जाय । किन्तु इस नियमका हम
सर्वत्र पालन नहीं कर सके । यदि हमें उनसे उपयुक्त पाठ अन्य हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध हुए तो उन्हें
स्वीकार करनेमें हमने संकोच नहीं किया । यहाँ तुलनात्मक ढंगसे मात्र प्रथम अध्यायके कुछ ऐसे पाठ दे रहे
हैं जिनसे उनका महत्त्व पाठकोंके ध्यानमें आ जाय ।
पृ० पं० पुरानी मुद्रित प्रति प्रस्तुत संस्करण
३ ३ -वत् । एवं व्यस्तज्ञाना- -वत् व्यस्तं ज्ञाना-
६ १ स्वयं पश्यति दृश्यतेऽनेनेति पश्यति दृश्यतेऽनेन
६ १ ज्ञप्तिमात्रं ज्ञातिमात्रं
१७ ४ पुरुषाकारा- पुरुषकारा-
१८ १ -र्थानामजीवानां नामा- -र्थानां नामा-
१९ १ -विधिना नामशब्दा- -विधिना शब्दा-

१. देखो, जीवस्थान पृ० ४, पृ० ४३५ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

दो शब्द ११
२० १ तत्त्वं प्रमाणेभ्यो तत्त्वं प्रमाणाभ्याम्
२९ ६ -निर्देशः । प्रशंसा- -निर्देशः । स प्रशंसा-
३० २ संक्षेपरुचयः । अपरे संक्षेपरुचयः । केचित् विस्तररुचयः । अपरे
३४ १ द्विविधा सामान्येन तावत् द्विविधाः सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत्
४४ ५ -संख्येयभागः -संख्येया भागाः
४९ ७ -स्पृष्टः अष्टौ नव चतु- स्पृष्टः अष्टौ चतु-
५० ३ -ख्येयभागः स्पृष्टः । सासादन- -ख्येयंभागः । असंयत-
सम्यग्दृष्टिभिः लोकस्यासंख्येयभागः
अष्टौ नव चतुर्दश भागा वा देशोनाः
सम्यग्मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां
सामान्योक्तं स्पर्शनम् । असंयत-
५९ २ -ख्येयः कालः । वन- -ख्येया लोकाः । वन-
६४ ११ -ज्ञिनां मिथ्यादृष्टेर्नाना- -ज्ञिनां नाना-
७१ १० -म्यधिके । चतुर्णा- -म्यधिके । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे
पूर्वकोटीपृथक्त्वैरम्यधिके । चतुर्णा-
८३ ७ -भागा असंख्येया उत्स- -भागोऽसंख्येयासंख्येया उत्स-
८८ ७ -संयता संख्ये- -संयता असंख्ये-
८९ ५ -भावः । इन्द्रियं प्रत्युच्यते । -भावः । पञ्चे-
पञ्चेन्द्रियाद्येकेन्द्रियान्ता उत्तरोत्तरं
बहवः । पञ्चे-
८९ ७ -भावः कायं प्रत्युच्यते । सर्वतस्तेजः- -भावः । त्रस-
कायिका अल्पाः । ततो बहवः पृथिवी-
कायिकाः । ततोऽप्यप्कायिकाः । ततो
वातकायिकाः । सर्वतोऽनन्तगुणा वन-
स्पतयः । त्रस-
९० ६ -दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मति- -दृष्टयोऽनन्तगुणाः विभगंज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाः
सासादनसम्यग्दृष्टयः । मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ।
मति-
९० ९ -यताः संख्ये- -यताः असंख्ये-
९० ९ -ष्टयः संख्ये- -ष्टयः असंख्ये-
९१ ५ दृष्टयोऽसंख्ये- -दृष्टयः संख्येयं-
९१ १२ -संयता संख्ये- -संयता असंख्ये-
९२ १ -दृष्टयः संख्ये- -दृष्टयोऽसंख्ये-
९२ २ -दृष्टयोऽसंख्ये -दृष्टयः संख्ये-
९२ ७ -यताः संख्ये- -यताः असंख्ये-
९२ ९ -यताः संख्ये- -यताः असंख्ये-
९२ १० -बहुत्वम् । विपक्षे एकैक- -बहुत्वम् । संज्ञा-
गुणस्थानग्रहणात् । संज्ञा-

१२ सर्वार्थसिद्धि
९३ ११ -स्वमर्थान्मन्यते -स्वमर्थो मन्यते
९४ १ अनेनेति तत् अनेन तत्
९८ १ -ल्याज्ञानभावः अज्ञाननाशो -ल्पाज्ञाननाशो
९८ ३ -धिगमे अन्य- -धिगमे च अन्य-
९८ ५ हेतुः तत्स्वरूप- हेतुः स्वस्वरूप-
१०० १ -त्यर्थः उपमानार्थापत्त्यादीना- -त्यर्थः । उक्तस्य
मत्रैवान्तर्भावादुक्तस्य
१०३ ३ -ज्ञानमपि प्रति -ज्ञानमक्षमेव प्रति
१०४ १ एवं प्रसक्त्या आसस्य एवं सति आसस्य
१०७ २ संज्ञाः । सम- संज्ञाः । सम-
१०७ ४ नातिवर्तत इति नातिवर्तन्त इति
११० १ -र्गतं करणमित्यु- -र्गतं करणमन्तःकरणमित्यु-
१११ ६ पताकेति । पताका वेति ।
१११ ७ अपैतस्य अवैतस्य
११३ ७ बहुषु बहुविशेष्वपि बहुष्वपि बहुत्वमस्ति बहुविशेष्वपि
११७ ३ द्वित्रिसिक्तः द्वित्रासिक्तः
११७ ५ द्वित्र्यादिषु द्वित्रादिषु
१२० ५ प्रतीत्या व्यु- प्रतीत्य व्यु
१३१ ३ ताम्याम् । तयोः ताम्यां विशुद्धचप्रतिपाताभ्याम् । तयोः
१३४ १० नारूपेष्विति नारूपिष्विति
१४० १ -ज्ञानमवध्यज्ञानं -ज्ञानं विभंगज्ञानं
१४० ८ -प्रवणप्रयोगो -प्रवणः प्रयोगो
३ प्रति परिचय
और भी ऐसी अनेक कई बातें थीं जिनके कारण हमने कई प्राचीन प्रतियोंके आधारसे इसे पुनः
सम्पादित करनेका निश्चय किया इसके लिए हमने मूडबिद्रीकी दो ताडपत्रीय प्रतियां, दिल्ली भाण्डारसे दो
हस्तलिखित प्रतियां और जैन सिद्धान्तभवन आरासे एक हस्तलिखित प्रति प्राप्त की । मुद्रित संस्करणोंमें से
हमारे सामने श्री पं० कलुप्पा भरमप्पा निटवे द्वारा सम्पादित और श्री पं० वंशीधरजी सोलापुर द्वारा
सम्पादित प्रतियां थीं । इस काममें मूडबिद्रीकी एक ताडपत्रीय प्रति और दिल्ली भाण्डारकी एक हस्तलिखित
प्रति विशेष उपयोगी सिद्ध हुईं । अन्य प्रतियोंकी अपेक्षा ये अधिक शुद्ध थीं । फिर भी आदर्श प्रतिके रूपमें
हम किसी एक को मुख्य मानकर न चल सके । हम यह तो नहीं कह सकते कि सर्वार्थसिद्धिका प्रस्तुत संस्करण
सब दृष्टियोंसे अन्तिम है फिर भी इसे सम्पादित करते समय इस बातका ध्यान अवश्य रखा गया है कि जहाँ
तक बने इसे अधिक परिशुद्ध और मूलग्राही बनाया जाय ।
प्रतियोंका परिचय देनेके पहले हम इस बातको स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सर्वार्थसिद्धिको सम्पादित
होकर प्रकाशमें आनेमें आवश्यकतासे अधिक समय लगा है । इतने लम्बे कालके भीतर हमें अनेक बार गृह-
परिवर्तन करना पड़ा है और भी कई अड़चनें आयी हैं । इस कारण हम अपने सब कागजात सुरक्षित न रख
सके । ऐसे कई उपयोगी कागज पत्र हम गँवा बैठे जिनके न रहने से हमारी बड़ी हानि हुई है । उन कागज-
पत्रोंमें प्रतिपरिचय भी था, इसलिए प्रतियोंका जो पूरा परिचय हमने लिख रखा था वह तो इस समय हमारे
सामने नहीं है । वे प्रतियाँ भी हमारे सामने नहीं हैं जिनके आधारसे हमने यह कार्य किया है । फिर भी

दो शब्द १३
हमारे मित्र श्रीयुक्त पं० के० भुजबलिजी शास्त्री मूडबिद्री और पं० दरबारीलालजी न्यायाचार्य दिल्ली की
सत्कृपासे उक्त स्थानोंकी प्रतियोंका जो परिचय हमें उपलब्ध हुआ है वह हम यहाँ दे रहे हैं—
(१) ता०—यह मूडबिद्रीकी ताड़पत्रीय प्रति है। लिपि कनाडी है। कुल पत्र ११६ हैं। इसके
प्रत्येक पृष्ठमें पंक्ति १० और प्रत्येक पंक्तिमें अक्षर लगभग ७१ हैं। प्रति शुद्ध और अच्छी हालतमें है।
सरस्वती गच्छ, बलात्कार गण कुन्दकुन्दान्वयके आ० वसुन्धरने भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा शालि० शक १५५१
विलम्बि संवत्सरके दिन इसकी लिपि समाप्त की थी। हमारे] सामने उपस्थित प्रतियोंमें यह सबसे अधिक
प्राचीन थी। इसका संकेताक्षर ता० है।
(२) ना०—यह भी मूडबिद्रीकी ताडपत्रीय प्रति है। लिपि कनाडी है। कुल पत्र १०१ हैं। 'इसके
प्रत्येक पृष्ठमें पंक्ति ९ और प्रत्येक पंक्तिमें अक्षर लगभग १०७ हैं। प्रति शुद्ध और अच्छी अवस्थामें है।
इसमें लिपिकर्ता तथा लिपिकालका निर्देश नहीं है। इसका संकेताक्षर ना० है।
(३) दि० १—यह श्री लाला हरसुखराय सुगनचन्दजीके नये मन्दिरमें स्थित दि० जैन सरस्वती
भाण्डार धर्मपुरा दिल्लीकी हस्तलिखित प्रति है। पत्र संख्या २०१ है। प्रत्येक पत्रमें १८ पंक्ति और प्रत्येक
पंक्तिमें लगभग ३३ अक्षर हैं। पत्रकी लम्बाई ११ इंच और चौड़ाई ५ इंच है। चारों ओर एक-एक इंच
हासिया छोड़कर बीचमें प्रतिलिपि की गयी है। कागज़ पुष्ट है, अक्षर भी बड़े सुन्दर हैं जो बिना किसी कष्टके
आसानीसे पढ़े जाते हैं। लेखनकार्य संवत् १७५२ आषाढ़ सुदि ११ गुरुवारको समाप्त हुआ था। प्रतिके
अन्तमें यह प्रशस्ति उपलब्ध होती है—
'प्रणिपत्य जिनवरेन्द्रं वरविग्रहरूपरञ्जितसुरेन्द्रं । सद्गुणसुधासमुद्रं वक्ष्ये सस्तां प्रशस्तिमहां ॥ १ ॥
जगत्सारे हि सारेऽस्मिन्निहिंसाजलसागरे । नगरे नागराकीर्जे विस्तीर्णपण्यपण्यके ॥ २ ॥ छ ॥ संवत् १७५२
वर्षे आषाढ़ सुदि ११ गुरौ लिखापिताध्यात्मरतपरसाशेषज्ञानावरणीयक्षयार्थं लिखितं ।'
इसका संकेताक्षर दि० १ है।
(४) दि० २—यह भी पूर्वोक्त स्थानकी हस्तलिखित प्रति है। पत्र संख्या १११ है। प्रत्येक पत्रमें
१२ पंक्ति और प्रत्येक पंक्तिमें लगभग ५० अक्षर हैं। मात्र प्रथम और अन्तिम पत्रमें पंक्ति संख्या कम है।
पत्रकी लम्बाई ११। इंच और चौड़ाई ५ इंच है। अगल-बगलमें सवा इंच और ऊपर-नीचे पौन इंच हांसिया
छोड़कर प्रतिलिपि की गयी है। प्रतिके अन्तमें आये हुए लेखसे विदित होता है कि यह प्रति सं० १८४५
आश्विन वदि १४ मंगलवारको लिखकर समाप्त हुई थी। लेख इस प्रकार है—
'संवत् १८४५ मासोत्तममासे अश्विनीमासे कृष्णपक्षे तिथौ च शुभ चतुर्दशी भूमिवासरेण लिखितं
जैसिंहपुरामध्ये पिरागदास मोहाका जैनी भाई ।'
इस प्रतिके देखनेसे विदित होता है कि यह सम्भवतः दि० १ के आधारसे ही लिखी गयी होगी।
प्रतिकार श्री पिरागदास जी जैन हैं और नर्रासिंहपुरा (नयी दिल्ली) जिन मन्दिरमें बैठकर यह लिखकर
तैयार हुई है। इसका संकेताक्षर दि० २ है।
इन प्रतियोंके सिवा पाँचवीं प्रति श्री जैन सिद्धान्त भवन आरा की है। जो प्रति वाचनके समय
उपयोगमें ली गयी है। तथा मुद्रणके समय मध्यप्रदेश सागर जिलाके अन्तर्गत खिमलासा गाँवकी प्रति भी
सामने रही है। यह गाँव पहले समृद्धिशाली नगर रहा है। यह बीना इटावासे मालथौनको जानेवाली सड़कपर
स्थित है और बीना इटावासे लगभग १२ मील दूर है। प्राचीन उल्लेखोंसे विदित होता है कि इसका प्राचीन
नाम क्षेमोल्लास है। खिमलासा उसीका अपभ्रंश नाम है। नगरके चारों ओर परकोटा और खण्डहर प्राचीन-
कालीन नगरकी समृद्धिके साक्षी हैं। यहाँका जिनमन्दिर दर्शनीय है। इसमें एक सरस्वतीभवन है। जिसमें
अनेक ग्रन्थोंकी हस्तलिखित प्राचीन प्रतियां अब भी मौजूद हैं।

१४ सर्वार्थसिद्धि
४ प्रकाशनमें ढिलाईका कारण
सर्वप्रथम इसका सम्पादन हमने स्वतन्त्र भावसे किया था । सम्पादनमें लगनेवाली आवश्यक सामग्री
हमें स्वयं जुटानी पड़ी थी । एक बार कार्यके चल निकलने पर हमें आशा थी कि हम इसे अतिशीघ्र प्रकाशमें
ले आवेंगे । एक दो साहित्यिक संस्थाएँ इसके प्रकाशनके लिए प्रस्तुत भी थीं परन्तु कई प्रतियोंके आधारसे
मूलका मिलान कर टिप्पण लेना और अनुवाद करना जितने जल्दी हम सोचते थे उतने जल्दी कर नहीं
सके । परिणाम स्वरूप वह काम आवश्यकतासे अधिक पिछड़ता गया । इसी बीच वि० सं० २००३ में
श्री पूज्य श्री १०५ क्षु० गणेशप्रसादजी वर्णीकी सेवाओंके प्रति सम्मान प्रकट करनेके लिए श्री गणेशप्रसाद
वर्णी जैन ग्रन्थमालाकी स्थापना की गयी और सोचा गया कि सर्वार्थसिद्धिका प्रकाशन इसी ग्रन्थमालाकी
ओरसे किया जाय । तदनुसार श्री भार्गव भूषण प्रेस में यह मुद्रणके लिए दे दी गयी । किन्तु प्रेसकी ढिलाई
और ग्रन्थमालाके सामने उत्तरोत्तर दूसरे कार्योंके आते रहनेके कारण इसके प्रकाशनमें काफी समय लग गया ।
५ भारतीय ज्ञानपीठ
इस साल किसी तरह हम इसके मुद्रणका कार्य पूरा करनेकी स्थितिमें आये ही थे कि कई ऐसी
आर्थिक व दूसरी अड़चनें ग्रन्थमालाके सामने उठ खड़ी हुईं जिनको ध्यानमें रखकर ग्रन्थमालाने मेरी सम्मति-
से इसका प्रकाशन रोक दिया और मुझे यह अधिकार दिया कि इस कार्यको पूरा करनेका उत्तरदायित्व यदि
भारतीय ज्ञानपीठ ले सके तो उचित आधारों पर यह ग्रन्थ भारतीय ज्ञानपीठको साभार सौंप दिया जाय ।
ग्रन्थमालाकी इस मनसाको ध्यानमें रखकर मैंने भारतीय ज्ञानपीठके सुयोग्य मन्त्री श्रीमान् पं० अयोध्याप्रसाद-
जी गोयलीयसे इस सम्बन्धमें बातचीत की । गोयलीयजीने एक ही उत्तर दिया कि अर्थाभाव या दूसरे किसी
कारणसे यदि सर्वार्थसिद्धिके प्रकाशनमें श्री ग० वर्णी जैन ग्रन्थमाला कठिनाई अनुभव करती है तो भारतीय
ज्ञानपीठ उसे यों ही अप्रकाशित स्थितिमें नहीं पड़ा रहने देगा । वह मुद्रण होनेके बाद शेष रहे कार्यको तो
पूरा करायेगा ही साथ ही वर्णी ग्रन्थमालाका इसपर जो व्यय हुआ है उसे भी वह सानन्द लौटा देगा । साधा-
रणतः बातचीतके पहले भारतीय ज्ञानपीठसे यह कार्य करा लेना हम बहुत कठिन मानते थे, क्योंकि उसके
प्रकाशनोंका जो क्रम और विशेषता है उसका सर्वार्थसिद्धिके मुद्रित फार्मोंमें हमें बहुत कुछ अंशोंमें अभाव सा
दिखाई देता है । किन्तु हमें यहाँ यह संकेत करते हुए परम प्रसन्नता होती है कि ऐसी कोई बात इसके बीच
में बाधक सिद्ध नहीं हुई । इससे हमें न केवल श्री गोयलीयजी के उदार अन्तःकरणका परिचय मिला अपि
तु भारतीय ज्ञानपीठके संचालनमें जिस विशाल दृष्टिकोणका आश्रय लिया जाता है उसका यह एक प्रांजल
उदाहरण है ।
६ अन्य हितैषियोंसे
सर्वार्थसिद्धिका प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठसे हुआ है यह देख कर हमारे कतिपय मित्रों और हितैषियों-
को, जिन्होंने इसके प्रकाशनमें ग्रन्थमालाको आर्थिक व दूसरे प्रकारकी सहायता पहुँचायी है, अचरज होगा ।
परन्तु यह बहुत ही छोटा प्रश्न है कि इस ग्रन्थका प्रकाशन किस संस्थासे हो रहा है । उनके देखनेकी बात
तो केवल इतनी-सी है कि उन्होंने साहित्यकी श्रीवृद्धिके लिए जो धन या दूसरे प्रकार की सहायता दी है
उसका ठीक तरह से उपयोग हो रहा है या नहीं । साधारणतः प्रबन्ध और कार्यकर्त्ताओंकी सुविधाकी दृष्टिसे
ही अलग-अलग संस्थाओंकी स्थापना की जाती है । परन्तु हैं वे सब एक ही महावृक्षकी शाखा-प्रशाखाएँ ।
अमुक फल अमुक शाखा में लगा और अमुक फल अमुक शाखामें यह महत्त्वकी बात नहीं है । महत्त्वकी बात
तो यह है कि उस महावृक्षकी हर एक शाखा-प्रशाखा तथा दूसरे अवयव अपने-अपने स्थानमें उचित कार्य कर
रहे हैं या नहीं । नाम रूपका आग्रह जैन परम्पराको न कभी इष्ट रहा है और न रहना चाहिए । केवल
व्यवहारके संचालन हेतु इसको स्थान दिया जाता है । इसलिए सर्वार्थसिद्धिका प्रकाशन क्या वर्णी ग्रन्थ-
मालासे हुआ क्या भारतीय ज्ञानपीठसे दोनों चीजें एक हैं ।

दो शब्द १५
७ आभार प्रदर्शन
फिर भी यहाँ कई दृष्टियोंसे हमें अपने सहयोगियों, मित्रों व हितैषियोंके प्रति आभारस्वरूप दो शब्द
अंकित कर देना अत्यावश्यक प्रतीत होता है। यह एक निश्चित सी बात है कि जैन समाजका ध्यान जैन
साहित्यके प्रकाशनकी ओर अभी उतना नहीं गया है जितना कि जाना चाहिए था। प्राचीन कालमें मन्दिर
प्रतिष्ठा और शास्त्रोंको लिपिबद्ध कराकर यत्र तत्र प्रतिष्ठित करना ये दोनों कार्य समान माने जाते थे। अभी
तक शास्त्रोंकी रक्षा इसी पद्धतिसे होती आयी है। हमारे पूर्वज चाहे उन शास्त्रोंके ज्ञाता हों चाहे न हों
किन्तु वे शास्त्रों की प्रतिलिपि करा कर उनकी रक्षा करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते थे और इस कार्यमें
प्रयत्नशील भी रहते थे, किन्तु जबसे मुद्रण कार्य प्रारम्भ हुआ है तबसे एक तरहसे समाजने इस ओरसे अपनी
आँख ही मूंद ली है। अब प्रतिलिपि कराना तो दूर रहा वे उनकी एक-एक मुद्रित प्रति निछावर देकर
खरीदनेमें भी हिचकिचाने लगे हैं। इस मदमें व्यक्तिगत खर्च करनेकी बातको तो छोड़ो, वे सार्वजनिक धनसे
भी यह कार्य सम्पन्न नहीं करना चाहते हैं जब कि वे इस धनका उपयोग दूसरे दिखावटी और अस्थायी
कार्योंमें करते रहते हैं। उनका तर्क है कि इतने बड़े ग्रन्थोंको हमारे यहाँ समझनेवाला ही कौन है? हम
उनको मन्दिरमें रख कर क्या करेंगे? यदि इसी तर्कसे प्राचीन पुरुषोंने काम लिया होता तो क्या साहित्यकी
रक्षा होना सम्भव था ? यह कहना तो कठिन है कि हमने अपना पूरा साहित्य बचा लिया है। तथापि जो
कुछ भी बचा लिया गया है वह भी पर्याप्त है। भगवान् महावीरकी चर्या और उनके उपदेशोंसे सीधा
सम्बन्ध स्थापित करनेकी क्षमता रखनेवाला एकमात्र साधन यह साहित्य ही है। इसलिए प्रत्येक गृहस्थका
यह कर्तव्य हो जाता है कि वह इसकी संरक्षाके लिए हर एक सम्भव उपाय काममें लावे।
प्रसन्नता है कि इस ओर भारतीय ज्ञानपीठके संस्थापक व दूसरे कार्यकर्ताओंका पर्याप्त ध्यान गया है
और वे इस बातका विचार किये बिना कि इसके प्रकाशन आदि पर पड़नेवाला व्यय वापस होगा या नहीं,
सब प्रकारके प्राचीन साहित्यके प्रकाशनमें दत्तावधान हैं। सर्वार्थसिद्धिका भारतीय ज्ञानपीठसे प्रकाशित होना
उनकी इसी शुभ भावनाका सुफल है, इसलिए सर्वप्रथम हम नम्र शब्दोंमें उनके प्रति आभार प्रदर्शित करना
अपना कर्तव्य मानते हैं। सर्वार्थसिद्धिके सम्पादक होनेके नाते तो हमें यह कार्य करना ही है, साथ ही वर्णी
ग्रन्थमालाके संचालक होनेके नाते भी हमें इसका निर्वाह करना है।
श्री ग. वर्णी जैन ग्रन्थमाला एक ऐसी संस्था है जिसे समाजके लब्धप्रतिष्ठ विद्वानोंका पृष्ठबल प्राप्त
है इसलिए सर्वार्थसिद्धिका उस द्वारा प्रकाशित हो जाना कठिन कार्य नहीं था फिर भी जो कठिन परिस्थिति
उसके सामने थी उसे देखते हुए उसने जिस अनुकरणीय मार्गका श्रीगणेश किया है इसके लिए हम वर्णी
ग्रन्थमालाकी प्रबन्ध समितिके प्रति भी आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य मानते हैं।
यहाँ हम उन महानुभावोंके प्रति भी आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य समझते हैं जिन्होंने एक
मात्र सर्वार्थसिद्धिके प्रकाशनके प्रति अभिरुचि होनेके कारण अपनी उदार सहायता वर्णी ग्रन्थमाला को दी
थी। देनेवाले महानुभाव ये हैं....
१. पूज्य श्री १०८ आचार्य सूर्यसागरजी महाराजके सदुपदेशसे श्रीमान् ब्र० लक्ष्मीचन्द्रजी वर्णी।
वर्णीजी ने १५००) इस कामके लिए दिल्लीकी पहाड़ी धीरज व डिप्टीगंजकी समाजसे भिजवाये थे।
२. वर्णी ग्रन्थमालाके कोषाध्यक्ष बाबू रामस्वरूपजी बरुआसागर। आपने इस कामके लिए १६०१)
प्रदान किये हैं।
३. उदारचेता श्रीमान् नेमचन्द बालचन्दजी सा० वकील उस्मानाबाद। आपकी पौत्री ब्र० गजराबाई
हमारे पास लब्धिसार क्षपणासार पढ़ने बनारस आयी थीं और लगभग २ माह यहाँ रही थीं। इसीके परिणाम-
स्वरूप बहिन गजराबाईकी प्रेरणासे वकील सा० ने १०००) ग्रन्थमालाको प्रदान किये थे।

१६ सर्वार्थसिद्धि
हस्तलिखित प्रतियोंके प्राप्त करनेमें हमें श्रीमान् पं० पन्नालालजी अग्रवाल दिल्ली, पं० नेमिचन्द्रजी
ज्योतिषाचार्य जैन सिद्धान्त भवन आरा, पं० के० भुजबलिजी शास्त्री मूडबिद्री और पं० दरबारीलालजी
कोठिया न्यायाचार्य दिल्लीसे पूरी सहायता मिली है, अतएव हम इनके भी आभारी हैं ।
भारतीय ज्ञानपीठके मैनेजर चि० श्री बाबूलालजी फागुल्ल उसके प्रकाशनोंको सुन्दर और आकर्षक
बनानेमें पर्याप्त श्रम करते रहते हैं । सर्वार्थसिद्धिको इस योग्य बनानेमें व दूसरे प्रकारकी सहायता पहुँचानेमें
भी उन्होंने हमें सहयोग दिया है, अतएव हम उनके भी आभारी हैं ।
सर्वार्थसिद्धिके परिशिष्ट और विषयसूची हमारे सहपाठी पं० हीरालालजी शास्त्रीने तैयार किये हैं
और आवश्यक संशोधनके साथ वे इसमें दिये गये हैं, अतएव हम इनका जितना आभार मानें थोड़ा है ।
तत्त्वार्थसूत्रकी उपलब्ध टीकाओंमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है । इसमें प्रमेयका विचार आगमिक,
दार्शनिक आदि सभी पद्धतियोंसे किया गया है । हमें आशा है कि इस सम्पादनसे समाजमें इसका मान और
अधिक बढ़ेगा ।
—फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री

प्रस्तावना
'मैं कौन हूँ, मेरा स्वभाव क्या है, मैं कहाँ से आया हूँ, मुझे उपादेय क्या है और उसकी प्राप्ति किन
निमित्तोंके मिलने पर होती है ? जो मनुष्य इन बातोंका विचार नहीं करता वह अपने गन्तव्य स्थानको प्राप्त
करनेमें समर्थ नहीं होता।'
आचार्य वादीभसिंहने क्षत्रचूड़ामणिमें तत्त्वज्ञानके प्रसंगसे यह वचन कहा है। यह मनुष्यके कर्तव्यका
स्पष्ट बोध कराता है। कर्तव्यका विचार ही जीवनका सार है। जो तिर्यञ्च हैं वे भी अपने कर्तव्यका विचार
कर प्रवृत्ति करते हैं फिर मनुष्यकी तो कथा ही अलग है।
प्रत्येक प्राणीके जीवनमें हम ऐसे-ऐसे विलक्षण परिणमन देखते हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा
सकती ? ऐसा क्यों होता है? क्या इसके लिए केवल बाह्य परिस्थिति ही एकमात्र कारण है? एक पिताके
दो बालक होते हैं। उनका एक प्रकारसे लालन-पालन होता है। एक पाठशालामें उन्हें शिक्षा मिलती है फिर
भी उनके शील-स्वभावमें विलक्षण अन्तर होता है। क्यों ? इसका शारीरिक रचनाके सिवा कोई अज्ञात
कारण अवश्य होना चाहिए। साधकोंने इस प्रश्नका गहरा मन्थन किया है। उत्तरस्वरूप उन्होंने विश्वको
यही अनुभव दिया है कि पुराकृत कर्मोंके कारण प्राणियोंके जीवनमें इस प्रकारकी विविधता दिखाई देती है।
विश्वकी विविधताका अवलोकन कर उन्होंने कहा है कि इस प्राणीकी प्रथम अवस्था निगोद है।
अनादि कालसे यह प्राणी इस अवस्थाका पात्र बना हुआ है। विस्तृत बालुकाराशिमें गिरे हुए वज्र सिकताकण
का मिलना जितना दुर्लभ है, इस पर्यायसे निकल कर अन्य पर्यायका प्राप्त होना उतना ही दुर्लभ है। अन्य
पर्यायोंकी भी कोई गिनती नहीं। उनमें परिभ्रमण करते हुए इसका पञ्चेन्द्रिय होना इतना दुर्लभ है जितना
कि अन्य सब गुणोंके प्राप्त हो जाने पर भी मनुष्यको कृतज्ञता गुणका प्राप्त होना दुर्लभ है। यदि यह पञ्चे-
न्द्रिय भी हो जाता है तो भी इससे इसका विशेष लाभ नहीं, क्योंकि एक मनुष्य पर्याय ही वह अवस्था है
जिसे प्राप्त कर यह अपनी उन्नतिके सब साधन जुटा सकता है। किन्तु इसका प्राप्त होना बहुत ही कठिन है।
एक दृष्टान्त द्वारा साधकोंने इसे इन शब्दोंमें व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार किसी चौपथ पर
रखी हुई रत्नराशिका मिलना दुर्लभ है उसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें परिभ्रमण करते हुए इसे मनुष्य पर्यायका
मिलना दुर्लभ है। कदाचित् इसे मनुष्य पर्याय भी मिल जाती है तो भी उसे प्राप्त कर अपने कर्तव्याकर्तव्यके
बोध द्वारा कर्तव्यके मार्गका अनुसरण करना और भी दुर्लभ है।
मनुष्य होने पर यह प्राणी नहीं मालूम कितनी ममताओंमें उलझा रहता है। कभी यह पुत्र, स्त्री
और घर-द्वारकी चिन्ता करता है तो कभी अपनी मानप्रतिष्ठाकी चिन्तामें काल यापन करता है। स्वरूप
'सम्बोधन की ओर इसका मन यत्किञ्चित् भी आकर्षित नहीं होता। जो इसका नहीं उसकी तो चिन्ता करता
है और जो इसका है उसकी ओर आँख उठाकर देखता भी नहीं। फल यह होता है कि यह न केवल परम
दुर्लभ इस मनुष्य पर्यायको गवाँ बैठता है अपितु सम्यक् कर्तव्यका बोध न होनेसे इसे पुनः अनन्त यातनाओंका
पात्र बनना पड़ता है।
इस स्थितिसे इस प्राणीका उद्धार कैसे हो, इस प्रश्नके समाधान स्वरूप साधकोंने अनेक मार्ग दरसाये
हैं उनमें सम्यक् श्रुतका अध्ययन मुख्य है। श्रुत दो प्रकारका है—एक वह जो ऐहिक इच्छाओंकी पूर्तिका
मार्गदर्शन करता है और दूसरा वह जो विषय और कषायके मार्गको अनुपादेय बतला कर आत्महितके मार्गमें
लगाता है। आत्माका हित क्या है? इस प्रश्नका उत्तर यदि हमें संक्षेपमें प्राप्त करना है तो यही कहा जा
प्रस्तावना-३

१८ सर्वार्थसिद्धि
सकता है कि 'मोक्ष' । अतएव मोक्षप्राप्तिके साधनोंका जिसमें सम्यक् प्रकारसे ऊहापोह किया गया है वही
शास्त्र सम्यक् श्रुत कहलानेकी पात्रता रखता है ।
इस दृष्टिसे जब हम प्राचीन साहित्यको देखते हैं तो सर्वप्रथम हमारी दृष्टि अङ्गश्रुत पर जाती है ।
इसका सीधा सम्बन्ध भगवान् महावीरकी वाणीसे है । ऐसी मान्यता है कि जितने भी तीर्थङ्कर होते हैं वे
अर्थका उपदेश देते हैं और उनके प्रमुख शिष्य, जिन्हें कि गणधर कहते हैं, ग्रन्थ रूपमें अङ्गश्रुतकी रचना
करते हैं । यह मुख्य रूपसे बारह आरों—विभागोंमें विभक्त होनेके कारण इसे द्वादशार कहते हैं और संघके
मुख्य अधिपति गणधरों—गणियोंके द्वारा इसकी रचना की जानेसे इसका दूसरा नाम गणिपिटक भी है ।
भगवान् महावीरके मोक्ष जानेके बाद तीन अनुबद्ध केवली और पाँच श्रुतकेवली हुए हैं । इनमें
अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु थे । इन तक यह अङ्गश्रुत अपने मूलरूपमें आया है । इसके बाद उत्तरोत्तर
बुद्धिबल और धारणाशक्तिके क्षीण होते जानेसे तथा पुस्तकारूढ़ किये जानेकी परिपाटी न होने से क्रमशः वह
विच्छिन्न होता गया है । इस प्रकार एक ओर जहाँ अंगश्रुतका अभाव होता जा रहा था वहाँ दूसरी ओर
श्रुतपरम्पराको अविच्छिन्न बनाये रखनेके लिए और उसका सीधा सम्बन्ध भगवान् महावीरकी वाणीसे बनाये
रखनेके लिए प्रयत्न भी होते रहे हैं । अंगश्रुतके बाद दूसरा स्थान अनंगश्रुतको मिलता है । इसको अंगबाह्य
भी कहते हैं । इसके मूल भेद ये हैं—सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म,
दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्प्याकल्प्य, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक और निषिद्धिका ।
इनमेंसे सर्वार्थसिद्धिमें उत्तराध्ययन और दशवैकालिक केवल इन दो का ही उल्लेख किया है । श्री धवला टीकाके
आधारसे विदित होता है कि इनकी रचना भी गणधरोंने ही की थी और अंगश्रुतके अस्तित्वकालमें ये उपस्थित
थे । किन्तु धीरे-धीरे अंगश्रुतके समान इनको भी धारण करनेकी शक्तिवाले श्रमणोंके न रहनेसे इनका भी
अभाव होता गया । फल यह हुआ कि एक प्रकारसे हम मूलश्रुतसे सर्वथा वंचित हो गये । श्वेताम्बर
परम्परामें जो आचारांग आदि अंगश्रुत और उत्तराध्ययन आदि अनंगश्रुत उपलब्ध होता है । वह विक्रम पाँचवीं
शताब्दिके बादका संकलन है इसलिए वह मूलश्रुतकी दृष्टिसे विश्वास योग्य नहीं माना जा सकता । इस प्रकार
अंगश्रुत और अंगबाह्यश्रुतके विच्छिन्न होनेमें कुल ६८३ वर्ष लगे हैं ।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तरकालमें भगवान् महावीरकी वाणीका कहिए या द्वादशांग वाणीका
कहिए वारसा हमें किसी रूपमें मिला ही नहीं । भद्रबाहु श्रुतकेवलीके कालमें ही जैन परम्परा दो भागोंमें
विभाजित हो गयी थी । पहली परम्परा जो भगवान् महावीर और उनके पूर्ववर्ती तीर्थङ्करोंके आचारंको
बिना किसी प्रकारके संशोधनके ग्राह्य मानती रही वह उस समय दिगम्बर परम्परा या मूल संघके नामसे
प्रसिद्ध हुई और जिसने परिस्थितिवश संशोधन कर उसमें नये आचारका प्रवेश किया वह श्वेताम्बर परम्पराके
नामसे प्रसिद्ध हुई । इस कारण मूल अंगश्रुत और अनंगश्रुतको तो लिपिबद्ध नहीं किया जा सका किन्तु काला-
न्तरमें ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने अङ्गश्रुतके आश्रयसे श्रुतकी रक्षा करनेका प्रयत्न किया है । षट्खण्डागम
और कषायप्राभृतकी रचना उन प्रयत्नोंमेंसे सर्वप्रथम है । आचार्य कुन्दकुन्द लगभग उसी समय हुए हैं जिन्होंने
अपनी आध्यात्मिक शैली द्वारा जीवादि तत्त्वोंका और मोक्षमार्गके अनुरूप आचारका विचार करते हुए न
केवल तीर्थङ्करोंके स्वावलम्बी मार्गकी रक्षा करनेका प्रयत्न किया है अपितु उसमें बहुत कुछ अंशमें स्थिरता
भी लायी है । इस तरह आरातीय आचार्यों द्वारा मूल श्रुतके अनुरूप श्रुतका निर्माण कर उसकी रक्षाके
अनेक प्रयत्न हुए हैं । अखिल जैन परम्परामें रचनाकी दृष्टिसे जिस श्रुतकी सर्वप्रथम गणना की जा सकती है
उसका संक्षेपमें विवरण इस प्रकार है—
ग्रन्थ नाम कर्त्ता रचनाकाल
षट्खण्डागम आ० पुष्पदन्त भूतबलि विक्रमकी दूसरी शताब्दि या इसके पूर्व
कषायप्राभृत आ० गुणधर ,, ,, समकालीन

प्रस्तावना १९
कषायप्राभृत की चूर्णि आ० यतिवृषभ¹ आचार्य गुणधरके कुछ काल बाद
समयप्राभृत, प्रवचनसारप्राभृत आ० कुन्दकुन्द² विक्रमकी पहली दूसरी शताब्दि
पञ्चास्तिकायप्राभृत व अष्ट-
प्राभृत
मूलाचार ( आचारांग ) आ० वट्टकेर आ० कुन्दकुन्दके समकालीन
मूलाराधना आ० शिवार्य " "
तत्त्वार्थसूत्र आ० गृद्धपिच्छ आ० कुन्दकुन्दके समकालीन या कुछ
काल बाद
इसके बाद भी श्रुतरक्षाके अनेक प्रयत्न हुए हैं । श्वेताम्बर अंगश्रुतका संकलन उन प्रयत्नोंमें से एक
है। यह विक्रमकी ६वीं शताब्दिमें संकलित होकर पुस्तकारूढ़ हुआ था ।
१ तत्त्वार्थसूत्र
इनमेंसे प्रकृतमें तत्त्वार्थसूत्रका विचार करना है। यह जैन दर्शनका प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें जैनाचार
और जैन तत्त्वज्ञानके सभी पहलुओं पर सूत्र शैलीमें विचार किया गया है। यह सुनिश्चित है कि जैन आगम-
श्रुतकी मुख्य भाषा प्राकृत रही है तथा इसके आधारसे आरातीय आचायोंने जो अंगबाह्य श्रुत लिपिबद्ध
किया है वह भी प्रायः प्राकृत भाषामें ही लिखा गया है। प्राकृत भाषाके जो विविध स्थित्यन्तर उपलब्ध होते
हैं उनसे इस बातकी पुष्टि होती है कि यह भगवान् महावीर और उनके आगे-पीछे बहुत काल तक बोल-
चालकी भाषा रही हैं। पाली, जिसमें कि प्राचीन महत्त्वपूर्ण बौद्ध साहित्य उपलब्ध होता है, प्राकृतका ही
१. इनके समयके विषयमें बड़ा विवाद है। वीरसेन स्वामीने इन्हें वाचक आर्यमंक्षु और नागहस्तिका
शिष्य लिखा है। इन दोनोंका श्वेताम्बर पट्टावलियोंमें उल्लेख आता है। सम्भवतः ये और श्वेताम्बर
परम्परामें उल्लिखित आर्यमंक्षु और नागहस्ति अभिन्न व्यक्ति हैं और वे ही आ० यतिवृषभके गुरु प्रतीत होते
हैं। जीवस्थान क्षेत्रप्रमाणानुगमकी धवला टीकामें आचार्य वीरसेनने जिस तिलोयपण्णत्तिका उल्लेख किया है
वह वर्त्तमान तिलोयपण्णत्तिसे भिन्न ग्रन्थ है। यह हो सकता है कि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिमें उसका कुछ भाग
सम्मिलित कर लिया गया हो पर इससे दोनोंकी अभिन्नता सिद्ध नहीं होती । पण्डित जुगलकिशोरजी मुख्तारने
पुरातन जैन वाक्यसूची की प्रस्तावनामें जैनसिद्धान्त भास्करके एक अंकमें प्रकाशित मेरे लेखका खण्डन करते
हुए जो वर्तमान तिलोयपण्णत्तिकी प्राचीन तिलोयपण्णत्तिसे अभिन्नता सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है वह उनका
उचित प्रयत्न नहीं कहां जा सकता, क्योंकि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिमें लोकके जिस आकारकी चर्चा की गयी
है उसका प्राचीन तिलोयपण्णत्तिमें उल्लेख नहीं है और इस आधारसे यह मानना सर्वथा उचित प्रतीत होता
है कि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिके आधारसे जो राजकाल गणनाके बाद आचार्य यतिवृषभकी स्थिति मानी जाती
है वह भी उचित नहीं है। इसके लिए पहले यह सिद्ध करना होगा कि इस राजकाल गणनाका उल्लेख
प्राचीन तिलोयपण्णत्तिमें भी पाया जाता है तभी यह मान्यता समीचीन ठहर सकेगी कि आचार्य यतिवृषभ
महावीर संवत्से हजार वर्ष बाद हुए हैं। तत्काल धवलाके उल्लेखके अनुसार आचार्य यतिवृषभको महा-
वाचक आर्यमंक्षु और नागहस्तिका शिष्य होनेके नाते उन्हें उस समयका ही मानना चाहिए जिस समय उन
दो महान् आचायोंने इस भूमण्डलको अलंकृत किया था । २. इन्द्रनन्दिने अपने श्रुतावतारमें षट्खण्डागम पर
आ० कुन्दकुन्दकी टीकाका भी उल्लेख किया है। इस आधारसे षट्खण्डागमका रचनाकाल प्रथम शताब्दिसे
भी पूर्व ठहरता है। अधिकतर विचारक ६८३ वर्षकी परम्पराके बाद इन ग्रन्थोंको स्थान देते हैं किन्तु मेरे
विचारसे श्रुतकी परम्परा किस क्रमसे आई इतना मात्र दिखाना उसका प्रयोजन है। षट्खण्डागम आदिके
रचयिता ६८३ वर्ष पूर्व हुए हों तो इसमें कोई प्रत्यवाय नहीं है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२० सर्वार्थसिद्धि
एक भेद है। प्रारम्भसे जैनों और बौद्धोंकी प्रकृति जनताको उनकी भाषामें उपदेश देनेकी रही है। परिणाम-
स्वरूप इन्होंने अधिकतर साहित्य रचनाका कार्य जनताकी भाषा प्राकृतमें ही किया है। किन्तु धीरे-धीरे
भारतवर्षमें ब्राह्मण धर्मका प्राबल्य होनेसे और उनकी साहित्यिक भाषा संस्कृत होनेसे बौद्धों और जैनोंको
संस्कृत भाषामें भी अपना उपयोगी साहित्य लिखनेके लिए बाध्य होना पड़ा है। यही कारण है कि तत्त्वार्थसूत्र
जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना करते समय वह संस्कृत भाषामें लिखा गया है। जैन परम्पराके उपलब्ध साहित्यमें
संस्कृत भाषामें रचा गया यह सर्वप्रथम ग्रन्थ है। इसके पहले केवल संस्कृत भाषामें जैन साहित्यकी रचना
हुई हो इसका कोई निश्चित आधार उपलब्ध नहीं होता। तत्त्वार्थसूत्र लघुकाय सूत्रग्रन्थ होकर भी इसमें
प्रमेयका उत्तमताके साथ संकलन हुआ है। इस कारण इसे जैन परम्पराके सभी सम्प्रदायोंने समान रूपसे
अपनाया है। दार्शनिक जगत्में तो इसे ख्याति मिली ही, आध्यात्मिक जगत्में भी इसका कुछ कम आदर नहीं
हुआ है। इस दृष्टिसे वैदिकोंमें गीताका, ईसाइयोंमें बाइबिलका और मुसलमानोंमें कुरानका जो महत्त्व है वही
महत्त्व जैन परम्परामें तत्त्वार्थसूत्रका माना जाता है। अधिकतर जैन इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं और कुछ
अष्टमी-चतुर्दशीको। दशलक्षण पर्वके दिनोंमें इसके एक-एक अध्याय पर प्रतिदिन प्रवचन होते हैं जिन्हें आम
जनता बड़ी श्रद्धाके साथ श्रवण करती है। इसके सम्बन्धमें ख्याति है कि जो कोई गृहस्थ इसका एक बार
पाठ करता है उसे एक उपवासका¹ फल मिलता है।
नाम—प्रस्तुत सूत्र ग्रन्थका मुख्य नाम 'तत्त्वार्थ' है। इस नामका उल्लेख करनेवाले इसके टीका-
कार मुख्य हैं। इसकी प्रथम टीका सर्वार्थसिद्धिमें प्रत्येक अध्यायकी समाप्ति सूचक पुष्पिकामें यह वाक्य
आता है।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां.........अध्यायः समाप्तः।
इसके अन्तमें प्रशंसासूचक तीन श्लोक आते हैं। उनमें भी प्रस्तुत टीकाको तत्त्वार्थवृत्ति कह कर
प्रस्तुत ग्रन्थकी 'तत्त्वार्थ' इस नामसे घोषणा की गयी है। तत्त्वार्थवार्तिक और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिककी भी
यही स्थिति है। इन दोनों टीका-ग्रन्थोंके प्रथम मंगल-श्लोकमें और प्रत्येक अध्यायकी समाप्तिसूचक पुष्पिकामें
मूल ग्रन्थके इसी नामका उल्लेख मिलता है।
तत्त्वार्थ सात हैं—जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष । सम्यग्दर्शनके विषय-
रूपसे इन सात तत्त्वार्थोंका प्रस्तुत सूत्र ग्रन्थमें विस्तारके साथ निरूपण किया गया है। मालूम पड़ता है कि
इसी कारणसे इसका तत्त्वार्थ यह नाम प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है।
लोकमें इसका एक नाम तत्त्वार्थसूत्र भी प्रचलित है। इस नामका उल्लेख वीरसेन स्वामीने अपनी
धवला² नामकी प्रसिद्ध टीकामें किया है। सिद्धसेन गणि भी अपनी टीकामें कुछ अध्यायोंकी समाप्तिसूचक
पुष्पिकामें³ इस नामका उल्लेख करते हैं। इसमें जीवादि सात तत्त्वार्थोंका सूत्र शैलीमें विवेचन किया गया है
इससे इसका दूसरा नाम तत्त्वार्थसूत्र पड़ा जान पड़ता है। किन्तु पिछले नामसे इस नाममें सूत्र पद अधिक
होने से सम्भव है कि ये दोनों नाम एक ही हों। केवल प्रयोगकी सुविधाकी दृष्टिसे कहीं इसका केवल 'तत्त्वार्थ'
इस नामसे और कहीं 'तत्त्वार्थसूत्र' इस नामसे उल्लेख किया जाता रहा हो। किसी वस्तुका जो नाम होता
है उसके एकदेशका उल्लेख करके भी उस वस्तुका बोध करानेकी परिपाटी पुरानी है। बहुत सम्भव है कि
इसी कारण इसका 'तत्त्वार्थ' यह नाम भी प्रसिद्धिमें आया हो। सिद्धसेन गणिने⁴ इसका तत्त्वार्थसूत्र
१. 'दशाध्यायपरिच्छिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति फलं स्यादुपवासस्य भाषितं मुनिपुङ्गवैः ।' २. 'तह गिद्धपिंच्छा-
इरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्ते विं वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य' इति दव्वकालो परूविदो। जीव-
स्थानकालानुयोगद्वार पृ० ३१६ । ३. इति तत्त्वार्थसूत्रं भाष्यसंयुक्तं भाष्यानुसारिण्यां तत्त्वार्थटीकायां आस्रवप्रति-
पादनपरः षष्ठोऽध्यायः समाप्तः । ४. देखो सिद्धसेन गणि टीका अध्याय एक और छहको अन्तिम पुष्पिका।

और तत्त्वार्थ इन दोनों नामोंके द्वारा उल्लेख किया है। इससे भी ये दोनों नाम एक ही हैं इस अर्थकी
पुष्टि होती है ।
इसका एक नाम मोक्षशास्त्र भी है। मोक्षशास्त्र इस नामका उल्लेख प्राचीन टीकाकारों या अन्य
किसीने किया है ऐसा हमारे देखनेमें नहीं आया । तथापि लोकमें इस नामकी अधिक प्रसिद्धि देखी जाती है ।
तत्त्वार्थसूत्रका प्रारम्भ मोक्षमार्गके उपदेशसे होकर इसका अन्त मोक्षके उपदेशके साथ होता है। जान पड़ता
है कि यह नाम इसी कारणसे अधिक प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है ।
सर्वार्थसिद्धिके बाद इसकी दूसरी महत्त्वपूर्ण टीका तत्त्वार्थभाष्य माना जाता है। इसकी उत्थानिकामें
यह श्लोक आता है—
'तत्त्वार्थाधिगमाख्यं बह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् ।
वक्ष्यामि शिष्यहितमिममर्हद्वचनैकदेशस्य ॥ २ ॥'
अर्थात् बहुत अर्थवाले और अर्हद्वचनके एक देशके संग्रहरूप तत्त्वार्थाधिगम नामके इस लघु ग्रन्थका मैं
शिष्य हितबुद्धिसे कथन करता हूँ ।
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें जो प्रशस्ति उपलब्ध होती है। उसमें भी तत्त्वार्थाधिगम इस नामका उल्लेख
किया है। इस आधारसे यह कहा जाता है कि इसका मुख्य नाम तत्त्वार्थाधिगम है ।
किन्तु इस आधारके होते हुए भी मूल सूत्र ग्रन्थका यह नाम है इसमें हमें सन्देह है, क्योंकि एक
तो ये उत्थानिकाके श्लोक और भाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति मूल सूत्र ग्रन्थके अंग न होकर भाष्यके
अंग हैं और भाष्य सूत्ररचनाके बाद की कृति है । दूसरे तत्त्वार्थसूत्रके साथ जो भाष्य की स्वतन्त्र प्रति
उपलब्ध होती है उसमें प्रत्येक अध्याय की समाप्ति सूचक पुष्पिकासे यह विदित नहीं होता कि वाचक उमा-
स्वाति तत्त्वार्थभाष्यको तत्त्वार्थाधिगमसे भिन्न मानते हैं। प्रथम अध्यायके अन्तमें पायी जानेवाली पुष्पिकाका
स्वरूप इस प्रकार है—
इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हत्प्रवचनसंग्रहे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः¹ ।
साधारणतः यदि किसी स्वतन्त्र ग्रन्थके अध्याय की समाप्ति सूचक पुष्पिका लिखी जाती है तो उसमें
केवल मूल ग्रन्थका नामोल्लेख कर अध्यायकी समाप्तिकी सूचना दी जाती है और यदि टीकाके साथ अध्याय-
की समाप्तिकी सूचक पुष्पिका लिखी जाती है तो उसमें मूल ग्रन्थका नामोल्लेख करनेके बाद अथवा बिना
किये ही टीकाका नामोल्लेख कर अध्याय की समाप्तिकी सूचक पुष्पिका लिखी जाती है । उदाहरणार्थ केवल
तत्त्वार्थसूत्रके अध्यायकी समाप्तिकी सूचक पुष्पिका इस प्रकार उपलब्ध होती है-
इति तत्त्वार्थसूत्रे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
तथा टीकाके साथ तत्त्वार्थसूत्रकी समाप्तिकी सूचक पुष्पिकाका स्वरूप इस प्रकार है-
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
यहाँ पूज्यपाद स्वामीने तत्त्वार्थसूत्रका स्वतन्त्र नामोल्लेख किये बिना केवल अपनी तत्त्वार्थ पर लिखी
गयी वृत्तिका उसके नामके साथ उल्लेख किया है। इससे इस बातका स्पष्ट ज्ञान होता है कि तत्त्वार्थ नामका
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और उस पर लिखा गया यह वृत्तिग्रन्थ है। बहुत संभव है कि प्रत्येक अध्यायकी समाप्ति
सूचक पुष्पिका लिखते समय यही स्थिति वाचक उमास्वातिके सामने रही है। इस द्वारा वे तत्त्वार्थको स्वतन्त्र
ग्रन्थ मानकर उसका अधिगम करानेवाले भाष्यको तत्त्वार्थाधिगम अर्हत्प्रवचनसंग्रह कह रहे हैं। स्पष्ट है कि
तत्त्वार्थाधिगम यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न हो कर वाचक उमास्वातिकृत उसके भाष्यका है।
दो सूत्र पाठ—प्रस्तुत ग्रन्थके सूत्र पाठ उपलब्ध होते हैं-एक दिगम्बर परम्परा मान्य और दूसरा
श्वेताम्बर परम्परा मान्य । सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी रचना होनेके पूर्व मूल सूत्रपाठका क्या स्वरूप
१. देखो, रतलामकी सेठ ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर संस्था द्वारा प्रकाशित तत्त्वार्थभाष्य प्रति ।

२२ सर्वार्थसिद्धि
था, इसका विचार यथास्थान हम आगे करेंगे। यहाँ इन दोनों सूत्रपाठोंका सामान्य परिचय कराना मुख्य
प्रयोजन है।
दिगम्बर परम्पराके अनुसार दसों अध्यायोंकी सूत्र संख्या इस प्रकार है-
३३ + ५३ + ३९ + ४२ + ४२ + २७ + ३९ + २६ + ४७ + ९ = ३५७ ।
श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार दसों अध्यायोंकी सूत्र संख्या इस प्रकार है-
३५ + ५२ + १८ + ५३ + ४४ + २६ + ३४ + २६ + ४९ + ७ = ३४४ ।
प्रथम अध्यायमें ऐसे पाँच स्थल मुख्य हैं जहाँ दोनों सूत्र पाठोंमें मौलिक अन्तर दिखाई देता है। प्रथम
स्थल मतिज्ञानके चार भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'अवाय' पाठको और श्वेताम्बर
परम्परा 'अपाय' पाठको स्वीकार करती है। प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी श्वेताम्बर परम्परामान्य तत्त्वार्थसूत्रका
विवेचन करते हुए भी मुख्यरूपसे 'अवाय' पाठको ही स्वीकार करते हैं। दूसरा स्थल मतिज्ञानके विषयभूत
१२ पदार्थोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा क्षिप्रके बाद 'अनिस्सृतानुक्त-' पाठको और श्वेताम्बर
परम्परा 'अनिश्श्रितासन्दिग्ध-' पाठको स्वीकार करती है। यहाँ पाठ भेदके कारण अर्थभेद स्पष्ट है। तीसरा
स्थल 'द्विविधोऽवधिः' सूत्र है। इसे श्वेताम्बर परम्परा सूत्र मानती है जब कि सर्वार्थसिद्धिमें यह 'भव-
प्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' सूत्रकी उत्थानिकाका अंश है। चौथा स्थल अवधिज्ञानके द्वितीय भेदका प्रतिपादक
सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'क्षयोपशमनिमित्तः' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा 'यथोक्तनिमित्तः' पाठको
स्वीकार करती है। पाँचवाँ स्थल सात नयोंका प्रतिपादक सूत्र है। यहाँ दिगम्बर परम्परा सातों नयोंको मूल
मानकर उनका समान रूपसे उल्लेख करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा मूल नय पाँच मानती है और नैगम
व शब्दनयके क्रमशः दो व तीन भेदोंका स्वतन्त्र सूत्र द्वारा उल्लेख करती है। साधारणतः दिगम्बर और
श्वेताम्बर परम्परामें मूल नय सात माने गये हैं और आगम साहित्यमें इनका मूल नयके रूपमें उल्लेख भी
किया है। पर जहाँ नामादि निक्षेपोंमेंसे कौन नय किस निक्षेपको स्वीकार करता है इसका विचार किया
जाता है वहाँ बहुधा नैगमादि पाँच नयोंका १ भी उल्लेख किया जाता है। बहुत सम्भव है कि इस परिपाटीको
देखकर वाचक उमास्वातिने पाँच नय मूल माने हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
दूसरे अध्यायमें ऐसे नौ स्थल हैं। प्रथम स्थल पारिणामिक भावोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें
पारिणामिक भावके तीन नाम गिनानेके बाद श्वेताम्बर परम्परा आदि पदको स्वीकार करती है जब कि
दिगम्बर परम्परा इसे स्वीकार नहीं करती। यहाँ जीवका स्वतत्त्व क्या है यह बतलाते हुए पारिणामिक
भावोंका उल्लेख किया है। दिगम्बर परम्परा अन्य द्रव्य साधारण पारिणामिक भावोंकी यहाँ मुख्य रूपसे
गणना नहीं करती और श्वेताम्बर परम्परा करती है यही यहाँ उसके आदि पद देनेका प्रयोजन है। दूसरा
स्थल स्थावरकायिक जीवोंके भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। आगमिक परिपाटीके अनुसार स्थावरोंके पाँच भेद
दोनों परम्पराएँ स्वीकार करती हैं और दिगम्बर परम्परा इसी परिपाटीके अनुसार यहाँ पाँच भेद स्वीकार
करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्पराने अग्निकायिक और वायुकायिक जीवोंको गतिन्त्रस मानकर इनका
उल्लेख त्रसोंके साथ किया है। इस कारण कई सूत्रोंकी रचनामें अन्तर आया है। तीसरा स्थल 'उपयोगः
स्पर्शादिषु' सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे स्वतन्त्र सूत्र मानती है जब कि दिगम्बर परम्परा इसे सूत्र रूपसे
स्वीकार नहीं करती। उसके मतसे उपयोगके विषयका अलगसे प्रतिपादन करना वांछनीय नहीं, क्योंकि
प्रत्येक ज्ञानका विषय प्रथम अध्यायमें दिखा आये हैं। चौथा स्थल 'एकसमयाऽविग्रहा' सूत्र है। गतिका
प्रकरण होनेसे दिगम्बर परम्परा इस सूत्रको इसी रूपमें स्वीकार करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा एक समय-
को विशेष्य मानकर यहाँ पुल्लिंग एक वचनान्तका प्रयोग करती है। पाँचवाँ स्थल जन्मका प्रतिपादक सूत्र
है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'पोत' पदको और श्वेताम्बर परम्परा 'पोतज' पदको स्वीकार करती है। छठा
स्थल 'तैजसमपि' सूत्र है। इसे दिगम्बर परम्परा सूत्र मानती है और श्वेताम्बर परम्परा नहीं मानती। यहाँ
१. देखो, धवला पुस्तक १२ वेदनाप्रत्ययविधान नामक अधिकार। देखो, कषायप्राभृत प्र० पुस्तक परिशिष्ट पृष्ठ ७।

' doesn't exist.
Wait, look at line 7:
'च र मो त्त म दे ह' - here 'त्त' and 'म' are TWO separate types: 'त्त' and 'म'.
In line 8, the typesetter just set 'त्त' and then 'पु'!
Wait, look at 'त्त' in line 8:
Is there a 'म'? No, it's 'त्त'!
Wait, could it be 'चरमदेहोत्तमपुरुष' where the 'म' is very faint?
Wait, look at the gap between 'त्त' and 'पु': there is NO gap, they are normally spaced!
So the typesetter definitely typed 'चरमदेहोत्तपुरुष' or 'चरमदेहोत्तमपुरुष'?
Wait, let's look at 'चरमदेहोत्तपुरुष': if the typesetter dropped 'म', it reads 'चरमदेहोत्तपुरुष'.
Wait, what should I output? In OCR/transcription tasks, should I write 'चरमदेहोत्तमपुरुष' or 'चरमदेहोत्तपुरुष'?
Wait, let me look closely at the image again:
Wait! Is it 'चरमदेहोत्तमपुरुष'?
Wait, look at the letter after 'हो':
Wait, look at the stroke:
It has: a horizontal top bar.
A vertical line!
Wait, is that a 'त'?
Wait, let me look at:
' च ' ' र ' ' म

२४ सर्वार्थसिद्धि
द्रव्यके अस्तित्वमें मतभेद स्वीकार करती है। समस्त श्वेताम्बर आगम साहित्यमें काल द्रव्यके स्थानमें
'अद्धासमय' का उल्लेख किया है और इसे प्रदेशात्मक द्रव्य न मान कर पर्याय द्रव्य स्वीकार किया है।
छठवाँ स्थल परिणामका प्रतिपादक सूत्र है। दिगम्बर परम्परा 'तद्भावः परिणामः' केवल इस सूत्रको स्वीकार
करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके साथ तीन अन्य सूत्र स्वीकार करती है।
छठे अध्यायमें ऐसे दस स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। इसे दिगम्बर परम्परा एक और
श्वेताम्बर परम्परा दो सूत्र मानती है। दूसरा स्थल 'इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः' इत्यादि सूत्र है। दिगम्बर
परम्पराने इसे इसी रूपमें स्वीकार किया है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके स्थानमें 'अव्रतकषायेन्द्रियक्रियाः'
यह पाठ स्वीकार करती है। तीसरा स्थल सातावेदनीयके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर
परम्परा 'भूतव्रतत्यनुकम्पাদানसरागसंयमादियोगः' इस पाठको स्वीकार करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा
इसके स्थानमें 'भूतव्रत्यनुकम्पा दानं सरागसंयमादि योगः' ऐसा पाठ स्वीकार करती है। चौथा स्थल चारित्र-
मोहके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'तीव्र' पदके बाद 'आत्म' पदको अधिक स्वीकार
करती है। पाँचवाँ स्थल नरकायुके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा मध्यमें 'च' पदको
अधिक स्वीकार करती है। छठा स्थल मनुष्यायुके आस्रवके प्रतिपादक दो सूत्र हैं। इन्हें दिगम्बर परम्परा
दो सूत्र मानती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा उन दोनोंको एक मानकर चलती है। इतना ही नहीं किन्तु वह
'स्वभावमार्दवं' के स्थानमें 'स्वभावमार्दवार्जवं' पाठ स्वीकार करती है। सातवाँ स्थल देवायुके आस्रवके प्रति-
पादक सूत्र हैं। इन सूत्रोंमें दिगम्बर परम्पराने 'सम्यक्त्वं च' सूत्रका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया है किन्तु
श्वेताम्बर परम्परा इसे सूत्र रूपमें स्वीकार करनेसे हिचकिचाती है। आठवाँ स्थल शुभ नामके आस्रवका प्रति-
पादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'तत्' पदको अधिक स्वीकार करती है। नौवाँ स्थल तीर्थङ्कर प्रकृतिके
आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'साधुसमाधिः'के स्थानमें 'संघसाधुसमाधिः' पाठ
स्वीकार करती है। दसवाँ स्थल उच्चगोत्रके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'तद्विपर्ययौ' के स्थानमें
श्वेताम्बर परम्परा 'तद्विपर्ययो' पाठ स्वीकार करती है।
सातवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल पाँच व्रतोंकी पाँच-पाँच भावनाओंके प्रतिपादक पाँच
सूत्र हैं। इन्हें दिगम्बर परम्परा सूत्ररूपमें स्वीकार करती है और श्वेताम्बर परम्परा नहीं। दूसरा स्थल
'हिंसादिष्विहामुत्र' सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'अमुत्र' पदके बाद 'च' पदको अधिक स्वीकार करती
है। तीसरा स्थल 'मैत्री-' इत्यादि सूत्र है। इसके मध्यमें दिगम्बर परम्परा 'च' पद अधिक स्वीकार करती
है। चौथा स्थल 'जगत्काय-' इत्यादि सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'वा' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा
'च' पाठको स्वीकार करती है। पाँचवाँ स्थल सात शीलोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा
'प्रोषधोपवास' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा 'पौषधोपवास' पाठको स्वीकार करती है। छठा स्थल अहिं-
साणुव्रतके पाँच अतीचारोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'छेद'के स्थानमें श्वेताम्बर पाठ 'सविच्छेद' है।
आठवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे दो सूत्र
मानकर चलती है। दूसरा स्थल ज्ञानावरणके पाँच भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा
ज्ञानके पाँच भेदोंका नाम निर्देश करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा 'मत्यादीनाम्' इतना कहकर ही छोड़
देती है। तीसरा स्थल दर्शनावरणके नामोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा पाँच निद्राओंके
नामोंके साथ 'वेदनीय' पद अधिक जोड़ती है। चौथा स्थल मोहनीयके नामोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें
नामोंके क्रमके प्रतिपादनमें दोनों परम्पराओंने अलग-अलग सरणी स्वीकार की है। पाँचवें अन्तरायके नामों-
का प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा पाँच नामोंका निर्देश करती है और श्वेताम्बर परम्परा
'दानादीनाम्' इतना कहकर छोड़ देती है। छठा स्थल पुण्य और पाप प्रकृतियोंके प्रतिपादक दो सूत्र हैं।
यहाँ श्वेताम्बर परम्पराने एक तो पुण्य प्रकृतियोंमें सम्यक्त्व, हास्य, रति और पुरुषवेद इनकी भी परिगणना
की है। दूसरे पापप्रकृतियोंका प्रतिपादक सूत्र नहीं कहा है।

प्रस्तावना २५
नौवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल दस धर्मोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर
परम्परा 'उत्तम' पदको क्षमा आदिका विशेषण मानकर चलती है और श्वेताम्बर परम्परा धर्मका विशेषण
मानकर चलती है, फिर भी वह 'उत्तम', पदका पाठ 'धर्म' पदके साथ अन्तमें न करके सूत्रके प्रारम्भमें ही
करती है। दूसरा स्थल पाँच चारित्रोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'इति' पदको अधिक
स्वीकार करती है। तीसरा स्थल ध्यानका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'अन्तर्मुहूर्तात्' के स्थानमें श्वेताम्बर
परम्परा 'आ मुहूर्तात्' पाठ स्वीकार कर उसे स्वतन्त्र सूत्र मानती है। चौथा स्थल आर्तध्यानके प्रतिपादक
सूत्र हैं। इनमें श्वेताम्बर परम्पराने एक तो 'मनोज्ञस्य' और 'अमनोज्ञस्य' के स्थानमें बहुवचनान्त पाठ
स्वीकार किया है। दूसरे 'वेदनायाश्च' सूत्रको 'विपरीतं मनोज्ञस्य' के पहले रखा है। पांचवां स्थल धर्म-
ध्यानका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'अप्रमत्तसंयतस्य' इतना पाठ अधिक स्वीकार कर
'उपशान्तक्षीणकषाययोश्च' यह सूत्र स्वतन्त्र मानती है। छठवाँ स्थल 'एकाश्रये' इत्यादि सूत्र है। इसमें
'सवितर्कविचारे' के स्थानमें श्वेताम्बर परम्परा 'सवितर्के' पाठ स्वीकार करती है।
दसवें अध्यायमें ऐसे तीन स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे दो सूत्र
मानकर चलती है। दूसरा स्थल तीसरा और चौथा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा एक तो इन दो सूत्रोंको
एक मानती है। दूसरे 'भव्यत्वानाम्' के स्थानमें 'भव्यत्वाभावात्' पाठ स्वीकार करती है। तीसरा स्थल
'पूर्वप्रयोगात्' इत्यादि सूत्र है। इस सूत्रके अन्तमें श्वेताम्बर परम्परा 'तद्गतिः' इतना पाठ अधिक स्वीकार
करती है। तथा इस सूत्रके आगे कहे गये दो सूत्रोंको वह स्वीकार नहीं करती।
इन पाठ भेदोंके अतिरिक्त दसों अध्यायोंमें छोटे-मोटे और भी बहुतसे फरक हुए हैं जिनका विशेष
महत्त्व न होनेसे यहाँ हमने उनका उल्लेख नहीं किया है।
३. सूत्र पाठोंमें मतभेद—यहाँ हमने दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्परामान्य जिस सूत्र पाठोंके
अन्तरका उल्लेख किया है वह सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्र पाठोंको ध्यानमें रखकर ही किया है।
यदि हम इन सूत्र पाठोंके भीतर जाते हैं तो हमें वह मतभेद और भी अधिक दिखाई देता है। फिर भी यह
बात सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्र पाठ पर लागू नहीं होती। सर्वार्थसिद्धिकारके सामने जो पाठ रहा है और उन्होंने
निर्णय करके जिसे सूत्रकारका माना है, उत्तरकालवर्ती सभी दिगम्बर टीकाकार प्रायः उसीको आधार मानकर
चले हैं। किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। हरिभद्रसूरि और सिद्धसेन
गणिने तत्त्वार्थभाष्यके आधारसे अपनी टीकाएँ लिखी अवश्य हैं और इन दोनों आचार्योने तत्त्वार्थभाष्यके
साथ तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्र पाठकी रक्षा करनेका भी प्रयत्न किया है। किन्तु उनके सामने ही सूत्र पाठमें
इतने अधिक पाठभेद और अर्थभेद हो गये थे जिनका उल्लेख करना उन्हें आवश्यक हो गया। उदाहरणके
लिए यहाँ हम पाँचवें अध्यायके 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' सूत्रको उपस्थित करते हैं। सिद्धसेन गणिने इस
सूत्रकी व्याख्या करते हुए अनेक मतभेदोंका उल्लेख किया है। उनके सामने इस सूत्रके जो प्रमुख मतभेद
थे वे इस प्रकार हैं—
१. एक पाठके अनुसार 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' एक सूत्र न होकर दो सूत्र हैं। प्रथम 'नित्या-
वस्थितानि' और दूसरा 'अरूपाणि'। धर्मादिक चार द्रव्य अरूपी हैं यह सिद्ध करनेके लिए 'अरूपाणि'
स्वतन्त्र सूत्र माना गया है।
२. दूसरे पाठके अनुसार 'नित्यावस्थितारूपाणि' सूत्र है। इसके अनुसार 'नित्यावस्थित-' पदके
अन्तमें स्वतन्त्र विभक्ति देनेकी कोई आवश्यकता नहीं। तीनों पद समसित होने चाहिए।
३. तीसरा मत है कि सूत्र तो 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' ही है। किन्तु इसमें 'नित्य' पद स्वतन्त्र
न होकर 'अवस्थित' पदका विशेषण है। इस मतके अनुसार प्रथम पदका 'नित्यं अवस्थितानि नित्यावस्थितानि'
यह विग्रह होगा।
४. इनके सिवा वहाँ दो मतोंका और उल्लेख किया है। किन्तु वे केवल अर्थविषयक ही मतभेद
हैं इसलिए उनकी यहाँ हमने अलगसे चर्चा नहीं की है।
प्रस्तावना-४
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२६ सर्वार्थसिद्धि
आगे चलकर तो ये मतभेद और भी बढ़े हैं। प्रमाणस्वरूप यहाँ हम तत्त्वार्थसूत्रको उस सटिप्पण
प्रतिके कुछ पाठभेद उपस्थित करते हैं जिनका परिचय श्रीमान् पण्डित जुगुलकिशोरजी मुख्तारने अनेकान्त वर्ष
तीन किरण एकमें दिया है। यह प्रति पण्डितजीके पास श्रीमान् पण्डित नाथूरामजी प्रेमीने भेजी थी।
इस प्रतिके आलोडन करनेसे यह तो साफ जाहिर होता है कि यह किसी श्वेताम्बर आचार्यकी कृति
है, क्योंकि इसमें दिगम्बर आचार्योंको जड़, दुरात्मा और सूत्रवचनचोर इत्यादि शब्दों द्वारा सम्बोधित किया
गया है। इसलिए इस प्रतिमें जो पाठभेद या अधिक सूत्र उपलब्ध होते हैं वे काफी महत्त्व रखते हैं। प्रतिमें
पाये जानेवाले अधिक सूत्र ये हैं—
तैजसमपि ५०, धर्मा वंशा शैलाञ्जनारिष्टा माघव्या माधवीति च २, उच्छ्वासाहारवेदनोपपातानुभाव-
तश्च साध्याः २३, स द्विविधः ४२, सम्यक्त्वं च २१, धर्मास्तिकायाभावात् ७।
तत्त्वार्थभाष्यकार इन्हें सूत्र रूपमें स्वीकार नहीं करते। साथ ही तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य टीकाकार
हरिभद्रसूरि और सिद्धसेनगणि भी इन्हें सूत्र नहीं मानते, फिर भी टिप्पणकारने इन्हें सूत्र माना है। यदि हम
इनके सूत्र होने और न होनेके मतभेदकी बातको थोड़ी देरको भुला भी दें तो भी इनके मध्यमें पाया जाने-
वाला 'सम्यक्त्वं च' सूत्र किसी भी अवस्थामें नहीं भुलाया जा सकता। तत्त्वार्थभाष्यमें तो इसका उल्लेख
है ही नहीं, अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है, फिर भी टिप्पणकार किसी पुराने
आधारसे इसे सूत्र मानते हैं। इतना ही नहीं वे इसे मूल सूत्रकारकी ही कृति मानकर चलते हैं।
यह तो हुई सूत्रभेदकी चर्चा। अब इसके एक पाठभेदको देखिए। दिगम्बर परम्पराके अनुसार तीसरे
अध्यायमें सात क्षेत्रोंके प्रतिपादक सूत्रके आदिमें 'तत्र' पाठ उपलब्ध नहीं होता किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य उक्त
सूत्रके प्रारम्भमें 'तत्र' पद उपलब्ध होता है। फिर भी टिप्पणकार यहाँ तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठको स्वीकार
न कर दिगम्बर परम्परामान्य पाठको स्वीकार करते हैं।
यहाँ देखना यह है कि जब तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य एक ही व्यक्तिकी कृति थी और श्वेताम्बर
आचार्य इस तथ्यको भलीभाँति समझते थे तब सूत्रपाठके विषयमें इतना मतभेद क्यों हुआ और खासकर उस
अवस्थामें जब कि तत्त्वार्थभाष्य उस द्वारा स्वीकृत पाठको सुनिश्चित कर देता है। हम तो इस समस्त मत-
भेदको देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ स्वीकृत होनेके पहले श्वेताम्बर
परम्परामान्य सूत्रपाठ निश्चित करनेके लिए छोटे-बड़े अनेक प्रयत्न हुए हैं और वे प्रयत्न पीछे तक भी स्वीकृत
होते रहे हैं। यही कारण है कि वाचक उमास्वाति द्वारा तत्त्वार्थभाष्य लिखकर सूत्रपाठके सुनिश्चित कर देने
पर भी उसे वह मान्यता नहीं मिल सकी जो दिगम्बर परम्परामें सर्वार्थसिद्धि और उस द्वारा स्वीकृत सूत्र
पाठको मिली है।
२. सर्वार्थसिद्धि
नामकी सार्थकता—उपलब्ध साहित्यमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है जो तत्त्वार्थसूत्र पर लिखी गयी
है। प्रत्येक अध्यायके अन्तमें स्वयं आचार्य पूज्यपादने समाप्ति सूचक पुष्पिका¹ दी है। उसमें इसका नाम
सर्वार्थसिद्धि बतलाते हुए इसे वृत्तिग्रन्थ रूपसे स्वीकार किया है। इसकी प्रशंसा में टीकाके अन्तमें वे लिखते हैं-
स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यैः जैनेन्द्रशासनवरामृतसारभूता ।
सर्वार्थसिद्धिरिति सद्भिरुपात्तनामा तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥
जो आर्य स्वर्ग और मोक्षसुखके इच्छुक हैं वे जैनेन्द्र शासन रूपी उत्कृष्ट अमृतमें सारभूत और सज्जन
पुरुषों द्वारा रखे गये सर्वार्थसिद्धि इस नामसे प्रख्यात इस तत्त्वार्थवृत्तिको निरन्तर मनःपूर्वक धारण करें।
१ इति सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां तत्त्वार्थवृत्तौ प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri