सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सर्वार्थसिद्धि
भाग बार जीव दो-दो समय तक अनाहारक होते रहे । इसलिए आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काण्डकोंको
दो से गुणा करने पर अनाहारक सासादनसम्यग्दृष्टियोंका कुल काल उपलब्ध होता है । १
अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें यह देखा जाता है कि पीछेसे अनेक स्थलों पर विषयको स्पष्ट करनेके
लिए अन्य ग्रन्थोंके श्लोक, गाथा, वाक्यांश या स्वतन्त्र टिप्पणियां जोड़ दी जाती हैं और कालान्तरमें वे ग्रन्थका
अंग बन जाती हैं। सर्वार्थसिद्धिमें यह व्यत्यय बहुत ही बड़ी मात्रामें हुआ है । ऐसे तीन उदाहरण तो हम
इस वक्तव्यके प्रारम्भमें ही उपस्थित कर आये हैं । कहना न होगा कि यह किसी टिप्पणकारकी सूझ है और
उसने अपनी दृष्टिसे विषयको स्पष्ट करनेके लिए पहले वे वाक्य फुटनोटके रूपमें हाशियामें लिखे होंगे और आगे
चलकर उसपर-से दूसरी प्रति तैयार करते समय वे ही मूल ग्रन्थके अंग बन गये होंगे । इसके सिवा आगे
भी ऐसे कई वाक्यांश या गाथाएँ मिली हैं जो अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध नहीं होतीं और जिन्हें
दूर कर देनेसे प्रकरणकी कुछ भी हानि नहीं होती । यहाँ हम कुछ ऐसे उपयोगी वाक्यांशोंके दो-तीन उदाहरण
उपस्थित कर रहे हैं जो प्राचीन संस्करणोंमें थे और इस संस्करणमें-से अलग करने पड़े हैं—
१. कुछ प्रतियोंमें तृतीय अध्यायके प्रथम सूत्रकी वृत्तिमें 'घनं च घनो मन्दो महान् आयत इत्यर्थः'
आदि पाठ उपलब्ध होता है। अब तककी मुद्रित प्रतियोंमें भी यह पाठ प्रकाशित हुआ है। हमारे सामने जो
प्रतियां थीं उनमें से अधिकतर प्रतियोंमें यह पाठ नहीं है और वृत्तिको देखते हुए वह वृत्तिकारका प्रतीत भी
नहीं होता, इसलिए इस पाठको ऊपर न देकर नीचे टिप्पणीमें दिखा दिया है।
२. नौवें अध्यायके नौवें सूत्रके मलपरीषहके व्याख्यानके अन्तमें 'केशलोञ्चसंस्काराभ्यामुत्पन्नखेद-
सहनं मलसामान्यसहनेऽन्तर्भवतीति न पृथगुक्तम्।' यह वाक्य मुद्रित प्रतियोंमें उपलब्ध होता है। किन्तु
हमारे सामने जो हस्तलिखित प्रतियां थीं उनमें यह वाक्य नहीं पाया जाता। वाक्य-रचनाको देखते हुए यह
सर्वार्थसिद्धिकारका प्रतीत भी नहीं होता। तथा किसी परीषहका स्वरूपनिर्देश करनेके बाद सर्वार्थसिद्धिमें
पुनः उस परीषहके सम्बन्धमें विशेष स्पष्टीकरण करनेकी परिपाटी भी नहीं दिखाई देती, इसलिए हमने इस
वाक्यको मूलमें न देकर टिप्पणीमें अलगसे दिखा दिया है।
२ प्रस्तुत संस्करणमें स्वीकृत पाठकी विशेषता
यह हम पहले ही निर्देश कर आये हैं कि प्रस्तुत संस्करणके पहले सर्वार्थसिद्धिके अनेक संस्करण
प्रकाशमें आ चुके थे। ऐसी अवस्थामें प्रस्तुत संस्करणके सम्पादनके समय किसी पाठको स्वीकार करने या
अस्वीकार करनेमें हमारे सामने बड़ी कठिनाई रही है। साधारणतः हमने इस बातका ध्यान रखा है कि
मुद्रित प्रतियोंमें जो पाठ उपलब्ध होते हैं। सर्वप्रथम उन्हें ही प्रमुखता दी जाय । किन्तु इस नियमका हम
सर्वत्र पालन नहीं कर सके । यदि हमें उनसे उपयुक्त पाठ अन्य हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध हुए तो उन्हें
स्वीकार करनेमें हमने संकोच नहीं किया । यहाँ तुलनात्मक ढंगसे मात्र प्रथम अध्यायके कुछ ऐसे पाठ दे रहे
हैं जिनसे उनका महत्त्व पाठकोंके ध्यानमें आ जाय ।
पृ० पं० पुरानी मुद्रित प्रति प्रस्तुत संस्करण
३ ३ -वत् । एवं व्यस्तज्ञाना- -वत् व्यस्तं ज्ञाना-
६ १ स्वयं पश्यति दृश्यतेऽनेनेति पश्यति दृश्यतेऽनेन
६ १ ज्ञप्तिमात्रं ज्ञातिमात्रं
१७ ४ पुरुषाकारा- पुरुषकारा-
१८ १ -र्थानामजीवानां नामा- -र्थानां नामा-
१९ १ -विधिना नामशब्दा- -विधिना शब्दा-
१. देखो, जीवस्थान पृ० ४, पृ० ४३५ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri