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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 558 में से

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पृष्ठ 11

दो शब्द
१ सम्पादनका कारण
सर्वार्थसिद्धिको सम्पादित होकर प्रकाशमें आनेमें अत्यधिक समय लगा है । लगभग आठ नौ वर्ष पूर्व
विशेष वाचनके समय मेरे ध्यानमें यह आया कि सर्वार्थसिद्धिमें ऐसे कई स्थल हैं जिन्हें उसका मूल भाग
माननेमें सन्देह होता है । किन्तु जब कोई वाक्य, वाक्यांश, पद या पदांश लिपिकारकी असावधानी या अन्य
कारणसे किसी ग्रन्थका मूल भाग बन जाता है तब फिर उसे बिना आधारके पृथक् करनेमें काफी अड़चनका
सामना करना पड़ता है । सर्वार्थसिद्धिके वाचनके समय भी मेरे सामने यह समस्या थी और इसीके फलस्वरूप
इसके सम्पादनकी ओर मेरा झुकाव हुआ था ।
यह तो स्पष्ट ही है कि आचार्य पूज्यपादने तत्त्वार्थसूत्र प्रथम अध्यायके 'निर्देशस्वामित्व' और
'सत्संख्या' इन दो सूत्रोंकी व्याख्या षट्खण्डागमके आधारसे की है । इसका विचार आगे चलकर प्रस्तावना-
में हम स्वतन्त्र प्रकरण लिखकर करनेवाले हैं । यहाँ केवल यह देखना है कि इन सूत्रोंकी व्याख्यामें कहीं
कोई शिथिलता तो नहीं आने पायी और यदि शिथिलताके चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं तो उसका कारण क्या है ?
'निर्देशस्वामित्व-' सूत्रकी व्याख्या करते समय आचार्य पूज्यपादने चारों गतियोंके आश्रयसे सम्य-
ग्दर्शनके स्वामीका निर्देश किया है। वहाँ तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शनके अभावके समर्थनमें पूर्व मुद्रित
प्रतियोंमें यह वाक्य उपलब्ध होता है—
‘कुत इत्युक्ते मनुष्यः कर्मभूमिज एव दर्शनमोहक्षपणप्रारम्भको भवति । क्षपणप्रारम्भकालात्पूर्वं
तिर्यक्षु बद्धायुष्कोऽपि उत्तमभोगभूमितिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्स्त्रीषु ; द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां क्षायिका-
संभवात् । एवं तिरश्चामपर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयं न पर्याप्तकानाम् ।'
दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके आगममें इस प्रकारके नियमका निर्देश है कि सम्यग्दृष्टि
मर कर किसी भी गतिके स्त्रीवेदियोंमें उत्पन्न नहीं होता ।
किन्तु श्वेताम्बर आगम ज्ञाताधर्मकथा नामके छठवें अंगमें मल्लिनाथ तीर्थङ्करकी कथा¹ के प्रसंगसे
बतलाया गया है कि मल्लिनाथ तीर्थङ्करने अपने पिछले महाबलके भवमें मायाचारके कारण ²स्त्रीनामकर्म
गोत्रको निष्पन्न किया जिससे वे तीर्थङ्करकी पर्यायमें स्त्री हुए । और इसी कारण पीछेके श्वेताम्बर टीका-
कारोंने उक्त नियमका यह खुलासा किया है कि 'सम्यग्दृष्टि मरकर स्त्री नहीं होता यह बाहुल्यकी अपेक्षा
कहा है ।'
यहाँ हमें इस कथाके सन्दर्भ पर विचार न कर केवल इतना ही देखना है कि यह स्त्री नामकर्म गोत्र
क्या वस्तु है । क्या यह नौ नोकषायोंमेंसे स्त्रीवेद नामक नोकषाय है या इस द्वारा अङ्गोपाङ्गका निर्देश
किया गया है ? जब महाबलकी पर्यायमें इस कर्मका बन्ध होता है तब वे तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले
सम्यग्दृष्टि साधु थे और सम्यग्दृष्टिके स्त्रीवेदका बन्ध नहीं होता ऐसा कर्मशास्त्रका नियम है । इसलिए यह
बँधनेवाला कर्म स्त्रीवेद नामक नोकषाय तो हो नहीं सकता । रही अङ्गोपाङ्गकी बात सो एक तो अङ्गो-
पाङ्गमें ऐसा भेद परिलक्षित नहीं होता । कदाचित् ऐसा भेद मान भी लिया जाय तो कर्मशास्त्रके नियमा-
नुसार अशुभ अङ्गोपाङ्गका बन्ध प्रमत्त-संयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें होता है यह कहना कठिन है ।
१. देखो अध्ययन ८ । २. तए णं से महब्बले अणगारे इमेणं कारणेणं इत्थिणामकम्मं गो यं विव्वंतिसु ।
ज्ञाता० पृ० ३१२ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri