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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 558 में से

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इसलिए प्रस्तुत प्रकरणमें न तो ज्ञाताधर्मकथाकी इस कथाको आधार माना जा सकता है और न ही इस
आधारसे श्वेताम्बर टीकाकारोंका यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि 'सम्यग्दृष्टि जीव मरकर स्त्रीवेदियोंमें
नहीं उत्पन्न होता यह बाहुल्य की अपेक्षा कहा है।'
इतने विचारके बाद जब हम सर्वार्थसिद्धिके उक्त कथन पर ध्यान देते हैं तो हमें उसमें सन्देह होता है।
उसमें तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शन न होनेके हेतुका निर्देश किया गया है। यह तो स्पष्ट है कि जो
मनुष्य तिर्यञ्चायुका बन्ध कर सम्यग्दृष्टि हो क्षायिक सम्यग्दर्शनको प्राप्त होता है वह उत्तम भोगभूमिके पुरुष-
वेदी तिर्यञ्चोंमें ही उत्पन्न होता है, स्त्रीवेदी तिर्यञ्चोंमें नहीं। किन्तु इसके समर्थनमें जो 'द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां
क्षायिकासंभवात्' यह युक्ति दी गयी है वह न केवल लचर है अपि तु भ्रमोत्पादक भी है।
इस युक्तिके आधारसे पूरे वाक्यका यह अर्थ होता है कि तिर्यञ्च द्रव्यवेदवाली स्त्रियोंमें चूँकि क्षायिक
सम्यग्दर्शन सम्भव नहीं है इसलिए क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव मरकर उत्तम भोगभूमिके तिर्यञ्च पुरुषोंमें ही
उत्पन्न होते हैं। अब थोड़ा बारीकीसे पूरे सन्दर्भ पर विचार कीजिए। जो प्रश्न है, एक तरहसे वही समाधान
है। तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शन क्यों नहीं होता इसका विचार करना है। किन्तु उसके उत्तरमें इतना
कहना पर्याप्त था कि बद्धतिर्यञ्चायु मनुष्य यदि क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है तो वह मरकर उत्तम भोग-
भूमिके तिर्यञ्च पुरुषोंमें ही उत्पन्न होता है ऐसा नियम है वहाँ समर्थनमें 'द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां क्षायिका-
संभवात्' इस हेतु कथनकी क्या आवश्यकता थी। इसीको कहते हैं वही प्रश्न और वही उत्तर।
दूसरे यहाँ 'द्रव्यवेदस्त्रीणां' यह वाक्य रचना आगम परिपाटीके अनुकूल नहीं है अतएव भ्रमोत्पादक
भी है, क्योंकि आगममें तिर्यञ्च, तिर्यञ्चिनी और मनुष्य, मनुष्यिनी ऐसे भेद करके व्यवस्था की गयी है तथा
इन संज्ञाओंका मूल आधार वेद नोकषायका उदय बतलाया गया है।
हमारे सामने यह प्रश्न था। हम बहुत कालसे इस विचारमें थे कि यह वाक्य ग्रन्थका मूलभाग है या
कालान्तरमें उसका अङ्ग बना है। तात्त्विक विचारणाके बाद भी इसके निर्णयका मुख्य आधार हस्तलिखित
प्राचीन प्रतियां ही थीं। तदनुसार हमने उत्तर भारत और दक्षिण भारतकी प्रतियोंका संकलन कर शंकास्थलोंका
मुद्रित प्रतियोंसे मिलान करना प्रारम्भ किया। परिणामस्वरूप हमारी धारणा सही निकली। यद्यपि सब
प्रतियोंमें इस वाक्यका अभाव नहीं है पर उनमेंसे कुछ प्राचीन प्रतियाँ ऐसी भी थीं जिनमें यह वाक्य नहीं
उपलब्ध होता है।
इसी सूत्रकी व्याख्यामें दूसरा वाक्य 'क्षायिकं पुनर्भाववेदेनैव' मुद्रित हुआ है। यहाँ मनुष्यिनियोंके
प्रकरणसे यह वाक्य आता है। बतलाया यह गया है कि पर्याप्त मनुष्यिनियोंके ही तीनों सम्यग्दर्शनोंकी प्राप्ति
सम्भव है अपर्याप्त मनुष्यिनियोंके नहीं। निश्चयतः मनुष्यिनीके क्षायिक सम्यग्दर्शन भाववेदकी मुख्यतासे ही
कहा है यह द्योतित करनेके लिए इस वाक्यकी सृष्टि की गयी है।
किन्तु यह तो स्पष्ट ही है कि आगममें 'मनुष्यिनी' पद स्त्रीवेदके उदयवाले मनुष्य गतिके जीवके लिए
ही आता है। जो लोकमें नारी, महिला या स्त्री आदि शब्दोंके द्वारा व्यवहृत होता है, आगमके अनुसार
मनुष्यिनी शब्दका अर्थ उससे भिन्न है। ऐसी अवस्थामें उक्त वाक्यको मूलका मान लेने पर मनुष्यिनी शब्दके
दो अर्थ मानने पड़ते हैं। उसका एक अर्थ तो स्त्रीवेदका उदयवाला मनुष्य जीव होता ही है और दूसरा अर्थ
महिला मानना पड़ता है चाहे उसके स्त्रीवेदका उदय हो या न हो।
ऐसी महिलाको भी जिसके स्त्रीवेदका उदय होता है मनुष्यिनी कहा जा सकता है और उसके क्षायिक
सम्यग्दर्शनका निषेध करनेके लिए यह वाक्य आया है, यदि यह कहा जाय तो इस कथनमें कुछ भी तथ्यांश
नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जैसा कि हम पहले कह आये हैं कि आगममें मनुष्यिनी शब्द भाववेदकी मुख्यतासे
ही प्रयुक्त हुआ है, अतएव वह केवल अपने अर्थमें ही चरितार्थ है। अन्य आपत्तियोंका विधि-निषेध करना
उसका काम नहीं है।
हमने इस वाक्य पर भी पर्याप्त ऊहापोह कर सब प्रतियोंमें इसका अनुसन्धान किया है। प्रतियोंके
मिलान करनेसे ज्ञात हुआ कि यह वाक्य भी सब प्रतियोंमें नहीं उपलब्ध होता।