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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 558 में से

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पृष्ठ 17

दो शब्द १३
हमारे मित्र श्रीयुक्त पं० के० भुजबलिजी शास्त्री मूडबिद्री और पं० दरबारीलालजी न्यायाचार्य दिल्ली की
सत्कृपासे उक्त स्थानोंकी प्रतियोंका जो परिचय हमें उपलब्ध हुआ है वह हम यहाँ दे रहे हैं—
(१) ता०—यह मूडबिद्रीकी ताड़पत्रीय प्रति है। लिपि कनाडी है। कुल पत्र ११६ हैं। इसके
प्रत्येक पृष्ठमें पंक्ति १० और प्रत्येक पंक्तिमें अक्षर लगभग ७१ हैं। प्रति शुद्ध और अच्छी हालतमें है।
सरस्वती गच्छ, बलात्कार गण कुन्दकुन्दान्वयके आ० वसुन्धरने भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा शालि० शक १५५१
विलम्बि संवत्सरके दिन इसकी लिपि समाप्त की थी। हमारे] सामने उपस्थित प्रतियोंमें यह सबसे अधिक
प्राचीन थी। इसका संकेताक्षर ता० है।
(२) ना०—यह भी मूडबिद्रीकी ताडपत्रीय प्रति है। लिपि कनाडी है। कुल पत्र १०१ हैं। 'इसके
प्रत्येक पृष्ठमें पंक्ति ९ और प्रत्येक पंक्तिमें अक्षर लगभग १०७ हैं। प्रति शुद्ध और अच्छी अवस्थामें है।
इसमें लिपिकर्ता तथा लिपिकालका निर्देश नहीं है। इसका संकेताक्षर ना० है।
(३) दि० १—यह श्री लाला हरसुखराय सुगनचन्दजीके नये मन्दिरमें स्थित दि० जैन सरस्वती
भाण्डार धर्मपुरा दिल्लीकी हस्तलिखित प्रति है। पत्र संख्या २०१ है। प्रत्येक पत्रमें १८ पंक्ति और प्रत्येक
पंक्तिमें लगभग ३३ अक्षर हैं। पत्रकी लम्बाई ११ इंच और चौड़ाई ५ इंच है। चारों ओर एक-एक इंच
हासिया छोड़कर बीचमें प्रतिलिपि की गयी है। कागज़ पुष्ट है, अक्षर भी बड़े सुन्दर हैं जो बिना किसी कष्टके
आसानीसे पढ़े जाते हैं। लेखनकार्य संवत् १७५२ आषाढ़ सुदि ११ गुरुवारको समाप्त हुआ था। प्रतिके
अन्तमें यह प्रशस्ति उपलब्ध होती है—
'प्रणिपत्य जिनवरेन्द्रं वरविग्रहरूपरञ्जितसुरेन्द्रं । सद्गुणसुधासमुद्रं वक्ष्ये सस्तां प्रशस्तिमहां ॥ १ ॥
जगत्सारे हि सारेऽस्मिन्निहिंसाजलसागरे । नगरे नागराकीर्जे विस्तीर्णपण्यपण्यके ॥ २ ॥ छ ॥ संवत् १७५२
वर्षे आषाढ़ सुदि ११ गुरौ लिखापिताध्यात्मरतपरसाशेषज्ञानावरणीयक्षयार्थं लिखितं ।'
इसका संकेताक्षर दि० १ है।
(४) दि० २—यह भी पूर्वोक्त स्थानकी हस्तलिखित प्रति है। पत्र संख्या १११ है। प्रत्येक पत्रमें
१२ पंक्ति और प्रत्येक पंक्तिमें लगभग ५० अक्षर हैं। मात्र प्रथम और अन्तिम पत्रमें पंक्ति संख्या कम है।
पत्रकी लम्बाई ११। इंच और चौड़ाई ५ इंच है। अगल-बगलमें सवा इंच और ऊपर-नीचे पौन इंच हांसिया
छोड़कर प्रतिलिपि की गयी है। प्रतिके अन्तमें आये हुए लेखसे विदित होता है कि यह प्रति सं० १८४५
आश्विन वदि १४ मंगलवारको लिखकर समाप्त हुई थी। लेख इस प्रकार है—
'संवत् १८४५ मासोत्तममासे अश्विनीमासे कृष्णपक्षे तिथौ च शुभ चतुर्दशी भूमिवासरेण लिखितं
जैसिंहपुरामध्ये पिरागदास मोहाका जैनी भाई ।'
इस प्रतिके देखनेसे विदित होता है कि यह सम्भवतः दि० १ के आधारसे ही लिखी गयी होगी।
प्रतिकार श्री पिरागदास जी जैन हैं और नर्रासिंहपुरा (नयी दिल्ली) जिन मन्दिरमें बैठकर यह लिखकर
तैयार हुई है। इसका संकेताक्षर दि० २ है।
इन प्रतियोंके सिवा पाँचवीं प्रति श्री जैन सिद्धान्त भवन आरा की है। जो प्रति वाचनके समय
उपयोगमें ली गयी है। तथा मुद्रणके समय मध्यप्रदेश सागर जिलाके अन्तर्गत खिमलासा गाँवकी प्रति भी
सामने रही है। यह गाँव पहले समृद्धिशाली नगर रहा है। यह बीना इटावासे मालथौनको जानेवाली सड़कपर
स्थित है और बीना इटावासे लगभग १२ मील दूर है। प्राचीन उल्लेखोंसे विदित होता है कि इसका प्राचीन
नाम क्षेमोल्लास है। खिमलासा उसीका अपभ्रंश नाम है। नगरके चारों ओर परकोटा और खण्डहर प्राचीन-
कालीन नगरकी समृद्धिके साक्षी हैं। यहाँका जिनमन्दिर दर्शनीय है। इसमें एक सरस्वतीभवन है। जिसमें
अनेक ग्रन्थोंकी हस्तलिखित प्राचीन प्रतियां अब भी मौजूद हैं।