सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ सर्वार्थसिद्धि
९३ ११ -स्वमर्थान्मन्यते -स्वमर्थो मन्यते
९४ १ अनेनेति तत् अनेन तत्
९८ १ -ल्याज्ञानभावः अज्ञाननाशो -ल्पाज्ञाननाशो
९८ ३ -धिगमे अन्य- -धिगमे च अन्य-
९८ ५ हेतुः तत्स्वरूप- हेतुः स्वस्वरूप-
१०० १ -त्यर्थः उपमानार्थापत्त्यादीना- -त्यर्थः । उक्तस्य
मत्रैवान्तर्भावादुक्तस्य
१०३ ३ -ज्ञानमपि प्रति -ज्ञानमक्षमेव प्रति
१०४ १ एवं प्रसक्त्या आसस्य एवं सति आसस्य
१०७ २ संज्ञाः । सम- संज्ञाः । सम-
१०७ ४ नातिवर्तत इति नातिवर्तन्त इति
११० १ -र्गतं करणमित्यु- -र्गतं करणमन्तःकरणमित्यु-
१११ ६ पताकेति । पताका वेति ।
१११ ७ अपैतस्य अवैतस्य
११३ ७ बहुषु बहुविशेष्वपि बहुष्वपि बहुत्वमस्ति बहुविशेष्वपि
११७ ३ द्वित्रिसिक्तः द्वित्रासिक्तः
११७ ५ द्वित्र्यादिषु द्वित्रादिषु
१२० ५ प्रतीत्या व्यु- प्रतीत्य व्यु
१३१ ३ ताम्याम् । तयोः ताम्यां विशुद्धचप्रतिपाताभ्याम् । तयोः
१३४ १० नारूपेष्विति नारूपिष्विति
१४० १ -ज्ञानमवध्यज्ञानं -ज्ञानं विभंगज्ञानं
१४० ८ -प्रवणप्रयोगो -प्रवणः प्रयोगो
३ प्रति परिचय
और भी ऐसी अनेक कई बातें थीं जिनके कारण हमने कई प्राचीन प्रतियोंके आधारसे इसे पुनः
सम्पादित करनेका निश्चय किया इसके लिए हमने मूडबिद्रीकी दो ताडपत्रीय प्रतियां, दिल्ली भाण्डारसे दो
हस्तलिखित प्रतियां और जैन सिद्धान्तभवन आरासे एक हस्तलिखित प्रति प्राप्त की । मुद्रित संस्करणोंमें से
हमारे सामने श्री पं० कलुप्पा भरमप्पा निटवे द्वारा सम्पादित और श्री पं० वंशीधरजी सोलापुर द्वारा
सम्पादित प्रतियां थीं । इस काममें मूडबिद्रीकी एक ताडपत्रीय प्रति और दिल्ली भाण्डारकी एक हस्तलिखित
प्रति विशेष उपयोगी सिद्ध हुईं । अन्य प्रतियोंकी अपेक्षा ये अधिक शुद्ध थीं । फिर भी आदर्श प्रतिके रूपमें
हम किसी एक को मुख्य मानकर न चल सके । हम यह तो नहीं कह सकते कि सर्वार्थसिद्धिका प्रस्तुत संस्करण
सब दृष्टियोंसे अन्तिम है फिर भी इसे सम्पादित करते समय इस बातका ध्यान अवश्य रखा गया है कि जहाँ
तक बने इसे अधिक परिशुद्ध और मूलग्राही बनाया जाय ।
प्रतियोंका परिचय देनेके पहले हम इस बातको स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सर्वार्थसिद्धिको सम्पादित
होकर प्रकाशमें आनेमें आवश्यकतासे अधिक समय लगा है । इतने लम्बे कालके भीतर हमें अनेक बार गृह-
परिवर्तन करना पड़ा है और भी कई अड़चनें आयी हैं । इस कारण हम अपने सब कागजात सुरक्षित न रख
सके । ऐसे कई उपयोगी कागज पत्र हम गँवा बैठे जिनके न रहने से हमारी बड़ी हानि हुई है । उन कागज-
पत्रोंमें प्रतिपरिचय भी था, इसलिए प्रतियोंका जो पूरा परिचय हमने लिख रखा था वह तो इस समय हमारे
सामने नहीं है । वे प्रतियाँ भी हमारे सामने नहीं हैं जिनके आधारसे हमने यह कार्य किया है । फिर भी