संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
प्रारंभिक सूचना, ग्रन्थ-भूमिका एवं सन्त-महिमा
The provided image appears to be completely blank/white with no visible text. Please upload an image containing the text you would like transcribed.
संतबानी संग्रह
भाग २
(शब्द)
जिस में
संतों, साधों और परम भक्तों के चुने
शब्द मय टिप्पणी और संक्षिप्त जीवन-
चरित्र उन महात्माओं के जिन की
साखी भाग १ में नहीं दी है
छापे गये हैं
"न भूतो न भविष्यति"—सुधाकर.
[साहिब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते]
इलाहाबाद
बेलवेडियर स्टीम प्रिंटिंग वर्क्स में प्रकाशित हुआ
सन् १९१५ ई०
[दाम १)
॥ संतबानी ॥
संतबानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जगत-प्रसिद्ध महात्म...
बानी व उपदेश को जिन का लोप होता जाता है बचा लेने का है। जितनी...
हमने छापी हैं उन में से विशेष तो पहिले छपी ही नहीं थीं और जो...
सो प्रायः ऐसे छिन्न भिन्न और बेजोड़ रूप में या क्षेपक और त्रुटि से...
कि उन से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था।
हमने देश देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ हर...
दुर्लभ ग्रंथ या फुटकर शब्द जहाँ तक मिल सके असल या नकल...
मँगवाये। भर सक तो पूरे ग्रंथ छापे गये हैं और फुटकर शब्दों...
सर्व-साधारण के उपकारक पद चुन लिये हैं, प्रायः कोई पुस्तक बिना दो...
का मुक़ाबला किये और ठीक रीति से शोधे नहीं छापी गई है और क...
अनूठे शब्दों के अर्थ और संकेत फुट-नोट में दे दिये हैं। जिन महात्मा...
है उन का जीवन-चरित्र भी साथ ही छापा गया है और जिन भ...
महापुरुषों के नाम किसी बानी में आये हैं उन के वृत्तांत और कौ...
से फुट-नोट मे लिख दिये गये हैं।
दो अंतिम पुस्तकें इस पुस्तक-माला की अर्थात संतबानी स...
[साखी] और भाग २ [शब्द] छप चुकीं जिन का नमूना देख कर...
पाध्याय श्री पंडित सुधाकर द्विवेदी वैकुंठ-वासी ने गद्गद होकर...
“न भूतो न भविष्यति”।
अब कोई नई बानी किसी प्राचीन पुरुष की हमारे पास...
सिवाय कबीर साहिब और पलटू साहिब के विशेष पदों के... उन की...
नये छापे में बढ़ाये जा रहे हैं।
पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के उ...
उन की दृष्टि में आवें उन्हें हम को कृपा करके लिख भेजें जिस से...
छापे मे दूर कर दिये जावें।
यद्यपि ऊपर लिखे हुए कारणों से इन पुस्तकों के छापने में बहुत ख़...
है तौ भी सर्व-साधारण के उपकार हेतु दाम आध आना फी आठ पृष्ठ...
से अधिक नहीं रक्खा गया है।
प्रोप्रैटर, बेलवेडियर छापाख़...
मई सन् १६१५ ई०
॥ सूचना ॥
यह संग्रह प्राचीन संतों और महात्माओं की बानी का जिन में से बहुतों
के ग्रंथ भारतवर्ष में प्रचलित हैं हमारे वैकुंठवासी मित्र, संतवानी के रसिक,
[...]प विद्या के सूर्य्य महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी के आग्रह से
[विव]स हुए आरंभ किया गया था और थोड़े से महात्माओं की साखियाँ और
[पद] उनके जीवन समय में चुने जा चुके थे उन को दिखलाये गये जिन को
[देखक]र वह गद्गद होकर बोले "न भूतो न भविष्यति" । इस पर महंत गुरुप्रसाद
[जी] जो पास बैठे थे तर्क किया कि पंडित जी आप ने इस नमूने के विषय में जो
["न भू]तो" कहा वह तो ठीक है पर "न भविष्यति" कैसे कहा, क्या आगे इस से
[उत्तम] संग्रह संतवानी-का नहीं रचा जा सकता ? पंडित जी ने जवाब दिया कि
"इन संतों से बढ़कर महात्मा औतार धरैं या यही संत फिर देह धर कर
उत्तम बानी कथैं तो हो सकता है क्योंकि इन महात्माओं की बानी का
[सं]ग्रहकर्त्ता ने काढ़ कर धर दिया है ।
पंडित जी के चोला छोड़ने पर इस संग्रह के पूरा करने का उत्साह भी
[...] का ढीला हो गया परन्तु अब कि संतवानी पुस्तक-माला के जितने
[छाप]ने को थे छप चुके अपने मित्र की इच्छानुसार इस संग्रह के पूरा करने
[प]र ध्यान गया और यथा शक्ति ठीक करके वह अब छापा जाता है ।
इस ग्रंथ के दो भाग रक्खे गये हैं—पहिला साखी-संग्रह और दूसरा
[पद-सं]ग्रह । पहिले भाग में कुल ऐसे महात्मा जिनकी साखियाँ हम को मिलीं
[४३] हैं और उनका संक्षिप्त जीवन-चरित्र हर एक की बानी के सिरे पर
[दि]या गया है । ऐसे महात्मा जिन के केवल पद मिले उनका संक्षिप्त
[जीवन]-वृत्तान्त दूसरे भाग में इसी प्रकार से दिया गया है । सब मिला कर
[महात्म]ाओं की चुनी हुई बानी इस ग्रंथ के दोनों भागों में छपी हैं जिन में
२४ महात्मा वह हैं जिन के ग्रंथ संतवानी पुस्तक-माला में छप चुके हैं—
[उन] में ऐसी रोचक साखियाँ और पद बढ़ा दिये गये हैं जो पीछे से मिले ।
[इन के] सिवाय १० ऐसे महात्मा जिनकी बानी पहिले इस कारन से नहीं छपी कि
या तो वह बहुत जगह छप चुकी है या उसके थोड़े ही पद मिले उनकी चुनी हुई
बानी और शब्द भी इस संग्रह में छाप दिये गये ह चाहे वह एक ही पद हो ।
[उन म]हात्माओं के नाम दूसरे पृष्ठ पर दिये हैं:—
\ ' / संतबानी पुस्तक-माला वाले महात्मा
१ कबीर साहिब १३ दरिया साहिब (मारवाड़) २ रैदासजी १४ दूलनदासजी
३ धनी धर्मदासजी १५ बुल्ला साहिब ४ गुरु नानक १६ केशवदासजी
५ मीरा बाई १७ चरनदासजी ६ दादू दयाल १८ सहजो बाई
७ बाबा मलूक दास १९ दया बाई, ८ सुन्दरदासजी २० गरीबदासजी
९ धरनीदासजी २१ गुलाल साहिब १० जगजीवन साहिब २२ भीखा साहिब
११ यारी साहिब २३ पलटू साहिब १२ दरिया साहिब (बिहार) २४ तुलसी साहिब
[ गुरु नानक साहिब के पद और सुंदरदासजी व पलटू साहिब की पहिले नहीं छपी थीं अब मिली हैं ]
दूसरे महात्मा १ पीपाजी ६ नरसी मेहता
२ नामदेवजी ७ गुसाईं तुलसीदासजी ३ सदनाजी ८ नाभाजी
४ सूरदासजी ९ बुल्लेशाह । ५ स्वामी हरिदास १० काष्ठ जिह्वा स्वामी
बानियाँ महात्माओं की उनके जीवन समय के क्रम में रक्खी जिस से समय समय की परमार्थी उन्नति, विवेक, बिचार और
दशा दरस जाय । शब्दों की अक्षर-रचना और मात्रा प्रत्येक देश की बोली और
अनुसार रक्खी गई है जिस में मूल न बदलै, सब को भाषा के एक में नहीं ढाला गया है—जैसे पंजाबी भाषा में “कुछ” को “कुज”
को “बहु” कहते हैं; राजपूताना में “दाँव” को “डाँव”, “दोहा” को “सुना” को “सुण्या”, इत्यादि ।
अन्य भाषाओं के पदों और शब्दों के अर्थ, और संकेतों या क़िस्सा-तलब बातों की कथा या भेद फुट-नोट में थोड़े में जता दिये गये हैं ।
( २ )
---खियाँ जो संतबानी पुस्तक-माला के मूल पाठ था नई
सुधार दी गई हैं और छापे की त्रुटियाँ जो
न कर प्रेस के दबाव से मात्राओं के
पत्र में दिखला दी गई हैं।
हम अपने उन सहायकों को हृदय से धन्यवाद देते हैं जिन्होंने
पद या साखियाँ भेज कर या पदों और साखियों के क्रम से बिठालने और
छापे की त्रुटियों के शोधने में इस काम में सहायता की । संत
सिंह जी ने तरनतारन ज़िला अमृतसर से गुरु नानक साहिब और
ई की साखियाँ भेजीं, पंडित हरिनारायण जी पुरोहित बी० ए० (जयपुर
अकाउन्टन्ट-जेनरल) ने महात्मा सुन्दरदासजी की उत्तम साखियाँ, और
गावबक्ष सिंह (ज़मींदार मौज़ा टँडवा ज़िला फ़ैज़ाबाद) ने पलटू साहिब
नदासजी की बहुत सी साखियाँ और पद भेजे, और लाला गिरधारी
ईस धौलपुर) ने कबीर साहिब की साखियों की तर्तीब और नई
के भेजने में सहायता की। बाबा अचिन्त सरन साधू राधास्वामी मत
ाद) ने मूल पाठ के शोधने और संकेतों का भेद लिखने में असली और
द दी, और बाबू वैष्णवदास बी० ए० (अकौन्टन्ट जेनरल रियासत
और बाबू तेजसिंह बी० ए०, एल० एल० बी० (गत बख़्शी
ह साहिब सी० एस० आई० इन्दौरवाले के पोते) से पदों को क्रम से
रने और प्रूफ़ के शोधने में सहायता मिली। राव बहादुर लाला श्याम-
त्न बी० ए०, सी० आई० ई० (मुरार, ग्वालियर) जो इस परोपकार के
ीवन-चरित्र आदि का मसाला भेजने में मददगार रहे उनकी सहायता
कम नहीं रही । इन सब महाशयों को हम पुनःपुनः धन्यवाद देते हैं ॥
मिला कर २५४० चुनी हुई साखियाँ भाग १ में और ६०३ पद भाग २
। यदि कोई प्रेमी और रसिक जन इस सूचना के पृष्ठ २ वाले
की उत्तम और मनोहर साखियाँ या पद जो संतबानी पुस्तक-माला
थ में नहीं छपे हैं कृपा पूर्वक चुन कर भेज देंगे वह धन्यवाद सहित
में शामिल किये जायेंगे ।
- लिपियाँ संतबानी की जो सम्पादक ने अनुमान बीस बरस के
कट्ठा करके यथा शक्ति उन की त्रुटियों को ठीक किया था छप चुकीं
शिवाय पलटू साहिब की थोड़ी सी मनोहर साखियों और बहुत से उत्तम पदों
जो उन महात्मा की बानी छापने के पीछे हम को मिले । यह पुराने पदों के
ाथ तीन भागों में इस क्रम से रक्खे गये हैं कि पहिले भाग में केवल कुंडलियाँ;
( ४ )
दूसरे भाग में रेख़ते, झूलने, अरिल, छंद और कवित्त; और तीसरे भ
रागों के पद वा भजन और साखियाँ। अनेक त्रुटियाँ भी जो पुराने छापे में
गई थीं नई लिपि से मिलान करके सुधार दी गई हैं और नई टिप्पन्दि
फुट-नोट में रख दी गई ह ॥ १४ दूलनदासजी
७५ बुल्ला साहिब
इलाहाबाद, अधम,
मई सन् १६१५. } संतबानीपुस्तक-माला सम्पादक ।
लेणि
ग्राँ
f
सूचीपत्र
नाम शब्द संख्या पृष्ठ
१ कबीर साहिब . . . ६१ १—२८
२ पीपाजी . ... १ २८
३ नामदेवजी ... ... ८ २८—३२
४ रैदासजी ... ... ... ६ ३२—३५
५ सदनाजी ... ... . १ ३६
६ धनी धम्मदासजी ... ... ... २४ ३७—४५
७ गुरु नानक . ... ... २८ ४६—५४
८ सूरदासजी ... ... ... ३० ५५—६७
६ स्वामी हरिदास ... .. .. २ ६७—६८
१० मीरा बाई ... ... .. २२ ६८—७७
११ नरसी मेहताजी . ... ... २ ७८
१२ गुसाईं तुलसीदास जी ... ... २३ ७६—६०
१३ दादू दयाल ... ... .. ३० ६०—१०१
१४ बाबा मलूकदास . ... ... १० १०२—१०६
१५ नामाजी ... .. ... १ १०६
१६ सुंदरदासजी . ... . ५५ १०७—१२५
१७ धरनीदासजी ... ... ... ६ १२५—१२६
१८ जगजीवन साहिब ... .. .. ३६ १३०—१४४
१६ यारी साहिब ... ... ... १० १४५—१४७
२० दरिया साहिब (बिहार वाले) .. . ६ १४८—१५३
२१ दरिया साहिब (मारवाड़ वाले) . ... ६ १५३—१५७
२२ दूलनदासजी . ... ... ३५ १५७—१७०
२३ बुल्ला साहिब ... .. ... १७ १७०—१७५
२४ केशवदास जी ... ... ... ५ १७६—१७६
२५ चरनदासजी ... ... ... १५ १७६—१८६
२ सूचीपत्र
नाम शब्द संख्या पृष्ठ
२६ बुल्लेशाह . . ७ १८७—१९१
२७ सहजो बाई .. . . ८ १९१—१९४
२८ दया बाई .. ... १ १९४—१९५
२९ गरीबदासजी ... .. ११ १९५—२०१
३० गुलाल साहिब . . १५ २०१—२०७
३१ भीखा साहिब १७ २०७—२१६
३२ पलटू साहिब .. ५५ २१६—२३८
३३ तुलसी साहिब . . २५ २३८—२५२
३४ काष्ठजिह्वा स्वामी ६ २५२—२५४
फुटकर . ८ २५४—२५६
——————
६०३
कबीर साहिब
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ १ भाग १ संतवानी संग्रह ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
चल सतगुरु की हाट, ज्ञान बुधि लाइये ।
कीजे साहिब से हेत, परम पद पाइये ॥१॥
सतगुरु सब कछु दीन्ह, देत कछु ना रह्यो ।
हमहिँ अभागिनि नारि, सुख तजि दुख लह्यो ॥२॥
गई पिया के महल, पिया सँग ना रची ।
हृदै कपट रह्यो छाय, मान लज्जा भरी ॥३॥
जहवाँ गैल सिलहली, चढ़ौँ गिरि गिरि पड़ौँ ।
उठौँ सम्हारि सम्हारि, चरन आगे धरौँ ॥४॥
जो पिय मिलन की चाह, कौन तेरे लाज हो ।
अधर मिलो ना जाय, भला दिन आज हो ॥५॥
भला बना संजोग, प्रेम का चोलना ।
तन मन अरपै सीस, साहिब हँस बोलना ॥६॥
जो गुरु रूठे होयँ, तो तुरत मनाइये ।
हुइये दीन अधीन, चूक बकसाइये ॥७॥
जो गुरु होयँ दयाल, दया दिल हेरिहैं ।
कोटि करम कटि जायँ, पलक छिन फेरिहैं ॥८॥
कहै कबीर समुझाय, समुझ हिरदे धरो ।
जुगन जुगन करो राज, ऐसी दुर्मति परिहरो ॥९॥
२ शब्द संग्रह
(२)
तोहिँ मोरी लगन लगाये रे फकिरवा ॥ टेक ॥
सोवत ही मैं अपने मंदिर मैं, सबदन मारि जगाये रे (फ०) १
बूड़त ही भव के सागर मैं, वहियाँ पकरि समुझाये रे (फ०) २
एकै बचन बचन नहिं दूजा, तुम मो से बंद छुड़ाये रे (फ०) ३
कहै कबीर सुनो भइ साधो, सत्तनाम गुन गाये रे (फ०) ४
(३)
सतगुरु हैं रँगरेज, चुनर मेरी रँगि डारी ॥ टेक ॥
स्याही रंग छुड़ाइ के रे, दियो मजीठा रंग ।
धोये से छूटै नहीं रे, दिन दिन होत सुरंग ॥ १ ॥
भाव के कुंड नेह के जल मैं, प्रेम रंग दइ बोर ।
चसकी चास लगाइ के रे, खूब रँगी झकझोर ॥ २ ॥
सतगुरु ने चुनरी रँगी रे, सतगुरु चतुर सुजान ।
सब कछु उन पर वार दूँ रे, तन मन धन औ प्रान ॥ ३ ॥
कह कबीर रँगरेज गुरु रे, मुझ पर हुए दयाल ।
सीतल चुनरी ओढ़ि के रे, भइहैं मगन निहाल ॥ ४ ॥
॥ नाम ॥
(१)
अजर अमर इक नाम है, सुमिरन जो आवै ॥ टेक ॥
बिनहीं मुख के जप करो, नहिं जीभ डुलावो ।
उलटि सुरत ऊपर करो, नैनन दरसावो ॥ १ ॥
जाहु हंस पच्छिम दिसा, खिरकी खुलवावो ।
तिरबेनी के घाट पर, हंसा नहवावो ॥ २ ॥
कबीर साहिब ३
पानी पवन की गम नहीं, वोहि लोक मँझारा ।
ताही बिच इक रूप है, वोहि ध्यान लगावो ॥ ३॥
जिमीँ असमान उहाँ नहीं, वो अजर कहावै ।
कहै कबीर सोइ साध जन, वा लोक मँझावै ॥ ४॥
(२)
हंसा करो नाम नौकरी ॥ टेक ॥
नाम विदेही निसि दिन सुमिरै, नहिं भूलै छिन घरी ॥ १ ॥
नाम बिदेही जो जन पावै, कभुँ न सुरति बिसरी ॥ २ ॥
ऐसा सबद सतगुरु से पावै, आवा गवन हरी ॥ ३॥
कहै कबीर सुनो भइ साधो, पावै अमर नगरी ॥ ४॥
(३)
जो जन लेहिँ खसम का नाउँ, तिन के सद बलिहारी जाउँ॥१
जो गुरु के निर्मल गुन गावै, सो भाई मेरे मन भावै ॥२॥
जेहिँ घट नाम रह्यो भरपूर, तिन की पग पंकज हम धूर ॥३
जाति जुलाहा मति का धीर, सहज सहज गुन रमै कबीर॥४
॥ चेतावनी ॥
(१)
मन फूला फूला फिरै, जक्त मैं कैसा नाता रे ॥ टेक ॥
माता कहै यह पुत्र हमारा, बहिन कहै बिर¹ मेरा ।
भाई कहै यह भुजा हमारी, नारि कहै नर मेरा ॥ १ ॥
पेट पकरि के माता रोवै, बाँहि पकरि के भाई ।
लपटि झपटि के तिरिया रोवै, हंस अकेला जाई ॥ २ ॥
(१) बीर = भाई ।
४ शब्द संग्रह
जब लगि जोवै माता रोवै, बहिन रोवै दस मासा ।
तेरह दिन तक तिरिया रोवै, फेर करै घर बासा ॥३॥
चार गजी अरगजी मँगाया, चढ़ा काठ की घोड़ी ।
चारो कोने आग लगाया, फूँक दियो जस होरी ॥४॥
हाड़ जरै जस लाह कड़ी को, केस जरै जस घासा ।
सोना ऐसी काया जरि गइ, कोई न आयो पासा ॥५॥
घर की तिरिया ढूँढ़न लागी, ढूँढ़ि फिरी चहुँ देसा ।
कहै कबीर सुनो भइ साधो, छोड़ौ जग की आसा ॥६॥
(२)
सुगवा पिँजरवा छोरि करि भागा ॥ टेक ॥
इस पिँजरे में दस दरवाजा,
दसो दरवाजे किवरवा लागा ॥१॥
अँखियन सेती नीर बहन लाग्यो,
अब कस नाहिं तू बोलत अभागा ॥२॥
कहत कबीर सुनो भइ साधो,
उड़ि गे हंस टूटि गयो तागा ॥३॥
(३)
कौने ठगवा नगरिया लूटल हो ॥ टेक ॥
चंदन काठ कै बनल खटोलना, ता पर दुलहिन सूतल हो॥१॥
उठो री सखी मोरी माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूसल हो ॥२
आये जमराज पलँग चढ़ि बैठे, नैनन आँसू टूटल हो ॥३॥
चारि जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धूधू ऊठल हो॥४॥
कहत कबीर सुनो भइ साधो, जग से नाता छूटल हो ॥५॥
कबीर साहिब ५
(४)
बीती बहुत रहि थोरी सी ॥ टेक ॥
खाट पड़े नर झीँखन लागे, निकसि प्रान गयो चोरी सी॥१
भाई बंद कुटुँब सब आये, फूँक दियो मानो होरी सी ॥२
कहै कबीर सुनो भइ साधो, सिर पर देत हैं भौँरी सी ॥३॥
(५)
तौरी गठरी मैं लागे चोर, बटोहिया का रे सोवै ॥टेक॥
पाँच पचीस तीन हैं चुरवा, यह सब कीन्हा सोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥१॥
जागु सबेरा बाट अनेड़ा, फिर नहिँ लागे जोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥२॥
भवसागर इक नदी बहुतु है, बिन उतरे जाव बोर¹-
बटोहिया का रे सोवै ॥३॥
कहै कबीर सुनो भइ साधो, जागत कीजे भोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥४॥
(६)
करम गति टारे नाहिँ टरी ॥ टेक ॥
मुनि बसिस्ट से पंडित ज्ञानी, सोधि के लगन धरी ।
सीता हरन मरन दसरथ को, बन मैं बिपति परी²॥१॥
कहँ वह फंद कहाँ वह पारधि,³ कहँ वह मिरग चरी²।
सीता को हरि लेगयो रावन, सोने की लंक जरी² ॥२॥
(१) बूड़, डूब । (२) रामचन्द्र जी का बनवास, उनके पिता दसरथ का उनके
वियोग में प्रान तजना, मारीच को म्रिगा बना कर रावन का सीताजी को चुरा
ले जाना, और फिर रामचन्द्र का रावन को मारना और लंका को जलाना यह
कथा प्रायः सब लोग जानते हैं । (३) शिकारी ।
६ शब्द संग्रह
नीच हाथ हरिचन्द¹ बिकाने, बलि² पाताल धरी ।
कोटि गाय नित पुन्य करत नृग, गिरगिट जोनि परी³॥
पाँडव जिन के आपु सारथी, तिन पर विपति परी ।
दुरजोधन को गर्व घटायो, जदु कुल नास करी⁴ ॥४॥
राहु केतु औ भानु चन्द्रमा, बिधि संजोग परी ।
कहत कबीर सुनो भइ साधो, होनी हो के रही ॥५॥
(१) राजा हरिश्चन्द्र भारी दानी और सत्यवादी थे जिन्हों ने विश्वामित्र
को अपना सब राज पाट यज्ञ की दक्षिणा में दे दिया इस पर मुनिजी ने त० भार सोना दान-प्रतिष्ठा का अपना और निकाला। राजा हरिश्चन्द्र ने उसके
लिये काशी में जाकर अपने को एक डोमड़े के हाथ और अपनी स्त्री और पुत्र
को एक ब्राह्मण के हाथ बेच कर मुनि जी को संतुष्ट किया।
(२) राजा बलि बड़े प्रतापी और दानी थे जिन के द्वारे पर आप भगवान बौना
का भेष धर कर तीन परग पृथ्वी माँगने गये। जब राजा बलि ने संकल्प कर दिया
तब भगवान ने बैराट रूप धारन करके एक परग में स्वर्गादिक और एक में सारी
पृथ्वी नाप ली और कहा कि अब बाकी तीसरा परग देव। राजा ने अपना शरीर भेंट
किया जिसे तीसरे परग से नाप कर भगवान ने उन्हें अमर करके पाताल का
राज्य दिया।
(३) राजा नृग रोज़ एक लाख गऊ दान दिया करते थे। एक बार कोई गऊ
जो पहिले दिन दान हो चुकी थी नई गउवों में आ मिली और राजा ने उसे
अनजान में दूसरे ब्राह्मण को संकल्प कर दिया। इस पर पहिले और दूसरे दिन
के दान पानेवाले ब्राह्मणों में झगड़ा मचा और दोनों राजा के पास न्याय को
गये। दोनों वही गऊ लेने पर हठ करते थे इस लिये राजा की बुद्धि चकराई
और सोच में पड़ कर दोनों की दलोल पर सिर हिला देते। इस पर उन ब्राह्मणों
ने सराप दिया कि तुम गिरगिट की तरह सिर हिलाते हो वही बन जावगे।
इस लिये राजा नृग मरने पर गिरगिट की जोनी पाकर एक अंधे कुए में पड़े
हुए थे जब कृष्णावतार हुआ तब श्रीकृष्ण ने उनको तारा।
(४) पांडवों के रथ पर श्रीकृष्ण महाभारत की लड़ाई में आप सारथी बने और
दुरजोधन का घमंड तोड़ा और कौरवों के कुल का और (परम धाम सिधारने के
पहिले) अपने जदु कुल का नाश किया। पांडवों पर यह विपति पड़ी
थी कि अपना सब राज पाट अपनी स्त्री द्रोपदी सहित कौरवों के हाथ जुए में
हार गये और मुद्दत तक बनोबास में कष्ट उठाया।
प्रथम भाग: कबीर साहिब, धर्मदास एवं गुरु नानक देव जी की वाणी
कबीर साहित्य ७
(७)
और मुए का सोग करीजै, तौ कीजै जो आपन जीजै ॥१॥
मैं नहिँ मरौँ मरै संसारा, अब मोहिँ मिला जियावनहारा २
या देही परिमल महकंदा, ता सुख बिसरे परमानन्दा॥३
कुअटा१ एक पंच पनिहारी, टूटी लेजुरि२ भरैँ मतिहारी३॥४
कह कबीर इक बुद्धि विचारी, नावह कुअटाना पनिहारी ॥५
(८)
टुक जिंदगी बँदगी कर लेना, क्या माया मद मस्ताना॥टेक
रथ घोड़े सुखपाल पालकी, हाथी औ वाहन नाना ।
तेरा ठाठ काठ की टाटी, यह चढ़ चलना समसाना४ ॥१
रूम पाट५ पाटम्बर अम्बर, जरी बफ़्त का बाना।
तेरे काज गजी गज चारिक६, भरा रहै तोसाखाना ॥२॥
खर्चे की तदबीर करो तुम, मंजिल लंबी जाना ।
पहिचन्ते का गाँव न मग में, चौकी न हाट दुकाना ॥३॥
जीते जी ले जीति जनम को, यही गोय यहि मैदाना ।
कहै कबीर सुनो भइ साधो, नहिँ कलि तरन जतन आना॥४
(६)
कायाँ बौरी चलत प्रान काहे रोई ॥ टेक ॥
काया पाय बहुत सुख कीन्हा, नित उठि मलि मलि धोई ।
सो तन छिया छार ह्वै जैहै, नाम न लैहै कोई ॥ १ ॥
कहत प्रान सुनु काया बौरी, मोर तोर संग न होई ।
तोहि अस मित्र बहुत हम त्यागा, संग न लीन्हा कोई ॥२॥
(१) छोटा कुआँ । (२) रस्सी । (३) मतिहीन, अज्ञान । (४) समसान = मुरदा
जलाने का घाट । (५) ऊनी कपड़ा । (६) चार एक ।
८ - शब्द संग्रह
ऊसर खेत कै कुसा मँगाये, चाँचुर चवर१ कै पानी ।
जीवत ब्रह्म को कोई न पूजै, मुरदा कै मिहमानी ॥३॥
सिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, सेस सहस मुख होई ।
जो जो जन्म लियो बसुधा२ में, थिर न रह्यो है कोई॥४
पाप पुन्य हैं जन्म संघाती, समुझि देख नर लोई ।
कहत कबीर अभि अंतर की गति, जानत बिरला कोई ॥५॥
(१०)
उपजै निपजै निपजि समाई, नैनन देखि चल्योजगजा। १
लाज न मरो कहो घर मेरा, अंत की बार नहीं कछु तेरा ॥२
अनेक जतन करि काया पालो, मरती बेर अगिन सँग जाली३
चोवा चंदन मरदन अंगा, सो तन जरै काठ के संगा ॥४॥
कहत कबीर सुनो रे गुनिया, बिनसै रूप देखैगी दुनियाँ ॥५॥
(११)
यही घड़ी यह बेला साधो ॥ टेक ॥
लाख खरच फिर हाथ न आवै, मानुष जनम सुहेला ॥१॥
ना कोइ संगी ना कोइ साथी, जाता हंस अकेला ॥२॥
क्यों सोया उठि जागु सबेरे, काल मारँदा सेला३ ॥३॥
कहत कबीर गुरू गुन गावो, झूठा है सब मेला ॥४॥
(१)
हटरी छोड़ि चल' बनिजारा ॥ टेक ॥
इस हटरी बिच मानिक मोती, कोइ बिरला परखनहारा ॥१
इस हटरी के नौ दरवाजे, दसवाँ ठाकुरद्वारा ॥ २ ॥
निकसि गइ थंभी ढहि परा मन्दिर, रलि गया चिक्कड़ गारा ३
कहत कबीर सुनो भइ साधो, झूठा जगत पसारा ॥ ४ ॥
(१) परती ज़मीन की छिछुली तलैया । (२) पृथ्वी । (३) तलवार ।
कबीर साहिब ६
(१३)
होली
आई गवनवाँ की सारी, उमिरि अबहीँ मोरी वारी ॥टेक॥
साज समाज पिया लै आये, और कहरिया चारी ।
वम्हना बेदरदी अचरा पकरि कै, जोरत गँठिया हमारी ।
सखी सब पारत गारी ॥ १ ॥
विधि¹ गति वाम कछु समझ परत ना, वैरी भई महतारी ।
रोय रोय अँखियाँ मोर पोंछत, घरवाँ से देत निकारी ।
भई सब का हम भारी ॥ २ ॥
गवन कराय पिया लै चाले, इत उत बाट निहारी ।
छूटत गाँव नगर से नाता, छूटै महल अटारी ।
करम गति टरै न टारी ॥ ३ ॥
नदिया किनारे बलम मोर रसिया, दीन्ह घुँघट पट टारी ।
थरथराय तन काँपन लागे, काहू न देख हमारी ।
पिया लै आये गोहारी ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, यह पद लेहु विचारी ।
अब के गौना बहुरि नहिँ औना, करिले भेंट अँकवारी ।
एक बेर मिलि ले प्यारी ॥ ५ ॥
॥ लय ॥
जो कोइ या बिधि मन को लगावै, मन के लगाये प्रभु पावै१
जैसे नटवा चढ़त बाँस पर, ढोलिया ढोल बजावै ।
अपना बोझ धरै सिर ऊपर, सुरति बरत² पर लावै ॥२॥
जैसे भुवंगम³ चरत बनहिँ मैं, ओस चाटने आवै ।
कभी चाटै कभी मनि तन चितवै, मनि तजि प्रान गँवावै॥३
(१) ब्रह्मा । (२) डोरी । (३) साँप ।
१० शब्द संग्रह
जैसे कामिनि भरे कूप जल, कर छोड़े बतरावै¹।
अपना रँग सखियन सँग राचै, सुरति गगर पर लावै ॥४॥
जैसे, सती चढ़ी सर² ऊपर, अपनी काया जरावै।
मातु पिता सब कुटुंब तियागै, सुरति पिया पर लावै ॥५॥
धूप दीप नैबेद अरगजा, ज्ञान की आरत लावै।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, फेर जनम नहिँ पावै ॥६॥
॥ विरह ॥
(१)
बालम आओ हमारे गेह रे, तुम बिन दुखिया देह रे॥टे० ।
सब कोइ कहै तुम्हारी नारी, मो को यह संदेह रे।
एकमेक ह्वै सेज न सोवै, तब लगि कैसा सनेह रे ॥ १ ॥
अन्न न भावै नींद न आवै, गृह बन धरै न धीर रे।
ज्यौँ कामी को कामिनि प्यारी, ज्यौँ प्यासे को नीर रे ॥२
है कोइ ऐसा परउपकारी, पिय से कहै सुनाय रे।
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे ॥३
(२)
प्रीति लगी तुम नाम की, पल बिसरै नाहीं।
नजर करो अब मिहर की, मोहिँ मिलौ गुसाईँ ॥ १॥
बिरह सतावै मोहिँ को, जिव तड़पै मेरा।
तुम देखन की चाव है, प्रभु मिलौ सबेरा ॥ २ ॥
नैना तरसै दरस को, पल पलक न लागै।
दर्दवंद दीदार का, निसि बासर जागै ॥ ३ ॥
जो अब के प्रीतम मिलैँ, करूँ निमिख³ न न्यारा।
अब कबीर गुरु पाइया, मिला प्रान पियारा ॥ ४ ॥
(१) बात करती है। (२) आग, चिता। (३) छिन भर।
कबीर साहिब ११
(३)
मिलना कठिन है, कैसे मिलौंगी पिय जाय ॥टेक॥
समझि सोचि पग धरौं जतन से, बार बार डिग जाय ।
ऊँची गैल राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय ॥१॥
लोक लाज कुल की मरजादा, देखत मन सकुचाय ।
नैहर वास बसौं पीहर मैं, लाज तजी नहिं जाय ॥२॥
अधर भूमि जहँ महल पिया का, हम पै चढ़ो न जाय ।
धन भइ बारी पुरुप भये भोला, सुरत झकोला खाय ॥३॥
दूतो सतगुरु मिले बीच मैं, दीन्हो भेद बताय ।
दास कबीर पिया से भेंटे, सीतल कंठ लगाय ॥४॥
(४)
कौन मिलावै मोहिँ जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय ॥टेक॥
हौँ१ हिरनी पिय पारधी२ हो, मारे सबद के बान ।
जाहि लगो सो जानही हो, और दरद नहिँ जान ॥१॥
मैं प्यासी हौँ पीव की हो, रटत सदा पिव पीव ।
पिया मिले तो जीव है, ना तो सहजै त्यागौँ जीव ॥२॥
पिय कारन पियरी भई हो, लोग कहै तन रोग ।
छः छः लंघन मैं करौं रे, पिया मिलन के जोग ॥३॥
कह कबीर सुन जोगिनी हो, तन मैं मनहिँ मिलाय ।
तुम्हरी प्रीति के कारने हो, बहुरि मिलैंगे आय ॥४॥
(५)
होली
ये अँखियाँ अलसानी हो, पिय सेज चलो ॥ टेक ॥
खंभ पकरि पतंग अस डोलै, बोलै मधुरी बानी ॥१॥
फूलन सेज बिछाय जो राख्यो, पिया बिना कुम्हिलानी ॥२॥
(१) मैं । (२) शिकारी ।