सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
प्रारंभिक ऐतिहासिक शोध: हिन्दी निर्गुण काव्य का प्रारम्भ व नामदेव
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हिन्दी निर्गुण-काव्य का प्रारम्भ और नामदेव की हिन्दी कविता
पुणे विद्यापीठ की पी एच्० डी० उपाधि के लिए स्वीकृत शोध-प्रबन्ध
हिन्दी निर्गुण-काव्य का प्रारम्भ
और
नामदेव की हिन्दी कविता
डॉ० शं० के० आडकर
रचना प्रकाशन
४५-ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद-१
प्रथम संस्करण १९७२
•
प्रकाशक
जीत मल्होत्रा
रचना प्रकाशन
४५-ए, खुल्दाबाद
इलाहाबाद-१
मूल्य : पचीस रुपये
•
मुद्रक
इलाहाबाद प्रेस
३७०, रानी मण्डी
इलाहाबाद-३
अपनी बात
हिन्दी संत साहित्य की महत्ता और उसकी व्यापकता इसी से प्रमाणित है कि
उसका अध्ययन और मनन झोपड़ियो से लेकर उच्च विद्या संस्थानों तक हो रहा है। यह
एक प्रकार का लोक-काव्य है जो सहज जीवन से उद्भूत हुआ है। शास्त्रीय परंपरा
और रूढ़ि के विरोध में इसका उद्भव हुआ और अपनी तेजस्विता और प्रखरता के कारण
उसका विकास होता रहा है। संत काव्य उस समाज का प्रतिबिंब है जो शास्त्रीयता
और रूढि के खिलाफ निरंतर संघर्ष करता रहा है। एक विशिष्ट वर्ग से सम्बद्ध होने के
कारण इस काव्य धारा का अध्ययन बहुत सीमित रहा किन्तु, पिछले कुछ दिनों से
विद्वानों का ध्यान इधर गया है। और अनेक दृष्टियों से इसका अध्ययन हो रहा है।
निर्गुण काव्य का प्रारंभ संत कबीर से माना जाता है। यद्यपि लगभग सभी
विद्वानों ने इस बात की ओर संकेत किया है कि कबीर से सौ वर्ष पूर्व नामदेव हुए थे
जिनकी रचनाओ में निर्गुण काव्य धारा के बीज वर्तमान है। फिर भी इन विद्वानों ने
नामदेव को इस धारा का प्रवर्तक नही माना। इसका प्रमुख कारण यह है कि नामदेव
की रचना मुख्यतः मराठी में है जिसका हिंदी निर्गुण धारा से कोई संबंध नही । 'गुरु
ग्रन्थ साहब' मे संग्रहीत केवल ६१ पद ही नामदेव के मिलते थे जिनके आधार पर
विद्वानो ने ऊपर का संकेत दिया है। किन्तु कुछ वर्ष पहले पूना विश्वविद्यालय ने नाम-
देव की हिंदी रचनाओ को प्रकाशित करके विद्वानो के संकोच को दूर कर दिया है और
अब प्रमाण के साथ यह कहा जा सकता है कि नामदेव की हिंदी रचनाओं में निर्गुण
काव्य धारा की सभी प्रवृत्तियाँ वर्तमान है।
प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में यह विवेचित किया गया है कि नामदेव की हिंदी रच-
नाओं में निर्गुण काव्य धारा की कौन-कौन-सी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं और किस प्रकार
वे संपूर्ण संत साहित्य को प्रभावित करती हैं। इस शोध प्रबंध का शीर्षक 'हिंदी निर्गुण
काव्य का प्रारंभ और नामदेव की हिंदी कविता' है जिसकी अपनी सीमा है। इस
शीर्षक के अन्तर्गत केवल यही बताया गया है कि हिंदी निर्गुण काव्य का प्रारंभ नामदेव
की हिंदी रचनाओ से होता है, यद्यपि यह निर्गुण भावना अध्यात्म और साहित्य के क्षेत्र
मे शताब्दियो पूर्व चली आ रही थी। लेकिन हिंदी में इसका प्रादुर्भाव नामदेव से ही होता
है। इस बात को दृढ़ता के साथ कहने के लिये ही इस शोध प्रबन्ध का प्रणयन हुआ है।
जब से हिंदी निर्गुण काव्य धारा का अध्ययन और अध्यापन प्रारंभ हुआ है
लगभग तभी से उस धारा के प्रवर्तक संत कबीर माने गये हैं। कबीर के साथ उस
का ऐसा अविच्छिन्न संबंध स्थापित हो गया है कि नामदेव को इस धारा का प्रवर्तक
कहने में सभी को संकोच होता रहा है। अतः इस बात की आवश्यकता थी कि प्रमाणो
सहित यह सिद्ध किया जाय कि कबीर से पूर्व होने वाले नामदेव इस धारा के प्रवर्तक
और प्रारम्भकर्त्ता हैं। एक ऐतिहासिक तथ्य को, जो सामग्री के अभाव में दब गया
था, उद्घाटित करने के लिए इस प्रबन्ध की आवश्यकता पड़ी।
मराठी साहित्य मे नामदेव की चर्चा बड़ी श्रद्धा के साथ की जाती है। उनके
हिंदुस्तानी पदों का भी उल्लेख किया जाता है किन्तु उन पदो का कथ्य और विषय-
सामग्री क्या है इसकी चर्चा बिलकुल ही नही की गई है। मराठी में किसी ने भी इसका
अध्ययन नही किया कि उनकी हिंदी रचनाओ का भाव क्या है और वे मराठी रच-
नाओ के भाव से कहाँ तक मेल खाती है। यही कारण है कि मराठी के विद्वानो ने
हिंदी पदो के रचयिता नामदेव को कभी ठीक से नही समझा। हिन्दी में सर्वप्रथम
प्रयत्न आचार्य विनय मोहन शर्मा का है जिससे नामदेव की हिंदी रचनाओ के अध्ययन
के लिए द्वार खुले हैं।
आचार्य विनय मोहन शर्मा जी ने अपने ग्रन्थ हिंदी को मराठी संतो की देन में
अन्य मराठी संतो की हिंदी रचनाओ के साथ नामदेव की भी चर्चा की और यह आग्रह
किया कि नामदेव को हिंदी निर्गुण काव्य धारा का प्रारम्भकर्त्ता मानना चाहिये।
वस्तुतः आचार्य शर्मा जी के इस आग्रह से ही नामदेव की हिंदी रचनाओ का अध्ययन
करने के लिये मुझे प्रेरणा मिली। किन्तु उनकी हिंदी रचनाओ के अभाव में यह कार्य
संभव नही हो पाया। पुणे विद्यापीठ के हिंदी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ० भगीरथ
मिश्र तथा डॉ० राजनारायण मौर्य ने बहुत परिश्रम करके संत नामदेव की हिंदी पदा-
वली का प्रकाशन किया। इस पदावली के उपलब्ध होने पर यह कार्य सरल हो गया।
इस पदावली के संपादको ने भी यह कहा है कि संत नामदेव निर्गुण काव्य धारा
के प्रवर्तक हैं किन्तु उन्होने इस धारा की परम्परा और नामदेव की रचनाओ से उदा-
हरण नही दिये। वस्तुतः उक्त पदावली में यह अपेक्षित भी नही है। वास्तविक रूप
से देखा जाय तो आचार्य विनय मोहन शर्मा और डॉ० भगीरथ मिश्र ही नामदेव
सम्बन्धी इस अध्ययन के प्रेरणा-स्रोत हैं। पुणे विद्यापीठ द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव
की हिंदी पदावली' में पहली बार संत नामदेव के समस्त हिंदी पद संग्रहीत हुए हैं और
इस पदावली के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि हिंदी निर्गुण काव्य के प्रारम्भ-
कर्त्ता नामदेव ही हैं। प्रस्तुत प्रबंध में बड़ी स्पष्टता और प्रामाणिकता के साथ इस तथ्य
को उद्घाटित किया गया है।
यह शोध प्रबन्ध कुल सात अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में हिंदी निर्गुण
काव्य धारा की पृष्ठभूमि बतलाई गई है जिसमे ब्रह्म के अस्तित्व, विकास तथा उसके
निर्गुण सगुण रूप का विवेचन किया गया है। किस प्रकार उत्तरी भारत में निर्गुण
रूप को प्रधानता मिल गई ओर संतों ने किस प्रकार निर्गुण भक्ति को अभिव्यक्ति की
प्रधानता दी इसका उल्लेख आगे किया गया है। इस तरह हिंदी के निर्गुण काव्य का
प्रारंभ सूचित किया गया है।
दूसरे अध्याय में संत नामदेव की जीवनी, उनका व्यक्तित्व और उनकी रचनाओं
के संबंध में लिखा गया है। अंत साक्ष्य तथा बहि साक्ष्य दोनों के आधार पर उपलब्ध
उनकी जीवनी प्रस्तुत की गई है। इस संबंध में अभी तक कोई निर्णयात्मक बात नहीं
कही गई थी। प्रस्तुत अध्याय में समस्त उपलब्ध तथ्यों का विश्लेषण कर उनकी जीवनी
और रचनाओं के संबंध में निर्णायक बात कही गई है।
तीसरे अध्याय में हिंदी निर्गुण काव्य धारा की प्रमुख प्रवृत्तियों का परिचय
दिया गया है। और इस बात का विवेचन प्रस्तुत किया गया है कि नामदेव की रचनाओं
में उनका प्रतिफलन किस प्रकार हुआ है। निर्गुण काव्य आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
है जिसे अद्वैतवाद, सूफी मत, नाथ पंथ, वैष्णव धर्म आदि ने मिलकर एक विशिष्ट स्वरूप
प्रदान किया है। तत्पश्चात् निर्गुण काव्य की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया गया है।
चौथे अध्याय में नामदेव की दार्शनिक विचार धारा प्रस्तुत की गई है। भार-
तीय दर्शन की मूल जिज्ञासा ने नामदेव को किस प्रकार प्रभावित किया और कैसे उन्होंने
सगुण निर्गुण को क्रम से अपनाया इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ब्रह्म,
जीव, माया तथा संसार के संबंध में नामदेव के क्या विचार हैं यह उनकी रचनाओं के
आधार पर स्पष्ट किया गया है।
पाँचवें अध्याय में नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन किया गया
है। काव्य का प्रयोजन बतलाते हुए संतों का काव्यादर्श और उनकी काव्य निर्मिति का
प्रयोजन बतलाया गया है। इसके पश्चात् इन रचनाओं के भाव पक्ष और कला पक्ष
पर विचार किया गया है। नामदेव की भाषा पर अधिक जोर दिया गया है क्योंकि यह
१४ वीं शताब्दी की भाषा है, जिसका भाषा के ऐतिहासिक विकास में महत्त्वपूर्ण
स्थान है।
छठवें अध्याय में पूर्वोक्त सभी प्रमाणों का आधार लेकर यह सिद्ध किया गया
है कि नामदेव हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तक हैं। कबीर को प्रवर्तक क्यों माना गया,
इसका कारण और इतिहास भी दिया गया है। किन्तु सभी दृष्टियों से विश्लेषण करने
के पश्चात् यही निष्कर्ष निकलता है नामदेव से ही हिंदी निर्गुण काव्य का प्रारंभ माना
जाना चाहिये ।
सातवें अध्याय में इसका विवेचन किया गया है कि नामदेव का तत्कालीन और
परवर्ती साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है। नामदेव के समकालीन संतों और
कवियों की उक्तियों में उनकी महत्ता को स्पष्ट करते हुए उत्तरकालीन संतों के उल्लेख
का भी विवेचन किया गया है। नामदेव के बाद की हिंदी निर्गुण काव्य धारा पर
उनका स्पष्ट प्रभाव है इसमें कोई संदेह नहीं ।
अंत में उपसंहार के अन्तर्गत संपूर्ण शोध प्रबंध का निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया
है। हिंदी निर्गुण काव्य धारा का प्रारंभ नामदेव से ही होता है यही इस अध्ययन
का निष्कर्ष है।
प्रस्तुत शोध प्रबंध हिंदी निर्गुण काव्य की पूरी परंपरा का अध्ययन और
विश्लेषण करने के बाद लिखा गया है। इसके लिये हिंदी, मराठी, अंग्रेजी आदि
अनेक स्रोतों से सामग्री एकत्र की गयी है। इस प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ ये हैं—
(१) इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि भारत में निर्गुण काव्य की परंपरा
शताब्दियों पहले विद्यमान थी। लेकिन हिन्दी में यह १३वीं शताब्दी में अवतरित हुई ।
(२) संत नामदेव की जीवनी, व्यक्तित्व और रचनाओं के संबंध में प्रामाणिक
तथ्य दिये गये हैं और उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले गये हैं।
(३) नामदेव की रचनाओं में प्राप्त निर्गुण काव्य की विभिन्न प्रवृत्तियों का
निर्देश और कबीर में उनके प्रतिफलन का विवेचन है।
(४) साहित्यिक दृष्टि से नामदेव की हिन्दी रचनाओं का पहली बार मूल्यांकन
किया गया है।
(५) हिंदी निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्तक के रूप में संत नामदेव को मान्यता
प्रदान की गई है।
इस शोध प्रबंध में व्यक्त मेरे विचार और मेरी मान्यताएँ सर्वथा मौलिक हैं,
जिनसे संत साहित्य के अध्ययन के अनेक नये द्वार खुलने की संभावना है। इस अध्य-
यन से हिंदी निर्गुण साहित्य की परंपरा लगभग डेढ़ सौ वर्ष पीछे जाती है। मेरा
अनुमान है कि इस परंपरा को और भी पीछे जाना चाहिये क्योंकि नामदेव एकाएक
ही बिना परंपरा के उदित नहीं हुए। अवश्य ही उनके साथ कोई परंपरा थी जिसकी
खोज करनी अभी बाकी है। यह शोध प्रबंध संत साहित्य के अध्ययन में एक बहुत ही
महत्वपूर्ण कड़ी है और मेरा विश्वास है कि इसके द्वारा हिन्दी निर्गुण साहित्य के अध्य-
यन के लिये और अधिक प्रेरणा मिलेगी।
आदरणीय डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित, प्रोफेसर तथा अध्यक्ष हिन्दी विभाग
पूना विश्वविद्यालय, ने प्रस्तुत विषय पर शोधकार्य करने की प्रेरणा और प्रोत्साहन
दिया जिसके लिये मैं उनका चिर ऋणी रहूँगा।
आदरणीय डॉ० राजनारायण मौर्य प्राध्यापक हिन्दी विभाग, पूना विश्व-
विद्यालय के सत्परामर्श द्वारा मेरे इस प्रबंध के विषय का सूत्रपात हुआ। इस प्रबंध को
दिशा निर्देशित करने में और विषय सामग्री की खोज इत्यादि के संबंध में उनसे जो
सक्रिय निर्देशन प्राप्त हुआ, उसके लिए मै उनका अनुग्रह स्वीकार करता हूँ। उनके
सुयोग्य मार्गदर्शन के बिना इस विषय पर कार्य करना लगभग असंभव था। उन्होंने
निरन्तर विषय को गहराई से समझने की प्रेरणा दी है। अपनी स्वभावगत सरलता
एवं शालीनता द्वारा प्रस्तुत प्रबंध के रचनाकाल में उन्होंने जो सहायता प्रदान की है
उसके प्रति आभार मात्र व्यक्त करके मैं उनसे उऋण नही हो सकता। सच तो यह है
कि मैं उनसे उऋण होना भी नही चाहता।
इस प्रबंध के लिखने में मैंने जिन ग्रंथो का उपयोग किया है उनकी प्रायः
समस्त सूची प्रबंध के अंत में दे दी गयी है। वस्तुतः पूर्व के लिखे ग्रंथ प्रत्येक भावी
लेखक के लिये पथ-प्रदर्शन का कार्य करते है। मैने जिन विद्वानो के ग्रंथो एवं विचारो
से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष में लाभ उठाया है उनके प्रति श्रद्धावनत होकर मैं अपना हार्दिक
आभार प्रकट करता हूँ।
इनके अतिरिक्त स्मृतिपटल पर अंकित न होने वाली जिन अन्य प्रत्यक्ष एवं
परोक्ष प्रेरणाओ ने मेरा उत्साह-वर्धन किया उन सबके प्रति भी मैं अपना हार्दिक आभार
व्यक्त करता हूँ।
अन्त में एक निवेदन और। हिन्दी साहित्य में संत नामदेव की हिन्दी रचनाओ
की चर्चा बहुत कम हुई है। प्रस्तुत प्रबंध मेरे विचार से एक नवीन दिशा की ओर
प्रथम प्रयास मात्र है। इसका क्षेत्र इतना अधिक विस्तृत है कि अन्य प्रतिभा-संपन्न
व्यक्ति इस संबंध में अधिकाधिक उपयोगी सामग्री प्रस्तुत कर सकते है। आशा है कि
इस प्रयास से इस दिशा में नवीन अनुसन्धान को बल मिलेगा। इस दृष्टि और संभावना
के साथ यह विनम्र प्रयास आपके समक्ष प्रस्तुत है। इस प्रबंध द्वारा यदि बुध जनो का
कुछ भी अनुरंजन हो सका तो इसे मैं उनकी सहज उदारता एवं अपना परम सौभाग्य
समझूंगा। रचना प्रकाशन के स्वत्वाधिकारी श्री जीत मल्होत्रा के अथक परिश्रम
और सूझ-बूझ से यह ग्रंथ पाठकों के समक्ष आ रहा है। मैं उनके प्रति अपनी
कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
दिल्ली दरवाजा
अहमद नगर रा० दे० लाडकर
(महाराष्ट्र)
अनुक्रमणिका
प्रस्तावना
प्रथम अध्याय
हिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि १७-५१
ब्रह्म का अस्तित्व, ब्रह्म का स्वरूप, निर्गुण और सगुण, दोनों की
एकता, निर्गुण शब्द और उसके अर्थ का ऐतिहासिक विकास, निर्गुण
काव्य, सगुण से पार्थक्य, निर्गुण काव्यधारा का ऐतिहासिक परि-
प्रेक्ष्य, सिद्ध सम्प्रदाय, नाथ पंथ, ज्ञानदेव की परम्परा, निर्गुण
उपासना का विकास, हिंदो काव्य तथा नाथ सम्प्रदाय, निर्गुण
काव्यधारा पर मत्स्येन्द्रनाथी धारा का प्रभाव, निर्गुण काव्य-धारा
पर गोरखनाथी धारा का प्रभाव।
द्वितीय अध्याय
संत नामदेव की जीवनी, व्यक्तित्व और रचनाएँ ५३-१०२
चरित्र विषयक सामग्री, कई नामदेव, हिन्दी में रचना करने वाले
नामदेव, ज्ञानेश्वर कालीन महाराष्ट्रीय सन्त नामदेव हैं अथवा कोई
अन्य, जन्म काल, नामदेव का अयोनि-सम्भव होना, नामदेव चरित्र
के प्राचीन स्रोत-गाथा, ज्ञानेश्वर और नामदेव का समकालीनत्व,
डॉ० रा० गो० भाडारकर का मत, डॉ० मोहनसिंह का मत,
मेकालिफ का मत, जनम साखी, महाराष्ट्रीय विद्वानों के मत, हिन्दी
के विद्वानों के मत, निष्कर्ष। जन्म स्थान, हिन्दी तथा मराठी के
विद्वानों के मत, माता, पिता एवं परिवार, जाति तथा व्यवसाय,
क्या बाल भक्त 'नामदेव डाकू थे ?'—गुरु नामदेव की यात्राएं,
नामदेव की समाधि, नामदेव का व्यक्तित्व । रचनाएं —मराठी
गाथा की प्रतियाँ, मराठी अभंगों का वर्गीकरण, हिन्दी रचनाएं,
हिन्दी की रचनाओं का विषयानुसार विभाजन ।
तृतीय अध्याय
नामदेव की हिंदी रचना में निर्गुण काव्य धारा की प्रवृत्तियां १०३-१५०
(१) निर्गुण सन्त काव्य-आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
(२) निर्गुण सम्प्रदाय के रूप निर्धारण में प्रेरक तत्त्व, अद्वैतवाद,
इस्लाम या सूफ़ी मत, सिद्ध सम्प्रदाय, नाथ पथ, वैष्णव धर्म ।
(३) निर्गुण काव्य की प्रवृत्तियां और नामदेव का हिंदी काव्य,
निर्गुण भावना, गुरु महिमा, मूर्ति पूजा तथा बाह्याडम्बर का
खण्डन, एकेश्वरवाद का प्रतिपादन, कथनी तथा करनी में
एकरूपता, भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता, सत्संग की
प्रधानता, सहज अवस्था, हठयोग, उलटबासियां ।
चतुर्थ अध्याय
नामदेव की दार्शनिक विचार-धारा १५१-१६४
भारतीय दर्शन, आत्मा की श्रेष्ठता, आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न
दार्शनिक सिद्धांत, विदेशी दार्शनिक सिद्धांतों का प्रभाव, सन्त कवियों
पर अन्य विचार-धाराओं का प्रभाव, वैष्णव मत का प्रमुख उपादान,
भक्ति तत्त्व, भगवान का लोक रक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप । महा-
राष्ट्रीय वारकरी सम्प्रदाय, वारकरी सम्प्रदाय का उदय, वारकरी
मत के सिद्धांत —
( १ ) विट्ठल ( २ ) भक्ति तथा अद्वैत ज्ञान ( ३ ) भगवत् रूप ।
वारकरी पंथ के सिद्धांत की विशेषता, नामदेव की रचनाओं में
प्राप्त उनके दार्शनिक विचार—(१) ब्रह्म, ब्रह्म परम्परा, नामदेव
का ब्रह्म वर्णन—(२) जीवात्मा ( आत्म दर्शन )—आत्म परम्परा,
जीव सम्बन्धी नामदेव के विचार (३) जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध
(४) जीव की एकता और अद्वैता । माया, माया की परम्परा,
नामदेव का माया वर्णन । जगत, जड जगत् का भौतिक स्वरूप ।
नामदेव का ऐहिक तत्त्व विचार, नामदेव का लौकिक जीवन
विषयक दृष्टिकोण, अभेद भक्ति, अद्वैत परक भक्ति कल्पना, निर्गुण-
सगुण की एकता, ज्ञानोत्तर भक्ति, सर्वं खलु इदं ब्रह्म, वात्सल्य
भक्ति, भक्ति और साधना सम्बन्धी व्यावहारिक विचार।
पंचम अध्याय
नामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन १६५-२४२
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के काव्य के प्रयोजन, सन्तों का
काव्यादर्श, काव्य के मूल्यांकन के दो प्रकार, नामदेव की कविता
का सामाजिक पक्ष, काव्य निर्मिति के प्रमुख कारण-(१) प्रतिभा,
(२) व्युत्पन्नता, (३) परिश्रम, (४) भावात्मकता। नामदेव की
कविता का भाव पक्ष, आत्मनिवेदनपरक काव्य, सन्त काव्य और
भक्ति, सन्त नामदेव की अभंग रचना, आर्तताः नामदेव के काव्य
का प्रेरणा स्रोत, साक्षात्कार की अनुभूति, नामदेव की कविता मे
रस : वात्सल्य, शान और करुणा। नामदेव की कविता का कला
पक्ष, गीति काव्य, नामदेव का अलंकार विधान, बिम्ब विधान,
नामदेव की छन्दो रचना, शैली। नामदेव का असाधारण कर्तृत्व,
नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की कुछ विशेषताएं, वाक्य
रचना, शब्द क्रम, बल (Emphasis) - नामदेव की हिन्दी के कुछ
विशिष्ट प्रयोग, विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग, संयुक्त
क्रियाओ का प्रयोग, नामदेव की हिन्दी पर अन्य भाषाओं का
प्रभाव, रूप रचना, सर्वनामो का प्रयोग, परसर्गों का प्रयोग,
ध्वनि।
षष्ठ अध्याय
नामदेव : हिन्दी काव्य धारा के प्रारम्भ कर्त्ता २४३-२८६
हिन्दी निर्गुण काव्य सम्बन्धी लेखन का परिचय, निर्गुण साहित्य
सम्बन्धी आलोचनात्मक ग्रन्थ, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ मे प्रकाशित
निर्गुण मत सम्बन्धी आलोचनात्मक लेख, सन्त मत के प्रारम्भ
कर्त्ता के रूप में नामदेव के प्रति संकेत, नामदेव के निर्गुण धारा
के प्रारम्भ कर्त्ता न माने जाने के कारण, नामदेव की रचनाओ
का हिन्दी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना, कबीर का प्रखर
व्यक्तित्व और उनके विचारो का प्रभाव, कबीर को क्रान्तिकारी
बनाने वाली परिस्थितियां, नामदेव और कबीर की रचनाओ की
तुलना, कर्म और वैराग्य का समन्वय, भेदभाव विहीनता, ब्रह्म की
निर्गुणता, अनन्य प्रेम भावना, सर्वात्मवाद और अद्वैत भावना,
निर्गुण भक्ति, नाम साधना, सेव्य सेवक भाव । सन्त नामदेव का
निर्गुण भक्ति की ओर झुकाव, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की
बताई हुई निर्गुण सन्तो की रचनाओ की विशेषताएँ, नामदेव की
रचनाओ से इन विशेषताओं के उदाहरण, नामदेव तथा कबीर का
काल, डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' का मत, कबीर का काल निर्णय,
डॉ० रामप्रसाद त्रिपाठी का मत, डॉ० राजनारायण मौर्य का मत,
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी का मत, निर्गुण पंथ के प्रवर्तक नामदेव ।
सप्तम अध्याय
नामदेव का तत्कालीन और परवर्ती साहित्य पर प्रभाव २६१-३२७
नामदेव की पंजाब यात्रा का रहस्य, पंजाब की तत्कालीन परि-
स्थिति, नामदेव की महत्ता और उनकी रचनाओ का प्रसार, मध्य-
युगीन नव जागरण के प्रणेता नामदेव, नामदेव का व्यक्तित्व,
नामदेव की रचनाओ का प्रसार, हिंदी काव्य रचना का प्रयोजन,
सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ, सिद्धो तथा नाथो का नामदेव पर
प्रभाव, नामदेव के समकालीन सन्त, नामदेव का परवर्ती साहित्य
पर प्रभाव, ईश्वर की सर्वव्यापकता, प्रत्यक्ष अनुभव से सत्यान्वेषण,
सद्गुरु-महत्त्व प्रतिपादन, सुमिरन, नामस्मरण का महत्त्व, बाह्या-
चार की व्यर्थता, अनन्य प्रेम भावना, कर्म और अध्यात्म भावना
का समन्वय, भेदभाव विहीनता, ब्रह्म की निर्गुणता, करनी तथा
कथनी में एकता, भक्त की भगवान के प्रति मिलन उत्कंठा ।
उपसंहार ३२८-३३३
संदर्भ ग्रंथ सूची ३३४-३४०
प्रथम अध्याय
हिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि
१. ब्रह्म का अस्तित्व
२. ब्रह्म का स्वरूप—निर्गुण और सगुण दोनो की एकता
३. निर्गुण शब्द और उसके अर्थ का ऐतिहासिक विकास
४. निर्गुण काव्य—सगुण से पार्थक्य
५. निर्गुण काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : सिद्ध संप्रदाय, नाथ पंथ,
ज्ञानदेव की परंपरा
६. निर्गुण उपासना का विकास
७. हिंदी काव्य तथा नाथ संप्रदाय
८. निर्गुण काव्यधारा पर मत्स्येंद्रनाथी धारा का प्रभाव
९. निर्गुण काव्यधारा पर गोरखनाथी धारा का प्रभाव
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि
ब्रह्म का अस्तित्व : वैज्ञानिक दृष्टि से—दार्शनिक दृष्टि से
मनुष्य का अहं, उसकी बुद्धि, उसका मन, उसके प्राण और उसका शरीर सब
मिलकर एक सुव्यवस्थित मानव-संगठन का निर्माण करते हैं। ऐसे संगठन इस ब्रह्माण्ड
में अनेक हैं। निखिल ब्रह्माण्ड स्वतः ऐसा ही एक वृहत् संगठन है।
हमारा शरीर जैसे नितांत स्थूल परमाणुओं का संघात है वैसे ही ब्रह्माण्ड के
पृथ्वी आदि लोक भी हैं। शरीर की ही भाँति ब्रह्माण्ड में प्राणशक्ति संचारित हो रही
है। हमारा सूक्ष्म मन ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म आकाश है। हमारी बुद्धि ब्रह्माण्ड का द्यौलोक
है। मानव संगठन के समस्त अवयवों का प्रेरक जीवात्मा है। उसी तरह निखिल ब्रह्माण्ड
के अवयवों का प्रेरक एक परम आत्म तत्त्व होना ही चाहिए।
जैसे मानवी शरीर रूपी संगठन को देखकर उसके रचयिता का भान होता है वैसे
ही इस ब्रह्माण्ड के संगठन को देखकर। रचयिता की रचना शक्ति में प्रकाशात्मिका
बुद्धि निहित रहती है उसी बुद्धि का विशाल रूप ब्रह्माण्ड रचयिता के भीतर होना
चाहिए।¹
आधुनिक विज्ञान ने ब्रह्माण्ड के संबंध में जो अनुसंधान प्रस्तुत किये हैं वे उस
परम तत्त्व की विराट् बुद्धि पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। सृष्टि निर्माण की योजना और
- 'The whole frame work of Nature bespeaks of an intelligent
author.'
'The Idea of God' p. 15
—by Pringle Pattison.
'The idea of a Universal Mind or Logos would be fairly
plausible inference from the present state of scientific
theory, at least it is in harmony with it'
'The Nature of the Physical World' p. 338
—by Eddington.
१८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसकी काय परिणति पर वैज्ञानिको ने जो खोज की है, वह निश्चित रूप से इस दिशा
की ओर संकेत करती है कि सृष्टि अकस्मात् उत्पन्न नही हुई । उसके पीछे एक महान्
शक्ति कार्य कर रही है । और जगत् के सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि समस्त ग्रह और उपग्रह
ऐसे आकर्षण संबंध में परस्पर सबद्ध हैं, उनकी दूरी, गति एव परिमाण ऐसे निश्चित
और नपे तुले हैं१ और एक दूसरे के सहायक बने हुए वे ऐसे सुरक्षित और सुदृढ हैं कि
उनके इन व्यापारों के पीछे एक अनन्त चेतन सत्ता की विद्यमानता का बरबस अनुभव
होने लगता है ।२
जो विधान इस सृष्टि मे पाया जाता है वही उसकी स्थिति के लिए आवश्यक
है । इस विधान का विधाता कौन है ?३
इस विधान का प्रसार यहाँ किसने किया ?
भूगर्भ विद्या, खगोल विद्या, शरीर विज्ञान, जीव विज्ञान आदि सभी शास्त्र अपने
क्षेत्र में कार्य करने वाले नियमो की ओर स्पष्ट संकेत कर रहे हैं । इस समय विज्ञान की
कोई भी ऐसी शाखा नही है, जो विश्व के किसी भी विभाग को नियम नियंत्रण विहीन
घोषित करती हो ।
प्रसिद्ध दार्शनिक प्रिंगल पटिसन के इस कथन४ की वास्तविकता विज्ञान के सभी
१ यो अन्तरिक्षे रजसो विमान । यजु ३२ ६ ( जिसने अन्तरिक्ष में लोको
को नाप तोल कर रखा है । )
२ फ्लिंट ने अपने ग्रन्थ ‘Theism’ के पृष्ठ १३८ पर इसी प्रकार के विचार
प्रकट किये हैं Each orb is affecting the other Each is
doing what, if unchecked would destroy itself and the en-
tire system, but so wonderously is the whole constructed
that these seemingly dangerous disturbances are the very
means of preventing destruction and securing the unive sal
welfare
३ Pringle Pattison अपने ग्रन्थ ‘The Idea of God’ के पृ० १५ पर
लिखते हैं—There is an eternal, inherent principle of order
in the world which proves an omnipotent mind All the
sciences almost lead us to acknowledge a first intelligent
author
४ ‘विश्व के समग्र रूप को एक साथ लेकर अथवा उसके किसी एक अंश पर
ध्यानपूर्वक विचार कीजिये तो वह एक बृहत् यन्त्र प्रतीत होगा, जिसके भीतर
अपरिमित छोटे छोटे यन्त्र हैं । इन छोटे छोटे यन्त्रों के भीतर पुनः अनेक
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि १६
क्षेत्रों की खोजों से सिद्ध हो रहा है।
पृथ्वी मंडल पर जो जीवन पाया जाता है वह आकस्मिक नहीं है। उसका एक
विशिष्ट उद्देश्य है। पार्थिव वनस्पतियाँ सूर्य से आती हुई प्राण-शक्ति को लेकर अपने
सरल अणुओं (molecules) को विविध अणुओं में परिणत कर देती हैं। वृक्षों से भरे
हुए जंगल पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को मरुस्थल के आक्रमणों से सुरक्षित रखते हैं। वे
मिट्टी को वर्षा की बाढ़ में वह जाने से भी रोकते हैं। संस्कृत में जल को जीवन कहा
गया है। आधुनिक वैज्ञानिक भी जल के तत्त्वों का विश्लेषण करके इसी परिणाम पर
पहुँचे हैं। कैनेथ वॉकर ने¹ हेंड्रेल का मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि जल में
जिस अनुपात से जीवन को सुरक्षित रखनेवाले तत्त्व मिश्रित हैं उनसे बढ़कर हमारे
वातावरण में और कुछ हो नहीं सकता। इस सम्बन्ध में जल के स्थान को और कोई
द्रव्य नहीं ले सकता। जीवन और जीवन संबंधी साधनों का यह विशाल कारखाना
किसकी देखरेख में चल रहा है ?
इस जीवन का भी जीवन निःसंदेह एक मूल महा जीवन है, जिसने तक्षा के
रूप में विभिन्न मूर्तियों के नाना रूप सांचे तैयार किये हैं। वृक्षों के पत्तों और फूलों के
रंगों में उसकी अद्भुत कारीगरी प्रकट हो रही है। पक्षियों के कलरव में वह संगीतकार
लघुतर एवं लघुतम यंत्र विद्यमान हैं जो मानव की खोज शक्ति तथा व्याख्या-
शक्ति की सीमा में आज तक आबद्ध नहीं हो सके। ये विभिन्न यंत्र अपने
समस्त अंशों के साथ ऐसे घनिष्ठ रूप में संयुक्त हैं कि सभी विचारशील
मानव उसकी प्रशंसा करते हैं। प्राकृतिक जगत् में साधन और साध्य का
संबंध सर्वत्र वैसा ही है जैसा मानवीय बुद्धि की कृतियों में दृष्टिगोचर होता
है, अथवा यह कहना युक्तिसंगत होगा कि वह इससे कही अधिक बढ़कर
है। जब कार्यों में समता है, तो कारणों में भी समता होनी ही चाहिए।
अतः मानव-मस्तिष्क की ही भाँति, प्रकृति के महान् कार्य जगत् का रचयिता
एक ऐसा महान् मस्तिष्क होना चाहिए, जिसमें महत् कार्य की अपेक्षा महत्
शक्तियाँ भी विद्यमान हों।'
'The Idea of God' p. 9, 10
—Pringle Pattison.
- The various properties of water are uniquely suitable for
the support of life No other substance could substitute
water in an environment like ours,
—'Meaning and Purpose' p. 102
बना बैठा है। जीवन रसायनी बनकर वह फलों में रस, मसालों में स्वाद और फूलों में
गंध उत्पन्न करता है। जल और कार्बन के पृथक्-पृथक् अनुपात से लकड़ी और शक्कर
भी उसी ने तैयार की है और इस प्रक्रिया द्वारा ओषजन उत्पन्न किया है जो पशुओं का
जीवन है। प्रोटोप्लाज्म की एक अदृश्य बूंद सूर्य से प्राण शक्ति पाकर समस्त जीवन-
जगत् का कारण बनी हुई है। यह जीवन प्रकृति से उत्पन्न नहीं हुआ। फिर इस जीवन
का स्रोत कहाँ है ? हक्सले के शब्दों में इस जीवन का स्रोत जीवन ही है। जीवन किसी
संगठन का परिणाम नही, प्रत्युत उसका कारण है।¹
विज्ञान के अनुसंधान जब स्वयं वैज्ञानिक को सोचने का अवसर देते हैं और
उसके मस्तिष्क पर अपना प्रभाव डालते हैं तो वैज्ञानिक की स्थिति दार्शनिक की-सी
हो जाती है। जब वह देखता है कि सृष्टि में पाया जाने वाला पूर्ण क्रम इसके पूर्व
पूर्णतया अस्त-व्यस्त (Chaotic) सामग्री को अनंत व्यक्तियों या इकाइयों के ढाँचे में
ढालने वाले व्यक्तिकरण (Individuation) के रूप में था तो वह यह सोचता है कि
क्या यह सब अपने आप हो रहा था ?
दूसरी ओर वह बालमनोविज्ञान, जो स्वतः अब एक प्राकृतिक विज्ञान माना
जाने लगा है, के आधार पर बालक के इंद्रिय संवेदन (Sensation), भेदीकरण
(Differentiation) और पदार्थ बोध (Perception) के क्रम में, सृष्टि के उसी क्रम
को देखता है और यहाँ उस चेतना संपन्न बालक की सहायता करने वाले अन्य चेतन
मानवों को देखता है, तो सृष्टि को क्रम को पूर्णता पर पहुँचाने वाली एक महा चेतन
सत्ता की ओर स्वभावतः उसकी कल्पना चली जाती है।
हम स्वयं अपने सामने मिट्टी के ढेर में से पानी तथा कुछ यंत्रों की सहायता
से मानव को ईंटें बनाते और उन ईंटों से महल बनाते देखते हैं। इस निर्माण में भी
फैली हुई सामग्री, सामग्री का व्यक्तिकरण और व्यक्तिकरण से व्यवस्था की ओर चलने
में एक निश्चित क्रम पाया जाता है और उस क्रम के मूल में एक चेतन सत्ता का हाथ
दिखाई देता है। सर जेम्स जोन्स ने इसे चेतना (Thought) और आइन्सटीन ने इसे
बुद्धि (Intelligence) या (Rationality) नाम दिया है।
सृष्टि विभिन्नरूपा होकर भी एक है। अंग्रेजी में इसका नाम ही Universe
है, जिसे हिंदी में एकात्म काव्य कहा जा सकता है। वेद तो इसे देव का काव्य कहता
ही है। काव्य की संगीतात्मक, भावात्मक एवं कल्पनात्मक, एकता उसके जनक चेतन
तत्व की एकरूपता को प्रकट करती है। इसी प्रकार सृष्टि का काव्यत्व (Harmony)
उसके एक स्रष्टा होने का संकेत देता है, जो चेतन है।
बाहर सृष्टि के विभिन्न अवयव मिलकर एक दूसरे को आकर्षित करने तथा
- Life is the cause and not the consequence of organism.
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २१
एक नियम में आबद्ध होने के कारण एक हैं। उनकी यह नियमबद्धता ही इस एकता
की निर्देशिका है।¹
इसी प्रकार भीतर भावना, कल्पना और चेतना की एकता है। नियमों की
यह एक प्रकारता पुनः एक नियम है। इस नियम का एक नियामक है। अतः अन्तः
तथा बाह्य चाहे जिस दृष्टि से देखें, यह विविध रूप जीवन और जगत् एक चेतन
नियामक का ही कार्य प्रतीत होता है।
इसी सर्वोपरि चेतन नियामक तत्त्व को ईश्वर कहते हैं। मानव स्वयं इस
सत्ता का अनुभव अपने में करता है।
ईश्वर का विचार मानव की प्रातिभ शक्ति, कल्पना की उपज है, ऐसा भी कहा
जाता है। इसी कल्पना शक्ति द्वारा वह अदृश्य शक्तियों का भी अनुमान किया करता
है। कल्पना शक्ति का क्षेत्र असीम है। मानवी कल्पना की पूर्णता आध्यात्मिक सत्यता
में परिणत हो जाती है। इसी से वह जहाँ योजना, क्रम तथा उद्देश्य की एकता पाता है
वहीं वह उस महान् सत्य ईश्वर के दर्शन करने लगता है। जैसा लिखा जा चुका है,
उसे यह एकता बाहर भी दिखाई देती है और अपने भीतर भी। अतः वह बाहर से
हटकर उस महान् सत्ता का अनुभव अपने हृदय की गुहा में, अपने समीप ही वरनो
सधस्थता में² ही करने लगता है।
संत एवं भक्त कवि तभी तो कहते रहे हैं :
'स्वामी जू मेरे पास हो, केहि विनय सुनाऊँ ?'
अभी तक हमने वैज्ञानिक दृष्टि से इस परम तत्त्व के संबंध में संक्षेप में विचार
किया। विज्ञान के विविध अंगों का दर्शनशास्त्र में विलय हो जाता है। अतः दर्शन-
- Every particle of matter in the universe attracts, to some
extent, every other particle. There is thus presented to the
mind a sublime picture of the inter-relatedness of all things.
All things are subject to law and the universe is in this
respect a unit.
P. W. Brigman
-'Reflections of a Physicist' P. 82.
२. अवयन्त्स्वे सधस्थे देवाना दुर्मतीरीक्षे राजन्नपद्विषः सेध मीढवो अपस्रिधः
सेध । —ऋग्वेद ८।७६।६
(हे परम प्रकाशमय प्रभु ! तुम यही मेरे भीतर मेरे साथ बैठे हो। अतः
जैसे ही देवों की दुर्मतियों को देखो वैसे ही हे अमृत सिंचक ! इन दुर्मतियों
को दूर कर इन द्वेषों और हिंसा वृत्तियों को नष्ट कर दो।)