सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनी बात
हिन्दी संत साहित्य की महत्ता और उसकी व्यापकता इसी से प्रमाणित है कि
उसका अध्ययन और मनन झोपड़ियो से लेकर उच्च विद्या संस्थानों तक हो रहा है। यह
एक प्रकार का लोक-काव्य है जो सहज जीवन से उद्भूत हुआ है। शास्त्रीय परंपरा
और रूढ़ि के विरोध में इसका उद्भव हुआ और अपनी तेजस्विता और प्रखरता के कारण
उसका विकास होता रहा है। संत काव्य उस समाज का प्रतिबिंब है जो शास्त्रीयता
और रूढि के खिलाफ निरंतर संघर्ष करता रहा है। एक विशिष्ट वर्ग से सम्बद्ध होने के
कारण इस काव्य धारा का अध्ययन बहुत सीमित रहा किन्तु, पिछले कुछ दिनों से
विद्वानों का ध्यान इधर गया है। और अनेक दृष्टियों से इसका अध्ययन हो रहा है।
निर्गुण काव्य का प्रारंभ संत कबीर से माना जाता है। यद्यपि लगभग सभी
विद्वानों ने इस बात की ओर संकेत किया है कि कबीर से सौ वर्ष पूर्व नामदेव हुए थे
जिनकी रचनाओ में निर्गुण काव्य धारा के बीज वर्तमान है। फिर भी इन विद्वानों ने
नामदेव को इस धारा का प्रवर्तक नही माना। इसका प्रमुख कारण यह है कि नामदेव
की रचना मुख्यतः मराठी में है जिसका हिंदी निर्गुण धारा से कोई संबंध नही । 'गुरु
ग्रन्थ साहब' मे संग्रहीत केवल ६१ पद ही नामदेव के मिलते थे जिनके आधार पर
विद्वानो ने ऊपर का संकेत दिया है। किन्तु कुछ वर्ष पहले पूना विश्वविद्यालय ने नाम-
देव की हिंदी रचनाओ को प्रकाशित करके विद्वानो के संकोच को दूर कर दिया है और
अब प्रमाण के साथ यह कहा जा सकता है कि नामदेव की हिंदी रचनाओं में निर्गुण
काव्य धारा की सभी प्रवृत्तियाँ वर्तमान है।
प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में यह विवेचित किया गया है कि नामदेव की हिंदी रच-
नाओं में निर्गुण काव्य धारा की कौन-कौन-सी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं और किस प्रकार
वे संपूर्ण संत साहित्य को प्रभावित करती हैं। इस शोध प्रबंध का शीर्षक 'हिंदी निर्गुण