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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 332 में से

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पृष्ठ 7

सम्बन्धी इस अध्ययन के प्रेरणा-स्रोत हैं। पुणे विद्यापीठ द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव
की हिंदी पदावली' में पहली बार संत नामदेव के समस्त हिंदी पद संग्रहीत हुए हैं और
इस पदावली के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि हिंदी निर्गुण काव्य के प्रारम्भ-
कर्त्ता नामदेव ही हैं। प्रस्तुत प्रबंध में बड़ी स्पष्टता और प्रामाणिकता के साथ इस तथ्य
को उद्घाटित किया गया है।
यह शोध प्रबन्ध कुल सात अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में हिंदी निर्गुण
काव्य धारा की पृष्ठभूमि बतलाई गई है जिसमे ब्रह्म के अस्तित्व, विकास तथा उसके
निर्गुण सगुण रूप का विवेचन किया गया है। किस प्रकार उत्तरी भारत में निर्गुण
रूप को प्रधानता मिल गई ओर संतों ने किस प्रकार निर्गुण भक्ति को अभिव्यक्ति की
प्रधानता दी इसका उल्लेख आगे किया गया है। इस तरह हिंदी के निर्गुण काव्य का
प्रारंभ सूचित किया गया है।
दूसरे अध्याय में संत नामदेव की जीवनी, उनका व्यक्तित्व और उनकी रचनाओं
के संबंध में लिखा गया है। अंत साक्ष्य तथा बहि साक्ष्य दोनों के आधार पर उपलब्ध
उनकी जीवनी प्रस्तुत की गई है। इस संबंध में अभी तक कोई निर्णयात्मक बात नहीं
कही गई थी। प्रस्तुत अध्याय में समस्त उपलब्ध तथ्यों का विश्लेषण कर उनकी जीवनी
और रचनाओं के संबंध में निर्णायक बात कही गई है।
तीसरे अध्याय में हिंदी निर्गुण काव्य धारा की प्रमुख प्रवृत्तियों का परिचय
दिया गया है। और इस बात का विवेचन प्रस्तुत किया गया है कि नामदेव की रचनाओं
में उनका प्रतिफलन किस प्रकार हुआ है। निर्गुण काव्य आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
है जिसे अद्वैतवाद, सूफी मत, नाथ पंथ, वैष्णव धर्म आदि ने मिलकर एक विशिष्ट स्वरूप
प्रदान किया है। तत्पश्चात् निर्गुण काव्य की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया गया है।
चौथे अध्याय में नामदेव की दार्शनिक विचार धारा प्रस्तुत की गई है। भार-
तीय दर्शन की मूल जिज्ञासा ने नामदेव को किस प्रकार प्रभावित किया और कैसे उन्होंने
सगुण निर्गुण को क्रम से अपनाया इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ब्रह्म,
जीव, माया तथा संसार के संबंध में नामदेव के क्या विचार हैं यह उनकी रचनाओं के
आधार पर स्पष्ट किया गया है।
पाँचवें अध्याय में नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन किया गया
है। काव्य का प्रयोजन बतलाते हुए संतों का काव्यादर्श और उनकी काव्य निर्मिति का
प्रयोजन बतलाया गया है। इसके पश्चात् इन रचनाओं के भाव पक्ष और कला पक्ष
पर विचार किया गया है। नामदेव की भाषा पर अधिक जोर दिया गया है क्योंकि यह
१४ वीं शताब्दी की भाषा है, जिसका भाषा के ऐतिहासिक विकास में महत्त्वपूर्ण
स्थान है।

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