सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 8, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठवें अध्याय में पूर्वोक्त सभी प्रमाणों का आधार लेकर यह सिद्ध किया गया
है कि नामदेव हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तक हैं। कबीर को प्रवर्तक क्यों माना गया,
इसका कारण और इतिहास भी दिया गया है। किन्तु सभी दृष्टियों से विश्लेषण करने
के पश्चात् यही निष्कर्ष निकलता है नामदेव से ही हिंदी निर्गुण काव्य का प्रारंभ माना
जाना चाहिये ।
सातवें अध्याय में इसका विवेचन किया गया है कि नामदेव का तत्कालीन और
परवर्ती साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है। नामदेव के समकालीन संतों और
कवियों की उक्तियों में उनकी महत्ता को स्पष्ट करते हुए उत्तरकालीन संतों के उल्लेख
का भी विवेचन किया गया है। नामदेव के बाद की हिंदी निर्गुण काव्य धारा पर
उनका स्पष्ट प्रभाव है इसमें कोई संदेह नहीं ।
अंत में उपसंहार के अन्तर्गत संपूर्ण शोध प्रबंध का निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया
है। हिंदी निर्गुण काव्य धारा का प्रारंभ नामदेव से ही होता है यही इस अध्ययन
का निष्कर्ष है।
प्रस्तुत शोध प्रबंध हिंदी निर्गुण काव्य की पूरी परंपरा का अध्ययन और
विश्लेषण करने के बाद लिखा गया है। इसके लिये हिंदी, मराठी, अंग्रेजी आदि
अनेक स्रोतों से सामग्री एकत्र की गयी है। इस प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ ये हैं—
(१) इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि भारत में निर्गुण काव्य की परंपरा
शताब्दियों पहले विद्यमान थी। लेकिन हिन्दी में यह १३वीं शताब्दी में अवतरित हुई ।
(२) संत नामदेव की जीवनी, व्यक्तित्व और रचनाओं के संबंध में प्रामाणिक
तथ्य दिये गये हैं और उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले गये हैं।
(३) नामदेव की रचनाओं में प्राप्त निर्गुण काव्य की विभिन्न प्रवृत्तियों का
निर्देश और कबीर में उनके प्रतिफलन का विवेचन है।
(४) साहित्यिक दृष्टि से नामदेव की हिन्दी रचनाओं का पहली बार मूल्यांकन
किया गया है।
(५) हिंदी निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्तक के रूप में संत नामदेव को मान्यता
प्रदान की गई है।
इस शोध प्रबंध में व्यक्त मेरे विचार और मेरी मान्यताएँ सर्वथा मौलिक हैं,
जिनसे संत साहित्य के अध्ययन के अनेक नये द्वार खुलने की संभावना है। इस अध्य-
यन से हिंदी निर्गुण साहित्य की परंपरा लगभग डेढ़ सौ वर्ष पीछे जाती है। मेरा
अनुमान है कि इस परंपरा को और भी पीछे जाना चाहिये क्योंकि नामदेव एकाएक
ही बिना परंपरा के उदित नहीं हुए। अवश्य ही उनके साथ कोई परंपरा थी जिसकी