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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 6

काव्य का प्रारंभ और नामदेव की हिंदी कविता' है जिसकी अपनी सीमा है। इस
शीर्षक के अन्तर्गत केवल यही बताया गया है कि हिंदी निर्गुण काव्य का प्रारंभ नामदेव
की हिंदी रचनाओ से होता है, यद्यपि यह निर्गुण भावना अध्यात्म और साहित्य के क्षेत्र
मे शताब्दियो पूर्व चली आ रही थी। लेकिन हिंदी में इसका प्रादुर्भाव नामदेव से ही होता
है। इस बात को दृढ़ता के साथ कहने के लिये ही इस शोध प्रबन्ध का प्रणयन हुआ है।
जब से हिंदी निर्गुण काव्य धारा का अध्ययन और अध्यापन प्रारंभ हुआ है
लगभग तभी से उस धारा के प्रवर्तक संत कबीर माने गये हैं। कबीर के साथ उस
का ऐसा अविच्छिन्न संबंध स्थापित हो गया है कि नामदेव को इस धारा का प्रवर्तक
कहने में सभी को संकोच होता रहा है। अतः इस बात की आवश्यकता थी कि प्रमाणो
सहित यह सिद्ध किया जाय कि कबीर से पूर्व होने वाले नामदेव इस धारा के प्रवर्तक
और प्रारम्भकर्त्ता हैं। एक ऐतिहासिक तथ्य को, जो सामग्री के अभाव में दब गया
था, उद्घाटित करने के लिए इस प्रबन्ध की आवश्यकता पड़ी।
मराठी साहित्य मे नामदेव की चर्चा बड़ी श्रद्धा के साथ की जाती है। उनके
हिंदुस्तानी पदों का भी उल्लेख किया जाता है किन्तु उन पदो का कथ्य और विषय-
सामग्री क्या है इसकी चर्चा बिलकुल ही नही की गई है। मराठी में किसी ने भी इसका
अध्ययन नही किया कि उनकी हिंदी रचनाओ का भाव क्या है और वे मराठी रच-
नाओ के भाव से कहाँ तक मेल खाती है। यही कारण है कि मराठी के विद्वानो ने
हिंदी पदो के रचयिता नामदेव को कभी ठीक से नही समझा। हिन्दी में सर्वप्रथम
प्रयत्न आचार्य विनय मोहन शर्मा का है जिससे नामदेव की हिंदी रचनाओ के अध्ययन
के लिए द्वार खुले हैं।
आचार्य विनय मोहन शर्मा जी ने अपने ग्रन्थ हिंदी को मराठी संतो की देन में
अन्य मराठी संतो की हिंदी रचनाओ के साथ नामदेव की भी चर्चा की और यह आग्रह
किया कि नामदेव को हिंदी निर्गुण काव्य धारा का प्रारम्भकर्त्ता मानना चाहिये।
वस्तुतः आचार्य शर्मा जी के इस आग्रह से ही नामदेव की हिंदी रचनाओ का अध्ययन
करने के लिये मुझे प्रेरणा मिली। किन्तु उनकी हिंदी रचनाओ के अभाव में यह कार्य
संभव नही हो पाया। पुणे विद्यापीठ के हिंदी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ० भगीरथ
मिश्र तथा डॉ० राजनारायण मौर्य ने बहुत परिश्रम करके संत नामदेव की हिंदी पदा-
वली का प्रकाशन किया। इस पदावली के उपलब्ध होने पर यह कार्य सरल हो गया।
इस पदावली के संपादको ने भी यह कहा है कि संत नामदेव निर्गुण काव्य धारा
के प्रवर्तक हैं किन्तु उन्होने इस धारा की परम्परा और नामदेव की रचनाओ से उदा-
हरण नही दिये। वस्तुतः उक्त पदावली में यह अपेक्षित भी नही है। वास्तविक रूप
से देखा जाय तो आचार्य विनय मोहन शर्मा और डॉ० भगीरथ मिश्र ही नामदेव