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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( ४६ )
प्रकृति का विकार है, तो इसके दुःख सुख का हमें लेश भी नहीं
प्रतीत होता ।
प्र०-प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राकृतिक ज्ञान नहीं होता, इसलिये
प्रकृति असिद्ध है ; क्योंकि वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं ?
उ०-विषयोऽविषयोऽप्यति दूरादेर्हानोपा-
दानाभ्यामिन्द्रियस्य ॥ १०८ ॥
इन्द्रियों के विषय अति दूरादि कारणों से अविषय हो जाते हैं,
इस वास्ते किसी इन्द्रिय का विषय न होने से प्रकृति की असिद्धि
नहीं हो सकती है, जैसे-अभी एक मनुष्य था, परन्तु थोड़े काल
में दूर चला गया, अब वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं रहा ।
प्र०-कितने कारण हैं जिनसे वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान
नहीं होता ?
उ०-अति दूर होने से, अति समीप होने से, इन्द्रिय के
बिगड़ जाने से, मन के अस्थिर न होने, या मन के दूसरे काम में
लगे होने से, अति सूक्ष्म होने से, बीच में परदा होने से इत्यादि,
और भी कई कारणों से प्रत्यक्ष का विषय अविषय होता है,
इसलिये किसी वस्तु के प्रत्यक्ष न होने से उसकी असिद्धि नहीं
हो सकती ।
प्र०-प्रकृति का प्रत्यक्ष न होने मैं क्या कारण है ?
सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः ॥ १०६ ॥
उ०-प्रकृति और पुरुष का सूक्ष्म होने से प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं
होता, सूक्ष्म होने से अत्यन्त अणु होना अभिप्राय नहीं ; क्योंकि
प्रकृति और पुरुष सर्वत्र व्यापक हैं, इनका प्रत्यक्ष योगियों को ही
होता है ।
प्र०-प्रकृति के प्रत्यक्ष न होने से यह क्यों माना जावे, कि
अति सूक्ष्म होने से प्रकृति का प्रत्यक्ष नहीं होता, किन्तु प्रकृति का

( ४७ )
अभाव ही मानना चाहिये, नहीं शशशृङ्ग की अप्रतीति भी अति
सूक्ष्म होने से माननी पड़ेगी ?
कार्य्यदर्शनात्तदुपलब्धेः ॥ ११० ॥
उ०-संसार में प्रकृति के कार्यों को देखने से प्रकृति का होना
सिद्ध होता है ; क्योंकि कार्य्य को देखने से कारण का अनुमान
होता है, और इन कार्यों को बिगाड़कर सूक्ष्म होकर कारण में
लय होने से कारण की सूक्ष्मता का अनुमान होता है ।
वादिविप्रतिपत्तेस्तदसिद्धिरिति चेत् ॥ १११ ॥
यदि संसार में वादी लोग प्रकृति की असिद्धि में यह हेतु दें
कि कोई ब्रह्म को जगत् का कारण मानते हैं, कोई परमाणुओं
को, कोई जगत् को अनुत्पन्न ही मानते हैं, तो इस जगत्-रूप
कार्य्य से प्रकृति के अनुमान करने में क्या हेतु है ? प्रथम तो
जगत् का कार्य होना साध्य है, दूसरे कारण ब्रह्म है, या प्रकृति
यह संशयात्मक है, इसलिये प्रकृति असिद्ध है ।
तथाप्येकतरदृष्ट्या एकतरसिद्धेर्नोपलापः ॥११२
जब एक कार्य को देखकर कारण का अनुमान होता है
और कारण को देखकर कार्य का अनुमान होता है, तो प्रकृति
को कारण सिद्ध मानना अनुचित नहीं, क्योंकि सब कार्य प्रकृति
में लय होते हैं । द्वितीय पुरुष जो अपरिणामी है उसको परिणामी
प्रकृति के अविवेक से बन्ध और विवेक से मुक्ति होती है ।
त्रिविधविरोधापत्तेश्च ॥ ११३ ॥
सब कार्य तीन प्रकार के होते हैं-अतीत अर्थात गुजरा
हुआ, दूसरे वर्त्तमान, तीसरे आनेवाला । यदि कार्य को सत न
माने तो यह तीन प्रकार का व्यवहार-जैसे, घट टूट गया, अथवा

( ४८ )
घट वर्तमान है, अथवा घट होगा, नहीं बन सकेगा । दूसरे
दुःख सुख मोहादि की उत्पति में विरोध होगा ; क्योंकि ब्रह्म तो
आनन्दस्वरूप होने से दुःखादि से शून्य है, और परमाणु और
प्रकृति में नाममात्र भेद है, इसलिए प्रकृति जगत् का कारण सिद्ध
है, अगले सूत्र में इसे और भी पुष्ट करते हैं—
नासदुत्पादो नृशृङ्गवत् ॥ ११४ ॥
असत् किसी वस्तु का कारण नहीं हो सकता, जैसे—मनुष्य
के सींग नहीं, इसलिये संसार में उसका कोई कार्य भी प्रतीत
नहीं होता, न उससे कोई कुछ बना सकता है ।
उपादाननियमात् ॥ ११५ ॥
संसार में सब बस्तुओं का उपादान नियत है, जैसे—मृत्तिका
से घट तो बन सकता है परन्तु पट नहीं बन सकता, या लोहे
से तलवार बन सकती है, रुई से नहीं बन सकती, जल से बर्फ
बनती है, घी से नहीं बनती, इसी प्रकार सब पदार्थों के उपादान
कारण नियत हैं, नियमित कार्य कारण भाव के सत् होने से
कार्य को भी सत् मानना पड़ेगा ।
सर्वत्र सर्वदा सर्व्वासम्भवात् ॥ ११६ ॥
यह कथन सर्वथा असम्भव है, क्योंकि संसार में ऐसे वाक्यों
का साधक कोई भी दृष्टांतादिक नहीं दीखता कि ( असतः
सज्जायते ) अर्थात् असत् से सत् होता है । अतः मानना
पड़ेगा कि ( सतः सज्जायते ) अर्थात् सत् से सत् ही उत्पन्न
होता है ।
शक्तस्य शक्यकरणात् ॥ ११७ ॥
कार्य में कारण का शक्तिमत्व होना ही उपादान कारण होता
है, क्योंकि जिस कारण द्रव्य में जो कार्यशक्ति वर्तमान ही नहीं

( ४६ )
है, उससे अभिलषित कार्य कदापि नहीं हो सकता ; जैसे कि
कृष्ण रंग से श्वेत रंग कदापि नहीं हो सकता । अब इससे यथार्थ
सिद्ध होगया कि जैसे कृष्ण रंग से श्वेत रंग उत्पन्न नहीं हो
सकता, इसी प्रकार असत् से सत् भी उत्पन्न नहीं हो सकता ।
कारणभावाच्च ॥ ११८ ॥
उत्पत्ति से पहिले हो कार्य का कारण से भेद नहीं है, क्योंकि
कार्य कारण के भीतर ही सदैव रहता है, जैसे कि तेल तिलों के
भीतर रहता है ।
न भावे भावयोगश्चेत् ॥ ११९ ॥
अब इसमें प्रश्न पैदा होता है कि कार्य तो नित्य है तो
भावरूप 'सत्' कार्य में भावरूप उत्पत्तियोग नहीं हो सकता,
असत् से सत् की उत्पत्ति के व्यवहार होने से । अब इस विषय
में सांख्य के आचार्य अपने मत को प्रकाश करते हैं।
नाभिव्यक्ति निबन्धनौ व्यवहारा व्यवहारौ । १२०
अब यहाँ पर सन्देह होता है कि यद्यपि उत्पत्ति से पहिले
सत् कार्य की किसी प्रकार उत्पत्ति हो, परन्तु अब कार्य सत्ता
अनादि है, तो उसका नाश क्यों हो सके । इसका उत्तर यह है,
कि कार्य की उत्पत्ति का व्यवहार और अव्यवहार अभिव्यक्ति
निमित्तक है, अर्थात् अभिव्यक्ति के भाव से कार्य की उत्पत्ति
होती है । अभिव्यक्ति के अभाव से उत्पत्ति का अभाव है। जो
पूर्व यह शंका की थी, कि यदि कारण में कार्य रहता है, तो
अमुक कार्य उत्पन्न हुआ, ऐसा कहना भी नहीं हो सकता । उसके
ही उत्तर में यह सूत्र है, कि अभिव्यङ्ग्यमान कार्य की उत्पत्ति का
व्यवहार अभिव्यक्ति निमित्तक है । पूर्व जो कार्य असत् नहीं
था उसकी अब उत्पत्ति हुई यह कथन ठीक नहीं है ।

( ५० )
नाशः कारण लयः ॥ १२१ ॥
"लीङ्" श्लेषणे धातु से लय शब्द बनता है। अति सूक्ष्मता
के साथ कार्य्य का कारण में मिल जाना, इसी का नाम नाश है।
कार्य्य की व्यतीत अवस्था अर्थात् जो अवस्था कार्य्य की उत्पत्ति
से पूर्व थी, उसी को धारण कर लेना और जो नाश भविष्यत्
में होनेवाला है, उसी का नाम प्रागभाव नामक नाश है। कोई
कोई यह कहते हैं कि जो वस्तु नाश हो जाती है उसकी
पुनरुत्पत्ति नहीं होती, परन्तु यह कहना सर्वथा अयोग्य है,
क्योंकि इस कथन से प्रत्यभिज्ञा में दोष होगा, अर्थात् जिस
पदार्थ को दो वर्ष पहले देखा था, उसको ही इस समय देखने से
यह ज्ञान होता है कि जो पदार्थ पहिले देखा था उसीको इस समय
देखता हूँ। इस ज्ञान में यह दोष होगा कि जो ज्ञान पूर्व हुआ था
वह इतने दिन तक नष्ट रहा और फिर भी समयानुसार उत्पन्न
होगया। यदि नष्ट हुये कार्य्य की दूसरी बार अनुत्पत्ति ही ठीक
होती तो इसमें अनुत्पत्ति का लक्षण पाया भी जाता। अतएव
यही कहना ठीक है कि नाश को प्राप्त कार्य्य फिर भी उत्पन्न हो
सकता है। अब यह सन्देह होता है कि यदि पहिले कहा हुआ ही
पक्ष ठीक है, तो अपने कारण में कार्य्य का नाश होता क्यों नहीं
दीखता, जैसे—तन्तु कपास से पैदा होते हैं, परन्तु नाश के समय
वह मिट्टी में मिल जाते हैं। इसका उत्तर यह है कि कार्य्य का
कारण में लय होजाना विवेकी पुरुषों को दीखता है और
अविवेकियों को नहीं दीखता, जैसे—तन्तु मिट्टी के रूप होजाते
हैं और मिट्टी कपास के वृक्षरूप होजाती है और वह वृक्ष फूल,
फल, कपास आदि रूप से परिणाम को प्राप्त होता है और जब
कार्य्य का नाम और उसीके समान कुछ बदला हुआ रूप संसार
में मौजूद है, तब नाश, ऐसा कहना भी योग्य नहीं। यही

( ५१ )
सिद्धान्त महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलिजी का भी है, कि
आकृति नित्य है। अब यहाँ यह सन्देह होता है कि अभिव्यक्ति
कार्य की उत्पत्ति के पूर्व भी थी या नहीं थी ? यदि थी तो कारण
के यत्न से पूर्व अभिव्यक्ति को स्वकार्य-जनकता दोष होगा
और उत्पत्ति के लिए जो कारण द्वारा यत्न किया जाता है वह
व्यर्थ होगा। यदि कार्य की उत्पत्ति से पहिले अभिव्यक्ति नहीं
थी तो सत्कार्य पक्ष में हानि होगी ; क्योंकि जब यह कह चुके
हैं कि जो कार्य पूर्व था, उसी की इस समय उत्पत्ति होती है,
किन्तु असत् की उत्पत्ति नहीं होती, तो अभिव्यक्ति का पूर्व में
अभाव कहने में दोष होगा। यदि यह कहा जाय कि अभिव्यक्ति
तो पूर्व भी थी लेकिन एक अभिव्यक्ति से दूसरी अभिव्यक्ति कारण
द्वारा होती जाती है, इसीलिये कारण व्यापार है, ऐसा कहने पर
अनवस्था दोष होगा ; क्योंकि एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी,
इसी तरह कहते जाओ, लेकिन कहीं भी विश्राम नहीं हो सकता,
इस कारण यह अनवस्था दोष हो गया। इन पूर्व कहे दोषों के
उत्तर यह हैं—प्रथम तो कारण व्यापार से सब कार्यों की उत्पत्ति
होती है, इस प्रकार पूर्वोक्त शंका ही नहीं हो सकती। दूसरे यदि
यह भी मान लिया जाय कि अभिव्यक्ति पहिले नहीं थी, तो भी
कारण व्यापार द्वारा उसकी सत्ता प्रकाश करने के वास्ते सदैव
आवश्यक है, तब कोई दोष नहीं हो सकता। तीसरे यह भी है कि
जब कार्य्य की अनागत अवस्था में ( जबतक कार्य उत्पन्न नहीं
हुआ ) सत् कार्य्यवाद की कोई हानि नहीं हो सकती, तब दोष भी
नहीं हो सकता ; क्योंकि जबतक घट पैदा ही नहीं हुआ, उससे
पहिले भी सत् कार्य्यवादी मिट्टी में घट को मानते हैं, इसी प्रकार
अभिव्यक्ति को भी समझना चाहिये। यदि कोई ऐसा सन्देह करे
कि कार्य का प्रागभाव “पहिले न होना” ही नहीं मानते तो घट
पहिले नहीं था, किन्तु अब पैदा हुआ है, ऐसा कहना भी नहीं

( ५२ )
बन सकता। इसका उत्तर यह है, कि कार्य की अवस्थाओं का ही
भाव अभाव कहते हैं न कि कार्य का और जो अनवस्था दोष
दिया उसका उत्तर यह है:—
पारम्पर्यतोऽन्वेषणा बीजांकुरवत् ॥ १२२ ॥
बीज और अंकुर के समान अर्थात् जब विचार किया
जाता है कि पहिले बीज था या वृक्ष, इस विषय में परम्परा
मानी गई है। इसी तरह अभिव्यक्ति मानो गई है, सिर्फ
भेद इतना ही है, कि उसमें क्रमिक परम्परा दोष उत्पन्न
होता है, अर्थात् पहिले कौन था, और इसमें एक-कालिक
एक ही समय में एक का दूसरे से उत्पन्न होना यह दोष होगा,
लेकिन यह दोष इस कारण माना जाता है, कि पातञ्जलभाष्य
में भी व्यासजी ने कार्यों को स्वरूप में नित्य और अवस्थाओं
से विनाशी माना है, वहां अनवस्था दोष को प्रामाणिक माना
है। यह बीजाङ्कुर का दृष्टान्त केवल लौकिक है, वास्तव में यहाँ
जन्म और कर्म का दृष्टान्त दिया जाता तो श्रेष्ठ था ; जैसे—जन्म
से कर्म होता है या कर्म से जन्म, क्योंकि बीजाङ्कुर के झगड़े
में कोई-कोई आदि सर्ग में वृक्ष के बिना ही बीज की उत्पत्ति मानते
हैं, वास्तव में अवस्था कोई वस्तु नहीं है, इसको कहते हैं:—
उत्पत्तिवद्वादोषः ॥ १२३ ॥
जैसेकि घट की उत्पत्ति के स्वरूप को ही वैशेषिकादि
असत् कार्यवादी कमी के सबब मानते हैं, अर्थात् यह उत्पत्ति
किस से उत्पन्न हुई, ऐसा सन्देह नहीं करते, केवल एक ही
उत्पत्ति को मानते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की उत्पत्ति किस
से हुई, यह विवाद नहीं करना चाहिये। केवल अभिव्यक्ति को
ही मानना चाहिये। सत्कार्यवादी और असत् कार्यवादी इन
दोनों में केवल इतना ही भेद है, कि असत् कार्यवादी कार्य

( ५३ )
उत्पत्ति की पूर्व दशा को प्रागभाव और कार्य के कारण में लय
होजाने को ध्वंस कहते हैं, और इन दोनों अवस्थाओं में कार्य
का अभाव मानते हैं, और इसी प्रकार सत्कार्यवादी कही हुई
दोनों अवस्थाओं को अनागत और अतीत कहते हैं, तथा उन
अवस्थाओं में कार्य का भाव मानते हैं, कार्य से कारण का
अनुमान कर लेना चाहिए ।
प्र०-किस-किस को कार्य कहते हैं ?
उ०-हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रित
लिङ्गम् ॥ १२४ ॥
हेतुमान् अर्थात् कारणवाला, अनित्य अर्थात् हमेशा एकसा
जो न रहे, अव्यापि अर्थात् एक देश में रहनेवाला, सक्रिय
क्रिया की अपेक्षावाला, अनेक जिसके अलग-अलग भेद मालूम
होवें, आश्रित कारण के अधीन इसको लिङ्ग अर्थात् कार्य के
पहिचानने का चिह कहते हैं ।
प्र०-जिसमें हेतुमत्वादिक होते हैं वही प्रधान के लिङ्ग कहे
जाते हैं ?
उ०-तुम्हारा यह कहना सर्वथा असंगत है ; क्योंकि प्रथम
तो इस सूत्र में वा पूर्व सूत्र में प्रधान का नाम ही नहीं है, दूसरे
सांख्यकार ने प्रधान शब्द को रूढ़ि नहीं माना, इसी कारण
इसको पुरुषवाचक भी कह सकते हैं; किन्तु प्रकृतिवाचक है ।
तीसरे यदि उनके तात्पर्यानुसार ( मतलब के माफ़िक़ ) यह लिङ्ग
पुरुष के ही मान लिये जावें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि सांख्यकार
के मत में कार्यमात्र की उत्पत्ति प्रकृति से है, एवं प्रकृति और
पुरुष का भेद भी माना है, एवं परस्परानपेक्षा भी कपिलाचार्य का
सिद्धांत है, तो प्रकृति से पुरुष का अनुमान नहीं हो सकता।

( ५४ )
हेतुमत्वादि विशेषण देने से कार्य कारण में भेद मालूम होता है,
इसी कारण उस भेद की प्रतीति में प्रमाण देते हैं—
आञ्जस्याद् भेदतो वा गुण सामान्यादेस्तत्सिद्धिः
प्रधानव्यपदेशाद्वा ॥ १२५ ॥
अर्थ—आञ्जस्य ( प्रत्यक्ष ) से, वा कारण के सामान्य
गुण कार्य में पाये जाते हैं। विशेष गुणों में भेद रहता है,
इससे प्रधान व्यपदेश से अर्थात् यह कारण है, यह कार्य है। इस
लौकिक व्यवहार से कार्य कारण के भेद की सिद्धि होती है।
त्रिगुणचेतनत्वादि द्वयोः ॥ १२६ ॥
अब कार्य कारण का भेद कहकर कार्य कारण का साधर्म्य,
अर्थात् बराबरीपन कहते हैं—कि सत्, रज, तम यह तीनों गुण
अचेतनत्वादि धर्म दोनों के समान ही हैं, आदि शब्द से
परिणामित्वादि का ग्रहण होता है।
प्रीत्य प्रीति विषादाद्यैर्गुणा नामन्योन्य
वैधर्म्यम् ॥ १२७ ॥
अर्थ—अब कार्य कारण का परस्पर ( आपस में ) वैधर्म्य
कहते हैं—सत्व, रज, तम, इन गुणों का सुख दुःख मोह इनमें
अन्योऽन्य वैधर्म्य ( एक ही कारण से अनेक-अनेक प्रकार के
कार्य की उत्पत्ति होना ) दिखाई पड़ता है। इस सूत्र में आदि
शब्द से जिनका ग्रहण होता है, उनका वर्णन पञ्चशिखाचार्य
ने इस प्रकार किया है कि सत्वगुण से प्रीति, तितिक्षा, सन्तोष
आदि सुखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं।
इस ही रीति से रजोगुण से अप्रीति शोक आदि दुःखात्मक
अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं, एवं तम से विषाद,
निद्रा ( नींद ) आदि मोहात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य

( ५५ )
पैदा होते हैं। घटरूप कार्य में केवल मिट्टी से रूपमात्र का ही
वैधर्म्य है।
लघ्वादिधर्मैः साधर्म्यं वैधर्म्यञ्चगुणानाम् ॥१२८॥
अर्थ—लघुत्वादि धर्मों से सत्त्वादि गुणों का साधर्म्य और
वैधर्म्य है; जैसे लघुत्व के साथ सर्व सत्वव्यक्तियों का ( सतोगुण
के पदार्थों का साधर्म्य है, रज और तम का वैधर्म्य है, एवं
चंचलत्वादि के साथ रजो व्यक्तियों का ( रजोगुण के पदार्थों का )
साधर्म्य है, और सत्व तम का वैधर्म्य है, इस ही प्रकार
गुरुत्व आदि के साथ तमोव्यक्तियों का ( तमोगुण के पदार्थों
का ) साधर्म्य है, और सत्व, रज से वैधर्म्य है।
प्र०—यद्यपि महदादि स्वरूप से सिद्ध हैं तो भी प्रत्यक्ष से
उनकी उत्पत्ति नहीं दीखती, इसी कारण महदादिकों के कार्य
होने में कोई भी प्रमाण नहीं ?
उ०—उभयान्यत्वात् कार्यत्वं महदादेर्घटा-
दिवत् ॥ १२९ ॥
प्रकृति और पुरुष इन दोनों से महदादिक और ही हैं, इस
सबब उन्हें कार्य मानना चाहिये, जैसे—घट मट्टी से अलग है
इसी सबब कार्य है, क्योंकि मट्टी कहने से न तो घट का बोध
होता है, और न घट कहने से मिट्टी का ही ज्ञान होता है।
इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष कहने से महदादिकों का भी ज्ञान
नहीं होता। इस कारण महदादिकों को प्रकृति और पुरुष से
भिन्न कार्य मानना चाहिये; क्योंकि प्रकृति और पुरुष कारण
हैं, किन्तु कार्य नहीं हैं।
परिणामात् ॥ १३० ॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष परिमित भाव से रहते हैं, कभी घटते
बढ़ते नहीं। इसी सबब उनको कार्य नहीं कह सकते; क्योंकि—

( ५६ )
समन्वयात् ॥ १३१ ॥
अर्थ—मन को आदि लेके जोकि महदादिकों का अवान्तर भेद
हैं, सो अन्नादिकों के मिलने से बढ़ते रहते हैं, और भूखे रहने से
क्षीण होते हैं । इस पूर्वोक्त समन्वय से भी महदादिकों को कार्यत्व
मालूम होता है ; क्योंकि जो नित्य पदार्थ होता है वह अवयव
( टुकड़ा ) रहित होता है, अतः उसका घटना-बढ़ना नहीं हो
सकता । इसका अर्थ यह हुआ कि घटना-बढ़ना आदि कार्य में
हो सकता है, कारण में नहीं हो सकता । मन आदि अन्न के
मिलने से बढ़ते हैं, और न मिलने से घटते हैं। इसी से महदादिकों
का कार्यत्व सिद्ध होता है ।
शक्तितश्चेति ॥ १३२ ॥
अर्थ—महदादिक पुरुष के कारण हैं, इसी में महदादिकों को
कार्यत्व है, क्योंकि इनके बिना पुरुष कुछ नहीं कर सकता,
जैसेकि नेत्रों के बिना कुछ नहीं कर सकता, अर्थात् देख नहीं
सकता, और पुरुष के बिना नेत्र में देखने की शक्ति नहीं हो
सकती ; क्योंकि नेत्र तो जड़ हैं, इस कारण मनुष्य दर्शन रूप
क्रिया को नेत्ररूपी कारण के बिना नहीं कर सकता, इस ही
सबब से नेत्रादिकों को कार्यत्व माना है । इस सूत्र में इति शब्द
से यह जानना चाहिये कि प्रत्येक कार्य की सिद्धि में इतने ही
प्रमाण होते हैं ।
तद्धाने प्रकृतिः पुरुषो वा ॥ १३३ ॥
अर्थ—महदादिकों को कार्य नहीं मानें तो महत्तत्त्व को प्रकृति
वा पुरुष इन दोनों से एक अवश्य माना जायगा ; क्योंकि जो
महदादि परिणामी हों तो प्रकृति, और महदादि अपरिणामी ही
को पुरुष मानना पड़ेगा ।

( ५७ )
प्र०-प्रकृति और पुरुष से भिन्न अर्थात् दूसरा और कोई
पदार्थ मान लिया जाय तो क्या हानि है ?
उ०-तयोरन्यत्वे तुच्छत्वम् ॥ १३४ ॥
अर्थ-हाँ ! हानि है, तुच्छत्व दोष की प्राप्ति होती है; क्योंकि
लोक में प्रकृति और पुरुष के सिवाय अन्य को अवस्तु माना है
अर्थात् प्रकृति और पुरुष यह दोही वस्तु हैं और सब अवस्तु
हैं ; अतएव इसको प्रकृति का कार्य मानना चाहिये । यदि दूसरा
मानें तो इसके कारण भी दूसरे ही मानने पड़ेंगे । इस प्रकार
महदादिकों को कार्यत्व सिद्ध हुआ । अब उनके द्वारा प्रकृति का
अनुमान सिद्ध करते हैं ।
कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यात् ॥ १३५ ॥
अर्थ-कार्य से कारण का अनुमान होता है ; क्योंकि जहाँ-
जहाँ कार्य होता है, वहीं-वहीं कारण भी होता है, और महदादिक
भी अपने कार्यों के उपादान कारण हैं, जैसेकि तिलरूप कार्य
स्वगत ( अपने में रहने वाले ) तेल का उपादान कारण है । इस
कथन से महदादिकों के कार्यत्व में किसी प्रकार की हानि नहीं है ।
अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् ॥ १३६ ॥
अर्थ-महत्तत्वादिकों की अपेक्षा भी मूल कारण प्रकृति
अव्यक्त अर्थात् सूक्ष्म है ; क्योंकि महत्तत्त्व के कार्य सुखादिकों
का प्रत्यक्ष होता है, और सूक्ष्मता के कारण प्रकृति का कोई
गुण प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
प्र०-प्रकृति तो परम सूक्ष्म है, अतः उसका न होना ही
सिद्ध होता है ?
उ०-तत्कार्यतस्तत्सिद्धेर्नापलापः ॥१३७॥
अर्थ-प्रकृति का अभाव ( न होना ) नहीं हो सकता ;
क्योंकि प्रकृति की सिद्धि ( होना ) मालूम पड़ती है । उसके

( ५८ )
कार्य्य महदादिक उसको सिद्ध कर रहे हैं। यहाँ तक प्रकृति का
अनुमान समाप्त हुआ। अब अध्याय की समाप्ति तक पुरुष का
अनुमान कहेंगे।
सामान्येन विवादाभावाद्धर्म वन्न साधनम् ॥१३८॥
अर्थ--जिस वस्तु में सामान्य ही से विवाद नहीं है उसकी
सिद्धि में साधनों की कोई अपेक्षा नहीं, जैसे-प्रकृति में सामान्य
ही से विवाद है, उसकी सिद्धि के वास्ते साधनों की अपेक्षा
आवश्यकता है, वैसे पुरुष में नहीं है; क्योंकि बिना चेतन के
संसार में अँधेरा प्रतीत ( मालूम ) होगा, यहाँ तक कि बौद्ध भी
सामान्यतः कर्म भोक्ता अहं पदार्थ को पुरुष मानते हैं, तो उसमें
किसी प्रकार का विवाद नहीं हो सकता। उदाहरण, धर्मवत्-
धर्म की तरह, जैसे कि धर्म को सभी बौद्ध नास्तिक आदि मानते
हैं, वैसे ही एक चेतन को सभी मानते हैं।
प्र०--पुरुष किसको कहते हैं ?
उ०--शरीरादिव्यतिरिक्तः पुमान् ॥ १३६ ॥
अर्थ--शरीर को आदि से लेकर प्रकृति तक जो २३ पदार्थ
हैं उनसे जो पृथक् है उसका नाम पुरुष है।
प्र०--शरीरादि से जो भिन्न है उसका ही नाम पुरुष है।
इसमें क्या हेतु है ?
उ०--संहतपदार्थत्वात् ॥ १४० ॥
जैसे शय्या आदिक संहत पदार्थ दूसरे के वास्ते सुख के
देने वाले होते हैं, अपने वास्ते नहीं। इसी प्रकार प्रकृत्यादिक
पदार्थ भी दूसरे के वास्ते हैं। स्पष्ट आशय यह है, कि प्रकृति
आदि जितने संहत पदार्थ हैं, वह किसी दूसरे के वास्ते हैं, और
जो वह दूसरा है, उसी का नाम पुरुष है, और संहत देहादि से

( ५६ )
भिन्न का नाम पुरुष है। यह पहले भी कह आये हैं, फिर यहाँ
कहना हेतुओं की केवल गिनती बढ़ानी है।
प्र०—पुरुष को प्रकृति ही क्यों न माना जाय, इसमें क्या
कारण है ?
उ०—त्रिगुणादिविपर्ययात् ॥ १४१ ॥
अर्थ—त्रिगुण अर्थात् सत्, रज, तम, मोह आदि शब्द से
जड़त्वादि, इनसे विपरीत होने से पुरुष प्रकृति नहीं हो सकता,
अर्थात् वह प्रकृति से भिन्न है; क्योंकि त्रिगुणत्व विशिष्ट का
नाम प्रकृति है, अर्थात् सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण; इन से
जिसका सम्बन्ध है, उसका ही नाम प्रकृति माना है, और जिसमें
नित्यत्व, शुद्धत्व, बुद्धत्व मुक्तत्व, यह धर्म हैं, उसका ही नाम
पुरुष है, तो विचारना चाहिये प्रकृति और पुरुष में कितना भेद
है। इस ही कारण पुरुष को प्रकृति नहीं मान सकते हैं।
अधिष्ठानाच्चेति ॥ १४२ ॥
अर्थ—और भी कारण है, पुरुष अधिष्ठान होने से प्रकृति
से जुदा ही है। अधिष्ठान अधिष्ठेय संयोग से मालूम पड़ता है,
कि दो के बिना संयोग हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ
कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। आशय यह है कि जब प्रकृति को
आधार कहते हैं, तब उसमें आधेय भी अवश्य होना चाहिये वह
आधेय पुरुष है।
प्र०—अधिष्ठान किसको कहते हैं ?
उ०—आधार को।
प्र०—आधार शब्द का क्या अर्थ है ?
उ०—रखने की जगह, जैसे पात्र।
प्र०—अधिष्ठेय किसको कहते हैं ?
उ०—आधेय को।

( ६० )
प्र०—आधेय शब्द का क्या अर्थ है ?
उ०—रखने की वस्तु को आधेय कहते हैं, जैसे—घृत "घी"।
भोक्तृ भावात् ॥ १४३ ॥
अर्थ—यदि यह कहो शरीरादिक ही भोक्ता है, तो कर्ता और
कर्म का विरोध होता है; क्योंकि आप ही अपने को भोग नहीं
सकता, अर्थात् शरीरादिक प्रकृति के कार्य्य हैं, और स्रक्चन्दना-
दिक भी प्रकृति के कार्य्य हैं। इस कारण आप अपना भोग नहीं
कर सकता ।
कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १४४ ॥
अर्थ—यदि शरीरादिक को ही भोक्ता माना जायगा, तो
दूसरा दोष यह भी होगा कि मोक्ष के उपाय करने में किसी की
प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि शरीरादि के विनाश होने से आप ही
मोक्ष होना सम्भव है, और तीसरा दोष यह होगा, कि सुख दुःखादि
प्रकृति के स्वाभाविक धर्म हैं, और स्वभाव किसी का नाश नहीं
होता, इस कारण मोक्ष असम्भव है, इससे पुरुष को ही भोक्ता
मानना ठीक है। पूर्व कहे हुए प्रमाणों से पुरुष को २३ तत्त्वों से
भिन्न कह चुके, अब पुरुष क्या वस्तु है, यह विचार करते हैं।
जड प्रकाशाऽयोगात् प्रकाशः ॥ १४५ ॥
इस विषय में वैशेषिक कहते हैं कि प्रकाशस्वरूप आत्मा
मन के संयोग होने से बाह्य ज्ञान से युक्त होता है और पर-
मात्मा प्रकाशमय है, जड़ प्रकृति से प्रकाशमय नहीं हो सकता ।
लोक में जड़ ( प्रकाश रहित ) काष्ठ लोष्टादिक है, और इनमें
प्रकाश किसी तरह नहीं देखने में आता । इस कारण सूर्यादिक के
समान प्रकाशरूप पुरुष जानना चाहिये ।
प्र०--प्रकाशस्वरूप आत्मा में तमादि गुणों का भाव है,
या नहीं ?

( ६१ )
निर्गुणत्वान्नचिद्धर्मा ॥ १४६ ॥
उ०—नहीं ! कारण यह है, कि पुरुष निर्गुण है, इसी
सयब चित्, सत्, रजादि गुणवाला नहीं हो सकता ; क्योंकि
गुण प्रकृति के धर्म हैं ।
प्र०—बहुत तीन गुण पुरुष में मानकर उसको शिव, विष्णु,
ब्रह्मा कहते हैं ?
उ०—श्रुत्या सिद्धस्य नापलापः सत्प्रत्यक्ष
वाधात् ॥ १४७ ॥
अर्थ—यद्यपि उक्त कथन से पुरुष में गुण कल्पना किया
जाता है, लेकिन युक्ति और श्रुति इन दोनों से विरुद्ध है, क्योंकि
श्रुतियों में भी “साक्षी चेता केवलोनिर्गुणश्च” इत्यादि विशेषणों
से पुरुष को निर्गुण ही प्रतिपादन किया है । एवं उस अनुभव
प्रत्यक्ष में दोष भी हो सकता है, क्योंकि वह अनुभव किसको
होगा । यदि पुरुष को होगा, तो ज्ञान को पुरुष से पृथक् वस्तु
मानना पड़ेगा । इस कारण पुरुष निर्गुण है ।
प्र०—जो पुरुष प्रकाशस्वरूप ही है, तो सुषुप्ति आदि
अवस्थाओं की कल्पना नहीं हो सकती, क्योंकि उन अवस्थाओं
में प्रकाशस्वरूपता नहीं रहती । यह जीव पर शङ्का है ?
उ०—सुषुप्त्याद्यसाक्षित्वम् ॥ १४८ ॥
अर्थ—पुरुष सुषुप्ति का आद्य साक्षी है, अर्थात् जिन अन्तः-
करण की वृत्तियों का नाम सुषुप्ति है, वह अन्तःकरण पुरुष के
आश्रय है । इसी कारण उस सुषुप्ति का साक्षी पुरुष है, और
सुषुप्ति अन्तःकरण का धर्म है ।
प्र०—यदि पुरुष प्रकाशस्वरूप है, और अन्तःकरण वृत्तियों
का आश्रय है, तो वह पुरुष एक है वा अनेक ?

( ६२ )
उ०—जन्मादिव्यवस्थातः पुरुषबहुत्वम् ॥१४९॥
संसार में जन्म को आदि लेकर अनेक अवस्था देखने में
आती हैं, तो इससे ही सिद्ध होता है, कि पुरुष बहुत हैं; क्योंकि
यदि सब अन्तःकरण की वृत्तियों का आधार एक ही पुरुष होता,
तो यह घट है, इस घट को मैं जानता हूँ, इस घट को मैं देखता
हूँ। इस प्रकार का अनुभव जिस क्षण में एक अन्तःकरण को
होता है, उसी क्षण में सब अन्तःकरणों को होना चाहिये; क्यों-
कि वह एक ही सबका आश्रयी है, लेकिन संसार में ऐसा देखने
में नहीं आता, इस कारण पुरुष अनेक हैं, और जो कोई-कोई
टीकाकार इस सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि जन्मादि व्यवस्था
ही से बहुत से पुरुष प्रतीत (मालूम) होते हैं वस्तुतः नहीं। उनका
कहना इस कारण अयोग्य है "पुण्यवान् स्वर्गं जायते, पापी नरके,
अज्ञोबध्यते, ज्ञानी मुच्यते।" पुण्यात्मा स्वर्ग में पैदा होता
है, और पापी नरक में पैदा होता है; अज्ञ बन्धन को प्राप्त होता
है, ज्ञानी मुक्त होता है, इत्यादि श्रुतियां बहुत्व (बहुत सारों) को
प्रतिपादन (सुबूत) करती हैं उनसे विरोध होगा।
प्र०—एक पुरुष की ही अनेक जन्मादि व्यवस्था हो सकती
हैं, या एक पुरुष की एक ही जन्मादि व्यवस्था है ?
उ०—उपाधि भेदेप्येकस्य नानायोग आकाश-
स्येव घटादिभिः ॥ १५० ॥
अर्थ—उपाधिभेद (शरीरादि) होने पर भी एक पुरुष
का अनेक जन्मों में अनेक शरीरों से योग- (मेल) होता है;
जैसेकि एक आकाश का घटादिकों के साथ योग होता है।
(खुलासा) एक ही पुरुष जन्मान्तर में अनेक उपाधियों को
धारण करता है, और अनेक योग वाला कहाता है, आकाश के

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समान ; जैसेकि आकाश एक ही है, लेकिन जब घट के साथ
योग को प्राप्त होता है, तो घटाकाश कहलाता है, और मठ के
साथ योग को प्राप्त होता है, तो मठाकाश कहलाता है ; लेकिन
वे उपाधियाँ आकाश को एक ही समय और एक ही देश में
एक साथ नहीं हो सकतीं, अर्थात् जितने स्थान आकाश का नाम
मठाकाश है, उस वक्त उस ही आकाश का नाम घटाकाश किसी
प्रकार नहीं हो सकता, किन्तु मठ की उपाधि को नाश करके
दूसरे वक्त घट के स्थापन होने पर घटाकाश कह सकते हैं । इस
प्रकार ही पुरुष भी एक देश काल में अनेक उपाधियों (शरीरादि)
को नहीं धारण कर सकता है, किन्तु अनेक काल में अनेक
उपाधियों को धारण करके नाना योग वाला कहने में आता है,
अर्थात् एक ही जीव कभी मनुष्य, कभी पशु, पक्षी आदि नाना
प्रकार के शरीर धारण करके एक ही रहता है । इस ही प्रकार
अनेक जीव अनेक उपाधियों को धारण करते हैं, यह ज्ञानियों को
ही अनुभव हो सकता है, और भी इस ही विषय में कहते हैं ।
उपाधिर्भिद्यते न तु तद्वान् ॥ १५१ ॥
अर्थ—उपाधि के बहुत से रूप होते हैं और उपाधि को ही
नानारूपों से बोलते हैं, लेकिन उपाधि वाला पुरुष एक ही है ।
यद्यपि अनेक नव्य (नवीन) वेदान्त शास्त्र के जानने वाले
यह कहा करते हैं, कि एक ही आत्मा का कार्य कारण उपाधि
में प्रतिविम्ब के पड़ने से जीव ईश्वर का भेद है, और प्रति-
विम्ब आपस में जुदे होने से जन्मादि व्यवस्था भी हो सकती है ।
यह उनका कथन इस प्रकार अयोग्य है, इसमें भेद और अभेद
की कोई कल्पना नहीं हो सकती; क्योंकि विम्ब (परछाईं वाला),
प्रतिविम्ब (परछाईं), इन दोनों की बिना अलहदगी माने विम्ब,
प्रतिविम्ब भाव हो ही नहीं सकता, और जीव को ब्रह्म का प्रति-

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विम्व मानते हैं, तो देखते हैं, कि प्रतिबिम्ब जड़ है। अतएव
पुरुष को भोक्ता, बद्ध, मुक्त, कभी नहीं कह सकते हैं, और जीव,
ब्रह्म को एकता के विषय में हानि प्राप्त होगी। अतएव सांख्य
मतानुसार, जीव, ब्रह्म को एक मानना भी नहीं हो सकता है।
एक ही ब्रह्म जीव रूप को धारण करता है इस पक्ष का खण्डन
इस सूत्र से होता है—
एवमैकत्वेन परिवर्तमानस्य न विरुद्ध धर्मा-
ध्यासः ॥ १५२ ॥
अर्थ—यदि एक ही ब्रह्म सम्पूर्ण उपाधियों से मिलकर जीव
रूप हो जाता है, तो उसमें विरुद्ध धर्म दुःख बन्धनादि का
अध्यास अवश्य होगा, इस कारण जीव, ब्रह्म को एक मानना
योग्य नहीं है।
प्र०—जबकि पुरुष को निर्धर्म कह चुके, तब, जन्म, मरण, मोक्ष,
बन्ध आदि धर्म क्योंकर हो सकते हैं ?
उ०—यह धर्म परिणामी नहीं है, जैसे—स्फटिक मणि के
पास काला, पीला, हरा इत्यादि रङ्गों के रख देने से वह मणि भी
नीली, पीली, काली दीखने लगती है, लेकिन मणि तो वास्तव में
सफेद ही है, इस प्रकार ही पुरुष में भी मन के धर्म सुख, दुःखादि
शरीर के धर्म, पिता, पुत्रादि प्रतीत होते हैं।
अन्यधर्मत्वेपि नारोपात् तत्सिद्धेरेकत्वात् ॥१५३
अर्थ—मन आदिकों का धर्म जो सुख, दुःखादि उस धर्म का
पुरुष में आरोप करने पर भी पुरुष को परिणामित्व की सिद्धि
नहीं हो सकती, क्योंकि सुख, दुःखादि पुरुष के धर्म नहीं हैं,
किन्तु मत के धर्म हैं। पुरुष जन्मान्तर में एक ही बना रहता है।
जब हर एक शरीर में एक-एक पुरुष है तो नाना पुरुष सिद्ध हुए

( ६५ )
और “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादिक अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियों
से विरोध होगा ?
उ०—नाद्वैतश्रुति विरोधो जातिपरत्वात् ॥१५४॥
अर्थ—अद्वैत को प्रतिपादन (सिद्ध) करनेवाली श्रुतियों
से विरोध न होगा, क्योंकि वहाँ पर अद्वैत शब्द जाति पर है ;
जैसे—एक आदमी के समान कोई नहीं है, जैसा कि संसार में
देखने में आता है, कि अमुक पुरुष अद्वितीय है। इसका आशय
यह है, कि उसके समान दूसरा और कोई नहीं है। इस ही प्रकार
ईश्वर को भी अद्वैत व अद्वितीय कहते हैं।
प्र०—जिस रीति से अद्वैत श्रुतियों का विरोध दूर करने के
वास्ते ईश्वर में अद्वैत शब्द जाति पर कहा है, उस प्रकार ही
पुरुष को भी ईश्वर का ही रूपान्तर क्यों नहीं मानते ?
उ०—विदितबन्धकारणस्यदृष्ट्यातद्रूपम् ॥१५५॥
अर्थ—मनुष्य के बन्ध आदि कारण सब विदित हैं, और
ईश्वर नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप है, इस कारण ईश्वर का
रूपान्तर नहीं हो सकता ।
प्र०—यदि जीव ईश्वर का रूपान्तर नहीं है, तो अनेक
शरीर धारण करने पर भी एक ही पुरुष रहता है, इसमें क्या
प्रमाण है ?
उ०—नान्धदृष्ट्याचक्षुष्मतामनुपलम्भः ॥१५६॥
अर्थ—जो पदार्थ अन्धे को नहीं दीखे, उसका अभाव नेत्र-
वान् मनुष्य कदापि नहीं कह सकता ; क्योंकि उसकी नेत्रेन्द्रिय
की शक्ति नष्ट हो गई है, इस कारण उसको दीख नहीं सकता,
और चक्षुष्मान् के नेत्रेन्द्रिय की शक्ति वर्त्तमान है, इस कारण
वह अभाव नहीं कह सकता ।