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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 192 में से

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भिन्न का नाम पुरुष है। यह पहले भी कह आये हैं, फिर यहाँ
कहना हेतुओं की केवल गिनती बढ़ानी है।
प्र०—पुरुष को प्रकृति ही क्यों न माना जाय, इसमें क्या
कारण है ?
उ०—त्रिगुणादिविपर्ययात् ॥ १४१ ॥
अर्थ—त्रिगुण अर्थात् सत्, रज, तम, मोह आदि शब्द से
जड़त्वादि, इनसे विपरीत होने से पुरुष प्रकृति नहीं हो सकता,
अर्थात् वह प्रकृति से भिन्न है; क्योंकि त्रिगुणत्व विशिष्ट का
नाम प्रकृति है, अर्थात् सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण; इन से
जिसका सम्बन्ध है, उसका ही नाम प्रकृति माना है, और जिसमें
नित्यत्व, शुद्धत्व, बुद्धत्व मुक्तत्व, यह धर्म हैं, उसका ही नाम
पुरुष है, तो विचारना चाहिये प्रकृति और पुरुष में कितना भेद
है। इस ही कारण पुरुष को प्रकृति नहीं मान सकते हैं।
अधिष्ठानाच्चेति ॥ १४२ ॥
अर्थ—और भी कारण है, पुरुष अधिष्ठान होने से प्रकृति
से जुदा ही है। अधिष्ठान अधिष्ठेय संयोग से मालूम पड़ता है,
कि दो के बिना संयोग हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ
कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। आशय यह है कि जब प्रकृति को
आधार कहते हैं, तब उसमें आधेय भी अवश्य होना चाहिये वह
आधेय पुरुष है।
प्र०—अधिष्ठान किसको कहते हैं ?
उ०—आधार को।
प्र०—आधार शब्द का क्या अर्थ है ?
उ०—रखने की जगह, जैसे पात्र।
प्र०—अधिष्ठेय किसको कहते हैं ?
उ०—आधेय को।