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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है ।

( १०७ )
के वास्ते प्रकृति सृष्टि की निवृत्ति और किसी के वास्ते प्रवृत्ति हो
इसमें क्या नियम है ?
उ०—कर्म का प्रवाह ही इसमें नियम है ।
प्र०—यह उत्तर ठीक नहीं, क्योंकि न मालूम किस मनुष्य
का कौन-सा कर्म है ? यह भी कोई निश्चय किया हुआ नियम
नहीं है ?
उ०—नैरपेक्ष्येऽपि प्रकृत्युपकारेऽविवेको
निमित्तम् ॥ ६८ ॥
अर्थ—यद्यपि सब पुरुष निरपेक्ष हैं, अर्थात् एक दूसरे की
अपेक्षा नहीं रखता, तथापि यह मेरा स्वामी है, मैं इसका सेवक
हूँ ; इस तरह प्रकृति के उपकार में ( सृष्टि करने में ) अविवेक
ही निमित्त है । प्रत्यक्ष यह है कि जब प्रकृति यह बात चाहती
है, कि यह मनुष्य मुक्त हो, तब ही उसको अपनी सृष्टि के भीतर
रखकर अनेक प्रकार के कार्यों में लगा देती है, और उन्हीं कार्यों
को करता हुआ वह मनुष्य किसी न किसी जन्म में विवेकी
( ज्ञानी ) होकर मुक्त हो जाता है; इसी वास्ते आचार्य ने
सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है ।
प्र०—जबकि प्रकृति का स्वभाव वर्त्तमान मान लिया है,
तो ज्ञान के उत्पन्न होने पर क्यों निवृत्त हो जाती है ? क्योंकि
जो जिसका स्वाभाविक धर्म है, वह सब जगह एकसा रहना
चाहिए ?
उ०—नर्त्तकीवत् प्रवृत्तस्यापि निवृत्तिश्चा-
रितार्थ्यात् ॥ ६९ ॥
अर्थ—जैसे नाच करनेवाली का नाच करना स्वभाव है, वह
सब सभा को नाच दिखाती है, और जब नाच करते करते उसके

( १०८ )
मनोरथ पूरे हो जाते हैं, तब वह नाच करने से निवृत्त हो
जाती है; इसी तरह यद्यपि प्रकृति का सृष्टि करना स्वभाव है,
परन्तु उस सृष्टि करने का जो प्रयोजन है वह विवेक के उत्पन्न
होने से निवृत्त होजाता है, अतएव उससे निवृत्त भी होजाती है।
अब मुक्ति से पुनरागमन होता है या नहीं, इसपर यहां
इस कारण विचार किया जाता है, कि इस ऊपर के सूत्र में
विवेक के उपरान्त सृष्टि की निवृत्ति प्रतिपादन कर चुके, और
इस पर यह सन्देह होता है, कि जब प्रकृति यह समझ लेती
होगी, कि पुरुष को मेरे संयोग से अनेक दुःखादि होते हैं, अत-
एव फिर उसका संयोग किसी काल में न कहना चाहिये। इसी
मत पर तो आचार्य विचार करते हैं।
दोषबोधेऽपि नोपसर्पणं प्रधानस्य कुल-
वधूवत् ॥ ७० ॥
अर्थ—पुरुष को मेरे संयोग से दुःख होगा, इस बात में
प्रकृति अपना दोष जानती है, तो क्या फिर उसका संयोग नहीं
करती, किन्तु अवश्य करती है, जैसे—अच्छे वंश की पतिव्रता स्त्री
से यदि कोई दोष हो भी जाय, और उससे स्वामी को कष्ट भी
पहुँचे, तब क्या वह अपने पति के पास का जाना छोड़ देगी ?
ऐसा नहीं होसकता, अवश्य जायगी; क्योंकि जो पति को त्यागती
है, तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट होता है। और भी प्रकार से
अन्य आचार्यों ने इस सूत्र का अर्थ किया है, कि जब प्रकृति
अपना दोष जान लेती है तब लज्जा के वश होकर फिर कभी
पुरुष के पास नहीं जाती, जैसे कुलवधू नहीं जाती। इस अर्थ
के करने से उनका तात्पर्य यह है, कि मुक्ति से पुनरावृत्ति नहीं
होती, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानभिक्षु ने "अपि"
शब्द का कुछ भी आशय नहीं निकाला, और न यह समझा

( १०६ )
कि जो अपने दोष से पति को छोड़ दे, वह कुलवधू कैसे हो
सकती है। कुलवधू वही होती है, जो अपने दोष को स्वामी से
क्षमा कराकर अपने स्वामी की सेवा में तत्पर ( लगी ) रहे ;
किन्तु अन्य टीकाकारों ने इस दृष्टान्त के गूढ़ आशय को बिना
समझे जो लिख दिया है, सो योग्य नहीं है, अथवा आचार्य्य
को यही बात माननीय थी, कि मुक्ति से फिर नहीं लौटता, तो
इन से पहिले सूत्र में इस बात को एक दृष्टांत के द्वारा प्रतिपादन
कर ही चुके थे, फिर इस सूत्र को बनाकर पुनरुक्ति क्यों करते ।
इसी ज्ञापक से सिद्ध है, कि मुक्ति से फिर लौट आता है, लेकिन
इस पुनरुक्ति को अन्य आचार्य नहीं समझे। पुरुष का बन्ध और
मोक्ष किस से होता है ? इस बात का विचार करते हैं ।
नैकान्ततो बन्धमोक्षौ पुरुषस्याविवेकादृते ॥७१॥
अर्थ—पुरुष को बन्ध मोक्ष स्वाभाविक नहीं है, किन्तु
अविवेक ही से होते हैं।
प्रकृतेराञ्जस्यात् ससंगत्वात् पशुवत् ॥ ७२ ॥
अर्थ—जब विचार करते हैं, तो ज्ञात होता है, कि प्रकृति
का संयोग पुरुष को रहता है, उसीसे पुरुष का बन्ध है। प्रकृति
का संयोग छूटना ही मोक्ष है, जैसे पशु रस्सी के संयोग से
बँध जाता है; और उसका संयोग छूट जाता है, तब वह मुक्त हो
जाता है; इसी तरह मनुष्य को भी जानना चाहिये ।
प्र०-प्रकृति कौन-से साधनों से बन्धन करती है, और
कैसे मुक्त करती है ?
उ०—रूपैः सप्तभिरात्मानं बध्नाति प्रधानं
कोशकारवद्विमोचयत्येकरूपेण ॥ ७३ ॥
अर्थ-धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और

( ११० )
अनैश्वर्य—इन सात रूपों से प्रकृति पुरुष का बन्धन करती है,
जैसे—तलवार के म्यान बनानेवाले की कारीगरी से तलवार ढकी
रहती है, इसी तरह प्रकृति से पुरुष को भी समझना चाहिये,
और वही प्रकृति ज्ञान से आत्मा को दुःखों से मुक्त कर देती है।
प्र०—जब मुक्ति में हेतु ज्ञान कहा, और धर्म्मादिक सब
बन्धन के हेतु कहे, तो धर्म में क्यों किसी की प्रवृत्ति होगी, और
क्यों ध्यानादि के वास्ते उपाय किया जावेगा ?
उ०—निमित्तत्वमविवेकस्येति न दृष्टहानिः।७४
अर्थ—मुक्ति के न होने में अज्ञान ही ( अविवेक ) निमित्त
है, इस वास्ते उसकी निवृत्ति ही के वास्ते यत्न करना चाहिये
और उस यत्न में धर्म्मानुष्ठान आदि चित्तशोधक कर्म भी परि-
गणित हैं, अतः उसकी हानि नहीं हो सकती ; क्योंकि बिना धर्म,
ध्यान आदि किये, कोई भी ज्ञानवान् हो ही नहीं सकता। अब
विवेक कैसे होता है, उसका उपाय कहते हैं—
तत्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेक
सिद्धिः ॥ ७५ ॥
अर्थ—देह आत्मा नहीं है, पुत्र आत्मा नहीं है, इन्द्रियाँ
आत्मा नहीं हैं, मन आत्मा नहीं है। इस प्रकार नेति-नेति करके
त्याग से और तत्त्वाभ्यास करने से विवेक की सिद्धि हो जाती
है। श्रुति भी इसी आशय को कहती है, “अर्थात् आदेशो नेति
नेतीति त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः”।
अधिकारिभेदान्न नियमः ॥ ७६ ॥
अर्थ—कोई मूर्ख बुद्धिवाले होते हैं, कोई विलक्षण ( श्रेष्ठ )
बुद्धिवाले होते हैं। इस कारण एक ही जन्म में सबको विवेक