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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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बन सकता। इसका उत्तर यह है, कि कार्य की अवस्थाओं का ही
भाव अभाव कहते हैं न कि कार्य का और जो अनवस्था दोष
दिया उसका उत्तर यह है:—
पारम्पर्यतोऽन्वेषणा बीजांकुरवत् ॥ १२२ ॥
बीज और अंकुर के समान अर्थात् जब विचार किया
जाता है कि पहिले बीज था या वृक्ष, इस विषय में परम्परा
मानी गई है। इसी तरह अभिव्यक्ति मानो गई है, सिर्फ
भेद इतना ही है, कि उसमें क्रमिक परम्परा दोष उत्पन्न
होता है, अर्थात् पहिले कौन था, और इसमें एक-कालिक
एक ही समय में एक का दूसरे से उत्पन्न होना यह दोष होगा,
लेकिन यह दोष इस कारण माना जाता है, कि पातञ्जलभाष्य
में भी व्यासजी ने कार्यों को स्वरूप में नित्य और अवस्थाओं
से विनाशी माना है, वहां अनवस्था दोष को प्रामाणिक माना
है। यह बीजाङ्कुर का दृष्टान्त केवल लौकिक है, वास्तव में यहाँ
जन्म और कर्म का दृष्टान्त दिया जाता तो श्रेष्ठ था ; जैसे—जन्म
से कर्म होता है या कर्म से जन्म, क्योंकि बीजाङ्कुर के झगड़े
में कोई-कोई आदि सर्ग में वृक्ष के बिना ही बीज की उत्पत्ति मानते
हैं, वास्तव में अवस्था कोई वस्तु नहीं है, इसको कहते हैं:—
उत्पत्तिवद्वादोषः ॥ १२३ ॥
जैसेकि घट की उत्पत्ति के स्वरूप को ही वैशेषिकादि
असत् कार्यवादी कमी के सबब मानते हैं, अर्थात् यह उत्पत्ति
किस से उत्पन्न हुई, ऐसा सन्देह नहीं करते, केवल एक ही
उत्पत्ति को मानते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की उत्पत्ति किस
से हुई, यह विवाद नहीं करना चाहिये। केवल अभिव्यक्ति को
ही मानना चाहिये। सत्कार्यवादी और असत् कार्यवादी इन
दोनों में केवल इतना ही भेद है, कि असत् कार्यवादी कार्य