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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

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नाशः कारण लयः ॥ १२१ ॥
"लीङ्" श्लेषणे धातु से लय शब्द बनता है। अति सूक्ष्मता
के साथ कार्य्य का कारण में मिल जाना, इसी का नाम नाश है।
कार्य्य की व्यतीत अवस्था अर्थात् जो अवस्था कार्य्य की उत्पत्ति
से पूर्व थी, उसी को धारण कर लेना और जो नाश भविष्यत्
में होनेवाला है, उसी का नाम प्रागभाव नामक नाश है। कोई
कोई यह कहते हैं कि जो वस्तु नाश हो जाती है उसकी
पुनरुत्पत्ति नहीं होती, परन्तु यह कहना सर्वथा अयोग्य है,
क्योंकि इस कथन से प्रत्यभिज्ञा में दोष होगा, अर्थात् जिस
पदार्थ को दो वर्ष पहले देखा था, उसको ही इस समय देखने से
यह ज्ञान होता है कि जो पदार्थ पहिले देखा था उसीको इस समय
देखता हूँ। इस ज्ञान में यह दोष होगा कि जो ज्ञान पूर्व हुआ था
वह इतने दिन तक नष्ट रहा और फिर भी समयानुसार उत्पन्न
होगया। यदि नष्ट हुये कार्य्य की दूसरी बार अनुत्पत्ति ही ठीक
होती तो इसमें अनुत्पत्ति का लक्षण पाया भी जाता। अतएव
यही कहना ठीक है कि नाश को प्राप्त कार्य्य फिर भी उत्पन्न हो
सकता है। अब यह सन्देह होता है कि यदि पहिले कहा हुआ ही
पक्ष ठीक है, तो अपने कारण में कार्य्य का नाश होता क्यों नहीं
दीखता, जैसे—तन्तु कपास से पैदा होते हैं, परन्तु नाश के समय
वह मिट्टी में मिल जाते हैं। इसका उत्तर यह है कि कार्य्य का
कारण में लय होजाना विवेकी पुरुषों को दीखता है और
अविवेकियों को नहीं दीखता, जैसे—तन्तु मिट्टी के रूप होजाते
हैं और मिट्टी कपास के वृक्षरूप होजाती है और वह वृक्ष फूल,
फल, कपास आदि रूप से परिणाम को प्राप्त होता है और जब
कार्य्य का नाम और उसीके समान कुछ बदला हुआ रूप संसार
में मौजूद है, तब नाश, ऐसा कहना भी योग्य नहीं। यही