सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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कार्य्य महदादिक उसको सिद्ध कर रहे हैं। यहाँ तक प्रकृति का
अनुमान समाप्त हुआ। अब अध्याय की समाप्ति तक पुरुष का
अनुमान कहेंगे।
सामान्येन विवादाभावाद्धर्म वन्न साधनम् ॥१३८॥
अर्थ--जिस वस्तु में सामान्य ही से विवाद नहीं है उसकी
सिद्धि में साधनों की कोई अपेक्षा नहीं, जैसे-प्रकृति में सामान्य
ही से विवाद है, उसकी सिद्धि के वास्ते साधनों की अपेक्षा
आवश्यकता है, वैसे पुरुष में नहीं है; क्योंकि बिना चेतन के
संसार में अँधेरा प्रतीत ( मालूम ) होगा, यहाँ तक कि बौद्ध भी
सामान्यतः कर्म भोक्ता अहं पदार्थ को पुरुष मानते हैं, तो उसमें
किसी प्रकार का विवाद नहीं हो सकता। उदाहरण, धर्मवत्-
धर्म की तरह, जैसे कि धर्म को सभी बौद्ध नास्तिक आदि मानते
हैं, वैसे ही एक चेतन को सभी मानते हैं।
प्र०--पुरुष किसको कहते हैं ?
उ०--शरीरादिव्यतिरिक्तः पुमान् ॥ १३६ ॥
अर्थ--शरीर को आदि से लेकर प्रकृति तक जो २३ पदार्थ
हैं उनसे जो पृथक् है उसका नाम पुरुष है।
प्र०--शरीरादि से जो भिन्न है उसका ही नाम पुरुष है।
इसमें क्या हेतु है ?
उ०--संहतपदार्थत्वात् ॥ १४० ॥
जैसे शय्या आदिक संहत पदार्थ दूसरे के वास्ते सुख के
देने वाले होते हैं, अपने वास्ते नहीं। इसी प्रकार प्रकृत्यादिक
पदार्थ भी दूसरे के वास्ते हैं। स्पष्ट आशय यह है, कि प्रकृति
आदि जितने संहत पदार्थ हैं, वह किसी दूसरे के वास्ते हैं, और
जो वह दूसरा है, उसी का नाम पुरुष है, और संहत देहादि से