सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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समान ; जैसेकि आकाश एक ही है, लेकिन जब घट के साथ
योग को प्राप्त होता है, तो घटाकाश कहलाता है, और मठ के
साथ योग को प्राप्त होता है, तो मठाकाश कहलाता है ; लेकिन
वे उपाधियाँ आकाश को एक ही समय और एक ही देश में
एक साथ नहीं हो सकतीं, अर्थात् जितने स्थान आकाश का नाम
मठाकाश है, उस वक्त उस ही आकाश का नाम घटाकाश किसी
प्रकार नहीं हो सकता, किन्तु मठ की उपाधि को नाश करके
दूसरे वक्त घट के स्थापन होने पर घटाकाश कह सकते हैं । इस
प्रकार ही पुरुष भी एक देश काल में अनेक उपाधियों (शरीरादि)
को नहीं धारण कर सकता है, किन्तु अनेक काल में अनेक
उपाधियों को धारण करके नाना योग वाला कहने में आता है,
अर्थात् एक ही जीव कभी मनुष्य, कभी पशु, पक्षी आदि नाना
प्रकार के शरीर धारण करके एक ही रहता है । इस ही प्रकार
अनेक जीव अनेक उपाधियों को धारण करते हैं, यह ज्ञानियों को
ही अनुभव हो सकता है, और भी इस ही विषय में कहते हैं ।
उपाधिर्भिद्यते न तु तद्वान् ॥ १५१ ॥
अर्थ—उपाधि के बहुत से रूप होते हैं और उपाधि को ही
नानारूपों से बोलते हैं, लेकिन उपाधि वाला पुरुष एक ही है ।
यद्यपि अनेक नव्य (नवीन) वेदान्त शास्त्र के जानने वाले
यह कहा करते हैं, कि एक ही आत्मा का कार्य कारण उपाधि
में प्रतिविम्ब के पड़ने से जीव ईश्वर का भेद है, और प्रति-
विम्ब आपस में जुदे होने से जन्मादि व्यवस्था भी हो सकती है ।
यह उनका कथन इस प्रकार अयोग्य है, इसमें भेद और अभेद
की कोई कल्पना नहीं हो सकती; क्योंकि विम्ब (परछाईं वाला),
प्रतिविम्ब (परछाईं), इन दोनों की बिना अलहदगी माने विम्ब,
प्रतिविम्ब भाव हो ही नहीं सकता, और जीव को ब्रह्म का प्रति-