सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

( ६० )
प्र०—आधेय शब्द का क्या अर्थ है ?
उ०—रखने की वस्तु को आधेय कहते हैं, जैसे—घृत "घी"।
भोक्तृ भावात् ॥ १४३ ॥
अर्थ—यदि यह कहो शरीरादिक ही भोक्ता है, तो कर्ता और
कर्म का विरोध होता है; क्योंकि आप ही अपने को भोग नहीं
सकता, अर्थात् शरीरादिक प्रकृति के कार्य्य हैं, और स्रक्चन्दना-
दिक भी प्रकृति के कार्य्य हैं। इस कारण आप अपना भोग नहीं
कर सकता ।
कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १४४ ॥
अर्थ—यदि शरीरादिक को ही भोक्ता माना जायगा, तो
दूसरा दोष यह भी होगा कि मोक्ष के उपाय करने में किसी की
प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि शरीरादि के विनाश होने से आप ही
मोक्ष होना सम्भव है, और तीसरा दोष यह होगा, कि सुख दुःखादि
प्रकृति के स्वाभाविक धर्म हैं, और स्वभाव किसी का नाश नहीं
होता, इस कारण मोक्ष असम्भव है, इससे पुरुष को ही भोक्ता
मानना ठीक है। पूर्व कहे हुए प्रमाणों से पुरुष को २३ तत्त्वों से
भिन्न कह चुके, अब पुरुष क्या वस्तु है, यह विचार करते हैं।
जड प्रकाशाऽयोगात् प्रकाशः ॥ १४५ ॥
इस विषय में वैशेषिक कहते हैं कि प्रकाशस्वरूप आत्मा
मन के संयोग होने से बाह्य ज्ञान से युक्त होता है और पर-
मात्मा प्रकाशमय है, जड़ प्रकृति से प्रकाशमय नहीं हो सकता ।
लोक में जड़ ( प्रकाश रहित ) काष्ठ लोष्टादिक है, और इनमें
प्रकाश किसी तरह नहीं देखने में आता । इस कारण सूर्यादिक के
समान प्रकाशरूप पुरुष जानना चाहिये ।
प्र०--प्रकाशस्वरूप आत्मा में तमादि गुणों का भाव है,
या नहीं ?