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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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अभाव ही मानना चाहिये, नहीं शशशृङ्ग की अप्रतीति भी अति
सूक्ष्म होने से माननी पड़ेगी ?
कार्य्यदर्शनात्तदुपलब्धेः ॥ ११० ॥
उ०-संसार में प्रकृति के कार्यों को देखने से प्रकृति का होना
सिद्ध होता है ; क्योंकि कार्य्य को देखने से कारण का अनुमान
होता है, और इन कार्यों को बिगाड़कर सूक्ष्म होकर कारण में
लय होने से कारण की सूक्ष्मता का अनुमान होता है ।
वादिविप्रतिपत्तेस्तदसिद्धिरिति चेत् ॥ १११ ॥
यदि संसार में वादी लोग प्रकृति की असिद्धि में यह हेतु दें
कि कोई ब्रह्म को जगत् का कारण मानते हैं, कोई परमाणुओं
को, कोई जगत् को अनुत्पन्न ही मानते हैं, तो इस जगत्-रूप
कार्य्य से प्रकृति के अनुमान करने में क्या हेतु है ? प्रथम तो
जगत् का कार्य होना साध्य है, दूसरे कारण ब्रह्म है, या प्रकृति
यह संशयात्मक है, इसलिये प्रकृति असिद्ध है ।
तथाप्येकतरदृष्ट्या एकतरसिद्धेर्नोपलापः ॥११२
जब एक कार्य को देखकर कारण का अनुमान होता है
और कारण को देखकर कार्य का अनुमान होता है, तो प्रकृति
को कारण सिद्ध मानना अनुचित नहीं, क्योंकि सब कार्य प्रकृति
में लय होते हैं । द्वितीय पुरुष जो अपरिणामी है उसको परिणामी
प्रकृति के अविवेक से बन्ध और विवेक से मुक्ति होती है ।
त्रिविधविरोधापत्तेश्च ॥ ११३ ॥
सब कार्य तीन प्रकार के होते हैं-अतीत अर्थात गुजरा
हुआ, दूसरे वर्त्तमान, तीसरे आनेवाला । यदि कार्य को सत न
माने तो यह तीन प्रकार का व्यवहार-जैसे, घट टूट गया, अथवा