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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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निर्गुणत्वान्नचिद्धर्मा ॥ १४६ ॥
उ०—नहीं ! कारण यह है, कि पुरुष निर्गुण है, इसी
सयब चित्, सत्, रजादि गुणवाला नहीं हो सकता ; क्योंकि
गुण प्रकृति के धर्म हैं ।
प्र०—बहुत तीन गुण पुरुष में मानकर उसको शिव, विष्णु,
ब्रह्मा कहते हैं ?
उ०—श्रुत्या सिद्धस्य नापलापः सत्प्रत्यक्ष
वाधात् ॥ १४७ ॥
अर्थ—यद्यपि उक्त कथन से पुरुष में गुण कल्पना किया
जाता है, लेकिन युक्ति और श्रुति इन दोनों से विरुद्ध है, क्योंकि
श्रुतियों में भी “साक्षी चेता केवलोनिर्गुणश्च” इत्यादि विशेषणों
से पुरुष को निर्गुण ही प्रतिपादन किया है । एवं उस अनुभव
प्रत्यक्ष में दोष भी हो सकता है, क्योंकि वह अनुभव किसको
होगा । यदि पुरुष को होगा, तो ज्ञान को पुरुष से पृथक् वस्तु
मानना पड़ेगा । इस कारण पुरुष निर्गुण है ।
प्र०—जो पुरुष प्रकाशस्वरूप ही है, तो सुषुप्ति आदि
अवस्थाओं की कल्पना नहीं हो सकती, क्योंकि उन अवस्थाओं
में प्रकाशस्वरूपता नहीं रहती । यह जीव पर शङ्का है ?
उ०—सुषुप्त्याद्यसाक्षित्वम् ॥ १४८ ॥
अर्थ—पुरुष सुषुप्ति का आद्य साक्षी है, अर्थात् जिन अन्तः-
करण की वृत्तियों का नाम सुषुप्ति है, वह अन्तःकरण पुरुष के
आश्रय है । इसी कारण उस सुषुप्ति का साक्षी पुरुष है, और
सुषुप्ति अन्तःकरण का धर्म है ।
प्र०—यदि पुरुष प्रकाशस्वरूप है, और अन्तःकरण वृत्तियों
का आश्रय है, तो वह पुरुष एक है वा अनेक ?