सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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सिद्धान्त महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलिजी का भी है, कि
आकृति नित्य है। अब यहाँ यह सन्देह होता है कि अभिव्यक्ति
कार्य की उत्पत्ति के पूर्व भी थी या नहीं थी ? यदि थी तो कारण
के यत्न से पूर्व अभिव्यक्ति को स्वकार्य-जनकता दोष होगा
और उत्पत्ति के लिए जो कारण द्वारा यत्न किया जाता है वह
व्यर्थ होगा। यदि कार्य की उत्पत्ति से पहिले अभिव्यक्ति नहीं
थी तो सत्कार्य पक्ष में हानि होगी ; क्योंकि जब यह कह चुके
हैं कि जो कार्य पूर्व था, उसी की इस समय उत्पत्ति होती है,
किन्तु असत् की उत्पत्ति नहीं होती, तो अभिव्यक्ति का पूर्व में
अभाव कहने में दोष होगा। यदि यह कहा जाय कि अभिव्यक्ति
तो पूर्व भी थी लेकिन एक अभिव्यक्ति से दूसरी अभिव्यक्ति कारण
द्वारा होती जाती है, इसीलिये कारण व्यापार है, ऐसा कहने पर
अनवस्था दोष होगा ; क्योंकि एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी,
इसी तरह कहते जाओ, लेकिन कहीं भी विश्राम नहीं हो सकता,
इस कारण यह अनवस्था दोष हो गया। इन पूर्व कहे दोषों के
उत्तर यह हैं—प्रथम तो कारण व्यापार से सब कार्यों की उत्पत्ति
होती है, इस प्रकार पूर्वोक्त शंका ही नहीं हो सकती। दूसरे यदि
यह भी मान लिया जाय कि अभिव्यक्ति पहिले नहीं थी, तो भी
कारण व्यापार द्वारा उसकी सत्ता प्रकाश करने के वास्ते सदैव
आवश्यक है, तब कोई दोष नहीं हो सकता। तीसरे यह भी है कि
जब कार्य्य की अनागत अवस्था में ( जबतक कार्य उत्पन्न नहीं
हुआ ) सत् कार्य्यवाद की कोई हानि नहीं हो सकती, तब दोष भी
नहीं हो सकता ; क्योंकि जबतक घट पैदा ही नहीं हुआ, उससे
पहिले भी सत् कार्य्यवादी मिट्टी में घट को मानते हैं, इसी प्रकार
अभिव्यक्ति को भी समझना चाहिये। यदि कोई ऐसा सन्देह करे
कि कार्य का प्रागभाव “पहिले न होना” ही नहीं मानते तो घट
पहिले नहीं था, किन्तु अब पैदा हुआ है, ऐसा कहना भी नहीं