सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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और “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादिक अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियों
से विरोध होगा ?
उ०—नाद्वैतश्रुति विरोधो जातिपरत्वात् ॥१५४॥
अर्थ—अद्वैत को प्रतिपादन (सिद्ध) करनेवाली श्रुतियों
से विरोध न होगा, क्योंकि वहाँ पर अद्वैत शब्द जाति पर है ;
जैसे—एक आदमी के समान कोई नहीं है, जैसा कि संसार में
देखने में आता है, कि अमुक पुरुष अद्वितीय है। इसका आशय
यह है, कि उसके समान दूसरा और कोई नहीं है। इस ही प्रकार
ईश्वर को भी अद्वैत व अद्वितीय कहते हैं।
प्र०—जिस रीति से अद्वैत श्रुतियों का विरोध दूर करने के
वास्ते ईश्वर में अद्वैत शब्द जाति पर कहा है, उस प्रकार ही
पुरुष को भी ईश्वर का ही रूपान्तर क्यों नहीं मानते ?
उ०—विदितबन्धकारणस्यदृष्ट्यातद्रूपम् ॥१५५॥
अर्थ—मनुष्य के बन्ध आदि कारण सब विदित हैं, और
ईश्वर नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप है, इस कारण ईश्वर का
रूपान्तर नहीं हो सकता ।
प्र०—यदि जीव ईश्वर का रूपान्तर नहीं है, तो अनेक
शरीर धारण करने पर भी एक ही पुरुष रहता है, इसमें क्या
प्रमाण है ?
उ०—नान्धदृष्ट्याचक्षुष्मतामनुपलम्भः ॥१५६॥
अर्थ—जो पदार्थ अन्धे को नहीं दीखे, उसका अभाव नेत्र-
वान् मनुष्य कदापि नहीं कह सकता ; क्योंकि उसकी नेत्रेन्द्रिय
की शक्ति नष्ट हो गई है, इस कारण उसको दीख नहीं सकता,
और चक्षुष्मान् के नेत्रेन्द्रिय की शक्ति वर्त्तमान है, इस कारण
वह अभाव नहीं कह सकता ।