सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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प्रकृति का विकार है, तो इसके दुःख सुख का हमें लेश भी नहीं
प्रतीत होता ।
प्र०-प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राकृतिक ज्ञान नहीं होता, इसलिये
प्रकृति असिद्ध है ; क्योंकि वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं ?
उ०-विषयोऽविषयोऽप्यति दूरादेर्हानोपा-
दानाभ्यामिन्द्रियस्य ॥ १०८ ॥
इन्द्रियों के विषय अति दूरादि कारणों से अविषय हो जाते हैं,
इस वास्ते किसी इन्द्रिय का विषय न होने से प्रकृति की असिद्धि
नहीं हो सकती है, जैसे-अभी एक मनुष्य था, परन्तु थोड़े काल
में दूर चला गया, अब वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं रहा ।
प्र०-कितने कारण हैं जिनसे वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान
नहीं होता ?
उ०-अति दूर होने से, अति समीप होने से, इन्द्रिय के
बिगड़ जाने से, मन के अस्थिर न होने, या मन के दूसरे काम में
लगे होने से, अति सूक्ष्म होने से, बीच में परदा होने से इत्यादि,
और भी कई कारणों से प्रत्यक्ष का विषय अविषय होता है,
इसलिये किसी वस्तु के प्रत्यक्ष न होने से उसकी असिद्धि नहीं
हो सकती ।
प्र०-प्रकृति का प्रत्यक्ष न होने मैं क्या कारण है ?
सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः ॥ १०६ ॥
उ०-प्रकृति और पुरुष का सूक्ष्म होने से प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं
होता, सूक्ष्म होने से अत्यन्त अणु होना अभिप्राय नहीं ; क्योंकि
प्रकृति और पुरुष सर्वत्र व्यापक हैं, इनका प्रत्यक्ष योगियों को ही
होता है ।
प्र०-प्रकृति के प्रत्यक्ष न होने से यह क्यों माना जावे, कि
अति सूक्ष्म होने से प्रकृति का प्रत्यक्ष नहीं होता, किन्तु प्रकृति का