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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

सूत्र में भी दिखलाया गया है, कि जब तक दिशा का प्रत्यक्ष

( २४ )
उत्तर दिशा का भली-भाँति ज्ञान न हो जावे, तब तक यह भ्रम
जा ही नहीं सकता ; इस कारण विवेक की आवश्यकता है, और
सूत्र में भी दिखलाया गया है, कि जब तक दिशा का प्रत्यक्ष
न हो जावे तब तक भ्रमन्निवृत्ति नहीं हो सकती ; इसलिये जब
तक प्रकृति और पुरुष के धर्म का ठीक निश्चय करके प्रकृति से
निवृत्ति और पुरुष की प्राप्ति न हो तब तक दुःख दूर भी
न होगा।
उ०—अचाक्षुषाणामनुमानेन बोधो धूमादि-
भिरिव वह्नेः ॥ ६० ॥
अर्थ—प्रकृति पुरुष अर्थात् जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति
का तो प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान से ज्ञान होता है।
प्र०—क्या यह प्रकृति प्रत्यक्ष नहीं ?
उ०—नहीं, प्रत्युत जो प्रत्यक्ष है वह विकृति है, अर्थात् प्रकृति
का परिणाम है।
प्र०—सूत्र में तो पुरुष शब्द है, तुम इससे जीवात्मा और
परमात्मा किस प्रकार लेते हो ?
उ०—शरीर में रहने से जीवात्मा और संसार में व्यापक
होने से परमात्मा पुरुष शब्द से लिये गये और न्याय में आत्मा
और सांख्य में पुरुष शब्द एक ही अर्थ के बतलानेवाले हैं।
सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था, प्रकृतिः प्रकृतेर्म-
हान्, महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमि-
न्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पंचविंश-
तिर्गणः ॥ ६१ ॥

( २५ )
अर्थ—सत्वगुण प्रकाश करनेवाला, रजोगुण न प्रकाश और
न आवरण करनेवाला, तमोगुण आवरण करनेवाला। जब यह
तीनों गुण समान रहते हैं, उस दशा का नाम प्रकृति है; क्योंकि
वर्तमान दशा में सत्वगुण, तमोगुण का परस्पर विरोध है। इस
समय जिस शरीर में सत्त्वगुण रहता है, वहाँ तमोगुण का वास
नहीं और इसी तरह जहाँ तमोगुण का निवास है वहाँ सत्वगुण
नहीं; परन्तु कारण अर्थात् परमाणु की दशा में एक दूसरे के
विरुद्ध नहीं कर सकते, उस समय पास ही पास रह सकते हैं।
अब उस प्रकृति से महत्तत्त्व अर्थात् मन उत्पन्न होता है और
मन से अहङ्कार और अहङ्कार से पंच सूक्ष्म तन्मात्रा या रूप
रस, गंध, स्पर्श और शब्द उत्पन्न होते हैं, उनसे पाँच ज्ञानेन्द्रिय
और पाँच कर्मेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं, और पञ्चतन्मात्राओं से पाँच
भूत अर्थात् पृथिवी, अप, तेज, वायु, और आकाश होते हैं,
और जब इनसे पुरुष अर्थात् जीव और ब्रह्म मिल जाता है तो
२५ गुण कहलाते हैं।
प्र०—अनेक पुरुषों ने महत्तत्त्व का अर्थ बुद्धि किया है, तुम
'मन' किस प्रकार लेते हो ?
उ०—बुद्धि जीवात्मा का गुण है। जीव के सत्य होने से वह
नित्य है, वह प्रकृति का कार्य्य नहीं और मन सूक्ष्म अन्य का
विकार है, अतएव मन ही लेना चाहिये।
प्र०—मन की इन्द्रियों में गणना की जाती है, अतएव भिन्न
करने से बुद्धि का ही प्रयोजन प्रतीत होता है ?
उ०—यदि १० इन्द्रियों में ११ वां मन भी लिया जाय तो
तुम्हारी संख्या ही अशुद्ध हो जायगी, इस हेतु से महत्तत्त्व का
अर्थ मन ही है।

( २६ )
स्थूलात् पञ्चतन्मात्राय ॥ ६२ ॥
अर्थ—इन पांच प्रकाशवान् तत्त्वों से उन सूक्ष्म तन्मात्रों का
अनुमान होता है, जिस प्रकार कार्य्य को देखकर कारण का
अनुमान होता है ; जैसे लिखा है—
कारणगुणपूर्वकं कार्य्य गुणो दृष्टः ॥
अर्थ—कार्य्य के गुणों के अनुसार कारण और कारण के
अनुसार कार्य्य के गुणों का अनुमान होता है ।
इसी प्रकार यहां कार्य्य तत्त्वों को देख कर कारण तन्मात्रा
का ज्ञान हो जाता है ।
बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्चाहङ्कारंस्य ॥ ६३ ॥
अर्थ—बाहर की और आभ्यन्तर्रीय इन्द्रियों से पञ्च तन्मात्रा
रूप कार्य का ज्ञान होकर उसके कारण अहङ्कार का भी ज्ञान
होता है, क्योंकि स्पर्शादि विषयों का ज्ञान समाधि और सुषुप्ति
अवस्था में जबकि अहङ्कार रूप वृत्ति का अभाव होता है नहीं
होता, इससे अनुमान होता है कि यह इस वृत्ति से उत्पन्न होते
हैं, अर्थात् अहङ्कार के कार्य्य हैं और अहङ्कार इनका कारण
है ; क्योंकि यह नियम है कि जो जिसके बिना पैदा न हो सके
वह उसका कारण होता है, और भूत विना अहङ्कार के सुषुप्ति
अवस्था में दृष्टिगत नहीं होते, अतएव यही उनका कारण
अनुमान से प्रतीत होता है ।
तेनान्तःकरणस्य ॥ ६४ ॥
अर्थ—और अहङ्काररुपी कार्य्य से उसके कारण अन्तःकरण
का अनुमान होता है, क्योंकि प्रथम मन में वस्तु की अस्तित्व का
निश्चय करके उसमें अहङ्ककार किया जाता है, अर्थात् उसे अपना

( २७ )
मानते हैं। जिस समय तक वस्तु की अस्तित्व का निश्चय न हो
तब तक उसमें अभिमान नहीं होता है, अर्थात् मैं हूँ, और यह
मेरा है, यह ज्ञान जबतक अपने-अपने और चीज़ की अस्तित्व
का ज्ञान न हो, किस तरह हो सकता है ?
ततः प्रकृतेः ॥ ६५ ॥
अर्थ—और उस मन से प्रकृति, जो मन का कारण है, उसका
अनुमान होता है, क्योंकि मन मध्यम परिणाम वाला होने से
कार्य्य है और प्रत्येक कार्य का कारण अवश्य होता है ; अब मन
का कारण प्रकृति के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता । क्योंकि
पुरुष तो परिणाम रहित है, और मन का शरीर की तरह मध्यम
परिणामवाला होना श्रुति, स्मृति और युक्ति से सिद्ध है ; क्योंकि
मन, सुख-दुःख और मोह धर्मवाला है, इस वास्ते उसका कारण
भी मोह धर्मवाला होना चाहिये । दुःख परतन्त्रता का नाम है,
और पुरुष की परतन्त्रता हो नहीं सकती । परतन्त्रता केवल जड़
प्रकृति का धर्म है और उसका कार्य्य मन है ।
संहतपरार्थत्वात् पुरुषस्य ॥ ६६ ॥
अर्थ—प्रकृति के अवयवों की संहति सर्वदा दूसरे के वास्ते
होती है, अपने लिये नहीं । इससे पुरुष का अनुमान होता है ;
क्योंकि मन आदिक जो प्रकृति के कार्य्य हैं, उन से पुरुष को लाभ
होता है । मन आदिक अपने लिये कुछ भी नहीं कर सकते,
और जितने शरीर से लेकर अन्न, वस्त्र, पात्रादि प्रकृति के विकार
हैं, उन से दूसरों का ही उपकार होना है, और पुरुष की क्रिया
का भोग पदार्थ नहीं है ; क्योंकि उपनिषद् में लिखा है "नवाअरे
सर्वस्य कामाय सर्वंप्रियंभवति नतुकामायसर्वंप्रियंभवति”—अर्थात्
सम्पूर्ण वस्तुओं के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी नहीं,

( २८ )
किन्तु आत्मा के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी प्रतीत
होती हैं ।
प्र०—क्या प्रकृति का कोई कारण नहीं है, ब्रह्म को कारण
सुना जाता है ?
उ०—ब्रह्म जगत् का निमित्त-कारण है । प्रकृति का उपादान
कारण नहीं ।
प्र०—प्रकृति को क्यों अकारण मानते हो ?
उ०—मूले मूला भावादमूलं मूलम् ॥ ६७ ॥
अर्थ—२२ तत्त्वों का मूल उपादान कारण प्रकृति है, और
मूल अर्थात् जड़ की जड़ नहीं होती, इसवास्ते मूल बिना मूल के
ही होता है ।
प्र०—प्रकृति को मूल क्यों मानते हो ?
उ०—यदि मूल का मूल मानोगे, तो उसके मूले की भी आ-
वश्यकता होगी । इस प्रकार अनवस्था आजायगी ।
प्र०—जैसे घट का कारण मृत्तिका है, और मृत्तिका का
कारण परमाणु है ?
उ०—पारम्पर्येऽप्येकत्र परिनिष्ठेति संज्ञा-
मात्रम् ॥ ६८ ॥
कारणों की परम्परा के विचार से परमाणु ही घट का कारण
है, मृत्तिका तो नाममात्र है ।
समानः प्रकृतेर्द्वयोः ॥ ६६ ॥
घट और मृत्तिका के साथ प्रकृति का समान सम्बन्ध है,
अर्थात् परम्परा से प्रकृति ही घट और मृत्तिका का कारण है,
और निरवयव होने से नित्य है, उसका कोई कारण नहीं ।

( २६ )
अधिकारित्रैविध्यान्ननियमः ॥ ७० ॥
यद्यपि प्रकृति सबका उपादान कारण है; परन्तु प्रत्येक
कार्य्य में जो तीन प्रकार के कारण माने जाते हैं अर्थात् ☸ १
उपादान, २ निमित्त, और ३ साधारण—इन की भी व्यवस्था न
रहेगी, क्योंकि जब कुम्हार मिट्टी दण्डादि का कारण प्रकृति ही
ठहरी, तो इन तीन कारणों की अनावश्यकता होने से बहुत
गोलमाल हो जायगा। इस में हेतु यह है, कि फिर कोई भी किसी
का निमित्त व असाधारण कारण न रहेगा, अतएव जहाँ-जहाँ
कारणत्व कहा जाय, वहाँ-वहाँ प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये,
क्योंकि प्रकृति तो सबका कारण है ही, उसके कहने की कोई
भी आवश्यकता नहीं है; जैसे—कुम्हार के पिता को घट का कारण
कहना अनावश्यक है, क्योंकि वह तो अन्यथा सिद्ध है। यदि
वही न होता तो कुलाल कहां से आता ? परन्तु घट के बनने में
कुलाल के पिता की कोई भी आवश्यकता नहीं है, ऐसा ही नवीन
नैयायिक भी मानते हैं, कि कारणत्व प्रकृति को छोड़कर कहना
चाहिये।
☸ १ उपादान कारण, जैसे घट का मृत्तिका। २ निमित्त
कारण, जैसे घट का कुलाल। ३ साधारण, जैसे घट के दण्ड आदि।
महदाख्यमाद्यं कार्य्यं तन्मनः ॥ ७१ ॥
अर्थ—प्रकृति का पहिला कार्य महत् है, और वह मन
कहलाता है। मन से अहङ्कारादि उत्पन्न होते हैं, मन की
उत्पत्ति ६१ सूत्र में कहचुके हैं।
चरमोऽहङ्कारः ॥ ७२ ॥
अर्थ—और प्रकृति का दूसरा कार्य अहङ्कार है। इन
तीनों सूत्रों का अभिप्राय यह है कि यदि प्रकृति को कारणत्व