सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
सूत्र तक जो अर्थ विज्ञानभिक्षु ने किया है, और “गुणादीनां
( १४५ )
प्र०—अन्यथा ख्याति किसको कहते हैं ?
उ०—पदार्थ तो दूसरा हो, और अर्थ दूसरी तरह किया जाय,
जैसे—सीप में चाँदी का आरोप करना अर्थात् चाँदी सिद्ध करनी ।
सदसत्ख्यातिर्बाधाबाधात् ॥ ५६ ॥
अर्थ—यह ऐसा माना जाय, कि वेदों का अर्थ है भी और
नहीं भी है, क्योंकि जो संसार के कार्यों में चतुर नहीं हैं उन-
को वेद के अर्थ का बाध होता है ; और जो सांसारिक कार्यों में
चतुर हैं, उनको अबाध होता है, इस तरह स्यादस्ति, स्यान्नास्ति,
है या नहीं, इस तरह जैनों के मत के अनुसार ही माना जाय,
तो भी ठीक नहीं। इस सूत्र में पहिले सूत्र से नकार अनुवृत्ति
आती है। “नासत:ख्यातं न शृंगवत्” इस सूत्र से लेकर ५६ वें
सूत्र तक जो अर्थ विज्ञानभिक्षु ने किया है, और “गुणादीनां
नात्यन्तबाध:”, इस सूत्र के आशय से मिलाया है, वह ठीक
नहीं ; क्योंकि वैसा अर्थ करने से प्रसंग में विरोध आता है।
दूसरे यह कि इस ५६वें सूत्र को, जो कपिल मुनि के सिद्धान्त
पक्ष में रखकर गुणों का बाध, अबाध दोनों ही माने हैं, वह भी
ठीक नहीं, क्योंकि “न तादृक् पदार्थाप्रतीते:”, इस सूत्र में आचार्य
पहिले ही कह चुके हैं, कि असत् और सत् इन दोनों धर्म्मों
वाला कोई पदार्थ संसार में नहीं दीखता, तो क्या आचार्य भी
विज्ञानभिक्षु के समान ज्ञान-रहित थे, जो अपने पूर्वापर कथन
को ध्यान में न रख कर गुणों को सत् और असत् दोनों रूपों
से कहते। यहां तक वेदों की उत्पत्ति और नित्यता को सिद्ध कर
चुके। अब शब्द के सम्बन्ध में विचार करते हैं।
प्रतीत्यप्रतीतिभ्यां न स्फोटात्मक: शब्द: ॥५७॥
अर्थ—जो शब्द मुख से निकलता है, उस शब्द के अतिरिक्त
जो उस शब्द में अर्थ के ज्ञान कराने वाली शक्ति है, उसे स्फोट
( १४६ )
कहते हैं ; जैसे कि—किसी ने कलश शब्द को कहा, तो उस
कलश शब्द के उच्चारण होने से कम्बुग्रीवादि कपालों का जिस
शक्ति से ज्ञान होता है, उसका ही नाम स्फोट है। इससे ऐसा
न समझना चाहिये, कि कलश इतना शब्द मुँह से निकलते ही
कम्बुग्रीव वाला जो पदार्थ है, उसका ही नाम कलश है, किन्तु
जिस शक्ति से उसका ज्ञान होता है, उसी का नाम स्फोट कह-
लाता है, किन्तु स्फोटात्मक शब्द नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें
दो तरह के तर्क उत्पन्न हो सकते हैं, कि शब्द की प्रतीति होती
है या नहीं। यदि प्रतीति होती है, तो जिस अर्थ वाले अक्षर
समुदाय से पूर्वापर मिला कर अर्थ प्रतीति और वाच्य ( कहने
लायक ) वस्तु का बोध ( ज्ञान ) है, उसके सिवाय स्फोट को
मानना व्यर्थ है, क्योंकि शब्द से ही अर्थ ज्ञान हुआ, स्फोट से
नहीं। और यह कहो कि शब्द की प्रतीति नहीं होती, तब अर्थ
ही नहीं। फिर स्फोट में ऐसी शक्ति कहां से आई जो बिना
अर्थ के अर्थ की प्रतीति करा सकै। इस कारण स्फोट का
मानना व्यर्थ है।
प्र०—न शब्दनित्यत्वं कार्य्यताप्रतीतेः ॥ ५८ ॥
अर्थ—शब्द नित्य नहीं हो सकता, क्योंकि उच्चारण के
बाद शब्द नष्ट हो जाता है ; जैसे—ककार उत्पन्न हुआ, उच्चा-
रणावसान में फिर नष्ट हो गया, इत्यादि अनुभवों से सिद्ध
होता है कि शब्द भी कार्य्य है।
उ०—पूर्व्वसिद्ध सत्त्वस्याभि व्यक्तिर्दीपेनैव -
घटस्य ॥ ५९ ॥
अर्थ—जिस शब्द का होना पहिले ही से सिद्ध है, उस
शब्द का उच्चारण करने से प्रकाश होता है, उसकी उत्पत्ति
( १४७ )
नहीं होती है । दृष्टान्त—जैसेकि अंधेरे स्थान में रक्खे हुये
पात्र को दीपक प्रकाश कर देता है । ऐसा नहीं कह सकते कि
दीये ने पात्र को उत्पन्न कर दिया, क्योंकि पात्र तो पहिले से
ही वहाँ विद्यमान था, अंधकार के कारण उसका ज्ञान नहीं होता
था। इसी तरह शब्द भी पहिले से सिद्ध है, उच्चारण करने से
केवल उनका प्रकाश होता है, इसलिये शब्द नित्य है ।
सत्कार्यसिद्धांतश्चेत् सिद्धसाधनम् ॥ ६० ॥
अर्थ—यदि ऐसा कहा जाय, कि कार्य जिस अवस्था में
दीखता है, उसी अवस्था में सत् है, शेष और अवस्थाओं में
असत् है। इसी तरह शब्द का भी कार्य है, और अपनी अवस्था
में सत् है, ऐसा मानेंगे, तो आचार्य कहते हैं, कि ऐसा मनने पर
हम शब्द के सम्बन्ध में सिद्ध साधन मानेंगे, अर्थात् जो शब्द
पहिले हृदय में था, उसीको उच्चारण आदि क्रियाओं से स्पष्ट
किया है, किन्तु घटादि पदार्थों के समान बनाया नहीं है । यहाँ-
तक शब्द-विचार समाप्त हुआ। अब इस विषय का विचार
करेंगे कि जीव एक है, वा अनेक हैं।
नाद्वैतमात्मनो लिंगात् तद्भेदप्रतीतेः ॥ ६१ ॥
अर्थ—जीव एक नहीं है, किन्तु अनेक हैं, इस सूत्र का यह
भी अर्थ है। जीव और ईश्वर इन दोनों का अभेद मानकर जो
अद्वैत माना जाता है वह ठीक नहीं, क्योंकि जीव के जो
अल्पज्ञत्वादि चिह्न हैं, और ईश्वर के जो सर्वज्ञत्वादि चिन्ह हैं, -
उनसे दोनों में भेद ज्ञात होता है ।
नानात्मनापि प्रत्यक्षबाधात् ॥ ६२ ॥
अर्थ—अनात्मा जो सुख दुःखादिकों के भोग हैं। उनसे भी
यही बात सिद्ध होती है, कि जीव एक नहीं है, क्योंकि एक
( १४८ )
मानने से प्रत्यक्ष में विरोध की प्राप्ति होती है, और संसार में
दीखता भी है, कि सुख-दुःख अनेक व्यक्ति एक समय में भोग
करते हैं, दूसरे पक्ष में ऐसा अर्थ करना चाहिये, कि जो मनुष्य
एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते, उनके सिद्धांत में
पूर्वोक्त दोष के अतिरिक्त और एक दोष यह भी प्राप्त हो जायगा,
कि घटादि कार्यों को भी आत्मा मान कर उनके नाश होते ही
आत्मा का भी नाश मानना होगा। यह प्रत्यक्ष से विरोध
होगा, इसलिये ऐसा अद्वैत मानना सत्य नहीं है।
नोभाभ्यां ते नैव ॥ ६३ ॥
अर्थ—आत्मा और अनात्मा इन दोनों की एकता है ऐसा
कहना भी योग्य नहीं, क्योंकि उसी प्रत्यक्ष प्रमाण में बाधा प्राप्त
हो जायगी, और संसार में यह बात प्रत्यक्ष दीख रही है, कि
आत्मा और अनात्मा दो पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं, इस वास्ते ऐसा
कहना कि एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ योग्य नहीं।
प्र०—अगर तुम ऐसा मानते हो कि आत्मा और अनात्मा
भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं, तो श्रुतियाँ ऐसा क्यों कहती हैं, कि “एकमेवा-
द्वितीयंब्रह्म ।” “आत्मैवेदं सर्वम्” ( एक ही ब्रह्म अद्वितीय है ) ;
यह सब आत्मा ही है ) इत्यादि श्रुतियाँ एक आत्मा बताती हैं,
तो बहुत से आत्मा, जीव वा ब्रह्म पृथक्-पृथक् क्यों माने जाँय ।
उ०—अन्यपरत्वमविवेकानां तत्र ॥ ६४ ॥
अर्थ—इन श्रुतियों में अन्यपरत्व अर्थात् द्वैत है, ऐसा ज्ञान
अज्ञों को होता है, और जो विद्वान् हैं वह इन श्रुतियों का ऐसा
अर्थ नहीं करते हैं, क्योंकि अद्वितीय शब्द से यह प्रयोजन है,
कि ईश्वर के समान दूसरा और कोई नहीं है, और जो एक
आत्मा मानते हैं, उनके मत में संसार का उपादान कारण सत्य
नहीं हो सकता।
( १४६ )
नात्माविद्या नोभयं जगदुपादानकारणं
निःसङ्गत्वात् ॥ ६५ ॥
अर्थ—इस कारण आत्मा जगत् का उपादान कारण नहीं
हो सकता कि वह निर्विकार है। यदि अविद्या को संसार का
उपादान कारण मानें तो अविद्या भी संसार का उपादान कारण
नहीं हो सकती, क्योंकि सत् मानें तो द्वैतापत्ति प्राप्त होती है,
और असत् मानने पर बन्ध्या के पुत्र के सदृश (समान) अभाव
वाली हो जायगी, और आत्मा तथा अविद्या यह दोनों मिलकर
संसार का उपादान कारण इस प्रकार नहीं हो सकते कि आत्मा
संग रहित है, इस कारण ही जो एक आत्मा के अतिरिक्त और
कुछ नहीं मानते, उनके मत में संसार का उपादान कारण सिद्ध
नहीं हो सकता है।
नैकस्यानन्दचिद्रूपत्वे द्वयोर्भेदात् ॥ ६६ ॥
अर्थ—वेदादि सत् शास्त्र ईश्वर को सच्चिदानन्द कहकर पुकार
रहे हैं, और जीव में आनन्द रूप होना नहीं है, इस कारण ईश्वर
और जीव इन दोनों में भेद है।
प्र०—जीव में आनन्द तो माना ही नहीं गया है, तो मुक्ति
का उपदेश क्यों कहा, क्योंकि मुक्ति अवस्था में दुःखों के दूर
हो जाने पर आनन्द होता ही है ?
उ०—दुःखनिवृत्तेर्गौणः ॥ ६७ ॥
अर्थ—मुक्त होने पर दुःख दूर हो जाते हैं, ऐसा कहना
गौण है। यद्यपि मुक्ति होने पर दुःख दूर हो जाते हैं, परन्तु
अल्पज्ञता तो जीव में उस समय भी बनी रहती है, इसलिये
फिर भी दुःख उत्पन्न होने का भय बना ही रहता है, इस कारण
जीव सर्वदा आनन्द में नहीं रहता है, अतः जीव को आनन्द-
( १५० )
स्वरूप नहीं कह सकते । आनन्दस्वरूप तो ईश्वर को ही कह
सकते हैं ।
प्र०—जब कि आप की मुक्ति ऐसी है, कि जिसके होने पर
भी फिर कुछ दिनों के बाद दुःख उत्पन्न होने की संभावना बनी
रहती है तो ऐसी मुक्ति से बद्ध रहना ही अच्छा है ।
उ०—विमुक्तिप्रशंसा मन्दानाम् ॥ ६८ ॥
अर्थ—विमुक्त ( बद्ध रहना ) की प्रशंसा मूर्ख लोग करते
हैं, न कि विद्वान् लोग । कोई-कोई मन को नित्य मानते हैं,
उनके मत का भी खंडन करते हैं ।
न व्यापकत्वं मनसः करणत्वादिनिन्द्रियत्वाद्वा ६९
अर्थ—मन व्यापक नहीं है, क्योंकि मन को इन्द्रिय और
कारण माना है ।
प्र०—कारण किसको कहते हैं ?
उ०—जिसके द्वारा जो अपने कार्य करने में तैयार हो, जैसे
कि मन के द्वारा जीवात्मा अपने कार्यों को करता है ।
सक्रियत्वाद्गतिश्रुतेः ॥ ७० ॥
अर्थ—मन क्रियावाला है इसलिये मन हर एक इन्द्रियों
के व्यापार और प्रवृत्ति का हेतु है, गतिवाला भी है ।
प्र०—यदि मन को नित्य नहीं मानते तो मत मानो, लेकिन
निर्विभाग, कारण रहित तो मानना होगा ।
उ०—न निर्भागित्वं तद्योगात् घटवत् ॥ ७१ ॥
अर्थ—जैसे घट आदि पदार्थ मृत्तिका ( मिट्टी ) के कार्य
हैं इस ही तरह मन भी किसी का कार्य अवश्य है । जबकि
कार्य निश्चय हो गया तो उसको कारण योग भी अवश्य होगा ।
प्र०—मन नित्य है या अनित्य ?
( १५१ )
उ०—प्रकृतिपुरुषयोरन्यत् सर्वमनित्यम् ॥ ७२
अर्थ—प्रकृति और पुरुष के अतिरिक्त जो अन्य पदार्थ हैं,
वह सब अनित्य हैं, इस कारण से मन भी अनित्य है।
प्र०—प्रकृति और पुरुष इन दो को ही नित्य क्यों माना है ?
उ०—न भागलाभो भोगिनो निर्भागस्वश्रुतेः ७३
अर्थ—जो आप ही कारण रूप है, उसका और कोई कारण
नहीं हो सकता, उसको तो सब ही कारण रहित मानते चले
आये हैं, इस कारण प्रकृति, पुरुष दोनों नित्य हैं।
प्र०—पुरुष की मुक्ति क्यों मानी गई है ?
नानन्दाभिव्यक्तिमुक्तिर्निर्धर्मत्वात् ॥ ७४ ॥
अर्थ—प्रधान जो प्रकृति है, उसको आनन्द की अभिव्यक्ति
(ज्ञान) नहीं हो सकती, इस कारण उसकी मुक्ति भी नहीं कह
सकते; क्योंकि आनन्द प्रधान का धर्म नहीं है। किन्तु जीव का है।
उ०—न विशेषगुणोच्छित्तिस्तद्वत् ॥ ७५ ॥
अर्थ—सत्व, रज, तम, इनके नाश होने को ही यदि मुक्ति
माना जाय तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उक्त सत्त्वादि तीन गुण
प्रधान के स्वाभाविक धर्म हैं, उनका नाश होना प्रधान का धर्म
नहीं है, इसलिये उसकी मुक्ति नहीं मानी जाती ।
न विशेषगतिर्निष्क्रियस्य ॥ ७६ ॥
अर्थ—यदि विशेष गति ऊपर नीचे का जाना, आना अर्थात्
ब्रह्मलोक की प्राप्ति इत्यादिक को ही मुक्ति मानें सो भी नहीं हो
सकती, क्योंकि प्रधान तो क्रिया शून्य है, जो कुछ उसमें क्रिया
दीखती है वह सब पुरुष के संसर्ग (मेल) से है, परन्तु आप
ऐसी शक्ति को नहीं रखता ।
नाकारो परागोच्छित्तिः क्षणिकत्वादिदोषात् ७७
( १५२ )
अर्थ— यदि आकार के सम्बन्ध को छोड़ देना ही मुक्ति
मानें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उसमें क्षणिकत्वादि दोष प्राप्त
होते हैं। इस सूत्र का स्पष्टार्थ यह है—प्रकृति का आकार घड़ा है,
उसका फूट जाना है उसको ही प्रकृति की मुक्ति मान लिया जाय
सो यह कथन कुछ अच्छा नहीं है, क्योंकि क्षणिकत्वादि सैकड़ों
दोष प्राप्त हो जायेंगे, ऐसा मानने से । जैसेकि कोई घड़ा इस क्षण
में टूट गया और फिर इसी क्षण में दूसार बन गया तो इत्यादि
कारणों से प्रधान की मुक्ति कैसे होसकती, है ?
न सर्वोच्छित्तिः पुरुषार्थत्वादिदोषात् ॥ ७८ ॥
अर्थ—सबको छोड़ देना भी मोक्ष नहीं होसकता । यदि
प्रधान सम्पूर्ण ( सब ) सृष्टि आदि रचना को छोड़ दे तो भी
उसकी मुक्ति नहीं होसकती, क्योंकि प्रधान के सब कार्य पुरुष के
लिये हैं ।
एवं शून्यमपि ॥ ७६ ॥
अर्थ—यदि सब को जोड़ देना ही प्रधान की मुक्ति का
लक्षण मान भी लिया जाय तो वह मुक्ति शून्य रहेगी, क्योंकि
आनन्द न रहेगा तो व्यर्थ है, इसलिये ऐसा न साना जाय ।
प्र०—पुरुष के साथ रहने वाली प्रकृति किसी स्थान में पुरुष
को छोड़ दे, इसको ही मुक्ति क्यों न माना जाय ?
उ०—संयोगाश्च वियोगान्ता इति न देशादि-
लाभोऽपि ॥ ८० ॥
अर्थ—जिसका संयोग होता है उसका वियोग तो निश्चय
ही होगा फिर किसी स्थान में जाकर छोड़ा तो क्या मुक्ति हो
सकती है ? किसी सूरत में नहीं । इसी तरह जब प्रकृति और
पुरुष का संयोग है तो वियोग भी जरूर होगा, फिर उसमें देश
( १५२ )
की क्या ज़रूरत है, क्योंकि स्थान के प्राप्त होने से मुक्ति तो हो ही
नहीं सकती ।
नभागियोगो भागस्य ॥ ८१ ॥
अर्थ-प्रधान के भाग ( अंश ) जो महत्तत्वादिक हैं उन-
का भागी ( प्रधान ) में मिल जाना ही मुक्ति है, सो भी नहीं
हो सकता, क्योंकि वह तो उसमें मिलते ही हैं ।
नाणिमादियोगोऽप्यवश्यंभावित्वात् तदुच्छिते-
रितरयोगवत् ॥ ८२ ॥
अर्थ-पुरुष के योग से अणिमादि ऐश्वर्य्यों का योग होना
भी प्रधान की मुक्ति का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि जिसका
योग है उसका वियोग तो अवश्य ही होगा, जैसाकि दूसरे
पदार्थों में मालूम होता है ।
नेन्द्रादिपदयोगोऽपितद्वत् ॥ ८३ ॥
अर्थ-पुरुष के संयोग से इन्द्रादि पद की प्राप्ति का होना
प्रधान की मुक्ति का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सब
नाशवान् हैं । अब “अहङ्कारिकश्रुतेर्नभौतिकानि” इस सूत्र में जो
वात सूक्ष्म रीति से कही है उसको कहते हैं-
न भूतप्रकृतित्वमिन्द्रियाणामाहं कारिकत्व-
श्रुतेः ॥ ८४ ॥
अर्थ-जो बात पृथिवी आदि भूतों में विद्यमान है वह बात
इन्द्रियों में नहीं दीखती, इसवास्ते इन्द्रियों को भौतिक नहीं कह
सकते, किन्तु अहङ्कार से पैदा हुई हैं ।
प्र०-सांख्य के मत के अनुसार प्रकृति और पुरुष का ज्ञान
होना ही मुक्ति का हेतु है; किन्तु वैशेषिकादिकों ने जो छः पदार्थ
माने हैं उनके ज्ञान से मुक्ति क्यों नहीं हो सकती ?
( १५४ )
उ०- न षट्पदार्थनियमस्तद्बोधान्मुक्तिः ॥८५॥
अर्थ—पदार्थ छः ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं; किन्तु
पदार्थ असंख्य ( बेशुमार ) हैं । अभाव जानने के वास्ते असंख्य
पदार्थ हैं, तो छः पदार्थों के जानने से मुक्ति नहीं हो सकती ।
षोडशादिष्वप्येवम् ॥ ८६ ॥
अर्थ—गौतमादिकों ने जो सोलह पदार्थ माने हैं और जिन-
जिन महर्षियों ने पच्चीस पदार्थ माने हैं उनके जान लेने से भी
मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि पदार्थ तो असंख्य हैं।
प्र०—वैशेषिकादिकों का मत क्यों दूषित माना गया
है; क्योंकि वह वैशेषिकादिक पृथिवी आदि के अणुओं को नित्य
मानते हैं।
उ०—नाणुनित्यता तत्कार्यत्वश्रुतेः ॥ ८७ ॥
अर्थ—पृथिवी आदि के अणुओं की नित्यता किसी प्रकार
प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि श्रुतियाँ उनको कार्य रूप कहती हैं
और एक युक्ति भी है। जब पृथिवी आदि साकार है तो उनके
अणु भी साकार हो सकते हैं। जब साकारता प्राप्त हो गई तो
किसी के कार्य भी जरूर हुए, इस कारण पृथिवी आदि के
अणुओं को नित्य नहीं कह सकते। यहाँ अणु का अर्थ परमाणु
नहीं, उससे स्थूल है।
प्र०—आप अणुओं को नित्य नहीं मानते तो मत मानो;
लेकिन उनका कोई कारण नहीं दीखता, इसवास्ते उनको कारण
रहित मानना चाहिये ?
उ०—न निर्भागत्वं कार्यत्वात् ॥ ८८ ॥
अर्थ—जबकि अणु कार्य है तो कारण रहित कैसे हो सकते
( १५५ )
हैं ? क्योंकि जो कार्ये है उसका कारण भी अवश्य ही कोई न
कोई होगा ।
प्र०-जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही आकार रहित हैं
तो उनका प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि जबतक रूप न
होगा तबतक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता ?
उ०-न रूपनिबन्धनात् प्रत्यक्षनियमः ॥ ८६ ॥
अर्थ-रूप के बिना प्रत्यक्ष नहीं होता, कोई नियम नहीं है ;
क्योंकि जो बाहर की वस्तु है उसके देखने के वास्ते अवश्यमेव
इन्द्रिय से योग की आवश्यकता रहती है, लेकिन जो ज्ञान से
जाना जाता है उसको रूपवान होने की कोई आवश्यकता नहीं
है, और नास्तिक लोग जो यह बात कहते हैं कि साकार पदार्थ
का ही प्रत्यक्ष होता है, निराकार का नहीं होता, यह कथन ठीक
नहीं, क्योंकि जब नेत्र आदि इन्द्रियों में दोष हो जाता है तब
सामने रक्खे हुए घट-पटादि पदार्थों का भी प्रत्यक्ष नहीं होता ।
इस से साबित होता है कि पदार्थ का स्वरूप होना प्रत्यक्ष होने
में नियम नहीं, किन्तु इन्द्रियों की स्वच्छता हेतु है ।
प्र०-आपने जो अणुओं को कार्य्यरूप कहकर अनित्य
सिद्ध किया तो क्या अणु कोई वस्तु आपके मत में है या नहीं ?
इसपर आचार्य्य अपना मत दिखाते हैं ।
उ०-न परिमाणचातुर्विध्यं द्वाभ्यां तद्योगात् ॥६०
अर्थ-जो मनुष्य अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व यह चार भेद मान-
कर परिमाण चार तरह के मानते हैं ऐसा मानना ठीक नहीं है ;
क्योंकि जिस बात के सिद्ध करने को चार प्रकार के परिमाण
मानते हैं वह बात अणु और महत् इन दो तरह के परिमाणों
से भी सिद्ध हो सकती है । दीर्घ और ह्रस्व यह दो परिमाण महत्
( १५६ )
परिमाण के अवान्तर ( भीतर रहने वाले ) भेद हैं। यदि गिनती
बढ़ानी ही स्वीकार है तो एक तिरछा अणु, एक सीधा अणु,
ऐसे ही बहुत से भेद हो सकते हैं ; लेकिन ऐसा होना ठीक नहीं।
और हमने जो अणुओं को अनित्य प्रतिपादन किया था वह
सिर्फ पृथ्वी आदि के गुण को अनित्य कहा था ; किन्तु अणु
परिमाण द्रव्यों को अनित्य नहीं प्रतिपादन किया था, क्योंकि हम
भी तो अणु नित्य मानते हैं।
प्र०—जब प्रकृति और पुरुष के सिवाय सबको अनित्य
कहा तो प्रत्यभिज्ञा किस तरह हो सकती है, क्योंकि जब सब
पदार्थों को नाशवान् मान लेंगे तब प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती है।
प्रत्यभिज्ञा का लक्षण पहले अध्याय में कह आये हैं।
उ०—अनित्यत्वेऽपि स्थिरतायोगात् प्रत्य-
भिज्ञानं सामान्यस्य ॥ ६१ ॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष के सिवाय जितने सामान्य
पदार्थ हैं वे सब ही अनित्य हैं तथापि हम उनको स्थिर मानते
हैं ; लेकिन क्षणिकवादियों के समान हर एक क्षण में परिवर्त्तन-
शील ( लौटना अर्थात् उलट-फेर ) नहीं मानते हैं ; इसवास्ते
प्रत्यभिज्ञा हो सकती है।
न तदपलापस्त स्मात् ॥ ६२ ॥
अर्थ—अतएव सामान्य पदार्थ कुछ न रहा ऐसा नहीं कहा
जा सकता ; किन्तु ऐसा कहा जा सकता है कि सामान्य पदार्थ
नित्य नहीं है।
नान्यनिवृत्तिरूपत्वं भाव प्रतीतेः ॥ ६३ ॥
अर्थ—सामान्य पदार्थों को अनित्य नहीं कह सकते हैं,