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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—८ देवता—इंद्र

हे ऋत्विजो! और यजमानो! हम सर्वश्रेष्ठ इंद्र का आह्वान तुम्हारे कल्याण के निमित्त
करते हैं. इंद्र केवल हमारे हैं. (१०)
सूक्त—८ देवता—इंद्र
एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम्. वर्षिष्ठमूतये भर.. (१)
हे इंद्र! हमारी रक्षा के लिए ऐसा धन दो जो हमारे भोग के योग्य, शत्रुओं को विजय
करने में सहायक तथा शत्रुओं की हार का कारण बने. (१)
नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै. त्वोतासो न्यर्वता.. (२)
उस धन से एकत्र किए गए योद्धाओं के मुक्के की चोट से हम शत्रु को रोक देंगे. तुम्हारे
द्वारा सुरक्षित होकर हम घोड़ों की सहायता से शत्रुओं को दूर भगाएंगे. (२)
इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि. जयेम सं युधि स्पृधः.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम अत्यंत दृढ़ वज्र को धारण करके अपने से द्वेष
करने वाले शत्रुओं को पराजित करेंगे. (३)
वयं शूरैर्भिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम्. सासह्वाम पृतन्यतः.. (४)
हे इंद्र! हम तुम्हारी सहायता पाकर अपने शस्त्रधारी सैनिकों को लेकर शत्रु सेना को
जीत सकेंगे. (४)
महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे. द्यौर्न प्रथिना शवः.. (५)
इंद्र देव शरीर से बलिष्ठ एवं गुणों से युक्त होने के कारण महान् हैं. वज्रधारी इंद्र को
पूर्वोक्त महत्त्व प्राप्त हो. इंद्र की सेना आकाश के समान विस्तृत हो. (५)
समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ. विप्रासो वा धियायवः.. (६)
जो वीर पुरुष युद्धक्षेत्र में जाने वाले हैं, पुत्र पाने की इच्छा रखते हैं अथवा जो बुद्धिमान्
ज्ञान की अभिलाषा रखते हैं, वे सब इंद्र की कृपा से सिद्धि प्राप्त करें. (६)
यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते. उर्वीरापो न काकुदः.. (७)
इंद्र का जो उदर सोमरस पीने के लिए सदा तत्पर रहता है, वह समुद्र के समान विस्तृत
है. जिस प्रकार जीभ का पानी कभी नहीं सूखता, उसी प्रकार इंद्र के उदर में स्थित सोमरस
भी कभी नहीं सूखता. (७)
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एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (८)
इंद्र के मुख से निकली हुई वाणी सत्य, विविध विशेषताओं से युक्त, महती एवं गौएं देने
वाली है. यज्ञ में हव्य देने वाले यजमान के लिए तो इंद्र की वाणी पके हुए फलों से लदी डाली
के समान है. (८)
एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (९)
हे इंद्र! तुम्हारी विभूतियां हव्य प्रदान करने वाले हमारे समान यजमान की रक्षा करने
वाली एवं शीघ्र फल देने वाली हैं. (९)
एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (१०)
सोमपान करने वाले इंद्र के लिए सामवेद एवं ऋग्वेद के मंत्र अभिलषित हैं. इंद्र
सोमपान संबंधी मंत्रों की इच्छा करते हैं. (१०)
सूक्त—९ देवता—इंद्र
इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महाँ अभिष्टिरोजसा.. (१)
हे इंद्र! इस यज्ञ में आकर सोमरस रूपी समस्त भोज्य पदार्थों से प्रसन्न बनो. इसके
पश्चात् तुम परम शक्तिशाली बनकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो. (१)
एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने. चक्रिं विश्वानि चक्रये.. (२)
यदि आनंद देने वाला एवं कार्य संपादन की प्रेरणा करने वाला सोमरस तैयार हो तो उसे
प्रसन्न एवं संपूर्ण कार्य सिद्ध करने वाले को भेंट करो. (२)
मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे. सचैषु सवनेष्वा.. (३)
हे सुंदर नासिका एवं ठोड़ी वाले तथा समस्त यजमानों द्वारा पूज्य इंद्र! तुम आनंद
बढ़ाने वाली स्तुतियों से प्रसन्न होकर इस सवन नामक यज्ञ में पधारो. (३)
असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत. अजोषा वृषभं पतिम्.. (४)
हे इंद्र! मैंने तुम्हारी स्तुतियां की हैं. वे तुम्हारे समीप स्वर्ग में पहुंच गई हैं. तुमने उन
स्तुतियों को स्वीकार कर लिया है. तुम मनचाही वर्षा करने वाले एवं यजमान के रक्षक हो.
(४)
सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम्. असदित्ते विभु प्रभु.. (५)
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हे इंद्र! श्रेष्ठ एवं विविध प्रकार का धन हमारे पास भेजो. हमारे भोग के लिए पर्याप्त एवं
अधिक धन तुम्हारे ही पास है. (५)
अस्मान्त्सु तत्र चोदयेंद्र राये रभस्वतः. तुविद्युम्न यशस्वतः.. (६)
हे अधिक संपत्ति वाले इंद्र! धन की सिद्धि के लिए हमें यज्ञ रूपी कर्म की प्रेरणा दो.
हम उद्योगशील एवं कीर्ति वाले हों. (६)
सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्. विश्वायुर्धेह्यक्षितम्.. (७)
हे इंद्र! हमें गायों एवं अन्न के साथ-साथ अधिक मात्रा में धन दो. यह धन इतना विस्तृत
हो कि समस्त आयु भर खर्च होने पर भी समाप्त न हो. (७)
अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्रसातमम्. इन्द्र ता रथिनीरिषः.. (८)
हे इंद्र! हमें विशाल यश, अनेक रथों में भरा हुआ अन्न एवं ऐसा धन दो, जिससे हम
हजारों की संख्या में दान कर सकें. (८)
वसोरिन्द्रं वसुपतिं गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम्. होम गन्तारमूतये.. (९)
अपने धन की रक्षा करने के लिए हम स्तुतियों द्वारा इंद्र को बुलाते हैं. इंद्र धन के रक्षक,
ऋचाओं से प्रेम करने वाले एवं यज्ञस्थान में गमन करने वाले हैं. (९)
सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः. इन्द्राय शूषमर्चति.. (१०)
सब यजमान प्रत्येक यज्ञ में इंद्र के महान् पराक्रम की प्रशंसा करते हैं. इंद्र यज्ञ में सदा
निवास करने वाले एवं शक्तिसंपन्न हैं. (१०)
सूक्त—१० देवता—इंद्र
गायन्ति त्वा गायत्रिणो ऽर्चन्त्यर्कमर्किणः.
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे.. (१)
हे शतक्रतु इंद्र! उद्गाता तुम्हारी स्तुति करते हैं. पूजार्थक मंत्र बोलने वाले होता पूजा के
योग्य इंद्र की अर्चना करते हैं. जिस प्रकार बांस के ऊपर नाचने वाले कलाकार बांस को ऊपर
उठाते हैं, उसी प्रकार स्तुति करने वाले ब्राह्मण तुम्हारी उन्नति करते हैं. (१)
यत्सानोः सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कृत्वम्.
तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति.. (२)
जब यजमान सोमलता खोजने के लिए एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर जाता है और
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सोमयाग रूप अनेक कर्म आरंभ करता है, तब इंद्र उसका प्रयोजन जानते हैं तथा यजमान
की इच्छानुसार वर्षा करने के लिए मरुद्गण के साथ यज्ञस्थान में आने की तैयारी करते हैं.
(२)
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा.
अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर.. (३)
हे सोमपानकर्त्ता इंद्र! अपने केशर वाले, युवा एवं पुष्ट शरीर वाले घोड़ों को रथ में
जोड़ो. इसके पश्चात् हमारी स्तुतियां सुनने के लिए समीप आओ. (३)
एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्या रुव.
ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय.. (४)
हे सर्वव्यापक इंद्र! इस यज्ञ में आओ. उद्गाता द्वारा की हुई स्तुति की प्रशंसा करो,
अध्वर्यु की स्तुतियों का समर्थन करो और अपने शब्दों से सबको आनंद दो. इसके पश्चात्
हमारे अन्न के साथ-साथ इस यज्ञ को भी बढ़ाओ. (४)
उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे.
शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सख्येषु च.. (५)
अगणित शत्रुओं को रोकने वाले इंद्र के लिए गाए गए गीत वृद्धि पाते रहें. इन गीतों के
कारण शक्तिशाली इंद्र हमारे पुत्रों एवं मित्रों के मध्य महान् शब्द करें. (५)
तमित् सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये.
स शक्र उत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः.. (६)
हम लोग मैत्री, धन और शक्ति पाने के लिए इंद्र के समीप जाते हैं. बलशाली इंद्र हमें
धन प्रदान करके हमारी रक्षा करते हैं. (६)
सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः.
गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः.. (७)
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अन्न सर्वत्र फैला हुआ और सुविधापूर्वक मिलने वाला है.
हे वज्र धारण करने वाले इंद्र! दूध, घी आदि रस के लाभ के लिए गोशाला का द्वार खोलो
और हमें धन प्रदान करो. (७)
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः.
जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि.. (८)
हे इंद्र! जिस समय तुम शत्रु का वध करते हो, उस समय धरती और आकाश दोनों में
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तुम्हारी महिमा नहीं समाती. तुम आकाश से जल की वर्षा करो और हमारे लिए गाएं दो. (८)
आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्व मे गिरः.
इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्चिदन्तरम्.. (९)
हे इंद्र! तुम्हारे दोनों कान चारों ओर की बात सुनने वाले हैं, इसलिए हमारी पुकार जल्दी
सुनो. हमारी स्तुतियों को अपने मन में स्थान दो. जिस प्रकार मित्र की बातें स्मरण रहती हैं,
उसी प्रकार हमारी ये स्तुतियां भी अपने पास रखो. (९)
विद्या हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम्.
वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम्.. (१०)
हे इंद्र! हम तुम्हें जानते हैं कि तुम मनचाही वर्षा करते हो तथा युद्धस्थल में हमारी
प्रार्थना सुनते हो. तुम समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हो. हम हजारों प्रकार के धन देने
वाली तुम्हारी रक्षा का आह्वान करते हैं. (१०)
आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब.
नव्यमायुः प्र सू तिर कृधी सहस्रसामृषिम्.. (११)
हे इंद्र! तुम हमारे पास शीघ्र आओ. हे कुशिक ऋषि के पुत्र! प्रसन्न होकर सोमपान
करो, देवताओं द्वारा प्रशंसनीय यज्ञकर्म करने के लिए हमारा जीवन बढ़ाओ एवं मुझ ऋषि
को हजारों धन वाला बनाओ. (११)
परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः.
वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः.. (१२)
हे हमारी स्तुतियों के विषय इंद्र! हमारी ये स्तुतियां सब ओर से तुम्हारे पास पहुंचें. चिर
आयु वाले तुम्हारा अनुगमन करके ये स्तुतियां वृद्धि प्राप्त करें. ये स्तुतियां तुम्हें संतुष्ट करके
हमारे लिए प्रसन्नता प्रदान करें. (१२)
सूक्त—११ देवता—इंद्र
इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः.
रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम्.. (१)
सागर के समान विस्तृत रथ के स्वामियों में श्रेष्ठ, अन्यों के स्वामी एवं सबके पालक इंद्र
को हमारी स्तुतियों ने बढ़ाया था. (१)
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते.
त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम्.. (२)
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हे बल के स्वामी इंद्र! तुम्हारी मित्रता पाकर हम शक्तिशाली एवं निर्भय बनें. तुम
अपराजित विजेता हो. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. (२)
पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः.
यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम्.. (३)
इंद्र द्वारा किए गए पुराकालीन दान प्रसिद्ध हैं. यदि वे स्तुतिकर्त्ताओं को गाययुक्त एवं
शक्तिपूर्ण अन्न दान करें तो सब प्राणियों की रक्षा हो सकती है. (३)
पुरां भिन्दुर्मुवा कविरमितौजा अजायत.
इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्त्ता वज्री पुरुष्टुतः.. (४)
इंद्र ने पुरभेदनकारी, युवा, अमित तेजस्वी, समस्त यज्ञों के धारणकर्त्ता, वज्रधारक एवं
अनेक व्यक्तियों द्वारा स्तुत रूप में जन्म लिया. (४)
त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम्.
त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः.. (५)
हे वज्रधारी इंद्र! तुमने गायों का अपहरण करने वाले बल असुर की गुफा का द्वार खोल
दिया था. बलासुर द्वारा सताए हुए देवों ने उस समय निडर होकर तुम्हें घेर लिया था. (५)
तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन्.
उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः.. (६)
हे शूर इंद्र! निचोड़े हुए सोमरस के गुणों का वर्णन करता हुआ मैं तुम्हारे धनदानों से
प्रभावित होकर वापस आया हूं. हे स्तुतिपात्र इंद्र! यज्ञकर्त्ता तुम्हारे समीप उपस्थित होने एवं
तुम्हारी कार्यकुशलता को जानते थे. (६)
मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः.
विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर.. (७)
हे इंद्र! तुमने छल द्वारा मायावी शुष्ण का नाश किया. इस बात को जो मेधावी लोग
जानते हैं, तुम उनकी रक्षा करो. (७)
इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत.
सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः.. (८)
शक्ति द्वारा विश्व के स्वामी बनने वाले की स्तुति प्रार्थियों ने की है. इंद्र के धन देने के ढंग
हजारों अथवा हजारों से भी अधिक हैं. (८)
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