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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—५९ देवता—मित्र

रथो ह वां भूरि वर्पः करिक्रत्सुतावतो निष्कृतमागमिष्ठः.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर-रस से युक्त सोमरस को पिओ एवं हमारे घर आओ. तुम्हारा
अतिशय धन देने वाला रथ सोम निचोड़ने वाले यजमान के शुद्ध घर में बार-बार आता है.
(९)
सूक्त—५९ देवता—मित्र
मित्रो जनान्यातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवीमुत द्याम्.
मित्रः कृष्टीरनिमिषाभि चष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत.. (१)
स्तुति किए जाने पर मित्र देव सभी लोगों को खेती आदि कामों में लगा देते हैं. वे धरती
और आकाश दोनों को धारण करते हैं एवं यज्ञकर्म करने वालों को भली प्रकार देखते हैं. घी
मिला हुआ हव्य मित्र के लिए हवन करो. (१)
प्र स मित्र मर्तो अस्तु प्रयस्वान्यस्त आदित्य शिक्षति व्रतेन.
न हन्यते न जीयते त्वोतो नैनमंहो अश्नोत्यन्तितो न दूरात्.. (२)
हे आदित्य देव! जो गाय का घृत लेकर तुम्हें हव्य देता है, वह मनुष्य अन्न का स्वामी
बने. तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे न कोई नष्ट कर सकता है और न हरा सकता है. उसे
पास से या दूर से पाप भी नहीं छू सकता. (२)
अनमीवास इळया मदन्तो मितज्ञवो वरिमन्ना पृथिव्याः.
आदित्यस्य व्रतमुपक्षियन्तो वयं मित्रस्य सुमतौ स्याम.. (३)
हे मित्र! निरोग एवं अन्न के कारण प्रसन्न हम धरती के विस्तृत भाग में घुटने टेककर
इच्छानुसार चलते हुए आदित्य के यज्ञ के समीप निवास करते हैं. हम लोग आदित्य की
कृपादृष्टि में रहें. (३)
अयं मित्रो नमस्यः सुशेवो राजा सुक्षत्रो अजनिष्ट वेधाः.
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (४)
सबके नमस्कार करने योग्य, सुख से सेव्य, सर्व जगत् के स्वामी, शोभन बलयुक्त एवं
सबके विधाता सूर्य उत्पन्न हुए हैं. उन यज्ञपात्र सूर्य की अनुग्रह बुद्धि तथा कल्याण करने
वाली मित्रता का हम पावें. (४)
महाँ आदित्यो नमसोपसद्यो यातयज्जनो गृणते सुशेवः.
तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविरा जुहोत.. (५)
महान् आदित्य लोगों को अपने-अपने कर्म में लगाने वाले एवं नमस्कार द्वारा सेवा करने
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योग्य हैं। वे स्तुति करने वालों के प्रति प्रसन्न होते हैं। उन अत्यंत स्तुति योग्य मित्र के निमित्त
अग्नि में हव्य डालो। (५)
मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि. द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्.. (६)
वर्षा द्वारा मनुष्यों का पालन करने वाले मित्र का अन्न सबके द्वारा भोगयोग्य एवं उनका
धन अतिशय कीर्तियुक्त है. (६)
अभि यो महिना दिवं मित्रो बभूव सप्रथा:. अभि श्रवोभिः पृथिवीम्.. (७)
जिस मित्र ने अपनी महिमा से अंतरिक्ष को हरा दिया है, उसी कीर्तिशाली ने धरती को
अन्न से भली प्रकार पूर्ण किया है. (७)
मित्राय पञ्च येमिरे जना अभिष्टिशवसे. स देवान्विश्वान्बिभर्ति.. (८)
ब्राह्मण आदि पांच जन शत्रुओं को हराने वाले बल से युक्त मित्र के लिए हवि देते हैं. वे
मित्र सभी देवों को धारण करते हैं. (८)
मित्रो देवेष्वायुषु जनाय वृक्तबर्हिषे. इष इष्टव्रता अकः.. (९)
दिव्य गुण वाले मनुष्यों में जो व्यक्ति कुश छेदन करता है, उसे मित्र देव कल्याणकारी
अन्न देते हैं. (९)
सूक्त—६० देवता—ऋभुगण
इहेह वो मनसा बन्धुता नर उशिजो जग्मुरभि तानि वेदसा.
याभिर्मायाभिः प्रतिजूतिवपर्सः सौधन्वना यज्ञियं भागमानश.. (१)
हे ऋभुओ! तुम्हारे कर्मों को सब लोग मन से जानते हैं. हे नेताओ एवं सुधन्वा के पुत्रो!
तुम अपने ज्ञान से उन कर्मों को जान लेते हो, जिन कर्मों द्वारा तुम शत्रु को हराने वाला तेज
पाने के लिए यज्ञ के भाग की अभिलाषा करते हो. (१)
याभिः शचीभिश्चमसाँ अपिंशत यया धिया गामरिणीत चर्मणः.
येन हरी मनसा निरतक्षत तेन देवत्वमृभवः समानश.. (२)
हे ऋभुओ! जिस शक्ति द्वारा तुमने चमस के चार भाग किए थे, जिस बुद्धि से तुमने
गाय को चर्मयुक्त किया था एवं जिस ज्ञान से तुमने इंद्र के हरि नामक घोड़ों को बनाया, उन्हीं
कर्मों द्वारा तुमने देवत्व पाया है. (२)
इन्द्रस्य सख्यमृभवः समानशुर्मनोर्नपातो अपसो दधन्विरे.
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सौधन्वनासो अमृतत्वमेरिरे विष्ट्वी शमीभिः सुकृतः सुकृत्यया.. (३)
अंगिरा के पुत्र ऋभुओं ने यज्ञकर्म द्वारा इंद्र की मित्रता भली प्रकार प्राप्त करके प्राण
धारण किए हैं. सुधन्वा के पुत्र एवं पवित्र कर्म करने वाले ऋभुगण देवत्व प्राप्ति के हेतु एवं
शोभन कर्मों से युक्त होकर अमृत पद को प्राप्त कर चुके हैं. (३)
इन्द्रेण याथ सरथं सुते सचाँ अथो वशानां भवथा सह श्रिया.
न वः प्रतिमै सुकृतानि वाघतः सौधन्वना ऋभवो वीर्याणि च.. (४)
हे ऋभुआे! तुम इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर सोम निचोड़ने के स्थान यज्ञ में जाओ
एवं यजमानों की स्तुतियां स्वीकार करो. हे सुधन्वा के पुत्रो एवं मेधावी ऋभुआे! तुम्हारे
शोभन कर्मों की सीमा जानना संभव नहीं है और न तुम्हारी शक्ति की. (४)
इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितं सुतं सोममा वृषस्वा गभस्त्योः.
धियेषितो मघवन्दाशुषो गृहे सौधन्वनेभिः सह मत्स्वा नृभिः.. (५)
हे इंद्र! तुम अन्न वाले ऋभुओं के साथ मिलकर जल द्वारा भली प्रकार गीले एवं पत्थरों
द्वारा निचोड़े हुए सोम को दोनों हाथों से पकड़कर पिओ. हे मघवा! तुम स्तुति से प्रेरणा
पाकर यजमान के घर में सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं के साथ सोम पीकर प्रसन्न बनो. (५)
इन्द्र ऋभुमान्वाजवान्मत्स्वेह नोऽस्मिन्त्सवने शच्या पुरुष्टुत.
इमानि तुभ्यं स्वसराणि येमिरे व्रता देवानां मनुषश्च धर्मभिः.. (६)
हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम ऋभुओं तथा अन्न से युक्त होकर एवं इंद्राणी को
साथ लेकर हमारे इस तृतीय सवन में प्रसन्न बनो. तुम्हारे सोमपान के लिए ये दिन एवं अग्नि
आदि देवों तथा मनुष्यों के कर्म निश्चित हैं. (६)
इन्द्र ऋभुभिर्वाजिभिर्वाजयन्निह स्तोमं जरितुरुप याहि यज्ञियम्.
शतं केतेभिरिषिरेभिरायवे सहस्रणीथो अध्वरस्य होमनि.. (७)
हे इंद्र! तुम अन्नयुक्त ऋभुओं के साथ स्तोता को अन्न देते हुए इस यज्ञ में स्तोता का
स्तोत्र सुनने के लिए आओ. सौ मरुतों एवं चलने में कुशल घोड़ों के साथ तुम यजमान द्वारा
हजार प्रकार से तैयार किए गए सोम वाले यज्ञ में आओ. (७)
सूक्त—६१ देवता—उषा
उषो वाजेन वाजिनि प्रचेताः स्तोमं जुषस्व गृणतो मघोनि.
पुराणी देवि युवतिः पुरन्धिरनु व्रतं चरसि विश्ववारे.. (१)
हे अन्न एवं धनयुक्त उषा! तुम उत्तम ज्ञानसंपन्न होकर स्तोता के स्तोत्रों को स्वीकार
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करो. हे सबके द्वारा वरण करने योग्य, पुरातन, युवती एवं बहुतों द्वारा स्तुत उषा! तुम
यज्ञकर्म के अनुसार चलती हो. (१)
उषो देव्यमर्त्या वि भाहि चन्द्ररथा सूनृता ईरयन्ती.
आ त्वा वहन्तु सुयमासो अश्वा हिरण्यवर्णां पृथुपाजसो ये.. (२)
हे मरणरहित, सोने के रथ वाली, प्रिय एवं सत्य वाणी बोलती हुई उषा! तुम सूर्यकिरणों
से प्रकाशित बनो. महान् बलशाली, लाल रंग वाले एवं रथ में सरलता से जोड़ने योग्य घोड़े
तुझ सुनहरे रंग वाली को बुलावें. (२)
उषः प्रतीची भुवनानि विश्वोर्ध्वा तिष्ठस्यमृतस्य केतुः.
समानमर्थं चरणीयमाना चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्व.. (३)
हे समस्त प्राणियों के सामने आनेवाली एवं मरणरहित सूर्य का ज्ञान कराने वाली उषा!
तुम आकाश में ऊंची ठहरती हो. हे अति नवीन उषा! एक ही मार्ग में चलने की इच्छुक तुम
बार-बार उसी मार्ग में इस तरह चलो जैसे आकाश में सूर्य का पहिया एक ही मार्ग पर चलता
है. (३)
अव स्यूमेव चिन्वती मघोन्युषा याति स्वसरस्य पत्नी.
स्वर्जनन्ती सुभगा सुदंसा आन्ताद्दिवः पप्रथ आ पृथिव्याः.. (४)
धन की स्वामिनी उषा कपड़े के समान फैले अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य की पत्नी
बनकर चलती है. अपना तेज उत्पन्न करती हुई, शोभन-धन वाली एवं अग्निहोत्र आदि उत्तम
कर्मों से युक्त उषा आकाश ओर धरती के अंत तक प्रकाशित होती है. (४)
अच्छा वो देवीमुषसं विभातीं प्र वो भरध्वं नमसा सुवृक्तिम्.
ऊर्ध्वं मधुधा दिवि पाजो अश्रेत्प्र रोचना रुरुचे रण्वसन्दृक्.. (५)
हे स्तोताओ! तुम अपने सामने शोभन पाती हुई उषा की सुंदर स्तुति नमस्कार सहित
करो. स्तुति धारण वाली उषा आकाश में ऊपर जाने वाला तेज धारण करती है. तेजस्विनी
एवं देखने में सुंदर उषा अच्छी तरह चमकती है. (५)
ऋतावरी दिवो अर्कैर्बोध्या रेवती रोदसी चित्रमस्थात्.
आयतीमग्न उषसं विभातीं वाममेषि द्रविणं भिक्षमाणः.. (६)
सत्ययुक्त उषा को दिव्य तेज के कारण सब जानते हैं. धनवाली उषा अपने विविध रूपों
से धरती-आकाश को भर देती है. हे अग्नि! तुम्हारे सामने आती हुई एवं प्रकाशयुक्त उषा से
मांगते हुए तुम सुंदर धन पाते हो. (६)
ऋतस्य बुध्न उषसामिषण्यन्वृषा मही रोदसी आ विवेश.
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