ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 668, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौधन्वनासो अमृतत्वमेरिरे विष्ट्वी शमीभिः सुकृतः सुकृत्यया.. (३)
अंगिरा के पुत्र ऋभुओं ने यज्ञकर्म द्वारा इंद्र की मित्रता भली प्रकार प्राप्त करके प्राण
धारण किए हैं. सुधन्वा के पुत्र एवं पवित्र कर्म करने वाले ऋभुगण देवत्व प्राप्ति के हेतु एवं
शोभन कर्मों से युक्त होकर अमृत पद को प्राप्त कर चुके हैं. (३)
इन्द्रेण याथ सरथं सुते सचाँ अथो वशानां भवथा सह श्रिया.
न वः प्रतिमै सुकृतानि वाघतः सौधन्वना ऋभवो वीर्याणि च.. (४)
हे ऋभुआे! तुम इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर सोम निचोड़ने के स्थान यज्ञ में जाओ
एवं यजमानों की स्तुतियां स्वीकार करो. हे सुधन्वा के पुत्रो एवं मेधावी ऋभुआे! तुम्हारे
शोभन कर्मों की सीमा जानना संभव नहीं है और न तुम्हारी शक्ति की. (४)
इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितं सुतं सोममा वृषस्वा गभस्त्योः.
धियेषितो मघवन्दाशुषो गृहे सौधन्वनेभिः सह मत्स्वा नृभिः.. (५)
हे इंद्र! तुम अन्न वाले ऋभुओं के साथ मिलकर जल द्वारा भली प्रकार गीले एवं पत्थरों
द्वारा निचोड़े हुए सोम को दोनों हाथों से पकड़कर पिओ. हे मघवा! तुम स्तुति से प्रेरणा
पाकर यजमान के घर में सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं के साथ सोम पीकर प्रसन्न बनो. (५)
इन्द्र ऋभुमान्वाजवान्मत्स्वेह नोऽस्मिन्त्सवने शच्या पुरुष्टुत.
इमानि तुभ्यं स्वसराणि येमिरे व्रता देवानां मनुषश्च धर्मभिः.. (६)
हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम ऋभुओं तथा अन्न से युक्त होकर एवं इंद्राणी को
साथ लेकर हमारे इस तृतीय सवन में प्रसन्न बनो. तुम्हारे सोमपान के लिए ये दिन एवं अग्नि
आदि देवों तथा मनुष्यों के कर्म निश्चित हैं. (६)
इन्द्र ऋभुभिर्वाजिभिर्वाजयन्निह स्तोमं जरितुरुप याहि यज्ञियम्.
शतं केतेभिरिषिरेभिरायवे सहस्रणीथो अध्वरस्य होमनि.. (७)
हे इंद्र! तुम अन्नयुक्त ऋभुओं के साथ स्तोता को अन्न देते हुए इस यज्ञ में स्तोता का
स्तोत्र सुनने के लिए आओ. सौ मरुतों एवं चलने में कुशल घोड़ों के साथ तुम यजमान द्वारा
हजार प्रकार से तैयार किए गए सोम वाले यज्ञ में आओ. (७)
सूक्त—६१ देवता—उषा
उषो वाजेन वाजिनि प्रचेताः स्तोमं जुषस्व गृणतो मघोनि.
पुराणी देवि युवतिः पुरन्धिरनु व्रतं चरसि विश्ववारे.. (१)
हे अन्न एवं धनयुक्त उषा! तुम उत्तम ज्ञानसंपन्न होकर स्तोता के स्तोत्रों को स्वीकार
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