ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१ देवता—अग्नि
सप्तम मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम्.
दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम्.. (१)
यज्ञ के नेता ऋत्विज् प्रशंसायोग्य, दूर से दिखाई देने वाले, गृहपति एवं गतिशील अग्नि
को हाथों की गति एवं उंगलियों की सहायता से अरणि से उत्पन्न करते हैं. (१)
तमग्निमस्ते वसवो नृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्.
दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः.. (२)
जो अग्नि घर में पूजनीय एवं नित्य थे, उन्हीं शोभनदर्शन वाले अग्नि को सभी भयों से
बचाने के लिए वसिष्ठ पुत्रों ने घर में रखा. (२)
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूर्त्या यविष्ठ.
त्वां शश्वन्त उप यन्ति वाजाः.. (३)
हे अतिशय युवा अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित होकर अपनी गतिशील ज्वाला के
साथ हमारे कल्याण के लिए यज्ञशाला में चमको. बहुत से अन्न तुम्हारे पास जाते हैं. (३)
प्र ते अग्नयोऽग्निभ्यो वरं निः सुवीरासः शोशुचन्त द्युमन्तः.
यत्रा नरः समासते सुजाताः.. (४)
शोभनजन्म वाले ऋत्विज् जहां बैठते हैं, वहां अग्नि लौकिक अग्नियों की अपेक्षा
कल्याणकारी, संतान देने वाले एवं अधिक दीप्तिशाली होकर चमकते हैं. (४)
दा नो अग्ने धिया रयिं सुवीरं स्वपत्यं सहस्य प्रशस्तम्.
न यं यावा तरति यातुमावान्.. (५)
हे शत्रुओं को हराने में कुशल अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनकर हमें ऐसा कल्याणकर,
संतान वाला, शोभन पुत्र-पौत्र वाला एवं श्रेष्ठ धन दो, जिसे हिंसक शत्रु बाधित न कर सकें.
(५)
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उप यमेति युवतिः सुदक्षं दोषा वस्तोर्हविष्मती घृताची.
उप स्वैनमरमतिर्वस्यूः.. (६)
अग्नि से नित्ययुक्त एवं हव्यसहित जुहू रात-दिन शोभनबल वाले अग्नि के पास आती
है. स्तोताओं के धन की अभिलाषा करती हुई अग्नि की दीप्ति अग्नि के पास आती है. (६)
विश्वा अग्नेऽप दहारातीर्येभिस्तपोभिर्दहदो जरूथम्.
प्र निस्वरं चातयस्वामीवाम्.. (७)
हे अग्नि! तुमने जिन तेजों से भयानक शब्द करने वाले राक्षसों को जलाया था, उन्हीं
तेजों से समस्त शत्रुओं को जलाओ व ताप नष्ट करके रोग को मिटाओ. (७)
आ यस्ते अग्न इधते अनीकं वसिष्ठ शुक्र दीदिवः पावक.
उतो न एभिः स्तवथैरिह स्याः.. (८)
हे श्रेष्ठ, शुभ, तेजस्वी एवं शोधक अग्नि! जो तुम्हारा तेज बढ़ाते हैं, उन पर तुम जिस
प्रकार प्रसन्न होते हो, उसी प्रकार हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर इस यज्ञ में आओ. (८)
वि ये ते अग्ने भेजिरे अनीकं मर्ता नरः पित्र्यासः पुरुत्रा.
उतो न एभिः सुमना इह स्याः.. (९)
हे अग्नि! जो पितरों के हितकारक एवं यज्ञकर्म के नेता लोग तुम्हारे तेज को अनेक
स्थानों में बांटते हैं, तुम उन पर जिस प्रकार प्रसन्न होते हो, उसी प्रकार हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न
होकर इस यज्ञ में स्थित बनो. (९)
इमे नरो वृत्रहत्येषु शूरा विश्वा अदेवीर्भि सन्तु मायाः.
ये मे धियं पनयन्त प्रशस्ताम्.. (१०)
जो लोग मेरे उत्तम यज्ञकर्म की स्तुति करते हैं, वे ही शूर नेता युद्धों में असुरों की माया
को पराजित करें. (१०)
मा शूने अग्ने नि षदाम नृणां माशेषसोऽवीरता परि त्वा.
प्रजावतीषु दुर्यासु दुर्य.. (११)
हे अग्नि! हम पुत्रादि से शून्य घर में न रहें, न हम दूसरों के घर में निवास करें. हे घर के
हितैषी अग्नि देव! पुत्रों एवं वीरों से युक्त हम तुम्हारी सेवा करते हुए प्रजायुक्त घरों में रहें.
(११)
यमश्री नित्यमुपयाति यज्ञं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्षयं नः.
स्वजन्मना शेषसा वावृधानम्.. (१२)
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हे घोड़ों के स्वामी अग्नि! हमें सगे पुत्र से वृद्धि पाता हुआ ऐसा शोभन संतानयुक्त घर
दो, जिस यज्ञयुक्त घर में तुम नित्य आते हो. (१२)
पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात् पाहि धूर्तेरररुषो अघायोः.
त्वा युजा पृतनायूँरभि ष्याम्.. (१३)
हे अग्नि! हमें द्वेषयुक्त राक्षस से बचाओ. हमें दान न करने वाले, पापी और हिंसक से
बचाओ. हम तुम्हारी सहायता से सेना के इच्छुक लोगों को पराजित करें. (१३)
सेदग्नीरग्नीरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वीळुपाणिः.
सहस्रपाथा अक्षरा समेति.. (१४)
हमारा बलवान्, दृढ़ हाथों वाला एवं हजारों अन्नों वाला पुत्र नाशरहित स्तोत्रों द्वारा जिस
अग्नि की सेवा करता है, वह अग्नि अन्य अग्नियों को पराजित करे. (१४)
सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात्.
सुजातासः परि चरन्ति वीराः.. (१५)
वे अग्नि ही हैं, जो अपने प्रज्वलित करने वाले को हिंसक एवं विशाल पाप से बचाते हैं
तथा शोभनजन्म वाले वीर जिनकी सेवा करते हैं. (१५)
अयं सो अग्निराहुतः पुरुत्रा यमीशानः समिदिन्धे हविष्मान्.
परि यमेत्यध्वरेषु होता.. (१६)
वे ही अग्नि अनेक यज्ञों में बुलाए जाते हैं, जिन्हें ऐश्वर्य चाहने वाला एवं हव्ययुक्त
यजमान भली प्रकार जलाता है एवं यज्ञों में होता जिनकी परिक्रमा करता है. (१६)
त्वे अग्न आहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्या.
उभा कृण्वन्तो वहतू मियेधे.. (१७)
हे अग्नि! हम धनों के स्वामी बनकर अग्निहोत्रादि नित्यकर्मों को धारण करने वाले
स्तोत्र बोलते हुए यज्ञ में बहुत से हव्य देंगे. (१७)
इमो अग्ने वीततमानि हव्याजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ.
प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु.. (१८)
हे अग्नि! तुम इन अति सुंदर हव्यों को देवों के समीप लेकर जाओ. प्रत्येक देव हमारे
इस हव्य की कामना करें. (१८)
मा नो अग्नेऽवीरते परा दा दुर्वाससेऽमतये मा नो अस्यै.
मा नः क्षुधे मा रक्षस ऋतावो मा नो दमे मा वन आ जुहूर्थाः.. (१९)
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हे अग्नि! हमें संतानहीन मत बनाओ. हमें बुरे कपड़े और बुरी बुद्धि मत देना. हमें भूख
और राक्षस को मत सौंपना. हे सत्ययुक्त अग्नि! हमें न घर में मारना और न वन में. (१९)
नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः.
रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२०)
हे अग्नि! मेरे लिए अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को तुम
अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. तुम सदा कल्याणों द्वारा
हमारा पालन करो. (२०)
त्वमग्ने सुहवो रण्वसन्दृक् सुदीती सूनो सहसो दीदिहि.
मा त्वे सचा तनये नित्य आ धङ्मा वीरो अस्मन्नर्यो वि दासीत्.. (२१)
हे शक्ति के पुत्र, शोभन आह्वान वाले एवं रमणीयदर्शन अग्नि! तुम उत्तम प्रकाश के
साथ प्रदीप्त बनो! तुम मेरे पुत्र के सहायक बनो एवं उसे मत जलाओ. हमारा मानवहितकारी
पुत्र नष्ट न हो. (२१)
मा नो अग्ने दुर्भृतये सचैषु देवेद्धेष्वग्निषु प्र वोचः.
मा ते अस्मान्दुर्मतयो भृमाच्छिद्देवस्य सूनो सहसो नशन्त.. (२२)
हे सहायक अग्नि! ऋत्विजों द्वारा अग्नियों के प्रज्वलित होने पर उनसे हमें दुःखपूर्वक
मरण के लिए मत कहो. हे प्रज्वलित एवं बलपुत्र अग्नि! तुम्हारी दुर्बुद्धि भ्रम से भी हमें न
प्राप्त हो. (२२)
स मर्तो अग्ने स्वनीक रेवानमर्त्ये य आजुहोति हव्यम्.
स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति.. (२३)
हे शोभनतेज वाले एवं देवतारूप अग्नि! तुम्हें हव्य देने वाला मनुष्य धनवान् होता है. वे
अग्नि देव यजमान को धन देते हैं, जिनके पास धन चाहने वाला स्तोता पूछने के लिए जाता
है. (२३)
महो नो अग्ने सुवितस्य विद्वान् रयिं सूरिभ्य आ वहा बृहन्तम्.
येन वयं सहसावन्मदेमाविक्षितास आयुषा सुवीराः.. (२४)
हे अग्नि! तुम हमारे महान् कल्याणकारी कार्यों को जानते हो. हम स्तोताओं को तुम
महान् धन दो. हे बलपुत्र अग्नि! उस धन से हम क्षयरहित, पूर्ण आयु वाले व शोभन पुत्र-पौत्रों
वाले होकर प्रसन्न बनें. (२४)
नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः.
रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५)
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