ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1024, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे घोड़ों के स्वामी अग्नि! हमें सगे पुत्र से वृद्धि पाता हुआ ऐसा शोभन संतानयुक्त घर
दो, जिस यज्ञयुक्त घर में तुम नित्य आते हो. (१२)
पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात् पाहि धूर्तेरररुषो अघायोः.
त्वा युजा पृतनायूँरभि ष्याम्.. (१३)
हे अग्नि! हमें द्वेषयुक्त राक्षस से बचाओ. हमें दान न करने वाले, पापी और हिंसक से
बचाओ. हम तुम्हारी सहायता से सेना के इच्छुक लोगों को पराजित करें. (१३)
सेदग्नीरग्नीरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वीळुपाणिः.
सहस्रपाथा अक्षरा समेति.. (१४)
हमारा बलवान्, दृढ़ हाथों वाला एवं हजारों अन्नों वाला पुत्र नाशरहित स्तोत्रों द्वारा जिस
अग्नि की सेवा करता है, वह अग्नि अन्य अग्नियों को पराजित करे. (१४)
सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात्.
सुजातासः परि चरन्ति वीराः.. (१५)
वे अग्नि ही हैं, जो अपने प्रज्वलित करने वाले को हिंसक एवं विशाल पाप से बचाते हैं
तथा शोभनजन्म वाले वीर जिनकी सेवा करते हैं. (१५)
अयं सो अग्निराहुतः पुरुत्रा यमीशानः समिदिन्धे हविष्मान्.
परि यमेत्यध्वरेषु होता.. (१६)
वे ही अग्नि अनेक यज्ञों में बुलाए जाते हैं, जिन्हें ऐश्वर्य चाहने वाला एवं हव्ययुक्त
यजमान भली प्रकार जलाता है एवं यज्ञों में होता जिनकी परिक्रमा करता है. (१६)
त्वे अग्न आहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्या.
उभा कृण्वन्तो वहतू मियेधे.. (१७)
हे अग्नि! हम धनों के स्वामी बनकर अग्निहोत्रादि नित्यकर्मों को धारण करने वाले
स्तोत्र बोलते हुए यज्ञ में बहुत से हव्य देंगे. (१७)
इमो अग्ने वीततमानि हव्याजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ.
प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु.. (१८)
हे अग्नि! तुम इन अति सुंदर हव्यों को देवों के समीप लेकर जाओ. प्रत्येक देव हमारे
इस हव्य की कामना करें. (१८)
मा नो अग्नेऽवीरते परा दा दुर्वाससेऽमतये मा नो अस्यै.
मा नः क्षुधे मा रक्षस ऋतावो मा नो दमे मा वन आ जुहूर्थाः.. (१९)
ebook converter DEMO Watermarks*