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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

सामवेद
यजुर्वेद
अथर्ववेद
ऋग्वेद

ऋग्वेद

ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ ... ॥ अथर्ववेद ॥
द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु
ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥
॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य-
वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद
सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद
सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ-
अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥
थर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥
॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ-
सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ-
सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥
वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य- ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद
द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु
ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥
द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु
ऋग्वेद ॥ सामवे- ॥ अथर्ववेद ॥
डा. गंगा सहाय शर्मा
एम.ए. (हिंदी, संस्कृत), पी.-एच.डी., व्याकरणाचार्य

ऋग्वेद
डा. गंगा सहाय शर्मा
एम.ए. (हिंदी-संस्कृत), पी-एच.डी., व्याकरणाचार्य
संस्कृत साहित्य प्रकाशन
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© १९७९
संस्कृत साहित्य प्रकाशन
संस्करण : २०१६

ISBN : 978-93-5065-223-7
VP : 1750.5H16*
संस्कृत साहित्य प्रकाशन के लिए
विश्व बुक्स प्राइवेट लि.
एम-१२, कनाट सरकस, नई दिल्ली-११०००१
द्वारा वितरित

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अपनी बात
मैंने सायण आचार्य के भाष्य पर आधारित ऋग्वेद का अनुवाद किया था. उस समय
आशा नहीं थी कि प्राचीन भारतीय संस्कृति को जानने की इच्छा रखने वालों को यह इतना
अधिक रुचिकर लगेगा. मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए यह गौरव की बात है. विद्वान्,
चिंतक एवं मनीषी पाठकों ने अब तक किसी त्रुटि एवं असंगति का संकेत नहीं किया है,
इससे मैं अनुमान लगाने का साहस कर सकता हूं कि इस ग्रंथ का अनुवाद, मुद्रण आदि
संतोषजनक है.
इस ग्रंथ में ऋग्वेद की ऋचाओं का वह अनुवाद दिया हुआ है, जो अर्थ सायणाचार्य को
अभीष्ट था. इस अनुवाद का आधार सायण का भाष्य है. उन्होंने जिस शब्द का जो अर्थ
बताया है, वही मैंने इस अनुवाद में देने का प्रयत्न किया है.
मैंने अनुवाद करने के लिए चारों वेदों में से ऋग्वेद और ऋग्वेद के अनेक भाष्यों में से
सायण भाष्य ही क्यों चुना, इसका उत्तर देने में मुझे संकोच नहीं है. ऋग्वेद भारतीय जनता
एवं आर्य जाति की ही प्राचीनतम पुस्तक नहीं, विश्व की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी
पुस्तक है. सबसे प्राचीन संस्कृति—वैदिक संस्कृति—के प्राचीनतम लिखित प्रमाण होने के
कारण ऋग्वेद की महत्ता सर्वमान्य है. मैं इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता कि ऋग्वेद की
ऋचाओं का ऋषियों ने ईश्वरीय ज्ञान के रूप में साक्षात्कार किया था या उन्होंने स्वयं इनकी
रचना की थी. वैसे ऋग्वेद में समसामयिक समाज का जिस ईमानदारी, विस्तार एवं तन्मयता
से वर्णन किया गया है, उससे मेरा व्यक्तिगत विश्वास यही है कि ऋषियों ने समयसमय पर इन
ऋचाओं की रचना की होगी.
सायण के अतिरिक्त ऋग्वेद पर वेंकट माधव, उद्गीथ, स्कंदस्वामी, नारायण, आनंद
तीर्थ, रावण, मुद्गल, दयानंद सरस्वती आदि अनेक विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं. इनमें किसी
का भाष्य पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है. केवल सायण ही ऐसे विद्वान् हैं, जिन्होंने चारों वेदों
पर पूर्ण भाष्य लिखा है और वह उपलब्ध है.
सायण का जीवनकाल चौदहवीं शताब्दी है. वह विजयपुर नरेश हरिहर एवं बुक्क के
मंत्री रहे थे. प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ 'माधव निदान' लिखने वाले माधव आचार्य इन्हीं के भाई थे.
किसी भी शब्द का अर्थ जानने में परंपरागत ज्ञान का बहुत महत्त्व है. सायण को
ऋग्वेद के परंपरागत अर्थ को जानने की सुविधा बाद में होने वाले आचार्यों से अधिक थी.
यह निर्विवाद है. मंत्री होने के कारण सभी पुस्तकों की प्राप्ति और विद्वानों की सहायता उन्हें
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सहज सुलभ थी. सायण ने ऋचाओं के प्रत्येक शब्द का विस्तार से अर्थ किया है. प्रत्येक
शब्द की व्याकरणसम्मत व्युत्पत्ति की है तथा उन्होंने निघंटु, प्रातिशाख्य एवं ब्राह्मण ग्रंथों के
उदाहरण देकर अपने अर्थ की पुष्टि की है. इस प्रकार सायण का अर्थ निराधार नहीं है.
वैदिक मंत्रों के अर्थ जानने के हेतु यास्क आचार्य ने तीन साधन बताए हैं:
१. आचार्यों से परंपरा द्वारा सुना हुआ ज्ञान एवं ग्रंथ.
२. तर्क.
३. मनन.
सायण ने इन तीनों का ही सहारा लेकर अपना भाष्य लिखा है. सायण की कोई धारणा
अथवा जिद नहीं जान पड़ती. कुछ अन्य आचार्यों के समान उन्होंने सभी मंत्रों का
आधिभौतिक, आध्यात्मिक या आधिदैविक अर्थ नहीं किया है. कुछ आचार्यों का यहां तक
विश्वास रहा है कि प्रत्येक वैदिक मंत्र के उक्त तीनों प्रकार के अर्थ संभव हैं. सायण ने प्रसंग
के अनुकूल कुछ मंत्रों का मानव जीवन संबंधी, कुछ का यज्ञ संबंधी और कुछ का
आत्मापरमात्मा संबंधी अर्थ दिया है. सायण के अनुसार, अधिकांश मंत्रों का अर्थ मानव
जीवन संबंधी ही है. शेष दो प्रकार का अर्थ उन्होंने बहुत कम मंत्रों का किया है. इस प्रकार
एकमात्र सायण ही ऐसे भाष्यकर्त्ता हैं, जिन्होंने किसी वाद का चश्मा लगाए बिना वैदिक मंत्रों
का अर्थ किया है. उनका भाष्य साधारण व्यक्ति को वेदार्थ समझने में भी सहायक है. इन्हीं
सब कारणों से मैंने अपने अनुवाद का आधार सायण भाष्य को बनाया है.
इस अनुवाद के साथ ऋग्वेद की मूल ऋचाएं भी दी जा रही हैं. हिंदी में ऋग्वेद के अन्य
अनुवाद भी हुए हैं, जिन्हें उनके लेखकों ने सायण भाष्य पर आधारित बताया है. मैं यह
कहने का साहस तो नहीं कर पाऊंगा कि उन सबके अनुवाद शुद्ध नहीं हैं; हां, यह कहने में
मुझे संकोच नहीं है कि मैंने सायण का आशय स्पष्ट करने का पूरा प्रयत्न किया है.
ऋग्वेद का विभाजन दस मंडलों में किया गया है. प्रत्येक मंडल में बहुत से सूक्त एवं
प्रत्येक सूक्त में अनेक ऋचाएं हैं. मैंने अनुवाद में केवल यही विभाजन दिया है. वैसे प्रत्येक
मंडल कुछ अनुवाकों में विभक्त है. अनुवाक सूक्तों में बांटे गए हैं. संपूर्ण ऋग्वेद को चौसठ
अध्यायों में विभक्त करके उनके आठ अष्टक बनाए गए हैं. प्रत्येक अष्टक में आठ अध्याय हैं.
सायण ने ये सब विभाजन दिए हैं. उनके भाष्य में अष्टकों एवं अध्यायों को ही प्रमुखता दी
गई है. एक तो यह विभाजन कृत्रिम है, दूसरे इससे व्यर्थ का भ्रम होता है, इसलिए मैंने इनका
उल्लेख नहीं किया है.
संहिता अथवा भाष्य में प्रत्येक मंत्र के ऋषि, देवता, छंद और विनियोग का उल्लेख है.
ऋषि का तात्पर्य उस मंत्र के निर्माता या द्रष्टा ऋषि से है. देवता का अर्थ है—विषय. यह
देवता शब्द के वर्तमान प्रचलित अर्थ से सर्वथा भिन्न है. ऋग्वेद के देवता सपत्नी (सौत), द्यूत
(जुआ), दरिद्रता, विनाश आदि भी हैं. छंद से तात्पर्य उस सांचे या नाप से है जिस में वह मंत्र
निर्मित है. विनियोग का तात्पर्य है—प्रयोग. जो मंत्र समयसमय पर जिस काम में आता रहा,
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वही उस का विनियोग रहा. वैदिक मंत्रों का अर्थ समझने में देवता (विषय) ही आवश्यक है.
इसलिए मैंने केवल देवता का ही उल्लेख किया है.
अधिकांश सूक्तों में एक सूक्त का ऋषि एवं छंद एक ही है. कुछ सूक्तों में अलग-अलग
मंत्रों के अलग ऋषि एवं छंद भी हैं. सभी वर्णों के पुरुषों के अतिरिक्त कुछ नारियां भी ऋषि
हुई हैं. मंत्रों के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र सभी ऋषि के रूप में संबंधित हैं. ब्राह्मण
एवं क्षत्रिय ऋषियों की संख्या ही सर्वाधिक है. वैश्य एवं शूद्र ऋषि एकएक ही हैं.
वैदिक आर्यों का समाज पूर्णतया विकसित एवं उन्नत समाज था. यदि ऋग्वेद में वर्णित
बातों को मानव जीवन संबंधी स्वीकार किया जाए तो आर्यों का जीवन सभी प्रकार से पूर्ण
था. ऋग्वेद में कुछ वस्तुओं एवं पशुपक्षियों के नाम एवं वर्णन साक्षात् रूप से आए हैं और
कुछ का उल्लेख अलंकार रूप में हुआ है. वर्णन चाहे किसी भी रूप में हो, पर इतना सिद्ध
हो जाता है कि ऋग्वेदकाल के लोग इन सब बातों को जानते थे. कुछ बातें उन्होंने प्रत्यक्ष
देखी थीं और कुछ की उन्हें कल्पना हो सकती है.
कवच, लोहे का द्वार, सोने अथवा लोहे की नकदी, सुसज्जित सेना, ढाल-तलवार,
कारावास, हथकड़ी-बेड़ी, आकाश में उड़ने वाला बिना घोड़ों का रथ, सौ पतवारों वाली नाव,
लोहे का नकली पैर, अंधे को आंखें मिलना, बूढ़े का दोबारा जवान होना, जुआ खेलना,
व्यभिचारिणी स्त्री का दूर जाकर गर्भपात करना, कामुकी नारी का संकेतस्थल पर आना,
कन्या के पिता द्वारा कन्या को अलंकृत करना, लकड़ी का संदूक, घोड़ा चलाने का चाबुक,
लगाम, अंकुश, सुई, कपड़ा बुनने वाला जुलाहा, घड़ा बनाने वाला कुम्हार, रथकार, सुनार,
किसान, तालाब से सिंचाई, हल जोतना आदि ऐसी बातें हैं, जो वैदिक आर्यों को सभी प्रकार
विकसित सिद्ध करती हैं.
कुछ लोगों का ऋग्वेद में व्यभिचारिणी स्त्री, गर्भपात, प्रेमी और प्रेयसी, कामी पुरुष,
कामुकी नारी, कन्या के पिता या भाई द्वारा उत्तम वर पाने हेतु दहेज देना, अयोग्य वर का
उत्तम वधू पाने हेतु मूल्य चुकाना, चोर, जुआरी, विश्वासघातक मित्र आदि का उल्लेख
अनुचित लग सकता है. इन शब्दों के वे दूसरे अर्थ करेंगे एवं तत्कालीन समाज में इन बातों
को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. मैं वास्तविकता बताने के लिए उनसे क्षमा चाहूंगा, मेरा दृढ़
विश्वास है कि एक बुद्धिप्रधान एवं विचारशील विकसित समाज में ये बातें होनी स्वाभाविक
हैं.
दिनभर जंगल में चरकर घरों को लौटती गाय, रस्सी से बंधे बछड़े का रंभाना, गाय का
दूध दुहना, छाछ बिलोना, कच्चे मांस पर मक्खियों का बैठना, चिड़ियों का चहचहाना आदि
पढ़कर ऐसा लगता है कि भारत के गांवों में आज भी वैदिक जीवन की झलक मिल जाती है.
नागरिकता का विस्तार एवं विज्ञान की पहुंच उसे विकृत कर रही है. आर्य मुख्यतया कृषि
जीवी एवं ग्रामों में रहने वाले लोग ही थे. बाद में उन्होंने नगर भी बसाए, पर ऋग्वेद में
अधिकांश नगर शत्रु नगरों के रूप में बताए गए हैं.
मुझे ऋग्वेद का सायण भाष्यानुसार अनुवाद करने में लगभग ढाई वर्ष लगे. यदि मुझे
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सायण के समान विस्तृत भाष्य लिखना पड़ता तो संभवतया चालीस वर्ष लगते. मेरे लिए इस
अनुवाद की एकमात्र उपलब्धि यही है कि मैं इस बहाने संपूर्ण ऋग्वेद एवं इसका सायण
भाष्य पढ़ सका. यदि किसी अन्य व्यक्ति का इस अनुवाद से कोई प्रयोजन सिद्ध हो सके तो
मैं अपना प्रयत्न सफल समझूंगा.
मेरे स्वयं के प्रमाद अथवा अज्ञान के कारण अथवा मुद्रण संबंधी कमियों के कारण यदि
अब भी कुछ त्रुटियां रह गई हों तो उन्हें मैं आगामी संस्करण में सुधारने हेतु कृतसंकल्प हूं.
जो महानुभाव इस ओर मार्गनिर्देशन करेंगे उनका मैं आभार मानूंगा.
अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं कि
ऋग्वेद की एक बात ने मुझे बहुत चकित किया है. उन्नत समाज, विचारशील लोगों एवं सभ्य
परिवारों की सभी सामग्री का उल्लेख होते हुए भी कहीं भी दीपक अथवा किसी कृत्रिम
प्रकाशसाधन का नाम नहीं मिला.
डा. गंगा सहाय शर्मा