रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
१२४ रसिकप्रिया
करि अंजन रंजित चारु कपोल करी जुत जावक नैननिकाई ।
सुनि आवत श्रीव्रजभूषन भूषन भूषतहीं उठि देखन धाई ।३१।
शब्दार्थ—कटि के तट = कमर में । उरमाई = लटका ली, डाल ली,
पहन ली । कल किकिनी० = सुंदर करधनी लेकर गले में पहन ली । कर =
हाथ में । नूपुर = पायजेब । पग = पैर में । पौंची = पहुँची, कलाई पर का
गहना । रची = पहन ली । अँगिया = चोली । अँगिया० = अँगिया पर आँचल
डालने की सुध भूल गई । रंजित = युक्त । करी० = नेत्रों का सौंदर्य यावक से
युक्त किया, नेत्रों का श्रृंगार महावर से कर लिया । जावक = महावर ।
निकाई = सुंदरता, श्रृंगार । ब्रजभूषन = श्रीकृष्णजी । भूषन०, = भूषण सजाते
समय ही ( भूषण पहनते पहनते ही ) उठ देखने दौड़ पड़ी और हड़बड़ी में
यहाँ का वहाँ पहन लिया ।
अलंकार—असंगति ।
श्रीकृष्णजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
(२१२) नँहूनंदन खेलत हे बने गात बनी छबि चंदन के जल की ।
वृषभानुसुताहि बिलाकत ही रुचि चित्त में बिभ्रम की झलकी ।
गिरि जात न जानत पाननि खात बिरी करि पंकज के दल की ।
बिहँसी सब गोपसुता हरि लोचन मूँदी सुरोचि दृगंचल की ।३२।
शब्दार्थ—हे = थे । बने गात = शरीर सजाए । रुचि = छटा । रुचि
चित्त में० = चित्त में विभ्रम का रंग आ गया । सुरोचि = सुंदर छटा ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, श्रीकृष्ण शरीर सजाए
खेल खेल रहे थे । उनके शरीर में चंदन-लेप की शोभा अच्छी बनी थी ।
( एकाएक उन्हें श्री राधिकाजी देख पड़ीं ) उन्हें देखते ही उनके चित्त में
विभ्रम का ऐसा रंग चढ़ा कि उन्हें पता ही न चला कि उनके हाथ से पान
( तांबूल ) छूटकर कब गिर गए । तब वे हाथ में लिए हुए कमल के पत्तों
का ही बीड़ा बनाकर खाने लगे । ( यह देखकर ) समस्त गोपियाँ हँस पड़ीं ।
( उनका हँसना देखकर ) श्रीकृष्ण ने अपने दृगंचलों की छटा को नेत्रों में
बंद कर लिया। अर्थात् श्रीकृष्ण को लज्जा लगी जिससे उन्होंने अपने नेत्र
बंद कर लिए, नेत्रों के मूँद लेने से उनके दृगंचलों की वह छटा नहीं रह गई ।
अथ विहृत हाव-लक्षण—( दोहा )
(२१३) बोलनि के समये बिषै, बोलन देइ न लाज ।
बिहृत हाव तासों कहैं, केसव कबि कबिराज । ३३।
३१—रची-बनी, बिना । उर सों-उर में । बिसराई-बिरमाई । रंजित-
भंजित । भूषन०-राधिका भूषित भूषन हो उठि धाई, भूषित ह्वै अति आतुर देख
न भाई । ३२—बने०-हैं बन तात, हैं बनगात । सुताहि-कुमारि । सुरोचि-सरोज ।
षष्ठ प्रभाव १३५
शब्दार्थ—समयैं बिषै = समय पर भी । तासों = ताकों, उसको ।
अथ श्रीराधिकाजू को विहृत हाव, यथा—( सबैया )
(२१४) मेरे कहे दहिये जु तऊ फिरि ग्रीषम ज्यों हठ-काठ दहौगी ।
पैरिबो प्रेम-समुद्र पराए कराए करें कृत क्यों निबहौगी ।
हौंस मरै सजनी सिगरी कबहुँ हरि सों हँसि बात कहौगी ।
पी-चित की चित्तसारी चढ़ी चित की पुतरी भई कौ लौं रहौगी।३४
शब्दार्थ—दहिये = जलती हो, दुख पाती हो । ग्रीषम = ग्रीष्म, अग्नि ।
हठ-काठ = हठ रूपी लकड़ी । पराए कराए = दूसरे द्वारा ( तैरने को प्रेरित
किए जाने पर ) । करें कृत = कार्य करने पर अर्थात् तैरने पर । दूसरे द्वारा
तैरने को प्रेरित किए जाने पर और दूसरे के तैरने से तुम्हारी तैरने की क्रिया
कैसे होगी । तुम्हें स्वयम् तैरना होगा । हौंस = उत्कंठा, लालसा । पी = प्रिय,
नायक । चित्रसारी = चित्रशाला, शयनगृह । चित = चित्र । पुतरी = पुतली
कौ लौं = कब तक ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) हे सखी, मेरे कहने से यदि
( इस समय ) जल रही हो ( हठ नहीं छोड़ रही हो ) तो भी मुझे विश्वास
है कि ऐसा समय आएगा जब ( भीतरी ) आग से तुम अपने हठ रूपी काठ
को स्वयम् जला डालोगी, अर्थात् जब प्रेम की तीव्र प्रेरणा होगी तो हठ न
रह जाएगा । तुम्हें प्रेमसमुद्र में तैरना है, क्या किसी के पार कराने से या
उसके ही पार करने से वहाँ तुम्हारा निबाह हो जायगा ? ( यह समुद्र तुम्हें
स्वयम् पार करना होगा, दूसरों के भरोसे मत रहो ) । ( उधर ) सारी
सखियाँ इस लालसा में मरी जा रही हैं कि कभी न कभी श्रीकृष्ण से तुम
हँसकर बोलोगी ( इधर तुम्हारा राग कुछ समझ में नहीं आ रहा है ) ।
आखिर, मैं यह पूछती हूँ कि प्रिय के हृदय की चित्रशाला में चित्र में खचित
पुतली के समान कब तक ( जड़ ) बनी रहोगी ।
अलंकार—रूपक ।
श्रीकृष्णजू को विहृत हाव यथा—( सवया )
(२१५) केसवदास सों आजु सखी बृषभानुकुमारी उराहनो दीनो ।
गारि दई अरु मारि दई अरबिंदन सों मनु कै हितहीनो ।
सीख दई, सुख पाइ लई उर लाइ सुगंध चढ़ाइ नवीनो ।
उत्तरु देइ कौं नंदकुमार कछू सिर नीचे तें ऊँचो न कीनो ।३५।
शब्दार्थ—उराहनो = उलाहना, उपालंभ । मारि० = कमलों से मार
दी ( मारा ) । मनु कै० = मन में लगाव कम करके, मन में प्रेम की कमी
करके ( अर्थात् रोष से ) ।
३४—फिरि - तन । पैरिबौ-पौरिबो । करें कृत - किये उत, किये कित ।
चढ़ी चित-चढ़ी चित्र । ३५—केसवदास-केसवराइ । मनु-करि ।
़१३६ रसिकप्रिया
भावार्थ— (सखी की उक्ति सखी से) हे सखी, वृषभानु की पुत्री राधिका
ने आज श्रीकृष्ण को उलाहना दिया, फिर गाली तक दी, मन में प्रेम की
कमी करके अर्थात् ईषत् रोष से कमलों की मार भी दी। फिर (ठंडी पड़कर)
नवीन सुगंधित द्रव्य उनके शरीर में लगाकर और उन्हें छाती से चिपकाकर
सीख दी और श्रीकृष्ण ने (बिना कुछ कहे सुने चुपचाप) सुख पाकर उसे
ग्रहण किया, इन सबका उत्तर देने के लिए नंदकुमार ने अपना सिर नीचे से
थोड़ा भी ऊपर नहीं किया (सिर जो नीचा किया तो वह नीचे का नीचे
ही रह गया, फिर उठाया ही नहीं, एक चुप तो सौ चुप) ।
अथ विलास हाव-लक्षण— (दोहा)
(२१६) खेलत बोलत हँसत अरु, चितवत चलत प्रकास।
जल थल केसवदास कहि, उपजत हाव बिलास।३६।
श्रीराधिकाजू को विलास हाव, यथा—(कवित्त)
(२१७) किलकत्त अलिक जु तिलक-चिलक मिस,
भौंहनि में बिभ्रमनि भावभेद दीने हैं।
लोचननि सोचन-सकोचनि नचावति है,
दसनचमक ही चकित चित्त कीने हैं।
केसौदास मंदहास अनायास दास करि,
लीने केसौराय जिय जद्यपि प्रबीने हैं।
मोहन के तन मन मोहिबे कौं मेरी आली,
तेरो मुख सुख ही अनंत ब्रत लीने हैं।३७।
शब्दार्थ—अलिक = भाल, माथा। चिलक = चमक। भावभेद = अनेक
भाव। बास = सुगंध। अनायास = बिना श्रम के। सुख ही = सरलता से।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी, श्रीकृष्ण के शरीर
एवम् मन को वशीभूत करने के लिए तेरे मुख ने अनेक ब्रत (ढंग) किए
हैं। माथे पर तिलक की चमक का बहाना उन्हें किलकाता है (आनंदित
करता है)। भौहों के अनेक विलासों (भंगिमाओं) से उनमें भावों के अनेक
स्वरूप लक्षित होते हैं। नेत्रों के सोच और संकोच की मुद्रा से तू उन्हें नचाती
है, दाँत की चमक ने तो उनके चित्त को ही चकित कर दिया है। अपने मंद
हास से तो उन्हें अनायास ही अपना दास बना लिया है, यद्यपि वे बड़े
प्रवीण गिने जाते हैं (अर्थात् तेरे मुख की चेष्टाओं का अत्यधिक प्रभाव उन
पर पड़ता है)।
३६—हाव-विविध । ३७-भाव-भौन । केसौदास०-मंदहास मुखबास ।
केसौराय-केसौदास । प्रबीने-नवीने । आली-सखी, भटू ।
· षष्ठ प्रभाव १३७
सूचना-( १ ) ब्रत करने वाला ब्रत का प्रभाव जिन पर डालना
चाहता है उन पर उसका प्रभाव किस प्रकार क्रमशः पड़ता है और वे उसके
वश हो जाते हैं इसका इसमें क्रम से वर्णन है। पहले तो वे अनाश्रित
किलकते हैं, फिर उनमें अनेक भाव जगते हैं, तदनंतर वे नाचने लगते हैं,
पुनः थकित होते हैं और अंत में वश में हो जाते हैं ।
( २ ) 'अलिक' का अर्थ 'अलीक, मिथ्या' भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्णजू को विलास हाव, यथा-( कबित्त )
(२२८) जिन न निहारे ते निहोरत निहारिबे कौं
काहू न निहारे जिन कैसेहूँ निहारे हैं।
सुर नर नाग नवकन्यनि के प्रानपति,
पतिदेवतानिहूँ कि हियनि बिहारे हैं।
इहि बिधि केसौदास रावरे असेष अंग।
उपमा न उपजी बिरंचि पचि हारे हैं।
रूप-मद-मोचन मदन-मद-मोचन हैं
तीय-ब्रत-मोचन बिलोचन तिहारे हैं।३८।
शब्दार्थ—निहारे = देखे । निहोरत = प्रार्थना करते हैं, लालसा करते हैं ।
कैसे ० = किसी प्रकार ( संयोग से या अनेक कष्ट झेलकर ) । नवकन्या =
नवीन कन्या, पंच कन्या ( अहल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी ) । पति-
देवता = पतिव्रता । असेष अंग = संपूर्ण रूप से । उपजी = बन सकी ।
बिरंचि = ब्रह्मा । पचि हारे = परेशान हो गए ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे कृष्ण, जिन्होंने आपके नेत्र
नहीं देखे वे देखने की लालसा करते हैं। जिन्होंने किसी प्रकार ( कष्ट सहकर
भी ) आपके नेत्र देख लिए वे फिर किसी के नेत्रों को नहीं देखते (आपके नेत्रों
के सौंदर्य के सामने किसी के नेत्रों का सौंदर्य नहीं ठहरता) । ये नेत्र सुर, नर,
नाग की कन्याओं और नवकन्याओं (पंच कन्याओं) को प्राणों की भाँति प्यारे
हैं और पतिव्रता स्त्रियों के भी हृदय में विहार करनेवाले हैं। इसी भाँति
आपके संपूर्ण अंग ( सुंदर ) हैं, जिनकी समता के लिए उपमान बनाते बनाते
ब्रह्मा परेशान होकर हार मान गए, परंतु उपमान न बन सके । आपके दोनो
नेत्र सौंदर्य का मद दूर करनेवाले एवम् कामदेव का गर्व छुड़ा देनेवाले और
स्त्रियों के व्रत ( पातिव्रत ) को विचलित करनेवाले हैं ।
अथ किलकिंचित हाव-लक्षण- (दोहा)
(२१६) श्रम अभिलाष सगर्ब स्मित, क्रोध हर्ष भय भाव ।
उपजत एकहि बार जहँ तहँ, किलकिंचित हाव ।३६।
३८-कैसेहूँ-कैसे कै । केसौदास-कैसोराय । उपजी-उपजै । रूप-मान ।
हैं-कौं, किधौं । बिलोचन-कौ लोचन । ३६-स्मित-सुख । तहँ-सो ।
१३८ रसिकप्रिया
अथ श्रीराधिकाजू को किलकंचित हाव, यथा—( सवैया )
(२२०) कौने रसै बिहँसै लखि कौनहिं कापर कोपिकै भौंह चढ़ावै ।
भूलति लाज भद्द कबहुँ कबहुँ मुख अंचल मेलि दुरावै ।
कौन की लेति बलाय, बलाय ल्यौं, तेरी दसा यह मोहिं न भावै ।
ऐसी तौ तू कबहुँ न भई अब तोहिं दई जनि बाइ लगावै ।४०।
शब्दार्थ—रसै = आनंदित होती है । कापर = किस पर । बलाय =
बलैया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, तू किस आनंद में
मगन हो रही है, किसे देख हँसी है और किस पर क्रुद्ध होकर भौंहें चढ़ाती
है । कभी तो तू लज्जा छोड़ देती है और कभी लज्जावश घूंघट में मुँह छिपा
लेती है । आज किसकी बलैया ले रही है, मैं तेरी बलैया लेती हूँ, बतला ।
तेरी यह दशा मुझे अच्छी नहीं लगती । ऐसी तो तू कभी भी नहीं हुई थी,
विधाता तुझे यह हवा न लगने दे ।
अलंकार—प्रथम समुच्चय ।
सूचना—'सरदार' ने लिखा है कि यहाँ 'कौने रसै' से अभिलाष, 'कौनहि
लखि बिहँसै' से मंद हास, 'कोपिकै भौंह चढ़ावै' से 'क्रोध', 'भूलति लाज' से
'गर्व स्मित', 'कबहूँ मुख अंचल मांहि छिपावै' से भय एवम् लज्जा तथा
बलाय लेति' से हर्ष आदि भाव सूचित होते हैं ।
श्रीकृष्णजू को किलकंचित हाव, यथा—( सवैया )
(२२१) ऐसी है गोकुल के कुल की जिनि दच्छिन नैन किये अनुकूले ।
खंजन से मनोरंजन केसव हास बिलास लता लगि मूले ।
बोलें झुकौ उभकौ अनबोलें फिरौ बिझुके से हिये महिं फूले ।
रूप भए सबके बिष ऐसे हैं कान्ह कहौ रस कौन के भूले ।४१।
शब्दार्थ—दच्छिन = सब पर समान भाव रखनेवाला (नायक) ।
अनुकूल = केवल एक ही से प्रेम रखनेवाला ( नायक ) । उभकौ = चंचल,
लालायित होते हैं । बिझुके = भड़के हुए ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे कृष्ण, गोकुल के कुल में
ऐसी कौन है जिसने आपके दक्षिण नेत्रों को अनुकूल कर लिया है ? सबके
प्रति संचरित होनेवालि नेत्रों को अपनी ही ओर लगा रखा है। मन को आनं-
दित करनेवाले आपके खंजनवत् ( सुंदर ) नेत्र हास-विलास रूपी लता में
भूल रहे हैं । आप बोलने पर झुकते ( रोषयुक्त होते ) हैं और न बोलने पर
४०—रसै-त्रसै । मेलि-मेरे, मांहि । दुरावै-छिपावै । ल्यौं-त्यौं ।
४१—के कुल-को कुल । किये-करे । केसव-के सब । हास०-हार बिहार ।
झुकौ०-झुक उभकें । अनबोलें-बिन बोले । फिरौ-फिरै । के बिष-केसव ।
षष्ठ प्रभाव १३५
उझके ( लालायित ) रहते हैं तथा भड़के हुए हृदय में फूले घूमते हैं ( उसी
के ध्यान में लीन रहते हैं ) । भला आप किसके रस ( प्रेम ) में भूले हुए
( मग्न ) हैं । (क्या और) सब ( गोपियों ) की सुंदरता विषवत् हो गई है ?
अलंकार—प्रथम समुच्चय ।
सूचना—किसी ओर न देखने से 'श्रम', 'हास-विलास' से 'स्मित', 'झुकौ'
से 'रोष', 'उझकौ' से 'अभिलाष', 'बिझुकौ' से 'भय', 'फूले' से 'हर्ष' और
'रूप बिख ऐसे भए' से 'गर्व' भाव व्यक्त होता है ।
अथ बिब्बोक हाव-लक्षण—( दोहा )
(२२२) रूप प्रेम के गर्व तें, कपट अनादर होइ ।
तहँ उपजत बिब्बोक रस, यह जानत सब कोइ ।४२।
शब्दार्थ--कपट अनादर = दिखावटी अपमान । रस = आनंद ।
श्रीराधिकाजू को बिब्बोक हाव, यथा—( सवैया )
(२२३) आवत जानि कै सोइ रही हरएँ हरि बैठे न जानि जगाई ।
साहस कै उरु माँझ धरयो कर जागत रोम की रोंचि जनाई ।
नीबी बिमोचत चौकि उठी पहिचानि झुकी बतियाँ कहि बाई ।
बासर गाइ गँवार चरावत आवत हैं निसि सेज पराई ।४३।
शब्दार्थ—हरएँ = धीरे धीरे । उरु = जांघ । कर = हांथ । जागत =
उठते हुए । रोंचि ( रुचि ) = दीप्ति । नीबी = फूफुंदी । झुकी = रोषयुक्त
हुई । बाई = बाई ( वायु ) विकार से ग्रस्त व्यक्ति की भाँति । गाइ =
गाय । गँवार = मूर्ख, असभ्य ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, आज राधिका श्रीकृष्ण
को आता जानकर सो गईं । वे भी पास जाकर चुपचाप धीरे से बैठ गए,
जान बूझकर जगाया नहीं । फिर साहस करके उन्होंने जांघ पर हाथ रखा ।
( ऐसा करने से ) उसके उठते हुए रोमों में दीप्ति उत्पन्न हो गई ( उसका
जगते रहना प्रकट हो गया )। ( सात्त्विक भाव हुआ जान ) श्रीकृष्ण नीबी
खोलने लगे, उनके ऐसा करने पर राधिका चौंक पड़ीं और श्रीकृष्ण को पह-
चानती हुई रुष्ट सी हुईं । वायुविकार से ग्रस्त की भाँति बातें करने लगीं कि
दिन में तो गँवार गाय चराते हैं और रात में दूसरे की ( स्त्री की ) शय्या पर
'सोने आते हैं' ( दिन भर तो न जाने कहाँ रहे इस समय आए हैं—प्रेमगर्व ) ।
श्रीकृष्णजू को बिब्बोक हाव, यथा—( सवैया )
(२२४) एक समै इक गोपी सों केसव कैसहूँ हाँसी की बात कही ।
'जा कहँ तात दई तजि ताहि कहा हम सों रस-रीति नहीं' ।
४२ - रूप०-किए गर्व तें मान श्रति । जाने-जानत । ४३-बैठे-बैठि,
जाने । उरु-उर । माँझ-मध्य । कहि बाई-करवाई ।
१४० रसिकप्रिया
सुनि को प्रतिउत्तर देइ सखी दृग आँसुन की अवली उमही ।
उर लाइ लई अकुलाइ तऊ अधिरातक लौं हिलकी न रही ।४४।
शब्दार्थ—जा कहँ = जिसको । तात = पिता । रस = प्रेम । अधिरातक
लौं = आधी रात तक । हिलकी = सिसक ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) एक बार श्रीकृष्ण ने एक गोपिका
से हँसी की, यह बात कही कि ‘जिसे स्वयम् पिता ने छोड़ दिया उससे मेरा
प्रेम-व्यापार क्या रह सकता है ? (कभी नहीं)’ । इसका प्रत्युत्तर भला कौन
देता, उस गोपिका के नेत्रों से आँसुओं की धारा उमड़ चली । तब श्रीकृष्ण
ने अकुलाकर उसे हृदय से लगा लिया । फिर भी आधी रात तक उसकी
सिसकी रुक न सकी ।
अलंकार—विशेषोक्ति ।
सूचना—‘तात दई तजि ताहि’ का अर्थ ‘सरदार’ ने यह भी लगाया है
कि पिता ने जिसे तुझे दे रखा है पहले उसे तू त्याग ।
अथ विच्छित्ति हाव-लक्षण—( दोहा )
(२२५) भूषन भुषिबे को जहाँ, होहि अनादर आनि ।
तहाँ बिच्छित्ति बिचारिये, केसवदास बखानि ।४५।
शब्दार्थ—भूषन = गहना । भुषिबे०=जहाँ गहने पहनने का अनादर हो
अर्थात् बिना सजे-सिंगारे ही शोभा हो ।
श्रीराधिकाजू को विच्छित्ति हाव, यथा—( सवैया )
(२२६) तन आपने भाए सिंगार सिंगारत हैं ये सिंगार सिंगारै बृथाहीं ।
ब्रजभूषन नैननि भूख है जाकी सु तो पै सिंगार उतारे न जाहीं ।
सब होत सुगंधनिहीं तें सुगंध सुगंध तें जाति सुगंध सुबाहीं ।
सखि तोहि तें हैं सब भूषन भूषित भूषन तें तुम भूषित नाहीं ।४६।
शब्दार्थ—भाए = ( नायक को ) भानेवाले । सुबाहीं=स्वभाव से ही,
स्वाभाविक ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, अपने को रुचने-
वाले शृंगार ही सब सिंगारते हैं, तूने ये शृंगार व्यर्थ ही किए । ब्रजभूषण के
नेत्रों में जिस शृंगार के देखने की भूख (इच्छा) है वे शृंगार क्या कभी (चढ़ाए)
४४—जा-या । ताहि जाहि । रस-रति । सुनि- × । ४५—तहाँ०-तहूँ
विच्छित्ति, सो बिच्छित्ति । बखानि-सुजान । ४६—सिंगार०-सिंगार नहीं
ये सिंगार । सिंगारत ०-सिंगारति और, सिंगारत होइ सुगंध । भूख है०-भूषित
नैनन । उतारे-उतारि, सिंगारे । सब-सचु । तें-मैं । जाति-जातें । सुबाहीं-
बृथाहीं । तोहि तें०-भूषन तो सब तोहि तें । तुम-तुव ।
षष्ठ प्रभाव १४१.
उतारे भी जा सकते हैं ? (तेरे सुंदर अंगों की शोभा पर ही उनके नेत्र मुग्ध
हैं, वे अंग तेरे शरीर से अलग ही नहीं हो सकते, ये श्रृंगार तो पृथक् भी किए
जा सकते हैं और फिर काम पड़ने पर संयुक्त भी हो सकते हैं) । सुगंध से अन्य
वस्तुएँ सुगंधित होती हैं, सुगंध की स्वाभाविक सुगंध क्या उससे कभी पृथक्
हो सकती है ? ( कदापि नहीं ) । उसे सुगंधित करने के लिए किसी दूसरे की
आवश्यकता नहीं होती । ठीक इसी प्रकार मेरे विचार से सब आभूषण तेरे
ही कारण सुशोभित होते हैं, तू उनसे सुशोभित नहीं होती ।
अलंकार-प्रतीप ।
श्रीकृष्णजू को विच्छित्ति हाव, यथा- ( सवैया )
(२२७) पान न खाए न पाग रची पलटे पट चित्त कहाँ धरिकै ।
कंठसिरी बनमाल मनोहर हार उतारे धरे अरिकै ।
चंदन चित्रनि लोपि सुलोचन लोकबिलोकनि सों लरिकै ।
अंग सुभाइ सुबास प्रकासित लोपिहौ केसव क्यों करिकै ।४७।
शब्दार्थ-पाग=पगड़ी । पलटे=बदल लिए । पट = वस्त्र । कंठसिरी=
मोती की माला । अरिकै = हठ करके । लोपि = छिपाकर । लोक-बिलोकनि
सों लरिकै = लोगों के नेत्रों से लड़ करके । सुभाइ = स्वाभाविक ।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति नायक प्रति ) आपने न जाने क्या मन में
सोचकर न तो पान ही खाया है, न सिर पर पगड़ी ही बांधी है । वस्त्र भी
बदले हुए हैं (साधारणतया आप जैसे आया करते थे वैसे नहीं आए हैं) ।
मोतियों की माला, बनमाला और मनोहर हार भी आपने हठपूर्वक उतार
डाले हैं । चंदन के चित्र भी शरीर पर से मिटा दिए हैं । लोगों के नेत्रों से
नेत्रों को लड़ाकर उन्हें भी छिपाने का प्रयत्न करते हैं (लज्जालु दिखते हैं) ।
इस प्रकार आपने अपने सभी श्रृंगार हटा लिए हैं। पर शरीर की जो
स्वाभाविक सुगंध है उसे आप किस प्रकार छिपाएँगे (वह तो अब भी व्यक्त हो
रही है) ।
सूचना - नायक के शरीर की सुगंध में मिश्रित सुगंध से नायिका ने
उसका अपराध लक्षित कर लिया है ।
अथ मोट्टाइत हाव-लक्षण- (दोहा)
(२२८) हेला लीला करि जहाँ, प्रकटत सात्विक भाव ।
बुधिवल रोकत सोभिजै, कहि मोट्टाइत हाव ।४८।
शब्दार्थ - हेला = निःसंकोच खेल खेलना । लीला = वेश बनाना ।
४७-खाए-खाइ । रची-बनी । चंदन ०- चंदन चित्र कपोलनि लोपि
सुलोचन अंजन सों मरिकै । बिलोकनि-बिलोचन । ४८- सात्विक-सातुक ।
सोभिजै-सोहिये सो ।
१४२ रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को मोट्टाइत हाव, यथा—(सवैया)
(२२६) खेलत हे हरि बागे बने जहाँ बैठी प्रिया रति तें अति लोनी ।
केसव कैसहूँ पीठि में डीठि परी कुच कुंकुम की रुचि रोनी ।
मात-समीप दुराई भले तिनि सातुक-भावनि की गति होनी ।
धूरि कपूर की पूरि बिलोचन सूँघि सरोरुह ओढ़ि उड़ोनी ।४६।
शब्दार्थ—हे = थे । बागे बने = पोशाक पहने । लोनी = सुंदर । रुचि =
शोभा । रोनी = रमणीय, अच्छी । दुराई = छिपाई । तिनि = उन्होंने
(नायिका ने) ।
भावार्थ--(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण पोशाक पहने वहाँ
खेल रहे थे जहाँ रति से भी बढ़कर सुंदर नायिका बैठी हुई थी । किसी प्रकार
नायिका की दृष्टि श्रीकृष्ण की पीठ (के वस्त्र) पर पड़ी जहाँ स्तनों की केसर
की सुंदर शोभा दिखाई पड़ रही थी (नायिका ने कभी पीछे से नायक को
आलिंगन किया था जिससे स्तनों की केसर का चिह्न उसकी पीठ में लग गया
था) । देखते ही उसे सात्विक भाव हो आया । उन सात्विकों की होनेवाली
गति (उनके प्रकाशित होने को) उसने माता के समीप (होने के कारण)
भली भाँति (इस प्रकार) छिपाया कि कपूर की धूल तो नेत्रों में भर ली,
कमल सूँघ लिया और ओढ़नी ओढ़ लीं (कपूर की धूल से आँसू आते हैं,
कमल सूँघकर उसकी प्रशंसा में सिर हिलाया जाता है और ओढ़नी ओढ़
लेने से चेहरा और शरीर छिप जाता है इस प्रकार चार सात्विक छिपाए
गए-अश्रु, कंप, रोमांच और वैवर्ण्य) ।
अलंकार—युक्ति (केशव के मत से 'लेश') ।
सूचना—'कविप्रिया' में यह छंद लेशालंकार के उदाहरण में दिया
गया है ।
श्रीकृष्णजू को मोट्टाइत हाव, यथा—(सवैया)
(२३०) भोजन कै वृषभानु-सभा महँ बैठे हे नंद सदा सुखकारी ।
गोप घने, बल बीर बिराजत, खात बनाइ बिरी गिरिधारी ।
राधिका झाँकी झरोखे ह्वै झाँप सी लागी, गिरे मुरझाइ बिहारी ।
सोर भयो समुझे सकुचे हरुवाइ कह्यो हरि लागि सुपारी ।५०।
शब्दार्थ—घने = अधिक । झरोखे ह्वै = खिड़की से । झाँप सी लागी =
झाँई सी आ गई, चक्कर सा आ गया । बलबीर = भाई बलराम । गिरि-
धारी = श्रीकृष्ण । बिहारी = श्रीकृष्ण । हरुवाइ = हड़बड़ाकर ।
४६—प्रिया-तिया । तिनि-जिन्हि । सातुक-सात्विक । ५०—हे-हैं ।
सुखकारी-सुभकारी । राधिका० । राधिका झाँकि झरोखनि ह्वै कवि केसव
रीझि गिरे सु बिहारी । भयो-परचौं । कह्यो-कही ।
षष्ठ प्रभाव १४३
अलंकार-युक्ति ।
अथ कुट्टमित हाव-लक्षण- (दोहा)
(२३१) केलि-कलह में सोभिजै केलि कपट पट रूप ।
उपजत है तहँ कुट्टमित हाव कहत कबिभूप ।५१।
भावार्थ-केलि के कलह में जहाँ कपटकेलि का छिपा रूप दिखलाई पड़े
अर्थात् नायक या नायिका जहां कलह के बहाने प्रच्छन्न केलि का ही आनंद
लें, वहाँ कुट्टमित हाव होता है ।
श्री राधिकाजू का कुट्टमित हाव, यथा- ( सवैया )
(२३२) पहिले हठि रूठि चली उठि पीठि दै मैं,चितई सखि तैं न लखी री
पुनि धाइ धरी हरिजू की भुजानि तें छूटिबे कों बहु भाँति भखी री ।
गहिकै कुच-पीड़न दंत नखच्छत बैरिन की मरजाद नखी री ।
पुनि ताहि कों पान खवावति हैं उलटी कछू प्रीति की रीति सखीरी ।५२।
शब्दार्थ - हठि = हठपूर्वक । रूठि = अप्रसन्न होकर । पीठि दै=मुँह मोड़
कर । धाइ = दौड़कर । भखी री = व्याकुल हुई । कुच-पीड़न=स्तनों का
मर्दन । बैरिन की = शत्रु की । मरजाद नखी री = सीमा लाँघ गए । बैरिन ०-
शत्रु अपने शत्रु को जितना कष्ट दे सकता है उसकी सीमा भी पार कर गए,
शत्रु से अधिक कष्ट दिया ।
श्रीकृष्णजू को कुट्टमित हाव, यथा- ( सवैया )
(२३३) देखत ही जिहिं मौन गही अरु मौन तजें कटु बोल उचारे ।
सौंहैं कियेहूँ न सौंहो कियो मनुहारि कियेहूँ न सूधे निहारे ।
हाहा कै हारि रहे मनमोहन पाइँ परैं तिहिं लातन मारे ।
मंडत हैं मुँहँ ताही को अंग लै हैं कछू प्रेम के पाठ निन्यारे।५३।
शब्दार्थ- सौंहैं किये = शपथ करने पर भी । न सौंहो कियो = सामने
मुँह नहीं किया । मनुहार = मिन्नत । हाहा कै = दीनतापूर्वक विनय करके ।
मंडत हैं = सिंगार रहे हैं । अंक = गोद में । निन्यारे = विचित्र ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति सखी से ) आज राधिका श्रीकृष्ण को देखते
ही मौन हो रहीं। फिर मौन छोड़ने पर कटु वचन कहने लगीं, यहाँ तक कि
श्रीकृष्ण के शपथें खाने पर भी उन्होंने मुँह सामने नहीं किया । मिन्नतें करने
पर भी सीधी नजर नहीं देखा । वे दीनतापूर्वक विनय करके भी हार गए,
तब पैरों पड़े और उन्होंने इन्हें लातों से झटक दिया । देखो, इस समय उसी
का मुँह अपनी गोद में लेकर सँवार-सिंगार रहे हैं । प्रेम के पाठ कुछ
विचित्र ही हैं ।
५१-सोभिजै-सोभियै, सोभिए । कपट-कलह । ५२ - पुनि ० - फिरि । चितई-
ही लखी । गहिकै ० - कुचपीड़न दंतनखक्षत दै गिरि, ...... दै निज । ५३-
जिहि-जिनि । तजें-तजी । कियेहूँ-करेहूँ । मनमोहन-नंदनंदन । तिहिं-तिन्ह ।
१४४ रसिकप्रिया
अथ बोधक हाव-लक्षण— ( दोहा )
(२३४) गूढ़ भाव को बोध जहँ, केसव औरहि होइ ।
तासों बोधक हाव सब, कहत सयाने लोइ ।५४।
शब्दार्थ--बोध = ज्ञान, जानकारी । औरहि = दूसरे को ( नायक या
नायिका को )।
श्रीराधिकाजू को बोधक हाव, यथा—( सवैया )
(२३५) बैठो हुतो बृषभानुकुमारि सखीन की मंडली मंडि प्रबीनी ।
लै कुँभिलानो सो कंज परी इक पाइन आइ गुवारि नवीनी ।
चंदन सों छिरक्यो वह वा कहँ पान दए करुनारसभीनी ।
चंदनचित्र कपोलनि लोपिकै अंजन आँजि बिदा करि दीनी ।५५।
भावार्थ— ( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, आज सखियों की
मंडली में चतुर राधिका बैठी थीं । इतने ही में एक नवोढ़ा ग्वालिन हाथ में
कुम्हलाया हुआ कमल लिए आई और उनके पैरों पड़ी । इन्होंने कमल पर
चंदन छिड़का, करुणा भाव से उसके हाथों में पान दिए, उसके कपोलों
पर लगा हुआ चंदन छुड़ा दिया और नेत्रों में अंजन लगाकर उसे बिदा दिया ।
गूढ़ार्थ—कुँभिलानो कंज=राधिका के विरह में श्रीकृष्ण कमल की तरह
मुरझा रहे हैं । पाइन परी = श्रीकृष्ण ने मिलने की प्रार्थना पैरों पड़कर की
है । चंदन सों छिरक्यो = मैं उनका विरहताप शांत करूँगी । पान दए =
मैं पान ( पाणि = हाथ ) देती हूँ, निश्चित मिलूँगी । चंदनचित्र कपोलनि
लोपिकै = चंद्रमा के डूब जाने पर, चाँदनी हट जाने पर मिलूँगी । अंजन
आँजि० = अंधकार में मिलूँगी या श्याम मेरी आँखों में बसते हैं ।
अलंकार—सूक्ष्म ।
श्रीकृष्णजू को बोधक हाव, यथा—( सवैया )
(२३६) सखि गोकुल गोप-सभा महँ गोबिंद बैठे हुते द्युति कों धरिकै ।
जनु केसव पूरन चंदु लसै चित चारु चकोरनि को हरिकै ।
तिनकों उलटो करि आनि दियो किहुँ नीरज नीर नएँ भरिकै ।
कहि काहे तें नेकु निहारि मनोहर फेरि दियो कलिका करिकै ।५६।
शब्दार्थ—द्युति = तेज । किहुँ = किसी ने । नीरज = कमल । नेकु =
थोड़ा सा । निहारि = देखकर ।
५४-को-के । औरहि०-समुझत कोइ । सब-यों । ५५-की मंडली-के
मंडल । मंडि-मध्य । आइ-आनि, आगें । इक०-जू कोऊ इक ग्वालिनि पाइ ।
चंदन-बंदन । छिरक्यो-छिरकी । कपोलनि लोपिकै-कपोल बिलेपिकै । ५६—
गोकुल-मोहन, सोहत । चारु-चार, चोर ।
१० सप्तम प्रभाव १४५
भावार्थ - ( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, गोकुल में गोपों की
सभा में श्रीकृष्ण जी कांतियुक्त बैठे हुए थे। मानो चकोर के सुंदर चित्तों को
हरण करके पूर्ण चंद्र शोभा दे रहा हो । उन्हें किसी ने कमल में ताजा जल
भरकर और उसे उलटा करके दिया। न जाने क्यों उन्होंने उसे थोड़ी देर
तक भावुकता के साथ देखकर और कली बनाकर लौटा दिया ।
गूढ़ार्थ - नीरज नीर० = नायिका के कमलवत् नेत्र आपके विरह में
आँसू बहा रहे हैं। कलिका करिकै० = जब कमल बंद होंगे (सूर्यास्त के समय)
तब मिलूँगा ।
अलंकार - सूक्ष्म ।
सूचना - 'कविप्रिया' में यही छंद सूक्ष्मालंकार के उदाहरण में दिया
गया है ।
( दोहा )
(२३७) राधा राधारमण के कहे जथामति हाव ।
डिठई केसवराय की छमियो कबि कबिराव । ५७।
इति श्रीमन्महाराजकुमार श्रीइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां राधिकाकृष्ण
हावभाववर्णनं नाम षष्ठः प्रभावः ॥
सप्तम प्रभाव
अथ अष्टनायिका-वर्णन - ( दोहा )
(२३८) ये सब जितनी नाइका, बरनी मति-अनुसार ।
केसबदास बखानियै, ते सब आठ प्रकार ।१।
(२३६) स्वाधिनपतिका, उत्कहीँ, बासकसज्जा नाम ।
अभिसंधिता बखानियै, और खंडिता बाम ।२।
शब्दार्थ - उत्कहीँ = उत्कंंठिता ही । अभिसंधिता = कलहांतरिता । बाम
= स्त्री, नायिका ।
(२४०) केसव प्रोषितप्रेयसी लब्धाबिप्र सु आनि ।
अष्टनायिका ये सकल अभिसारिका सु जानि ।३।
शब्दार्थ - प्रोषित० = प्रोषितपतिका । लब्धा० = विप्रलब्धा । आनि = अन्य ।
५७- मति-विधि । राय-दास । छमियो-छमिजो ।
१- बखानियै-बखानिजै । ते सब-बुधिबल । २- स्वाधिन० - स्वाधिन-
पतिका, उत्कला स्वाधीनपतिका उत्कंठा, स्वाधीनपति उत्कंंठिता । ३-सु
आनि-सु जान, सु ज्ञान । सकल-सबै । सु जानि सु बखान, सु जान ।
३४६ रसिकप्रिया
अथ स्वाधीनपतिका-लक्षण—(दोहा)
(२४१) केसव जाके गुन बँध्यो, सदा रहै पति संग।
स्वाधिनपतिका तासु कों, बरनत प्रेम-प्रसंग। ४।
प्रच्छन्न स्वाधीनपतिका, यथा—(सवैया)
(२४२) केसव जीवन जो ब्रज को पुनि जोवहु तें अति बापहि भावै।
जापर देव-अदेव-कुमारिनि वारत माइ न बार लगावै।
ता हरि पै तूँ गँवार की बेटी महावर पाइ झवाँइ दिवावै।
हौं तौ बची अब हाँसिनहीं ऐसें और जौ देखै तौ ऊतरु आवै।५।
शब्दार्थ—जीवन = प्राण। भावै = अच्छे लगते हैं। माइ = माता।
अदेव = मनुष्य। वारत = न्यौछावर करने में। बार = विलंब। झवाँइ =
झावें से पैर रगड़वाकर। दिवावै = दिलवाती है। हाँसी = उपहास, अप्रतिष्ठा।
ऊतरु आवै = उसे क्या उत्तर दोगी अर्थात् कोई नहीं।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी, जो ब्रजवासियों के
प्राण हैं और जिन्हें पिता भी प्राणों से अधिक प्यारा समझते हैं, जिन पर
उनकी माता देव तथा नर-कुमारियों को न्योछावर कर देने में देर नहीं लगातीं,
ऐसे कृष्ण से भी तू ग्रामवासी की छोकरी (राधिका) होकर पैरों में झावें
से रगड़वाकर महावर लगवाती है। मैं तो केवल हँसकर ही टाल गई। यदि
कोई दूसरा देखेगा तो क्या तुझसे उत्तर बन आएगा? (अर्थात् नहीं)।
प्रकाश स्वाधीनपतिका, यथा—(कबित्त)
(२४३) चोली को सो पान तोहिं करत सँवारिबोई,
मुकुर ज्यों तोहीं बीच मूरति समानी है।
तोहीं तियदेवता पै पायो पति केसौदास,
पतनी बहुत पतिदेवता बखानी है।
तेरे मनोरथ भागीरथ-रथ पाछै पाछै,
डोलत गुपाल मेरे गंग को सो पानी है।
ऐसी बात कौन जो न मानी सुनि मेरी रानी,
उनकें तौ तेरी बानी वेद की सी बानी है।६।
४—तास कों-तास कहें, तास कहि। ५—पुनि-अरु। बापहि-तातहि।
कुमारिनि-कुमारिन। बार०-बारनि लावै। गँवार-अहीर। महावर०-झमाइकेँ
पांइ महावर द्यावै। हौं तौ०-हौंतौ रही बचि, मैं तौ चलो अब। ऐसे-अस, सखि।
तौ-सो।६—को सो-के सो। बीच-मांह। तियदेवता-पतिदेवता। केसौदास-
केसौराइ। तेरे०-मनोरथ रथ भगीरथ रथ पीछे। डोलत०-डोलै नंदलाल।
वेद-देव।
सप्तम प्रभाव १४७
शब्दार्थ—चोली = पान रखने की डलिया। पान = तांबूल। करत
सँवारिबोई = सँवारते रहते हैं। तियदेवता = स्त्री ही है देवता जिसके लिए
( वह पति ) ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) हे सखी, वे तुझे डलिया में
रखे पान की तरह उलट पलट कर सँवारते रहते हैं, दर्पण की भाँति तुझमें
ही उनकी मूर्ति बसी हुई है। पतिदेवता (पतिव्रता, पति को देवता माननेवाली)
स्त्रियाँ तो बहुत सी प्रसिद्ध हैं पर स्त्रीदेवता ( स्त्री को देवता माननेवाला )
पति तो तुम्हीं को मिला है। तेरे मनोरथ रूपी भगीरथ के रथ के पीछे पीछे
मेरे कृष्ण गंगाजल की भाँति चलते हुए दिखाई देते हैं (तेरे मनोरथ के
अनुकूल कार्य करते देखे जाते हैं ) हे रानी, उन्होंने तेरी ऐसी कौन सी बात
थी जो टाल दी ? वे तो तेरी बात वेद-वाणी-तुल्य समझते हैं।
अलंकार—दृष्टांत और रूपक ।
सूचना—वेदवाणी अमान्य नहीं की जाती जैसे स्वामी की वाणी ।
श्रीकृष्ण नायिका की वाणी भी अमान्य नहीं करते ।
अथ उत्का-लक्षण—( दोहा )
(२४४) कौनहुँ हेत न आइयो, प्रीतम जाके धाम ।
ताकों सोचति सोचि हिय, केसव उत्का बाम ।७।
प्रच्छन्न उत्का, यथा—( कबित्त )
(२४५) किधौं गृह-काज कै न छूटत सखा-समाज,
किधौं कछू आज व्रत-बासर बिभात तैं ।
दीनो तैं न सोध, किधौं काहू सों भयो बिरोध,
उपज्यो प्रबोध किधौं उर अवदात तैं ।
सुख में न देह किधौं मोहीं सों कपटनेह,
किधौं देखि मेह अति डरे अधरात तैं ।
किधौं मेरी प्रीति की प्रतीति लेत केसोदास,
अजहूँ न आए मन सुधौं कौनी बात तैं ।८।
शब्दार्थ—किधौं गृहकाज = घर का कोई काम आ पड़ा है। कै =
अथवा । छूटत न = छोड़ न सके । व्रत-वासर = व्रत का दिन । विभात =
प्रभात । आज० = आज व्रत के दिन का प्रभात ( आरंभ ) । सोध = पता,
समाचार । बिरोध = झगड़ा । प्रबोध = ज्ञान, वैराग्य । अवदात = विमल ।
७—उत्का-उत्कंठिता । सोचि-सोच । केसव०-सो उत्कंठा । ८—कै न-
किं न, किधौं । छूटत-छूटघो न । किधौं उर-उर सोधु । केसवदास-केसवराइ ।
सु धौं-सूधो ।
१४८ रसिकप्रिया
उपज्यो० = अथवा उनके निर्मल हृदय में वैराग्य उत्पन्न हो गया है। सुख
में न देह = शरीर सुख में नहीं है, अस्वस्थ हैं। कपट-नेह = दिखौआ प्रेम ।
मेह = वर्षा । अधरात तें = आधी रात हो जाने के कारण । प्रतीति =
विश्वास । प्रतीति लेना = परीक्षा करना, जांच करना । मन = हे मन । सु धौं
= सो न जाने । कौनी बात तें = किस कारण से ।
प्रकाश उत्का, यथा--( सवैया )
(२४६) सुधि भूलि गई, भुलाए किधौं काहू कि भूलैई डोलत बाट न पाई ।
भीत भए किधौं केसव काहू सों, भेंट भई कोऊ भामिनि भाई ।
मग आवत हैं किधौं आइ गए, किधौं आबहिगे सजनी सुखदाई ।
अब आए न नंदकुमार बिचारि, सु कौन बिचार अबार लगाई।६।
शब्दार्थ-सुधि = स्मृति, स्मरण । भुलाए० = किसी ने भुलावा दे रखा
है, किसी ने अपने चक्कर में फँसा रखा है। भूलैई डोलत = मार्ग भूलकर
घूम रहे हैं । बाट = मार्ग, रास्ता । भीत = भयभीत । भामिनि = स्त्री, नायिका ।
भाई = अच्छी लगी । मग = (मार्ग ) रास्ता । बिचारि = तू विचार कर ।
बिचार = कारण । अबार = देर ।
अथ वासकसज्जा-लक्षण- (दोहा )
(२४७) बासकसज्जा होइ सो, कहि केसव सबिलास ।
चितवै रतिगृहद्वार त्यों, पिय-आवन की आस ।१०।
शब्दार्थ-सविलास = विलासपूर्वक, विलासयुक्त । रतिगृह = प्रिय से
मिलने का गृह । त्यों = ओर ।
वासकसज्जा, यथा- (कवित्त)
(२४८) चंदन बिटप बपु कोमल अमल दल,
कलित ललित लता लपटी लवंग की ।
केसोदास तामें दुरी दीप की सिखा सी दौरि,
दुरवति नीलबास दुति अंग अंग की ।
पौन पानी पंछी पसु बस सब्द जित जित
होइ तित तित चौंकि चाहै चोप संग की ।
नंदलाल-आगम बिलोकें कुंजजाल बाल
लीनी गति तेहीं काल पंजर-पतंग की ।११।
६-यथा सवैया-मदनमनोहर छंद । कि-कैं । काहू सों-काहू कै । कोऊ-
कोई । मग०-आवत हैं मग आइ गए । आइ०-आए गए । अब आए-आए ।
बिचारि०--सखी सुनु कौने । बिचारि-विचार । १०--चितवै ०-चितै रहै । ११--
कलित-बलित, बिमल । दुरवति०--दरसत । पानी--पान । बस०--बसै सदा जित
जित, सब्द जित जित । होइ०--होइ तित तित चौंकि चाहै, बांस सदा जित
जित होइ । बिलोकें०--बिलोकिबे को कुंज बाल । लीनी--कीनी । तेहीं--तिहीं ।
१५० रसिकप्रिया
केसौदास सब छाड़ि कियो हठ ही सों हेत,
वाहू छोड़ि जिय जिये बिन कहा जात है।
ऐसे प्यारे पीय ही सों मान्यो न मनायो तब,
ऐसी तोहि बूझियै जु पाछैं पछिताव है। १४।
शब्दार्थ—बालिस = (सं० बालिश) मूर्ख। ज्यों = भाँति। कह = क्यों।
बिललातु है = व्याकुल होता है। पाहन = (पाषाण) पत्थर। तें = से (भी
अधिक)। पीन = मोटा, कठोर। माखन सो = मक्खन की भाँति मृदु। हेत =
प्रेम, संबंध। जिय = हे मन। जिए बिन = जीते रहे बिना, अब जाओगे कहाँ,
तुम्हें जीते रहना ही पड़ेगा, मरने चले हो तो मर भी न सकोगे। ऐसी० =
क्या तुम्हें ऐसा करना चाहिए था कि तू पीछे पछताए ?
प्रकाश अभिसंधिता, यथा—( सवैया )
(२५२) पाइ परेहू तें प्रीतम त्यों कहि केसव क्योंहूँ न मैं दृग दीनी
तेरी सखी सिख सीखी न एकहूँ रोष ही
सप्तम प्रभाव १५१
काको घर घालिबे कौं बसे कहाँ घनस्याम,
घूघू ज्यौं घुसन प्रात मेरे गृह आए हौ ।१७।
शब्दार्थ—सीठे=निस्सार वस्तु, किसी वस्तु का तत्त्व निकाल लेने पर जो
अवशिष्ट रहे। सीथ = कण, भात का दाना । सठ-ईठ = शठ को इष्ट, शठ की
तरह । ठाए हौ = हो गए हो । घूघू = घुग्घू, उलूक, उल्लू ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति नायक से ) यदि मेरी आँखों को (तुम्हारे
कथनानुसार ठीक ठीक ) दिखाई नहीं देता तो कानों से तो वे सब बातें
सुनती ही हूँ जिनमें दुनिया तुम्हारे गीत गाती है। आपने कुल का ध्यान
छोड़ दिया है। कौए की तरह उच्छिष्ट और निस्सार अन्नकण चुगते फिरते
हैं। आप तो शठों की तरह धृष्ट हो गए हैं। 'दूर रहो दूर रहो' कहते रहने
पर भी दौड़ दौड़कर मेरे पैर क्यों पकड़ते हैं ? आप ठौर कुठौर तो कुछ
समझते नहीं, मैंने आपको भली भाँति पहचान लिया है। कहिए किसका
घर घालने के लिए रात में कहाँ बसे रहे ? अब घुग्घू की भाँति ( दूसरे का
घर घालकर ) मेरे घर में प्रातःकाल घुसने चले हैं।
प्रकाश खंडिता, यथा—( सवैया )
(२५४) आजु कछू अँखियाँ हरि और सी मानो महावर माहँ रँगी हैं ।
मोहन मोही सी लागति मोहिं इते पर मोहन मोह लगी हैं ।
मेरी सौं मो सहुँ भानहु बेगि हिये रसरोष की रीति जगी हैं ।
मेरे बियोग के तेज तचीं किधौं केसव काहू के प्रेम पगी हैं ।१८।
शब्दार्थ—और सी = और ही प्रकार की । मोहन = हे मोहन । मोही
सी = मुग्ध हुई सी । मोहिं = मुझे । मोहन मोह० = मोहनेवाले मोह से युक्त,
अत्यंत आकर्षक भाव से युक्त हैं। मो सहुँ = मुझसे । भानहु = बताइए ।
तेज = अग्नि । तचीं = पकी हैं।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति नायक प्रति ) हे कृष्ण, आज आपकी
आँखें कुछ और ही प्रकार की हैं। मानो महावर ( के रंग ) में रँगी हुई
हैं। हे मोहन, मुझे तो ये मोह ली गई सी जान पड़ती हैं, फिर भी ये मुझे
मोहक भाव से युक्त जान पड़ रही हैं। मेरी शपथ, आप शीघ्र मुझसे यह
रहस्य बताएँ क्योंकि मेरे मन में विपरीत भावों की स्थिति एक साथ ही
दिखाई पड़ रही है—रस ( प्रेम ) की भी और रोष की भी। यदि ये आँखें
मेरे वियोग की अग्नि से तपकर लाल हुई हैं (तब तो रस की स्थिति ठीक
ही है ) और यदि ये किसी दूसरी नायिका के प्रेम ( लाल रंग ) में पागकर
लाल हुई हैं तो रोष की स्थिति स्पष्ट है।
१७— तौं - तैं । केसौदास-केसौराइ । लोकनि०-लोक महि, लोक माँझ ।
फिरौ - फिरै । ज्यौं-कौ । गृह-घर । १८-माहँ-रंग मो सहुँ-मोहूँ सौं ।
१५२ रसिकप्रिया
सूचना—(१) प्रेम का रंग लाल होता है और रोष का भी रंग
लाल होता है।
(२) इस छंद के अनेक शंका-समाधान टीकाकारों ने किए हैं।
अथ प्रोषितपतिका-लक्षण—(दोहा)
(२५६) जाको प्रीतम दै अवधि, गयो कौनहूँ काज।
ताकौं प्रोषितप्रेयसी, कहि बरनत कबिराज ।१६।
प्रच्छन्न प्रोषितपतिका—यथा, (सवैया)
(२५७) केसव कैसेहूँ पूरब पुन्य मिल्यो मनभावतो भाग भरयो री ।
जानै को माई कहा भयो क्यौंहूँ जु औधि को अधिक द्योस टरचोरी।
ताकहूँ तूं न अजौं हँसि बोलै जऊ मेरो मोहन पाइ परयो री।
काठहु तै हठ तेरो कठोर इतैं बिरहानलहूँ न जरयो री ।२०।
शब्दार्थ—मनभावती = मनचहेता (नायक) । भाग भरयो = भाग्यवती
हुई। माई = हे माई, आश्चर्यबोधक। अधिक = आधा। द्योस = दिवस, दिन।
टरचो री = टल गया, बीत गया। अजौं = अब भी। इतैं = इतने तीव्र ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) हे सखी, न जाने क्या कारण
हुआ कि अवधि से केवल आधा दिन ही किसी प्रकार अधिक व्यतीत हो गया
और श्रीकृष्ण प्रतिज्ञानुसार समय पर नहीं पहुँच सके। इतने थोड़े समय के
विलंब के लिए तू अब भी उनसे हँसकर नहीं बोल रही है, यद्यपि वे तेरे पैरों
पड़ रहे हैं। यह नहीं समझती कि न जाने किस पूर्वजन्म के पुण्य से प्रिय से
भेंट हुई है, भाग्योदय का समय आया है। इसलिए मेरी दृष्टि में निश्चय ही
तेरा हठ काठ से भी कड़ा है। क्योंकि उनके वियोग की विरहाग्नि में भी
वह न जल सका ( तो अब क्या आशा की जाय, अब भी तो तू अपना हठ
नहीं छोड़ती )।
प्रकाश प्रोषितपतिका, यथा—(सवैया)
(२५८) औधि दै आए उहाँ उनसों यह भोजन कै अब ही हम ऐहैं।
ताकहँ तौ अब लौं बहराइके राखी बरघाइ मरु करि मैं हैं।
बैठे कहा इनके ढिग केसव जाउ नहीं कोउ आइ जु कैहैं।
जानत हौ उन आँखिनि तें अँसुवा उमहैं बहुरयो पुनि रहैं ।२१।
शब्दार्थ—उनसों = उस नायिका को। अब ही = अभी। ऐहैं = आएँगे।
अब लौं = अब तक। बहराइकै = भुलावा दे करके। बरघाइ = बलात् । मरु
१६—प्रोषितपतिका-प्रोषित प्रेयसी । २०— क्यौंहूँ जु-कैसेहूँ, कान्ह को ।
अधिक-आधो कु । टरचो-ढरचो । बोलै०-बोलति मेरो ज्यौं । हूँ न-
दूनो । २१—आए-आपु । उनसों-उनको । यह-यहाँ । बरघाइ-स्ववाह, बराइ ।
मरु०-बरु कहि । इनके-इनकी । जाप-जाउ । उन-इन । उमहै-उमड्यो ।
करि = अत्यंत कठिनाई से । कहा = क्यों । इनके = इस नायिका के । ढिग =
पास । कहैं = कहिहैं, कह देंगे । जाउ ० = जाते क्यों नहीं, कोई जाकर यदि ये
समाचार (उस नायिका को जिससे भोजन करके आने की कह आए हैं) सुना
आए तो । उमहे = उमड़ने पर । बहुरयो = तदनंतर । रैहैं = रहिहैं, रहेंगे,
रुकेंगे । पुनि रैहैं = क्या फिर रोके रुक सकेंगे ?
अथ विप्रलब्धा-लक्षण--( दोहा )
(२५६) दूती सों संकेत कहि लैन पठाई आप ।
लब्धविप्र सो जानियै, अनआए संताप ।२२।
शब्दार्थ-लैन पठाई = बुलाने के लिए भेज दी ।
प्रच्छन्न विप्रलब्धा, यथा--( सवैया )
(२६०) सूल से फूल सुबास कुबास सी भाकसी से भए भौन सभागे ।
केसव बाग महावन सो जुर सी चढ़ी जोन्ह सबै अँग दागे ।
नेह लग्यो उर नाहर सो निसि नाह घरीक कहूँ अनुरागे ।
गारी सो गीत बिरी बिष सी सिगरेई सिंगार अँगार से लागे ।२३।
शब्दार्थ--सूल = ( सं० शूल ) काँटा । कुबास = दुर्गंध । भाकसी =
(भस्त्रा) भाड़, भरसांई । भौन = महल । सभागे = अच्छे, मनभावने । बाग =
बगीचा, उपवन । महावन = घोर जंगल सा भयावना । जुर सी = ज्वर की
भाँति । जोन्ह = (ज्योत्स्ना) चाँदनी । दागे = जलाए । नाहर = सिंह ( की
भाँति त्रासद ) । निसि = रात्रि में । नाह = नाथ ( पति ) । घरीक = घड़ी
भर । निसि नाह = रात्रि में घड़ी भर के लिए अपने पति के कहीं अन्यत्र रम
जाने के कारण । गारी से = गाली की भाँति अप्रिय । बिरी = पान का बीड़ा ।
प्रकाश विप्रलब्धा, यथा--( कबित्त )
(२६१) देखत उद्घिजात देखि देखि निज गात,
चंपक के पात कछू लिख्यो है बनाइकै ।
सकल सुगंध टारि फूल-माल तोरि डारि,
दूतिका कों मारि पुनि बीरी बगराइकै ।
लै लै दीह साँस तजि बिबिध बिलास हास,
केसौदास ह्वै उदास चली अकुलाइकै ।
सेइकै संकेत सूनो कान्हजू सों बोलि ऊनो,
मोसों कर जोरि दूनो दूनो दुख पाइकै ।२४।
२२--कहि--बदि, करि । लब्ध--लब्धा । सो--सु । जानियै--जानिजै ।
२३--सभाग--सुभागे । गारी सो--गारी से । २४--टारि--ढारि । बीरी--बोरा ।
हास--ग्रास । बोलि--मान । कर०--जोरे कर, करचो जोर, करि जोसो । दूनो--
बोली दूनों ।
१५४ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—उदधिजात = चंद्रमा । गात = गात्र, शरीर । पता = पत्ता,
पंखुड़ी । बनाइ कै = भली-भाँति मन लगाकर । टारि = हटाकर, दूर करके ।
मारि = पीटकर । बगराइ कै = बिखेरकर, फैलाकर । दीह = दीर्घ । बिलास =
प्रसन्नता की चेष्टाएँ । सेइकै = अर्थात् वहाँ रहकर । ऊनो = उदास भाव की
बातें । दूनो = दोनो ही । दूनो = दूना, अत्यधिक ।
सूचना—इस कवित्त के प्रथम चरण के लेख के बारे में अनेक अटकलें
लगाई गई हैं । सरदार ने बड़ा लंबा चौड़ा वाग्विस्तार किया है । सीधी बात
इतनी ही है कि चंद्रमा को देखकर उसके शरीर में जो कामोद्दीपन हो रहा
था उसी के लिए उसने चंपकदल पर राहु का चित्र अंकित किया, जिससे
उसका तेज मंद पड़े । चंपकदल चुनने का कारण यह है कि उसके शरीर के
रंग से उसका साम्य है ।
अथ अभिसारिका-लक्षण—( दोहा )
(२६२) हित तें कै मद मदन तें, पिय पै मिलै जु जाइ ।
सो कहियै अभिसारिका, बरनी त्रिविध बनाइ ।२५।
शब्दार्थ—हित तें = प्रेम से (प्रेमाभिसारिका) । मद तें = गर्व से (गर्वा-
भिसारिका ) । मदन तें = काम से ( कामाभिसारिका ) ।
अथ स्वकीया अभिसारिका-लक्षण—( दोहा )
(२६३) अति सलज्ज पग मग धरै, वलत बधून के संग ।
स्वक्रिया को अभिसार यह, भूषन भूषित अंग ।२६।
सूचना—निम्नलिखित चार दोहे हस्तलिखित प्रति में नहीं हैं। सरदार
ने इन्हें अन्य का माना है--
परकीया अभिसारिका, यथा—( दोहा )
जनी सहेली सोभही, बंधूबधू सँग चार ।
मग में देइ बराइ डग, लज्जा को अभिसार ॥
सामान्या को अभिसार, यथा—( दोहा )
चकित चित्त साहस सहित, नीलवसनजुत गात ।
कुलटा संध्या अभिसरै, उत्सव तम अधिरात ॥
चहूँ ओर चितवै हँसै, चित चोरै सबिलास ।
अंगराग-रंजित नितहि, भूषन-भूषित भास ॥
कुसुम कंजु कर मंदगति, सखी-संग मग चार ।
सखी सहेली साथ बहु, बरनि नारि-अभिसार ॥
२५—पै-सों, को । २६—सलज्ज-सुलज्ज । पग०-पग डग धरै, डगमग
धरी, डगमग धरै । चलत-धरति । बधून-वधू । स्वक्रिया-स्वीया । यह-वह,
इह ।