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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 286 में से

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पृष्ठ 137

षष्ठ प्रभाव १३५
उझके ( लालायित ) रहते हैं तथा भड़के हुए हृदय में फूले घूमते हैं ( उसी
के ध्यान में लीन रहते हैं ) । भला आप किसके रस ( प्रेम ) में भूले हुए
( मग्न ) हैं । (क्या और) सब ( गोपियों ) की सुंदरता विषवत् हो गई है ?
अलंकार—प्रथम समुच्चय ।
सूचना—किसी ओर न देखने से 'श्रम', 'हास-विलास' से 'स्मित', 'झुकौ'
से 'रोष', 'उझकौ' से 'अभिलाष', 'बिझुकौ' से 'भय', 'फूले' से 'हर्ष' और
'रूप बिख ऐसे भए' से 'गर्व' भाव व्यक्त होता है ।
अथ बिब्बोक हाव-लक्षण—( दोहा )
(२२२) रूप प्रेम के गर्व तें, कपट अनादर होइ ।
तहँ उपजत बिब्बोक रस, यह जानत सब कोइ ।४२।
शब्दार्थ--कपट अनादर = दिखावटी अपमान । रस = आनंद ।
श्रीराधिकाजू को बिब्बोक हाव, यथा—( सवैया )
(२२३) आवत जानि कै सोइ रही हरएँ हरि बैठे न जानि जगाई ।
साहस कै उरु माँझ धरयो कर जागत रोम की रोंचि जनाई ।
नीबी बिमोचत चौकि उठी पहिचानि झुकी बतियाँ कहि बाई ।
बासर गाइ गँवार चरावत आवत हैं निसि सेज पराई ।४३।
शब्दार्थ—हरएँ = धीरे धीरे । उरु = जांघ । कर = हांथ । जागत =
उठते हुए । रोंचि ( रुचि ) = दीप्ति । नीबी = फूफुंदी । झुकी = रोषयुक्त
हुई । बाई = बाई ( वायु ) विकार से ग्रस्त व्यक्ति की भाँति । गाइ =
गाय । गँवार = मूर्ख, असभ्य ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, आज राधिका श्रीकृष्ण
को आता जानकर सो गईं । वे भी पास जाकर चुपचाप धीरे से बैठ गए,
जान बूझकर जगाया नहीं । फिर साहस करके उन्होंने जांघ पर हाथ रखा ।
( ऐसा करने से ) उसके उठते हुए रोमों में दीप्ति उत्पन्न हो गई ( उसका
जगते रहना प्रकट हो गया )। ( सात्त्विक भाव हुआ जान ) श्रीकृष्ण नीबी
खोलने लगे, उनके ऐसा करने पर राधिका चौंक पड़ीं और श्रीकृष्ण को पह-
चानती हुई रुष्ट सी हुईं । वायुविकार से ग्रस्त की भाँति बातें करने लगीं कि
दिन में तो गँवार गाय चराते हैं और रात में दूसरे की ( स्त्री की ) शय्या पर
'सोने आते हैं' ( दिन भर तो न जाने कहाँ रहे इस समय आए हैं—प्रेमगर्व ) ।
श्रीकृष्णजू को बिब्बोक हाव, यथा—( सवैया )
(२२४) एक समै इक गोपी सों केसव कैसहूँ हाँसी की बात कही ।
'जा कहँ तात दई तजि ताहि कहा हम सों रस-रीति नहीं' ।
४२ - रूप०-किए गर्व तें मान श्रति । जाने-जानत । ४३-बैठे-बैठि,
जाने । उरु-उर । माँझ-मध्य । कहि बाई-करवाई ।