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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 286 में से

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पृष्ठ 143

१० सप्तम प्रभाव १४५
भावार्थ - ( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, गोकुल में गोपों की
सभा में श्रीकृष्ण जी कांतियुक्त बैठे हुए थे। मानो चकोर के सुंदर चित्तों को
हरण करके पूर्ण चंद्र शोभा दे रहा हो । उन्हें किसी ने कमल में ताजा जल
भरकर और उसे उलटा करके दिया। न जाने क्यों उन्होंने उसे थोड़ी देर
तक भावुकता के साथ देखकर और कली बनाकर लौटा दिया ।
गूढ़ार्थ - नीरज नीर० = नायिका के कमलवत् नेत्र आपके विरह में
आँसू बहा रहे हैं। कलिका करिकै० = जब कमल बंद होंगे (सूर्यास्त के समय)
तब मिलूँगा ।
अलंकार - सूक्ष्म ।
सूचना - 'कविप्रिया' में यही छंद सूक्ष्मालंकार के उदाहरण में दिया
गया है ।
( दोहा )
(२३७) राधा राधारमण के कहे जथामति हाव ।
डिठई केसवराय की छमियो कबि कबिराव । ५७।
इति श्रीमन्महाराजकुमार श्रीइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां राधिकाकृष्ण
हावभाववर्णनं नाम षष्ठः प्रभावः ॥
सप्तम प्रभाव
अथ अष्टनायिका-वर्णन - ( दोहा )
(२३८) ये सब जितनी नाइका, बरनी मति-अनुसार ।
केसबदास बखानियै, ते सब आठ प्रकार ।१।
(२३६) स्वाधिनपतिका, उत्कहीँ, बासकसज्जा नाम ।
अभिसंधिता बखानियै, और खंडिता बाम ।२।
शब्दार्थ - उत्कहीँ = उत्कंंठिता ही । अभिसंधिता = कलहांतरिता । बाम
= स्त्री, नायिका ।
(२४०) केसव प्रोषितप्रेयसी लब्धाबिप्र सु आनि ।
अष्टनायिका ये सकल अभिसारिका सु जानि ।३।
शब्दार्थ - प्रोषित० = प्रोषितपतिका । लब्धा० = विप्रलब्धा । आनि = अन्य ।
५७- मति-विधि । राय-दास । छमियो-छमिजो ।
१- बखानियै-बखानिजै । ते सब-बुधिबल । २- स्वाधिन० - स्वाधिन-
पतिका, उत्कला स्वाधीनपतिका उत्कंठा, स्वाधीनपति उत्कंंठिता । ३-सु
आनि-सु जान, सु ज्ञान । सकल-सबै । सु जानि सु बखान, सु जान ।