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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 286 में से

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पृष्ठ 146

१४८ रसिकप्रिया
उपज्यो० = अथवा उनके निर्मल हृदय में वैराग्य उत्पन्न हो गया है। सुख
में न देह = शरीर सुख में नहीं है, अस्वस्थ हैं। कपट-नेह = दिखौआ प्रेम ।
मेह = वर्षा । अधरात तें = आधी रात हो जाने के कारण । प्रतीति =
विश्वास । प्रतीति लेना = परीक्षा करना, जांच करना । मन = हे मन । सु धौं
= सो न जाने । कौनी बात तें = किस कारण से ।
प्रकाश उत्का, यथा--( सवैया )
(२४६) सुधि भूलि गई, भुलाए किधौं काहू कि भूलैई डोलत बाट न पाई ।
भीत भए किधौं केसव काहू सों, भेंट भई कोऊ भामिनि भाई ।
मग आवत हैं किधौं आइ गए, किधौं आबहिगे सजनी सुखदाई ।
अब आए न नंदकुमार बिचारि, सु कौन बिचार अबार लगाई।६।
शब्दार्थ-सुधि = स्मृति, स्मरण । भुलाए० = किसी ने भुलावा दे रखा
है, किसी ने अपने चक्कर में फँसा रखा है। भूलैई डोलत = मार्ग भूलकर
घूम रहे हैं । बाट = मार्ग, रास्ता । भीत = भयभीत । भामिनि = स्त्री, नायिका ।
भाई = अच्छी लगी । मग = (मार्ग ) रास्ता । बिचारि = तू विचार कर ।
बिचार = कारण । अबार = देर ।
अथ वासकसज्जा-लक्षण- (दोहा )
(२४७) बासकसज्जा होइ सो, कहि केसव सबिलास ।
चितवै रतिगृहद्वार त्यों, पिय-आवन की आस ।१०।
शब्दार्थ-सविलास = विलासपूर्वक, विलासयुक्त । रतिगृह = प्रिय से
मिलने का गृह । त्यों = ओर ।
वासकसज्जा, यथा- (कवित्त)
(२४८) चंदन बिटप बपु कोमल अमल दल,
कलित ललित लता लपटी लवंग की ।
केसोदास तामें दुरी दीप की सिखा सी दौरि,
दुरवति नीलबास दुति अंग अंग की ।
पौन पानी पंछी पसु बस सब्द जित जित
होइ तित तित चौंकि चाहै चोप संग की ।
नंदलाल-आगम बिलोकें कुंजजाल बाल
लीनी गति तेहीं काल पंजर-पतंग की ।११।
६-यथा सवैया-मदनमनोहर छंद । कि-कैं । काहू सों-काहू कै । कोऊ-
कोई । मग०-आवत हैं मग आइ गए । आइ०-आए गए । अब आए-आए ।
बिचारि०--सखी सुनु कौने । बिचारि-विचार । १०--चितवै ०-चितै रहै । ११--
कलित-बलित, बिमल । दुरवति०--दरसत । पानी--पान । बस०--बसै सदा जित
जित, सब्द जित जित । होइ०--होइ तित तित चौंकि चाहै, बांस सदा जित
जित होइ । बिलोकें०--बिलोकिबे को कुंज बाल । लीनी--कीनी । तेहीं--तिहीं ।