रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ रसिकप्रिया
अथ श्रीराधिकाजू को किलकंचित हाव, यथा—( सवैया )
(२२०) कौने रसै बिहँसै लखि कौनहिं कापर कोपिकै भौंह चढ़ावै ।
भूलति लाज भद्द कबहुँ कबहुँ मुख अंचल मेलि दुरावै ।
कौन की लेति बलाय, बलाय ल्यौं, तेरी दसा यह मोहिं न भावै ।
ऐसी तौ तू कबहुँ न भई अब तोहिं दई जनि बाइ लगावै ।४०।
शब्दार्थ—रसै = आनंदित होती है । कापर = किस पर । बलाय =
बलैया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, तू किस आनंद में
मगन हो रही है, किसे देख हँसी है और किस पर क्रुद्ध होकर भौंहें चढ़ाती
है । कभी तो तू लज्जा छोड़ देती है और कभी लज्जावश घूंघट में मुँह छिपा
लेती है । आज किसकी बलैया ले रही है, मैं तेरी बलैया लेती हूँ, बतला ।
तेरी यह दशा मुझे अच्छी नहीं लगती । ऐसी तो तू कभी भी नहीं हुई थी,
विधाता तुझे यह हवा न लगने दे ।
अलंकार—प्रथम समुच्चय ।
सूचना—'सरदार' ने लिखा है कि यहाँ 'कौने रसै' से अभिलाष, 'कौनहि
लखि बिहँसै' से मंद हास, 'कोपिकै भौंह चढ़ावै' से 'क्रोध', 'भूलति लाज' से
'गर्व स्मित', 'कबहूँ मुख अंचल मांहि छिपावै' से भय एवम् लज्जा तथा
बलाय लेति' से हर्ष आदि भाव सूचित होते हैं ।
श्रीकृष्णजू को किलकंचित हाव, यथा—( सवैया )
(२२१) ऐसी है गोकुल के कुल की जिनि दच्छिन नैन किये अनुकूले ।
खंजन से मनोरंजन केसव हास बिलास लता लगि मूले ।
बोलें झुकौ उभकौ अनबोलें फिरौ बिझुके से हिये महिं फूले ।
रूप भए सबके बिष ऐसे हैं कान्ह कहौ रस कौन के भूले ।४१।
शब्दार्थ—दच्छिन = सब पर समान भाव रखनेवाला (नायक) ।
अनुकूल = केवल एक ही से प्रेम रखनेवाला ( नायक ) । उभकौ = चंचल,
लालायित होते हैं । बिझुके = भड़के हुए ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे कृष्ण, गोकुल के कुल में
ऐसी कौन है जिसने आपके दक्षिण नेत्रों को अनुकूल कर लिया है ? सबके
प्रति संचरित होनेवालि नेत्रों को अपनी ही ओर लगा रखा है। मन को आनं-
दित करनेवाले आपके खंजनवत् ( सुंदर ) नेत्र हास-विलास रूपी लता में
भूल रहे हैं । आप बोलने पर झुकते ( रोषयुक्त होते ) हैं और न बोलने पर
४०—रसै-त्रसै । मेलि-मेरे, मांहि । दुरावै-छिपावै । ल्यौं-त्यौं ।
४१—के कुल-को कुल । किये-करे । केसव-के सब । हास०-हार बिहार ।
झुकौ०-झुक उभकें । अनबोलें-बिन बोले । फिरौ-फिरै । के बिष-केसव ।